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Episode 13 — मुनीर बाबा का असली चेहरा
Pretika · Jinn & Spirits · 4 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- हमज़ाद
- Chapter
- 14 of 31
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 4 min
- Words
- 672
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
अगली शाम, मुझे उस अजनबी से मिलने जाना था। पर उस दोपहर जो हुआ, उसने मुझे बता दिया कि मैं मुनीर बाबा पर शक़ करके ग़लत नहीं थी।
हुआ यूँ कि मैं घर से निकली, नीचे तक गई, पर फिर मुझे याद आया कि मैं अपना phone charger ऊपर ही भूल आई हूँ। मैं वापस ऊपर गई, और चाबी से दरवाज़ा खोलने के बजाय — पता नहीं क्यों, शायद किसी अंदरूनी एहसास से — मैंने दरवाज़ा बहुत धीरे से, बिना आवाज़ किए खोला। और अंदर का जो नज़ारा मैंने देखा, उसने मेरे पैर वहीं जमा दिए।
माँ घर में नहीं थीं। और उस ख़ाली घर में, मुनीर बाबा मेरे कमरे में थे। उन्होंने फ़र्श पर एक कपड़ा बिछाया हुआ था, और उस पर कई चीज़ें रखी थीं — कुछ सूखे फूल, एक छोटा सा आईना, एक चाकू, और एक काग़ज़ जिस पर अजीब-सी आड़ी-तिरछी लकीरें बनी थीं। ये कोई हिफ़ाज़त का ताबीज़ बनाने वाला अमल नहीं लग रहा था। ये कुछ और था। कुछ जो मुझे देखते ही ग़लत लगा।
और वो धीरे-धीरे कुछ पढ़ रहे थे। पर वो किसी की हिफ़ाज़त की दुआ नहीं थी। वो किसी को बुला रहे थे। और बीच-बीच में, वो रुककर, ख़ाली हवा में ऐसे बात कर रहे थे जैसे कोई उनके सामने खड़ा हो।
मैंने उन्हें कहते सुना — ...जानता हूँ, मालिक। मैं जानता हूँ कि अमावस क़रीब है। लड़की तैयार है। बस वो हमज़ाद बीच में आ रहा है। पर आप फ़िक्र न करें। जिस पल आप उसकी ज़ंजीर खींचेंगे, वो बेबस हो जाएगा। और जब आप अपनी क़ीमत ले लेंगे, तो जो ताक़त उस हमज़ाद में है, वो लावारिस हो जाएगी... और मैं वहीं रहूँगा, उसे समेटने के लिए। बस इतना ही तो माँगा है मैंने आपसे। एक हमज़ाद। बदले में एक ज़िंदगी। सौदा तो सस्ता है, मालिक।
मेरे पूरे बदन में जैसे बर्फ़ जम गई।
तो ये था मुनीर बाबा का असली चेहरा। वो मुझे बचाने कभी आए ही नहीं थे। वो उस चीज़ के आदमी थे। उनका सौदा साफ़ था — वो अमावस की रात मुझे उस चीज़ के हवाले होने देंगे, चुपचाप, बिना किसी रुकावट के। और बदले में, जब मेरा हमज़ाद उस चीज़ के हुक्म में बेबस होगा, तो मुनीर बाबा उसकी ताक़त पर क़ब्ज़ा कर लेंगे। बिलकुल वैसे ही, जैसे डेढ़ सौ साल पहले मीर साहब ने किया था। एक और लालची अमिल, एक और हमज़ाद को ग़ुलाम बनाने की भूख। और मैं उस सौदे में सिर्फ़ वो क़ीमत थी जो चुकाई जानी थी।
तभी, शायद मेरी साँस की आवाज़ से, मुनीर बाबा का पढ़ना रुक गया। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी गर्दन घुमाई, और उनकी वो ठंडी आँखें सीधे मुझ पर आकर टिक गईं।
कुछ पल के लिए, हम दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे। मैं दहलीज़ पर, डर से जमी हुई। और वो फ़र्श पर, अपने उस काले अमल के बीच बैठे हुए। उनके चेहरे पर न कोई घबराहट थी, न कोई सफ़ाई देने की जल्दी। बस एक धीमी, ठंडी मुस्कान उभरी। उन्होंने बहुत आराम से कहा — तुमने सुन लिया।
ये सवाल नहीं था। और फिर उन्होंने जो कहा, उसने मुझे बता दिया कि अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं था। उन्होंने कहा — कोई बात नहीं, बेटा। वैसे भी, अब तुम्हारा जानना या न जानना कोई मायने नहीं रखता। अमावस में सिर्फ़ चार रातें बची हैं। और चार रातों में, एक अकेली लड़की न किसी अमिल के पास जा सकती है — क्योंकि इस इलाक़े के हर अमिल को मैं जानता हूँ — और न कहीं भाग सकती है। तुम बस अपनी माँ के पास चुपचाप बैठी रहो। और उस रात का इंतज़ार करो।
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने बस अपना बैग उठाया, और सीढ़ियाँ उतरकर तेज़ी से बाहर निकल गई — मुनीर बाबा की उस ठंडी हँसी को पीछे छोड़ते हुए।
चार रातें। मेरे पास सिर्फ़ चार रातें थीं। और अब मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं था। मैं सीधे उस पते की तरफ़ चल पड़ी जो उस अजनबी ने भेजा था — इस उम्मीद में कि जो फटे हुए पन्ने उसके पास थे, उनमें मेरी बची हुई ज़िंदगी का कोई रास्ता हो।
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