PretikaJinn & Spiritsहमज़ाद

Episode 11 — डायरी का छुपा पन्ना

Pretika · Jinn & Spirits · 4 मिनट

Writer
Pretika
Story
हमज़ाद
Chapter
12 of 31
Category
Jinn & Spirits
Reading time
4 min
Words
748
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अगली सुबह जब मैं कमरे से बाहर निकली, तो मुनीर बाबा पहले से जागे हुए थे, और उनकी नज़रें सीधे मेरी गर्दन पर टिकी थीं — वहाँ, जहाँ वो नया ताबीज़ होना चाहिए था, पर नहीं था।
उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मुझे देखते रहे, फिर उन्होंने एक लंबी साँस अंदर खींची, जैसे हवा को सूँघ रहे हों। और मैं जानती थी, उन्हें वो खुशबू मिल गई थी। वो ऊद वाली, गरम खुशबू, जो अब तक मेरे कमरे में, मेरे बालों में, मेरे कपड़ों में बसी हुई थी। मुनीर बाबा का चेहरा सख़्त हो गया।
बेटा, उन्होंने बहुत ठहरी हुई आवाज़ में कहा, तुमने रात को उससे बात की।
ये सवाल नहीं था। ये इल्ज़ाम था। मैंने झूठ बोलने की कोशिश की — नहीं बाबा, मुझे नींद नहीं आ रही थी, बस... — पर उन्होंने मेरी बात बीच में काट दी। वो जो तुम्हारे साथ है, वो सैकड़ों साल पुराना है, ज़ोया। और तुम बाईस-तेईस साल की एक लड़की हो। जब वो तुमसे बात करता है, तो वो अपनी बात नहीं कहता — वो वो कहता है जो तुम सुनना चाहती हो। वो तुम्हारे दिल में झाँककर, वहीं से अपने लफ़्ज़ चुनता है। तुम्हें लगेगा वो तुमसे प्यार करता है, कि वो तुम्हें बचाना चाहता है। पर ये सब उसका जाल है, ताकि तुम वो ताबीज़ न पहनो, और जिस रात उसका मालिक आए, तुम बे-हिफ़ाज़त, अकेली, उसके हवाले होने के लिए तैयार बैठी हो।
एक पल के लिए, उनकी बात ने मुझे हिला दिया। क्योंकि वो पूरी तरह ग़लत नहीं लग रही थी। मैं कैसे यक़ीन कर लूँ कि जो आवाज़ मुझसे मोहब्बत की बात कर रही है, वो सच बोल रही है? पर फिर मुझे उनकी वो एक पल की घबराहट याद आई। और वो भाप पर लिखा 'भागो' याद आया। और सबसे बढ़कर — मुझे याद आया कि जिस रात वो ठंडी चीज़ मुझे लेने आई थी, मुनीर बाबा ने कहा था, 'आज रात जो भी हो, उसे रोकने की कोशिश मत करना, बस देखती रहना'। जैसे उन्हें पहले से पता हो कि कुछ आने वाला है। जैसे वो चाहते हों कि वो चीज़ अपना काम कर जाए।
तो मैंने वही किया जो शायद मुझे बहुत पहले करना चाहिए था। मैंने मुनीर बाबा पर यक़ीन करना बंद कर दिया।
मैंने ऊपर से हामी भर दी — ठीक है बाबा, मैं आज से ताबीज़ पहन लूँगी। मैंने वो ताबीज़ गले में डाल भी लिया, उनके सामने। पर मन ही मन, मैंने एक फ़ैसला कर लिया था। मुझे किसी और के भरोसे नहीं रहना था। मुझे खुद जानना था कि इस कर्ज़ से बचने का कोई रास्ता है या नहीं। और उसका एक ही सिरा मेरे पास था — मीर साहब की वो डायरी।
उस दोपहर, जब माँ आराम कर रही थीं और मुनीर बाबा नमाज़ के लिए बैठे थे, मैंने चुपके से वो डायरी दोबारा निकाली और एक-एक पन्ना ध्यान से पढ़ना शुरू किया। पहले तो वही सब था जो मैं जानती थी। पर डायरी के आख़िर में, कुछ पन्ने ऐसे थे जिन पर मीर साहब ने अपनी मौत से ठीक पहले, काँपते हाथों से कुछ और लिखा था। और वहाँ, एक जगह, एक लाइन थी जिसने मेरी साँस रोक दी।
उन्होंने लिखा था — इस कर्ज़ को तोड़ने का एक रास्ता है। मैंने वो रास्ता ढूँढ़ लिया है। पर उसकी क़ीमत इतनी भारी है कि...
और वहीं, ठीक वहीं, अगला पन्ना फटा हुआ था। साफ़-साफ़ फटा हुआ। किसी ने, किसी वक़्त, वो पन्ने जान-बूझकर निकाल दिए थे — ठीक वो पन्ने जिन पर कर्ज़ तोड़ने का तरीक़ा लिखा था। मैंने पूरी डायरी उलट-पुलट डाली, पर वो पन्ने कहीं नहीं थे।
मैं वहीं बैठी रह गई, हताश। इतने क़रीब आकर, रास्ता मेरे हाथ से फिसल गया था। और तभी मेरा phone vibrate हुआ।
वही अनजान number। वही जिससे पहले messages आए थे। इस बार लिखा था — डायरी के फटे हुए पन्ने ढूँढ़ रही हो? वो मेरे पास हैं। मेरे दादा ने उनकी नक़ल बना ली थी, बहुत साल पहले। अगर सच में इस कर्ज़ से बचना चाहती हो, तो कल शाम, अकेली, इस पते पर आना। और किसी को — ख़ासकर उस अमिल को — मत बताना। नीचे एक पता लिखा था।
मैंने वो message कई बार पढ़ा। ये एक अजनबी था। ये एक जाल हो सकता था। पर उसके पास वो चीज़ थी जो मुझे इस दुनिया में सबसे ज़्यादा चाहिए थी। और सच कहूँ, इस पूरी कहानी में, यही पहला इंसान था जिसने मुझे कुछ 'करने' का रास्ता दिखाया था, सिर्फ़ डराया नहीं था। मैंने जवाब में सिर्फ़ एक लफ़्ज़ लिखा — आऊँगी।

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