PretikaVillage Horrorरक्तवन

भाग 5 — पेड़ों में चेहरे

Pretika · Village Horror · 6 मिनट

Writer
Pretika
Story
रक्तवन
Chapter
5 of 10
Category
Village Horror
Reading time
6 min
Words
1146
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

देव ने उस रात रघुवीर का घर छोड़ दिया। न कुछ कहा, न सुना। बस चला गया।

चौकी लौटकर उसने बोतल खोली — वो देसी शराब जो गाँव में मिलती थी — और आधी बोतल सीधे गटक गई। मगर नशा नहीं हुआ। दर्द बहुत गहरा था — नशा ऊपर से नहीं टिका।

रात में जंगल से फिर आवाज़ आई।

"देव... बेटा..."

इस बार देव ने कान नहीं बंद किए। वो उठा। दरवाज़ा खोला। और जंगल की तरफ खड़ा होकर चीखा —

"मुझे माफी माँगने का हक किसी को नहीं है! सुना तुमने! किसी को नहीं!"

जंगल खामोश रहा।

फिर — धीरे से — वो आवाज़ फिर आई।

"देव... मैं तुझसे माफी नहीं माँग रहा... मैं तुझे चेतावनी दे रहा हूँ... बेटा... वो तुझे चाहती है... बारहवाँ साल आ गया है... और इस बार — उसने तुझे चुना है..."

देव जम गया।

"तू... तू सच में मेरे पिता है?"

"मैं तेरे पिता की आवाज़ हूँ, बेटा... शरीर नहीं... शरीर तो वहीं खड़ा है... जहाँ सब खड़े हैं... आकर देख ले... दिन में आ... दोपहर को... जंगल सोता है दोपहर को... पश्चिम की तरफ आना... जहाँ पेड़ सबसे बूढ़े हैं... मैं वहाँ हूँ..."

"मैं कैसे जानूँ कि तू झूठ नहीं बोल रहा? जंगल आवाज़ें चुराता है — यही तो कहा रघुवीर ने!"

आवाज़ कुछ देर रुकी।

फिर बोली —

"जब तू पाँच साल का था — तू आम के पेड़ से गिरा था। तेरी पिछली बाँह पर — दाएँ हाथ पर — तिल के नीचे — एक निशान है। चाँद जैसा। ये बात — तेरी माँ के अलावा — सिर्फ मुझे पता थी। क्योंकि तू गिरा था — और मैंने तुझे उठाया था।"

देव की साँस अटक गई।

उसकी दाईं बाँह पर — तिल के नीचे — सच में एक चाँद-सा निशान था।

✦ ✦ ✦

अगले दिन दोपहर को देव जंगल में गया।

अकेला। टॉर्च नहीं — दिन था। कमर पर कुल्हाड़ी। जेब में पिता की तस्वीर। गले में रघुवीर की दी उल्टी कुंडी — भले ही वो उस आदमी से अब नफरत करता था, मगर बेवकूफ नहीं था।

जंगल दिन में सच में अलग था। सुन्न। गहरा सुन्न। जैसे साँस रोके लेटा हो कोई विशाल जानवर।

पश्चिम की तरफ चलते हुए देव ने एक बात नोटिस की — जितना अंदर जा रहा था, पेड़ उतने बूढ़े होते जा रहे थे। और छाल — छाल पर धीरे-धीरे उभार आने लगे। पहले उसे लगा पेड़ों की सामान्य गाँठें हैं।

फिर एक पेड़ के पास रुककर उसने ध्यान से देखा।

गाँठ नहीं थी।

चेहरा था।

छाल के अंदर — धँसा हुआ — एक इंसानी चेहरा। बंद आँखें। नाक। होंठ। सब कुछ — पेड़ की छाल से बना हुआ। जैसे कोई चेहरे को पीछे से दबा रहा हो और छाल ऊपर से चढ़ी हो।

देव ने काँपते हाथ से छाल छुई।

छाल — गर्म थी।

और उसके नीचे — कुछ धड़का।

देव झटके से पीछे हटा। उसने आसपास के पेड़ देखे। हर पेड़ पर — एक चेहरा। दर्जनों। सैंकड़ों। जितनी दूर नज़र जाती थी — हर तने में कोई न कोई दबा हुआ था।

सोए हुए।

सांस लेते हुए।

देव भागा — अंदर की तरफ। उसे बस एक पेड़ ढूँढना था। एक।

और वो मिल गया।

जंगल के सबसे घने हिस्से में — एक बांझ का पेड़ खड़ा था — दूसरों से थोड़ा अलग, थोड़ा नया। चौबीस साल पुराना। उसकी छाल में — आदमकद — एक चेहरा धँसा था।

देव की टांगों ने काम करना बंद कर दिया। वो घुटनों पर गिर पड़ा।

"पापा..."

छाल का चेहरा — उसके पिता का चेहरा था। वही नोकदार नाक। वही गाल की खाई। बूढ़ा हो गया था चेहरा — मगर देव ने पहचान लिया। शीशा हर रोज़ झूठ बोलता है — मगर खून पहचान लेता है।

और तभी — पेड़ की छाल फटी।

धीरे से। चेहरे के होंठों के पास। एक दरार खुली।

और अंदर से — आवाज़ आई। हवा जैसी। पत्तों की सरसराहट जैसी।

"देव... बेटा... तू आ गया..."

"पापा!" देव पेड़ से लिपट गया। वो रो रहा था। चौबीस साल का बच्चा — पिता के तने से लिपटा हुआ — रो रहा था। "पापा मैं तुझे निकालूँगा! मैं तुझे यहाँ से ले जाऊँगा! कुल्हाड़ी लाया हूँ — मैं पेड़ काट दूँगा!"

"नहीं!" आवाज़ तेज़ हुई। पेड़ काँपा। "पेड़ मत काटना, बेटा! पेड़ काटेगा — तो मैं नहीं बचूँगा। पेड़ कटते ही — अंदर वाला मर जाता है। पूरी तरह। ये पेड़ हमारा ताबूत नहीं है, देव — ये हमारा शरीर है।"

"तो कैसे निकालूँ तुझे? बता! कुछ भी करूँगा!"

पेड़ कुछ देर चुप रहा। फिर बोला —

"सिर्फ एक तरीका है। मगर वो तू नहीं करेगा।"

"बता!"

"जंगल का दिल काटना होगा।"

"दिल?"

"इस जंगल के बीचों-बीच — एक पेड़ है। सबसे पुराना। सबसे ऊँचा। वही मृत पीपल है — जिससे मड़याली को बाँधकर जलाया गया था। वो मरा हुआ पेड़ — दो सौ साल से खड़ा है — और उसी की जड़ों में — मड़याली की राख दबी है। वो पेड़ इस जंगल का दिल है। उसके जलने से — ये पूरा जंगल मर जाएगा।"

"तो मैं उसे जला दूँगा!"

"सुन पूरी बात, बेटा।" पिता की आवाज़ टूट गई, "दिल जलेगा — तो पूरा जंगल जलेगा। और जंगल जलेगा — तो जंगल में दबी हर आत्मा — हर पेड़ में दबा हर इंसान — साथ जलेगा। आज़ादी मिलेगी — मगर जलकर। मुक्ति — मगर अग्नि से। और देव..."

"और?"

"मैं भी उसी में हूँ।"

देव के हाथ ढीले पड़ गए।

"मतलब — तुझे बचाने का रास्ता — तुझे जलाने से होकर जाता है।"

"मुझे बचाने का नहीं, बेटा। मुझे मुक्त करने का। मैं चौबीस साल से यहाँ खड़ा हूँ। मैंने हर रात देखी है। हर बारह साल में एक नया आदमी आता है — चीखता है — और फिर धीरे-धीरे छाल उसे निगल लेती है। मैं जानता हूँ अगली बार किसे लाएँगे। अगली अमावस — इक्कीस दिन बाद है। और गाँव की पंचायत पहले ही अपना शिकार चुन चुकी है।"

"किसे चुना है?"

"एक बच्ची को। गाँव के बाहर वाली गुफा में रहने वाली। गूँगी है — इसलिए किसी ने उसका विरोध नहीं किया। छुटकी नाम है उसका। उम्र — ग्यारह साल।"

देव का सिर चकरा गया।

ग्यारह साल की बच्ची।

"और एक बात और, देव।" पिता की आवाज़ अब बहुत धीमी हो गई — जैसे थककर, "मड़याली ने तुझे चुना है। तू श्याम रावत का खून है — और श्याम रावत वो बलि थी जो उसे सबसे ज़्यादा ताकत दी। तेरा खून उसे — उसके बच्चे को — वो शक्ति देगा जो दो सौ साल में नहीं मिली। अगर तू उसके हाथ लगा — तो ये जंगल सिर्फ ढकानी तक नहीं रहेगा। ये बढ़ेगा। पहाड़ के उस पार। शहरों तक।"

"तो मैं भाग जाऊँ।"

"भागने से कुछ नहीं होगा, बेटा। जिसे जंगल चिन्हित कर ले — उसे दुनिया के किसी कोने में बुला लेता है। तू वापस आएगा। कोई न कोई रास्ता बन जाएगा। तेरी नौकरी, तेरी ज़िम्मेदारी, तेरा दर्द — कुछ भी। इसीलिए रास्ता एक ही है —"

पेड़ की आवाज़ रुकी। छाल सिकुड़ने लगी। दोपहर खत्म हो रहा था — जंगल जागने लगा था।

"पापा! रास्ता क्या है? पापा!"

आखिरी शब्द — सरसराहट में डूबते हुए — आए:

"— खुद जंगल बन जाना... पहले... उससे पहले कि वो तुझे बनाए..."

और पेड़ — पेड़ हो गया।

देव वहाँ घुटनों पर बैठा रहा। आसपास — हज़ारों चेहरों वाले पेड़ — धीरे-धीरे जाग रहे थे।

और बहुत दूर — जंगल के सबसे गहरे हिस्से से — एक हँसी आई।

मीठी।

काँपती हुई।

माँ जैसी।

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