Pretika › Village Horror › रक्तवन
भाग 6 — छुटकी
Pretika · Village Horror · 6 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- रक्तवन
- Chapter
- 6 of 10
- Category
- Village Horror
- Reading time
- 6 min
- Words
- 1027
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
छुटकी को देव ने अगले दिन ढूँढ निकाला।
गाँव के बाहर, पहाड़ी के ढलान पर एक बर्बाद गोबर-ढेर वाली गुफा — उसमें एक ग्यारह साल की लड़की रहती थी। सूखे पत्तों का बिछौना। एक फटा कंबल। एक तीन पैर वाला बर्तन। और बर्तन में — सूखी रोटी के टुकड़े — शायद दुकानदार देता था, दया से।
लड़की ने देव को देखा तो गुफा के पिछले कोने में सिमट गई। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी थीं — और उन आँखों में ऐसा डर था जो किसी ग्यारह साल की आँखों में नहीं होना चाहिए।
"डरो मत," देव ने धीरे से कहा। उसने अपनी जेब से बिस्कुट का पैकेट निकाला। ज़मीन पर रखा। पीछे हट गया।
लड़की ने बिस्कुट देखे। देव को देखा। फिर बिस्कुट।
उसने झट से पैकेट उठाया — जैसे डर हो कि कोई छीन लेगा — और खाने लगी।
देव बाहर बैठ गया। उसने उससे कोई बात नहीं की। बस रोज़ आने लगा। बिस्कुट। कभी केला। कभी रोटी-सब्ज़ी। तीसरे दिन लड़की गुफा के मुँह तक आ गई। पाँचवें दिन बाहर। सातवें दिन — उसने देव का हाथ पकड़ लिया।
देव ने इशारों से पूछा, "तेरा नाम छुटकी है?"
लड़की ने सिर हिलाया।
"माँ-बाप?"
उसने ऊपर आसमान की तरफ देखा।
देव ने उसे गोद में उठा लिया। बिना सोचे। और छुटकी ने — शायद ज़िंदगी में पहली बार — किसी के कंधे पर सिर रखा।
उसी रात देव ने फैसला कर लिया।
पंचायत इस बच्ची को जंगल को नहीं देगी। उसकी लाश पर भी नहीं।
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मगर फैसला आसान था। रास्ता नहीं।
देव ने पहले रघुवीर के पास गया। बूढ़ा उसे देखकर सहम गया — शायद माफी की उम्मीद में — मगर देव ने माफी की बात नहीं की। सीधा मुद्दे पर आया।
"इक्कीस दिन बाद अमावस है। वो इस बार छुटकी को ले जाएँगे। मुझे उसे बचाना है। तू मेरी मदद करेगा — या तू भी उन सबके साथ है?"
रघुवीर ने बहुत देर उसे देखा। फिर अपनी पाइप रखी।
"चौबीस साल पहले मैंने एक आदमी की रस्सी बाँधी थी। उसके बाद से — मैंने एक भी रात पूरी नींद नहीं सोई। मेरे बच्चे मुझसे बात नहीं करते — उन्हें पता नहीं क्यों, मगर वो मुझमें कुछ सूंघ लेते हैं। जानवरों की तरह।" उसने अपने काँपते हाथ देखे, "अगर मरने से पहले एक काम कर सकूँ — जिससे तेरे बाप की आत्मा मुझे माफ करे — तो बता। क्या करना है?"
"तीन काम। एक — छुटकी को गाँव से बाहर पहुँचाना है। दूर। जहाँ पंचायत न पहुँचे। दो — मुझे अमावस की रात जंगल के बीच तक जाना है। उस मृत पीपल तक। और तीन —"
देव ने एक लंबी साँस ली।
"— मुझे आग चाहिए। बहुत सारी।"
रघुवीर की आँखें फैल गईं।
"तू... तू दिल जलाने वाला है?"
"मेरे पिता ने कहा — मुक्ति अग्नि से मिलेगी।"
"पागल है तू! जंगल जलेगा — और तू अंदर होगा! तू बाहर नहीं निकल पाएगा! वो जंगल तुझे अपने अंदर कैद कर लेगा — पूरी ताकत से — ये उसकी मौत की लड़ाई होगी!"
"यही तो मैं चाहता हूँ।"
रघुवीर रुक गया। "क्या कहा?"
देव ने आँखें उठाईं। उनमें कोई डर नहीं था। बस एक पूरी-पूरी थकान थी — और थकान के पार, एक ठंडा, साफ इरादा।
"काका — मड़याली मुझे चाहती है। मेरा खून चाहती है। अगर मैं अंदर नहीं गया — तो वो किसी और को लेगी। छुटकी को। या अगले बारह साल में किसी और बच्चे को। ये चक्र टूटना ही होगा। और चक्र तभी टूटेगा — जब मैं खुद अंदर जाऊँगा। वो मुझे लेने आएगी — पूरी ताकत लेकर — और जिस पल वो मुझे लेगी — उसी पल वो अपने दिल के सबसे करीब होगी।"
"और तू उसी पल आग लगाएगा।"
"उसी पल।"
रघुवीर ने सिर हिलाया। "तेरे पिता जैसा है तू। बिल्कुल तेरे पिता जैसा। बेवकूफ और बहादुर — दोनों एक साथ।"
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योजना बनी। छुटकी को अमावस से तीन दिन पहले रघुवीर के एक रिश्तेदार के पास भेजा जाना था — अल्मोड़ा, पहाड़ के उस पार। रघुवीर खुद ले जाएगा।
मगर जंगल को सब पता था।
अमावस से पाँच दिन पहले — देव जब छुटकी की गुफा पहुँचा — गुफा खाली थी।
कंबल वहीं था। बर्तन वहीं था। मगर छुटकी नहीं थी।
और गुफा की दीवार पर — मिट्टी से — किसी ने एक निशान बनाया था।
एक पेड़।
जिसकी जड़ों में — एक छोटी-सी आकृति बँधी हुई थी।
देव दौड़ा। गाँव की तरफ। पंचायत की तरफ।
पंचायत के बाहर — सरपंच ठकुरदारी सिंह खड़ा था। जैसे इंतज़ार कर रहा हो।
"कहाँ है बच्ची?" देव ने उसका कॉलर पकड़ लिया।
सरपंच ने विरोध नहीं किया। बस बोला —
"बच्ची सुरक्षित है, अफसर साहब। हमने उसे जंगल को नहीं दिया — हमने उसे छुपाया है। अमावस तक।"
"झूठ मत बोल!"
"मैं झूठ नहीं बोल रहा।" सरपंच की आँखों में — देव ने पहली बार — दर्द देखा। असली दर्द। "सुन मेरी बात, देव रावत। तू सोचता है मुझे अपने बाप के किए पर गर्व है? मेरा बाप भी उसी पंचायत में था। और मैं — मैं उस सौदे को निभा रहा हूँ। क्योंकि अगर सौदा टूटा — तो जंगल एक आदमी नहीं लेगा। वो गाँव लेगा। पूरा गाँव। सौ साल पहले — जब पहली बार पंचायत ने देने से मना किया था — जंगल ने एक रात में उन्नीस आदमी लिए थे। उन्नीस।"
"तो तुमने अनाथों को मारना शुरू कर दिया?"
"तो हमने — अपने आप को — बचा लिया।" सरपंच ने आँखें झुका लीं, "ये कभी सही नहीं था। मगर ये ज़िंदा रखता था।"
देव ने उसका कॉलर छोड़ा।
"बच्ची कहाँ है?"
"पुरोहित जोशी के घर के तहखाने में। मगर सुन — तू उसे निकालेगा तो पंचायत तुझे रोकेगी। बीस आदमी हैं उनके पास। और देव — एक बात और।"
"क्या?"
सरपंच ने उसकी आँखों में देखा।
"बच्ची को लेकर भागना मत। तू भागेगा — तो जंगल भूखा रह जाएगा। और भूखा जंगल — अमावस की रात — खुद गाँव में आएगा। अगर तुझे कुछ करना है — तो अमावस से पहले कर। जंगल के अंदर।"
देव एक पल के लिए रुका।
सरपंच — जो उसकी नज़र में हत्यारों का वारिस था — उसे जंगल में जाने की इजाज़त दे रहा था?
"तू चाहता है मैं अंदर जाऊँ। क्यों?"
सरपंच ने बहुत धीरे से कहा —
"क्योंकि बेटा — तेरे पिता ने बाँधे जाते वक्त मुझसे एक बात कही थी। मैं उस रात वहाँ था। रस्सी कसते वक्त। श्याम रावत ने होश में आकर मुझे देखा — और गाली नहीं दी। उन्होंने कहा — 'मेरा बेटा आएगा। एक दिन। और वो ये खत्म करेगा।'"
"मैं चौबीस साल से तेरा इंतज़ार कर रहा हूँ, देव रावत। पूरा गाँव नहीं — मगर मैं।"