Pretika › Jinn & Spirits › हमज़ाद
Episode 12 — उसकी दुनिया
Pretika · Jinn & Spirits · 4 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- हमज़ाद
- Chapter
- 13 of 31
- Category
- Jinn & Spirits
- Reading time
- 4 min
- Words
- 797
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
उस रात, मैं मुनीर बाबा वाला ताबीज़ पहनकर सोने का नाटक करती रही, और जब घर में सब सो गए, तो मैंने वो ताबीज़ धीरे से उतार दिया।
मुझे कल उस अजनबी से मिलने जाना था। पर उससे पहले, मैं एक बात जान लेना चाहती थी — उससे, जो जन्म से मेरे साथ था। मैं जानना चाहती थी कि वो आख़िर है क्या। क्योंकि जब तक मैं ये न जानूँ कि मेरे साथ जो है वो कैसा है, मैं ये कैसे तय करती कि उस पर भरोसा करूँ या नहीं।
मैंने अँधेरे में कहा — मुझे अपनी दुनिया दिखाओ। मुझे बताओ तुम क्या हो।
कुछ पल की ख़ामोशी के बाद, वो खुशबू आई। पर इस बार उसके साथ कुछ और भी आया। मेरी आँखें खुली थीं, पर कमरा धीरे-धीरे बदलने लगा — जैसे मैं जागते हुए भी किसी सपने में उतर रही हूँ। मेरे कमरे की दीवारें धुएँ की तरह घुलने लगीं, और उनके पार, एक और ही दुनिया खुलने लगी।
मैं जो देख रही थी, उसे शब्दों में बाँधना मुश्किल है। वहाँ ज़मीन नहीं थी, आसमान नहीं था — बस आग थी। पर वो आग जलाती नहीं थी। वो हर रंग की थी, नीली, बैंगनी, सुनहरी — और वो साँस ले रही थी, हिल रही थी, जैसे कोई ज़िंदा समंदर हो। दूर-दूर तक, उस आग के समंदर में, कुछ आकृतियाँ थीं — धुएँ से बनी, आती-जाती, बदलती हुई। ये उसकी दुनिया थी। जिन्नात की दुनिया। धुएँ और बे-धुएँ की आग से बनी एक ऐसी जगह, जो हमारी दुनिया के ठीक बग़ल में, एक परदे के पीछे, हमेशा से मौजूद है — और हमें कभी दिखती नहीं।
और तभी, पहली बार, मैंने उसे देखा। पूरा नहीं। एक आकृति, उस आग के बीच, मेरी तरफ़ मुड़ी हुई। धुएँ और रौशनी से बनी, पर इंसानी शक्ल में — लंबा, गहरा, और उसकी आँखें उसी आग की तरह जल रही थीं, पर उनमें एक ऐसी नरमी थी, एक ऐसी थकान, जो सदियों के इंतज़ार से आती है। जैसे ही मैं उसका चेहरा ध्यान से देखने की कोशिश करती, वो धुएँ में घुल जाता। पर मैंने उसकी मौजूदगी को महसूस किया। और वो मुझे इतना अपना लगा कि मेरी आँखें भर आईं।
उसने कहा — यही मैं हूँ, ज़ोया। इसी आग से मैं बना हूँ, जिस पल तू मिट्टी और साँस से बनी। हम दोनों एक ही धागे के दो सिरे हैं। तेरी हर साँस के साथ, मेरी एक साँस चलती है। जिस दिन तेरी आख़िरी साँस निकलेगी, उसी दिन मेरी भी। इसीलिए मैं तुझसे बँधा हूँ — तेरी हिफ़ाज़त करना मेरी फ़ितरत नहीं, मेरी बनावट है। तू है, तो मैं हूँ।
मैंने पूछा — फिर उस चीज़ ने, 'आग के पार रहने वाले' ने, तुम्हें अपना ग़ुलाम कैसे बना लिया? अगर तुम सिर्फ़ मेरे हो, तो उसका तुम पर हुक्म क्यों चलता है?
उसकी वो जलती आँखें एक पल के लिए बुझ-सी गईं। उसने कहा — क्योंकि जब तेरे पुरखे ने उससे सौदा किया, तो उसने सिर्फ़ अपनी नहीं, अपने खून के हर हमज़ाद की डोर उस चीज़ के हाथ में दे दी। तेरे जन्म के साथ जब मैं बना, तो मैं आज़ाद नहीं बना। मैं एक ज़ंजीर के साथ बना, जिसका दूसरा सिरा उसके हाथ में है। जिस रात वो उस ज़ंजीर को खींचेगा, मुझे उसके पीछे जाना होगा, चाहे मैं कितना भी न चाहूँ। और मुझे तुझे उसके हवाले करना होगा।
मैं ख़ामोश रही। फिर मैंने वो सवाल पूछा जो असल में मैं पूछने आई थी — तो क्या इस ज़ंजीर को तोड़ा नहीं जा सकता?
उसने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। फिर, बहुत धीरे से, जैसे ये कहना उसके लिए भी दर्द भरा हो, उसने कहा — एक ही तरीक़ा है, ज़ोया। जो गाँठ जिसने बाँधी हो, उसे उसी के हाथों खुलवाया जा सकता है। ये ज़ंजीर तेरे पुरखे, मीर साहब ने बाँधी थी, अपने लहू से, अपने लफ़्ज़ों से। ये तभी टूटेगी जब कोई उसी लहू का — यानी तू — वो अमल उलटा कर दे जो उन्होंने किया था। उसी अमावस की रात, उसी वक़्त, उस चीज़ के सामने।
पर क्या? — मैंने पूछा, क्योंकि मैं उसकी आवाज़ में वो अधूरापन महसूस कर सकती थी।
और उसने जो कहा, वो मुझे उस पूरी रात कचोटता रहा। उसने कहा — पर उस अमल की एक क़ीमत है। और वो क़ीमत मैं हूँ। अगर तू ये ज़ंजीर तोड़ेगी, तो वो धागा भी टूट जाएगा जो हमें बाँधता है। तू आज़ाद हो जाएगी — उस चीज़ से भी, और मुझसे भी। मैं मिट जाऊँगा, ज़ोया। हमेशा के लिए। जैसे मैं कभी था ही नहीं।
वो धुएँ की दुनिया धीरे-धीरे मिटने लगी, और मेरा कमरा वापस लौट आया। पर उसकी वो आख़िरी बात हवा में टँगी रह गई। इस कर्ज़ से मेरी आज़ादी का एक ही रास्ता था — और उस रास्ते पर, उसे मिटना था। उसे, जो मुझे इस दुनिया में सबसे ज़्यादा, सबसे पुराना जानता था।
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