PretikaVillage Horrorरक्तवन

भाग 10 — नई सुबह

Pretika · Village Horror · 6 मिनट

Writer
Pretika
Story
रक्तवन
Chapter
10 of 10
Category
Village Horror
Reading time
6 min
Words
1021
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

मड़ई का जंगल तीन दिन जलता रहा।

मगर अजीब बात — आग जंगल से बाहर नहीं आई। न गाँव छुआ, न खेत, न आसपास के पहाड़। आग ने सिर्फ वो जलाया — जो मड़याली का था। जैसे आग को भी पता था — इसका काम बलि नहीं, मुक्ति है।

तीसरे दिन — बारिश हुई।

और चौथे दिन सुबह — जहाँ दो सौ साल से घना, अंधेरा, बुलाता हुआ जंगल था — वहाँ सिर्फ राख का मैदान था।

और राख में — हर वो जगह जहाँ कभी पेड़ खड़ा था — एक छोटा-सा पत्थर उभर आया था। हज़ारों पत्थर। जैसे कब्रें।

जैसे जंगल ने — मरते-मरते — अपने मेहमानों को कब्रें दे दीं।

✦ ✦ ✦

रघुवीर लौटा — छुटकी के साथ।

बच्ची अल्मोड़ा से भागकर वापस आई थी, बीच रास्ते से। रघुवीर ने बताया — "मैं इसे रोक नहीं पाया। ये रोज़ खिड़की से पहाड़ की तरफ देखती थी। और जिस दिन जंगल जला — इसने मेरा हाथ पकड़ा और इशारे से कहा — 'अब चलो। वो बुला रहा है।'"

छुटकी राख के मैदान में उतरी।

देव उसे रोकना चाहता था — मगर रघुवीर ने उसका हाथ पकड़ लिया। "जाने दे। इसे इससे ज़्यादा पता है, हमसे।"

छुटकी राख में चली। धीरे-धीरे। बीच तक — जहाँ कभी वो मृत पीपल खड़ा था।

वहाँ — राख के ढेर में से — एक छोटा-सा हरा पौधा निकला हुआ था।

एक पत्ता। सिर्फ एक।

छुटकी ने उस पौधे के पास घुटने टेके। उसने अपनी छोटी-सी उंगली पत्ते पर रखी।

और — देव और रघुवीर ने दूर से देखा — छुटकी रोने लगी।

बिना आवाज़ के। बस आँसू।

फिर उसने वो किया जो उसने ज़िंदगी में कभी नहीं किया था।

उसने अपने होंठ खोले। गला काँपा। और एक शब्द — टूटा-फूटा, खरखरा हुआ, ग्यारह साल की खामोशी से भरा — निकला:

"मा... माँ..."

रघुवीर की लाठी गिर गई।

"ये... ये तो गूँगी है..."

"थी," देव ने धीरे से कहा। उसकी अपनी आँखें भीग रही थीं, "शायद — अब नहीं है।"

✦ ✦ ✦

बाद की बातें जल्दी-जल्दी हुईं।

देव ने अपनी रिपोर्ट लिखी — मगर पत्र नहीं दिया। पत्र जला दिया। सरपंच ठकुरदारी सिंह ने खुद पंचायत बुलाई — और सौ साल के सौदे की सच्चाई गाँव के सामने रखी। गाँव ने — पहली बार — अपने मारे हुए लोगों के लिए — एक श्राद्ध किया। हज़ारों पत्थरों के बीच। हर परिवार ने एक दीया जलाया।

पुरोहित रघुनाथ जोशी उस रात गायब हो गया जिस रात जंगल जला। कुछ कहते हैं — वो राख के मैदान में चला गया और कभी नहीं लौटा। कुछ कहते हैं — उसकी आवाज़ अब भी — कभी-कभी — पहाड़ों में सुनाई देती है, माफी माँगती हुई।

रघुवीर ने आखिरी बार मड़ई की राख पर एक लोहे की कुल्हाड़ी गाड़ दी — जिस पर उसने खुद अपने हाथ से लिखवाया:

"श्याम रावत — वनरक्षक। जिसने अपना फर्ज निभाया। और अपने बेटे को सिखाया — कि असली रखवाली जंगल की नहीं, इंसानियत की होती है।"

देव ने इस्तीफा नहीं दिया। उसने मड़ई रेंज में ही रहने की अर्ज़ी दी — जो अब रेंज नहीं, सिर्फ एक खुला मैदान था। वनविभाग ने हैरानी से मंज़ूर कर दिया।

और छुटकी —

छुटकी का नाम अब छुटकी नहीं था। देव ने उसे गोद लिया — कानूनी कागज़ात, पूरे ढंग से — और नाम रखा:

"श्यामली। अपने बाप के नाम पर।"

✦ ✦ ✦

एक साल बाद की बात है।

मड़ई के मैदान में — जहाँ राख थी — अब घास उग आई थी। हरी, ताज़ी, सामान्य घास। चिड़ियाँ आ गई थीं। पहली बार — दो सौ साल में — उस ज़मीन पर पक्षी बोल रहे थे।

देव और श्यामली अपनी चौकी के सामने बैठे थे। श्यामली अब बोलती थी — थोड़ा-थोड़ा, धीरे-धीरे, मगर बोलती थी। उसका पहला पूरा वाक्य ये था:

"बाबा, आज पौधे को पानी देना है।"

वो पौधा — राख वाला एक-पत्ते वाला पौधा — अब चार फीट का हो चुका था। देव ने उसे पीपल की जगह से उखाड़कर चौकी के सामने लगा दिया था। ये किसी न पेड़ की प्रजाति का नहीं था — वनविभाग के वैज्ञानिक भी आए, देखे, सिर खुजाए, चले गए।

उसके पत्ते — गोल थे, छोटे, और हर पत्ते के बीच में एक हल्की-सी लाल नस चलती थी।

श्यामली उससे रोज़ बातें करती थी। और कभी-कभी — देव ने देखा — पौधा हिलता था।

बिना हवा के।

जैसे जवाब दे रहा हो।

एक शाम, देव ने श्यामली से पूछा — "बेटा, तू इस पेड़ से क्या बातें करती है?"

श्यामली ने पत्ते पर हाथ रखा। कुछ देर सुना।

फिर मुस्कुराई।

"ये कह रहा है — अब उसे भूख नहीं लगती। ये कह रहा है — उसे नींद आती है, और सपनों में एक औरत लोरी गाती है। और ये कह रहा है —"

श्यामली रुक गई।

"और क्या कह रहा है?"

श्यामली ने देव की तरफ देखा। उसकी आँखों में — एक पल को — वो पुरानी गहराई झलकी जो गुफा वाले दिनों में थी।

"ये कह रहा है — धन्यवाद। और — ये पूछ रहा है — कि क्या वो एक दिन आपसे मिल सकता है? इंसान बनकर?"

देव ने पेड़ को देखा।

पेड़ के सबसे ऊपर वाले पत्ते पर — उस लाल नस ने — एक निशान बना लिया था।

एक छोटा-सा, पाँच उंगलियों वाला —

हाथ।

देव ने उस हाथ की तरफ अपना हाथ बढ़ाया।

और पत्ता — झुककर — उसकी हथेली को छू गया।

गर्म था।

इंसानी हाथ-सा गर्म।

"क्यों नहीं," देव ने धीरे से कहा — आँखों में आँसू, होंठों पर मुस्कान, "बता दे उसे — इस बार गोद तैयार रहेगी। पहले से।"

✦ ✦ ✦

रात हुई।

देव ने चौकी का दरवाज़ा बंद किया। कुंडी लगाई — आदतन। और बिस्तर पर लेट गया।

रात के बारह बजे — दरवाज़े पर खटखट हुई।

देव की आँख खुली। पुरानी आदत से उसने गिनी —

खट... खट... खट...

तीन।

उसने मुस्कुराते हुए आँखें बंद कर लीं। इंसान होगा। गाँव का कोई। सुबह देख लेगा।

मगर तभी —

खट...

चौथी।

देव की आँखें खुल गईं।

बाहर — पूरी खामोशी। फिर — एक आवाज़। बच्चे की आवाज़। मगर कोई जानी-पहचानी आवाज़ नहीं। बिल्कुल नई। मीठी। बहुत मीठी।

"बाबा..." आवाज़ ने कहा, "श्यामली को बुलाओ ना... बाहर... मुझसे मिलने... उसका भाई आया है..."

देव बिस्तर पर पत्थर-सा जम गया।

उसने धीरे से मुड़कर — दूसरे बिस्तर पर देखा।

श्यामली का बिस्तर —

खाली था।

और खिड़की — जो उसने रात को बंद की थी —

खुली थी।

बाहर, अंधेरे में, पौधे के पास — दो छोटी-छोटी आकृतियाँ खड़ी थीं।

हाथ में हाथ डाले।

और एक आकृति ने — धीरे से — देव की तरफ मुड़कर —

हाथ हिलाया।

मगर कहते हैं —
जंगल कभी मरता नहीं।
जंगल बस — नया रूप लेता है।

(रक्तवन — सीज़न 2: "जो बच्चा लौटा" — जल्द ही)

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