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एपिसोड 4 — काला दरवाज़ा
firoj saifi · Haunted Places · 2 मिनट
अरमान और रीवा दौड़कर माही के कमरे में पहुँचे।
माही काँप रही थी।
"वो लड़की कौन थी?" अरमान ने पूछा।
माही रोते हुए बोली,
"वो कह रही थी... मुझे बाहर निकालो।"
उस रात के बाद हवेली का माहौल बदल गया।
दरवाज़े अपने आप खुलने लगे।
बत्तियाँ अचानक बंद हो जातीं।
और हर रात ठीक ढाई बजे किसी की आवाज़ किसी न किसी का नाम लेकर पुकारती।
अरमान ने आखिरकार फैसला किया।
वह काला दरवाज़ा खोलेगा।
रामदीन ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की।
"मालिक, वहाँ मत जाइए।"
लेकिन अरमान नहीं माना।
पुरानी अलमारी से एक जंग लगी चाबी मिली।
वह चाबी जैसे उसी दरवाज़े के लिए बनी थी।
अरमान ने ताले में चाबी घुमाई।
क्लिक।
दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
अंदर अंधेरी सीढ़ियाँ थीं।
नीचे तहखाना था।
हवा में सीलन और किसी जली हुई चीज़ की गंध थी।
अरमान टॉर्च लेकर नीचे उतरा।
दीवारों पर गहरी खरोंचें थीं।
जैसे किसी ने नाखूनों से पत्थर नोचा हो।
तहखाने के बीच में उसे टूटी हुई चूड़ियाँ मिलीं।
और एक जंग लगी बेड़ी।
अरमान ने बेड़ी को हाथ लगाया।
उसी क्षण पीछे का दरवाज़ा जोर से बंद हो गया।
धड़ाम!
अरमान पलटा।
"कौन है?"
कोई जवाब नहीं।
फिर उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाया—
"तुमने बहुत देर कर दी..."
अरमान के हाथ से टॉर्च गिर गई।
अंधेरे में कुछ उसके पीछे खड़ा था।
उसने किसी तरह दरवाज़ा तोड़ा और बाहर भाग आया।
उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।
अब उसे समझ आ गया था—
इस हवेली में कुछ ऐसा था जिसे सिर्फ पुराना घर कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
""""एपिसोड 5""""
- Writer
- firoj saifi
- Story
- दरवाज़े के उस पार , Season 1
- Chapter
- 4 of 8
- Category
- Haunted Places
- Reading time
- 2 min
- Words
- 261
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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