PretikaVillage Horrorरक्तवन

भाग 9 — आग

Pretika · Village Horror · 6 मिनट

Writer
Pretika
Story
रक्तवन
Chapter
9 of 10
Category
Village Horror
Reading time
6 min
Words
1160
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

उस रात मड़ई के जंगल ने वो दिखाया जो दो सौ साल में किसी ने नहीं देखा था।

बंदी — जो मड़याली के अपने शिकार थे — उसी के खिलाफ खड़े हो गए। सैकड़ों आधे-इंसान-आधे-पेड़ — अपने उखड़े पैरों से रस बहाते हुए — अपनी माँ के सामने दीवार बन गए।

मड़याली ने उन्हें देखा। उसके चेहरे पर क्रोध था — मगर क्रोध के नीचे, बहुत गहरे — कुछ और था।

अकेलापन।

"तुम सब..." उसकी आवाज़ काँपी, "मेरे बच्चे... मैंने तुम्हें पाला... दो सौ साल... तुम मेरे अंदर रहे... और आज — आज तुम मेरे खिलाफ खड़े हो?"

"माँ," एक बूढ़ी बंदी बोली — उसकी आवाज़ पत्तों-सी सरसराई, "तूने हमें पाला नहीं। तूने हमें खाया। और हम तुझसे डरते थे — मगर आज — आज हम इस बच्चे की आँखों में वो देख रहे हैं जो हमने दो सौ साल में नहीं देखा।"

"क्या?"

"हिम्मत। बिना डर के दिया हुआ।"

मड़याली ने देव की तरफ देखा।

देव बोरे के साथ खड़ा था। माचिस हाथ में।

"रुक जा," मड़याली ने धीरे से कहा — और उसकी आवाज़ में अब वो मीठापन था जो रात में चौकी के दरवाज़े पर आता था, "बेटा। मैं तुझे तेरे पिता देती हूँ। ज़िंदा। पूरा। मैं उसे इस छाल से निकाल दूँगी — अभी। तू बस वो माचिस ज़मीन पर रख दे। और चला जा। मैं तुझे कभी नहीं बुलाऊँगी। वादा।"

देव के हाथ काँपे।

पिता। ज़िंदा। वापस।

चौबीस साल का खालीपन — एक पल में भर सकता था।

उसने श्याम रावत की तरफ देखा।

श्याम रावत — घुटनों पर, रस बहाते हुए — मुस्कुराया। और सिर हिलाया।

"बेटा," उसने कहा, "अगर तूने ये सौदा किया — तो मैं ज़िंदा लौटकर भी मरा रहूँगा। क्योंकि मेरी ज़िंदगी की कीमत — अगली अमावस की किसी छुटकी होगी। मैं ऐसे बाप नहीं हूँ। और तू ऐसा बेटा नहीं है।"

देव ने माचिस कसकर पकड़ी।

"मैं आया था तुझे लेने, पापा।"

"और तू ले जाएगा।" श्याम रावत की आँखों से रस-से आँसू बहे, "मगर मुझे — जैसा मैं हूँ। जहाँ मैं हूँ। एक बाप अपने बेटे से यही माँगता है — कि बेटा उससे अच्छा निकले।"

मड़याली चीखी — "बहुत हुआ!"

और उसने अपनी पूरी शक्ति उगल दी।

मैदान की ज़मीन साफ उठी। बंदियों की दीवार — टूटी — बिखरी। जड़ों का तूफान — सीधा देव की तरफ।

देव दौड़ा। बंदियों के टूटते घेरे से — सीधा मृत पीपल की तरफ। जड़ों ने उसकी पीठ नोची। एक जड़ उसकी टांग में घुसी — उसने कुल्हाड़ी से काटी। खून बहा — मगर वो पीपल तक पहुँचा।

बोरा फाड़ा। किरोसीन के डिब्बे — एक, दो, तीन, चार — पीपल की जड़ों पर, उस विशाल तने पर, उस देवी-से चेहरे पर — खाली कर दिए।

"नहीं!" मड़याली की चीख ने उसके कान फोड़ दिए। उसकी आँखों से खून बहा।

और वो खुद आई।

ज़मीन छोड़कर — उड़ती हुई — जड़ों के साथ — सीधा देव की तरफ। उसकी छाल-ढकी उंगलियाँ देव के गले पर कसने वाली थीं —

मगर उसके पेट का उभार — फिर हिला।

तेज़। बहुत तेज़।

मड़याली हवा में रुक गई।

उसकी आँखें — लकड़ी के चक्र वाली आँखें — नीचे अपने पेट पर गईं।

देव ने वो पल देखा। और बिना सोचे — चीखकर — उससे नहीं — उसके पेट से बोला:

"सुन! तू सुन रहा है ना?! तेरी माँ वैद्या थी! लोग उसे देवी कहते थे! मुर्दे के सिरे तक पहुँचे आदमी को ज़िंदा करती थी वो! तू उस देवी का बच्चा है — इस भूख का नहीं! दो सौ साल से तू दर्द सुन रहा है — चीखें सुन रहा है — मगर उससे पहले — तेरी माँ की गोद में गाने भी तो थे! वो गाने याद कर! वो हाथ याद कर — जो इलाज करता था — मारता नहीं था!"

मड़याली पत्थर-सी जम गई।

और उसके पेट में — धीरे-धीरे — एक आवाज़ उठी।

बिल्कुल हल्की। बिल्कुल छोटी।

रोने की आवाज़।

बच्चे की रोने की आवाज़ — दो सौ साल पुराने, कभी न जन्मे बच्चे की।

मड़याली ज़मीन पर उतरी। उसके पैर लड़खड़ाए। उसने अपने पेट को दोनों हाथों से थामा — और पहली बार — दो सौ साल में पहली बार — उसकी छाल से असली आँसू बहे।

"रो रहा है..." उसने फुसफुसाया, "मेरा बच्चा... रो रहा है... दो सौ साल से वो बस भूखा था... आज पहली बार... रो रहा है..."

उसने ऊपर देखा। देव को देखा। फिर श्याम रावत को। फिर बिखरी हुई बंदियों को — अपने खाये हुए लोगों को।

"मैं वैद्या थी," उसने कहा। बहुत धीरे। जैसे खुद को याद दिला रही हो, "मैंने... मैंने कितने लोगों को बचाया था... गाँव के बच्चे मुझे 'मड़याली माँ' कहते थे... और फिर उन्हीं बच्चों के बाप ने मुझे जलाया... और मैंने... मैंने क्या बना दिया खुद को..."

"माँ," श्याम रावत बोला, "देर नहीं हुई है। आखिरी इलाज — सबसे बड़ा इलाज — अभी बाकी है।"

मड़याली ने उसे देखा।

"कौन सा?"

"अपने बच्चे का। उसे भूख से मुक्त कर। उसे इस जंगल से मुक्त कर। उसे — जन्म दे। असली जन्म। जो अग्नि के बाद होता है।"

मड़याली बहुत देर चुप रही।

पूरा जंगल चुप रहा।

फिर — उसने देव से हाथ बढ़ाया।

"माचिस दे।"

देव ने काँपते हाथ से माचिस का बक्सा उसकी छाल-ढकी हथेली पर रखा।

मड़याली ने बक्सा देखा। फिर देव को देखा।

"बेटा — एक बात बता। अगर मैं जल गई — और मेरा बच्चा जल गया — तो क्या कहीं... किसी जन्म में... वो फिर आएगा? इंसान बनकर? सामान्य बच्चा बनकर? जिसे माँ की गोद मिले?"

देव की आँखों में आँसू आ गए।

"आएगा। मैं वादा करता हूँ — आएगा।"

मड़याली मुस्कुराई।

और उस मुस्कान में — दो सौ साल बाद — वो वैद्या झलकी जो कभी मड़ई के मैदान में लोगों का इलाज करती थी।

"भाग, बेटा। जितना तेज़ भाग सके। जंगल तुझे रोकेगा — मरते हुए भी — मगर मैं उसे रोकूँगी। मेरी आखिरी ताकत — तेरे साथ।"

"और मेरे पिता—"

"तेरे पिता को मैं खुद छुड़ाऊँगी।" मड़याली ने श्याम रावत की तरफ देखा, "चौबीस साल की मेहमानी का बदला — आज चुकाऊँगी।"

देव ने आखिरी बार अपने पिता को देखा।

श्याम रावत ने उसे — हाथ उठाकर — आशीर्वाद दिया।

"जा बेटा। और सुन — बाहर निकलकर पीछे मुड़कर मत देखना। कभी नहीं। मैं चाहता हूँ तेरी आखिरी याद — ये न हो।"

देव भागा।

पीछे से — माचिस चलने की आवाज़ आई।

फिर — दहकने की।

फिर — एक आवाज़ — जो चीख नहीं थी। गाना थी।

मड़याली गा रही थी।

कोई पुरानी लोरी — जो शायद वो अपने बच्चे को सुनाना चाहती थी दो सौ साल पहले। और उस लोरी के साथ — आग उठी।

देव भागता रहा। जंगल उसे रोकने लगा — डालियाँ झुकीं, जड़ें उठीं — मगर हर बार, हर जगह, कुछ उसे रोकने आता — और रुक जाता। जैसे कोई बड़ा हाथ — माँ का हाथ — उसे रास्ता दे रहा हो।

और जब वो जंगल के किनारे पहुँचा — पहाड़ी के ऊपर भोर हो रही थी।

उसने पीछे नहीं देखा।

पीछे — पूरा जंगल जल रहा था।

मगर आग की लपटों में — कोई चीख नहीं थी।

सिर्फ लोरी थी।

और फिर — एक-एक करके — जलते जंगल से — रोशनी उठने लगी।

छोटी-छोटी। सैकड़ों। हज़ारों। दीयों-सी रोशनियाँ — धुएँ से निकलकर — ऊपर — आसमान की तरफ — तैरती हुईं।

आत्माएँ।

दो सौ साल की कैद — मुक्त।

देव ने उनमें से एक रोशनी को देखा — जो बाकियों से अलग, उसके पास आकर — एक पल के लिए — रुकी।

उसने उस रोशनी में — कुछ नहीं देखा।

मगर सुना।

"जी, बेटा।"

और रोशनी — आसमान में समा गई।

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