Pretika › Village Horror › रक्तवन
भाग 7 — अमावस से पहली रात
Pretika · Village Horror · 5 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- रक्तवन
- Chapter
- 7 of 10
- Category
- Village Horror
- Reading time
- 5 min
- Words
- 898
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
अमावस से तीन दिन पहले की रात, देव और रघुवीर जोशी के घर के पीछे झाड़ियों में छुपे थे।
नब्बे साल का पुरोहित रघुनाथ जोशी — वो आदमी जिसके बाप ने मड़याली को जलवाया था, और जो खुद चौबीस साल पहले श्याम रावत की बलि में शामिल था — इस घर में अकेला रहता था। तहखाने में — छुटकी।
"दो आदमी बाहर पहरा दे रहे हैं," रघुवीर ने फुसफुसाया, "और जोशी अंदर है। तहखाने का रास्ता रसोई से है।"
"बूढ़ा कितना बड़ा खतरा होगा?"
"बूढ़ा तंत्र जानता है, देव। मान या न मान — उसके खानदान ने दो सौ साल से जंगल के साथ संपर्क रखा है। ऐसे आदमी के पास चीज़ें होती हैं।"
उन्होंने आधी रात का इंतज़ार किया। पहरेदारों की चाय में रघुवीर ने पहले ही — दूधवाले बनकर — नींद की जड़ी मिला दी थी। दोनों आदमी सूरत बदले बिना लुड़क गए।
अंदर घुसना आसान था। जोशी अपने कमरे में मंत्र पढ़ रहा था — रात भर पढ़ता था, बुढ़ापे में डर से। देव और रघुवीर चुपके से रसोई में घुसे। तहखाने का पट्टा मिला। नीचे सीढ़ियाँ।
और तहखाने में —
देव का ख़ून जम गया।
छुटकी एक लोहे की जंजीर से स्तंभ से बँधी थी। मगर वो अकेली नहीं थी।
तहखाने की दीवारों पर — हाथ से बने सैकड़ों निशान थे। पेड़ों के। आँखों के। और बीच में — मिट्टी का एक चबूतरा — जिस पर रखा था एक पत्थर का कटोरा। कटोरे में — काली, गाढ़ी चीज़। जिसकी गंध देव जानता था।
खून।
और कटोरे से — एक पतली सी जड़ निकली हुई थी। तहखाने की फर्श को चीरती हुई। ज़मीन के अंदर घुसी हुई।
जंगल की जड़ — इस तहखाने तक आ चुकी थी।
"ये... ये क्या है?" रघुवीर की आवाज़ काँप गई। "इस बूढ़े ने... इस बूढ़े ने जंगल को अपने घर बुला रखा है?"
"इसने जंगल को बुलाया नहीं। इसे जंगल से ख़ाना देता है।" देव ने जड़ की तरफ देखा, "खून। रोज़। बदले में — शायद — ज़िंदा रहने की।"
छुटकी ने देव को देखा। उसकी आँखों में आँसू भर आए। उसने अपने होंठों पर उंगली रखी — और फिर ऊपर की तरफ इशारा किया।
देव समझ गया। जोशी जानता है कि कोई नीचे है।
"जंजीर काट," उसने रघुवीर से कहा। रघुवीर ने अपनी पुरानी सांड से जंजीर तोड़ी। छुटकी देव की गोद में।
तीनों सीढ़ियाँ चढ़े —
और रसोई में — रघुनाथ जोशी खड़ा था।
नब्बे साल का बूढ़ा। सूखा हुआ, हड्डियों का ढाँचा। मगर आँखें — आँखें नौजवान की थीं। तेज़, पीली, जागती हुई।
"रघुवीर," बूढ़े ने मुस्कुराते हुए कहा, "तेरी आखिरी रस्सी भी फेल हो गई।"
"जोशी — हट जा रास्ते से।"
"हट जाऊँ?" जोशी हँसा — एक सूखी, काँपती हँसी, "मैंने सत्तर साल उस जंगल की सेवा की है। सत्तर साल। मेरे बाप ने उसे दिया — मैंने उसे दिया — और तुम सोचते हो मैं अपने भगवान का भोजन तुम्हें दे दूँगा?"
"वो तेरा भगवान नहीं है, जोशी। वो तेरा मालिक है। और गुलामी की सबसे बदतर क़िस्म यही होती है — जिसमें गुलाम अपनी जंजीर से प्यार करने लगे।"
जोशी की मुस्कान उतर गई।
उसने अपनी दाँड़ी — लोहे की छड़ी — उठाई। और दाँड़ी का नीचला सिरा ज़मीन पर तीन बार पटका।
फर्श काँपी।
"ओ माँ," जोशी ने आँखें बंद करके कहा, "तेरा भोजन जा रहा है। रोक ले।"
और तहखाने के पट्टे से — जड़ें फूट पड़ीं।
दर्जनों। सैकड़ों। काली, चिकनी, साँपों-सी लहराती जड़ें — ऊपर आईं — सीधा देव की तरफ।
"देव!" रघुवीर चीखा।
जड़ों ने देव की टांगें लपेटीं। एक जड़ उसकी बाँह पर कसी। छुटकी उसकी गोद से छीनी जाने लगी —
और देव ने एक काम किया जो उसने सोचा भी नहीं था।
उसने अपनी जेब से पिता की तस्वीर निकाली — और चीखकर उसे जड़ों के सामने कर दिया।
"देख लो!" उसने जंगल से कहा — उस जड़ से — उस माँ से, "इसे पहचानती हो?! ये श्याम रावत है! और मैं उसका बेटा हूँ! और मैं खुद आ रहा हूँ! अमावस की रात! खुद! मगर ये बच्ची — ये बच्ची तेरी नहीं है! सुना तूने! ये नहीं!"
जड़ें — रुक गईं।
पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। जड़ें हवा में अड़ी रहीं — जैसे सुन रही हों।
फिर — बहुत धीरे — वो पीछे हटने लगीं। तहखाने में समा गईं। फर्श सामान्य हो गई।
मगर पीछे छोड़ गईं — एक पत्ता।
देव ने उठाया। नाखून की खरोंच:
"आ। तेरी बली कबूल। बच्ची तेरी।"
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बाहर निकलकर रघुवीर की टांगें काँप रही थीं।
"तूने... तूने अभी जंगल से सौदा किया?"
"मैंने वो किया जो मेरे पिता नहीं कर पाए।" देव ने छुटकी को कंबल में लपेटा, "काका — इसे अभी ले जाओ। अल्मोड़ा। रात में ही निकलो। और एक काम — मेरा लिखा हुआ पत्र ये है। अगर मैं वापस न आऊँ — तो ये पत्र पुलिस को दे देना। इसमें सब है — सौ साल का सौदा, पंचायत के नाम, सब।"
"देव..."
"और काका — अगर मैं वापस आ गया — तो ये पत्र जला देना। गाँव को माफ कर देना। क्योंकि मुक्ति सिर्फ पेड़ों को नहीं चाहिए। गाँव को भी चाहिए।"
रघुवीर ने उसे गले लगा लिया। बूढ़ा रो रहा था।
"तेरे बाप की रस्सी बाँधी थी मैंने। और तू मुझे काका कहता है।"
"तूने मेरी जान बचाई थी उस रात चेतावनी देकर। हिसाब बराबर है।"
छुटकी जाते-जाते देव की तरफ मुड़ी। उसने अपनी छोटी-सी उंगलियों से — पहली बार — कुछ इशारा किया।
देव नहीं समझा।
रघुवीर समझा — बूढ़े ने गूँगे बच्चों के साथ गाँव में ज़िंदगी गुज़ारी थी।
"वो कह रही है," उसने धीरे से अनुवाद किया, "— 'मुझे तुम्हारी आवाज़ सुनाई देती है। मैं गूँगी हूँ, मगर तुम्हारी आवाज़ यहाँ सुनाई देती है।' — और उसने अपना सीना छुआ।"
देव का गला रुँध गया।
"उससे कहो — अमावस के बाद — मैं खुद उसे सुनाऊँगा।"