PretikaVillage Horrorरक्तवन

भाग 8 — जंगल का दिल

Pretika · Village Horror · 7 मिनट

Writer
Pretika
Story
रक्तवन
Chapter
8 of 10
Category
Village Horror
Reading time
7 min
Words
1238
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अमावस की रात।

कोई चाँद नहीं। तारे भी बादलों के पीछे थे। ढकानी गाँव ने अपने दीये बुझा दिए थे — परंपरा थी। अमावस की रात गाँव अंधेरा रखता था, ताकि जो जंगल से लौटे — उसे घर का रास्ता न दिखे।

देव अकेला खड़ा था जंगल के किनारे।

कमर पर कुल्हाड़ी। पीठ पर बोरा — जिसमें किरोसीन के चार डिब्बे, माचिस के पाँच बक्से, और आग लगाने के लिए देसी बम — रघुवीर ने शिकारियों से सीखा हुआ तरीका। गले में उल्टी कुंडी। जेब में पिता की तस्वीर।

उसने एक गहरी साँस ली।

"मैं आ गया," उसने जंगल से कहा। ज़ोर से। साफ। "अपनी मर्ज़ी से। अब रास्ता दिखा।"

जंगल में — एक हलचल उठी।

पेड़ हिले — बिना हवा के। और दो पेड़ों के बीच — जहाँ पहले घना अंधेरा था — एक रास्ता खुल गया। धुंधला-सा, चांदनी-सा रास्ता, जो अंदर की तरफ टेढ़ा-मेढ़ा जाता था।

देव चल पड़ा।

रास्ता बदलता रहा। कभी बाएँ, कभी दाएँ। आसपास के पेड़ों की छाल में चेहरे जाग रहे थे — देव चलता, और छाल के अंदर आँखें खुलतीं। सैकड़ों आँखें। सब उसे देखतीं। किसी में दया थी। किसी में लालच। किसी में — बहुत-कुछ में — बस एक बेबसी।

एक पेड़ से फुसफुसाहट आई, "वापस जा..."

दूसरे से, "चला जा... बच भाग..."

तीसरे से — एक बूढ़ी औरत की आवाज़, "बेटा... ये आखिरी रास्ता है... आगे लौटना नहीं..."

देव रुकी नहीं।

और फिर — रास्ता खुल गया।

एक खाली मैदान — जंगल के बीचों-बीच। गोल। शायद सौ कदम चौड़ा। मैदान के बीच में —

वो पेड़ खड़ा था।

मृत पीपल। दो सौ साल मरा हुआ, मगर गिरा नहीं। उसकी डालियाँ आसमान में इस तरह फैली थीं जैसे किसी ने काले हाथ फैला रखे हों। तना इतना मोटा कि दस आदमी मिलकर भी नाप न सकें। और तने पर — कोई चेहरा नहीं था।

क्योंकि तना खुद — एक चेहरा था।

छाल के उभार से बना हुआ — विशाल, सोया हुआ, एक औरत का चेहरा। बंद आँखें। शांत होंठ। जैसे कोई देवी अपने मंदिर में सो रही हो।

और उस पेड़ के चारों तरफ — गोल घेरे में — खड़े थे वे।

सैकड़ों।

आदमी, औरतें, बच्चे। दो सौ साल के कपड़ों में। नंगे पैर — टखनों तक ज़मीन में गड़े। छाल से ढके बदन। आधे इंसान, आधे पेड़। उन्नीस गाँव वाले जो एक रात में गए थे। बारह-बारह साल की बलियाँ। मुसाफिर। अनाथ। बेसहारे।

और सबसे आगे — दो पेड़ों के बीच — श्याम रावत खड़ा था।

"पापा।" देव की आवाज़ निकल गई।

श्याम रावत ने अपने बेटे को देखा। उसकी छाल-ढके चेहरे पर — एक दरार चली। आँसू? या रस?

"बेटा... तू आ गया।"

और तभी — मैदान की ज़मीन काँपी।

मृत पीपल की जड़ों के नीचे से — आवाज़ उठी। एक साँस। गहरी। लंबी। और फिर —

पेड़ का चेहरा — आँखें खोल गईं।

"श्याम रावत का बेटा।"

आवाज़ पूरे मैदान में थी। ज़मीन में थी। हवा में थी। देव के अपने सीने में थी।

"मैं तेरा इंतज़ार कर रही थी। दो सौ साल से — मैंने सिर्फ लिया है। आज पहली बार — कोई खुद आया है।"

मैदान की ज़मीन से — मड़याली उठी।

पहले उसके बाल — काले, लंबे, जड़ों से बने। फिर कंधे — छाल से ढके। फिर पूरा शरीर — आधा औरत, आधा पेड़। उसकी आँखें पेड़ की आँखों जैसी थीं — पुतलियों की जगह चक्र, लकड़ी के चक्र। और उसके पेट पर —

उसके पेट पर — एक उभार था।

जैसे वो — दो सौ साल से — गर्भवती हो।

देव के पैर लड़खड़ाए।

"देख रहा है?" मड़याली ने अपने पेट पर छाल-ढका हाथ फेरा। उसकी आवाज़ में — एकदम अचानक — एक माँ का दर्द आ गया, "मेरा बच्चा। दो सौ साल से पेट में है। जन्म नहीं ले पाया। क्योंकि उसे जन्म देने वाली ज़मीन — ये जंगल — अधूरा है। एक प्राण कम है। हमेशा से एक कम। हर बारह साल मैं देती हूँ — मगर कभी पूरा नहीं होता।"

"क्योंकि जो तू लेती है — वो डर से दिया जाता है। नफरत से।" देव ने हिम्मत करके कदम आगे बढ़ाया, "बलि तभी पूरी होती है — जब खुद दी जाए।"

मड़याली का सिर — एक झटके में — उसकी तरफ घूमा। गैर-इंसानी हरकत। गर्दन लकड़ी-सी चरमराई।

"तू जानता है?"

"मैं तुझे देने आया हूँ। खुद। अपनी मर्ज़ी से।" देव ने अपना बोरा उतारा। कुल्हाड़ी नीचे रखी। "मेरा खून ले। मुझे ले। और अपने बच्चे को जन्म दे। मगर बदले में —"

"बदले में?" मड़याली हँसी — और उस हँसी में पूरा जंगल हँसा, सैकड़ों पेड़ काँपे, "बलि माँगती नहीं, बेटा। बलि दी जाती है।"

"तो मुझे मार ले।" देव ने हाथ फैला दिए, "मगर एक बात सुन ले। तेरा बच्चा जन्म लेगा — और फिर? फिर वो भी भूखा होगा। फिर बारह साल। फिर एक बलि। फिर एक। तेरा बच्चा — तेरी तरह — भूखा पैदा होगा। क्योंकि तूने उसे भूख में पाला है। दर्द में पाला है।"

मैदान खामोश हो गया।

"और मैं तुझे एक और रास्ता देता हूँ।"

"रास्ता?" मड़याली की आवाज़ में पहली बार — दो सौ साल में पहली बार — एक सवाल आया।

देव ने अपनी जेब से पिता की तस्वीर निकाली। ज़मीन पर रखी। फिर उल्टी कुंडी उतारी। तस्वीर के पास रखी।

"तेरे पीपल के नीचे — तेरी राख दबी है। वहीं तू बँधी है। वहीं तेरा बच्चा बँधा है। मैं जानता हूँ — मुक्ति अग्नि में है। मगर मैं तुझे जलाने नहीं आया।" उसने आँखें उठाईं, "मैं तुझे जलाने की इजाज़त माँगने आया हूँ। खुद जला। अपनी राख खुद भस्म कर। अपने बच्चे को — इस भूखे जंगल की जगह — मुक्ति दे। क्योंकि कोई बाहरी तुझे जलाएगा — तो तू श्राप देगी। मगर अगर तू खुद जलेगी — तो ये मुक्ति होगी। तेरी भी। तेरे बच्चे की भी। इन सबकी भी।"

उसने पीछे मुड़कर सैकड़ों पेड़-इंसानों को देखा।

"और मेरे पिता की भी।"

मड़याली बहुत देर तक उसे देखती रही।

फिर — उसके पेट का उभार — हिला।

एक बार।

फिर एक बार।

और मड़याली का चेहरा — वो देवी-सा शांत चेहरा — बिगड़ने लगा। छाल फटी। आँखें चमकीं।

"झूठ!" वो चीखी — और उसकी चीख से मैदान के किनारे के पेड़ झुक गए, "तू मुझे धोखा देने आया है! मैं जानती हूँ इंसानों को! दो सौ साल से जानती हूँ! तुम सब एक जैसे हो! पहले मीठी बात — फिर आग! मेरे पेट में आग! मेरे बच्चे में आग!"

ज़मीन फटी। जड़ें फूटीं — सैकड़ों, हज़ारों — देव की तरफ।

"पापा!" देव चीखा।

और तभी — श्याम रावत ने वो किया जो चौबीस साल में किसी बंदी ने नहीं किया था।

उसने अपने पैर — ज़मीन से — उखाड़ दिए।

छाल फटी। जड़ें टूटीं। खून-सा रस बहा। और श्याम रावत — आधा इंसान, आधा पेड़ — दो दशकों में पहली बार — चला। दौड़ा। अपने बेटे और जड़ों के बीच आ खड़ा हुआ।

"मड़याली!" उसने चीखकर कहा, "मुझे ले! मैं तेरी बलि हूँ — चौबीस साल की! मगर मेरे बेटे को — एक बार — बोलने दे!"

जड़ें रुकीं।

श्याम रावत घुटनों पर गिरा — उसके उखड़े पैरों से रस बह रहा था। उसने देव की तरफ मुड़कर कहा —

"बेटा... बोरा... अब..."

देव ने बोरा उठाया।

मगर मड़याली समझ चुकी थी।

"आग?!" उसकी चीख से आसमान के बादल फटे, "तू आग लाया है?! मेरे बच्चे के घर में — आग?!"

मैदान उठ खड़ा हुआ।

सैकड़ों बंदी — जो दशकों से शांत खड़े थे — अपने-अपने पैर उखाड़ने लगे। छाल फटने की आवाज़ें — जड़ें टूटने की आवाज़ें — चीखें — रोना —

"श्याम की बात सुनो!" श्याम रावत ने उनसे चीखकर कहा, "मेरे बेटे की बात सुनो! आज — या तो हम सब बलि हैं — या हम सब गवाह हैं! चुन लो! आज रात — चुन लो!"

और एक-एक करके — बंदी चलने लगे।

पहले दस। फिर पचास। फिर सैकड़ों।

दो सौ साल के कैदी — अपनी जड़ें तोड़ते हुए — मड़याली और देव के बीच की दीवार बनने लगे।

मड़याली ने आसमान की तरफ चीखा।

और पूरा जंगल — एक ही प्राणी — चीखा।

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