Pretika › Village Horror › रक्तवन
भाग 4 — रघुवीर की कहानी
Pretika · Village Horror · 5 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- रक्तवन
- Chapter
- 4 of 10
- Category
- Village Horror
- Reading time
- 5 min
- Words
- 859
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
रघुवीर ने देव को घायल, काँपता हुआ घास में देखा। कुछ नहीं पूछा। उठाया। गाँव ले आया। अपने घर। उबली हुई जड़ी-बूटियों का काढ़ा पिलाया।
जब देव की साँसें सुधरीं, तो रघुवीर ने एक पुरानी तीन-पाई पर बैठकर अपनी पाइप जलाई।
"अब सुन," उसने कहा, "अब तुझे सब बताना पड़ेगा। क्योंकि जंगल ने तुझे चिन्हित कर लिया है। उसने तुझे अपना दरबार दिखा दिया — ये वो सिर्फ उन्हें दिखाता है जिन्हें वो चाहता है।"
"वो चाहता कौन है, काका? सच बोलो अब। पूरी बात। शुरू से।"
रघुवीर ने पाइप का कश लिया। धुआँ छोड़ा। और बोलना शुरू किया।
"दो सौ साल पहले की बात है। तब यहाँ कोई जंगल नहीं था। खुला मैदान था — मड़ई नाम का। घास, झाड़ियाँ, एक छोटा सा तालाब। ढकानी गाँव के लोग यहाँ अपने जानवर चराते थे।"
"फिर?"
"फिर एक औरत आई। कहाँ से आई — किसी को नहीं पता। पहाड़ के उस पार से, कहते हैं। नाम था — मड़याली। वैद्या थी। जड़ी-बूटियों की ऐसी जानकार थी, कि मुर्दे के सिरे तक पहुँचा आदमी ज़िंदा कर देती थी। गाँव वाले उसे देवी मानने लगे। उसकी झोपड़ी उसी मैदान में थी — तालाब के किनारे।"
"और वो गर्भवती थी।"
देव चौंका। "कैसे पता?"
"कहानी में आगे आएगा। सुन। — साल भर में मड़याली की नाम इतनी फैली कि दूर-दूर से लोग आने लगे। और जहाँ देवी-पुजारी होते हैं — वहाँ पंडित-पुरोहितों की रोज़ी रुकती है। गाँव के पुरोहित — ठाकुर जोशी — उससे जलने लगे। उन्होंने गाँव में अफवाह फैलाई — ये औरत वैद्या नहीं, डायन है। रात को कब्रों पर जाती है। बच्चों का खून पीती है।"
"और गाँव वालों ने मान लिया?"
"गाँव वाले वही मानते हैं जो डरावना हो। सच में दिलचस्पी किसी को नहीं होती, बेटा।" रघुवीर ने पाइप नीचे रखी, "एक रात — अमावस की रात — भीड़ उसकी झोपड़ी पहुँची। मड़याली उस रात एक बच्चे का इलाज कर रही थी। उन्होंने उसे घसीटा। मैदान के बीच ले गए। और जोशी ने फैसला सुनाया — डायन को जलाया जाएगा।"
देव के रोंगटे खड़े हो गए।
"उन्होंने उसे एक मृत पीपल के पेड़ से बाँधा — मैदान में एक ही मरा हुआ पेड़ था — और चारों तरफ लकड़ी ढेर कर दी। मड़याली चीखी। उसने कहा — मुझे मार दो, मगर मेरे पेट के बच्चे को बख्श दो। किसी ने नहीं सुना। आग लगा दी गई।"
"और फिर?"
"फिर वो हुआ जो आज तक ढकानी की याद में दफ़न है। मड़याली जलती रही — मगर चीखी नहीं। आग के बीच से उसकी आवाज़ आई — शांत, बहुत शांत — 'तुमने मुझे मारा। मगर मेरा बच्चा — मेरा बच्चा मैं इस ज़मीन को देती हूँ। ये ज़मीन उसे पालेगी। और ये ज़मीन — हर बारह साल में — तुमसे अपनी देन माँगेगी।'"
रघुवीर की आवाज़ काँप गई।
"अगली सुबह — मैदान में जंगल उग आया था।"
"क्या?"
"एक रात में, बेटा। जहाँ घास थी — वहाँ सौ-सौ फीट ऊँचे पेड़ खड़े थे। मड़याली की राख ज़मीन में मिली — और उस राख से — पूरा जंगल निकला। उसका बच्चा — जो पेट में मरा — वो जंगल बन गया। ये जंगल एक प्राणी है, देव। एक। हज़ारों पेड़ नहीं — एक ही बच्चा है ये। और मड़याली — वो इस जंगल की माँ है। इसकी आत्मा।"
"और हर बारह साल?"
"हर बारह साल में बच्चा भूखा होता है। बढ़ने के लिए उसे एक प्राण चाहिए। एक इंसान। पहली बार — जंगल ने खुद लिया। गाँव का एक आदमी अंदर गया — नहीं लौटा। दूसरी बार भी। तीसरी बार भी। फिर गाँव की पंचायत ने सौदा किया।"
देव का मुँह सूख गया।
"सौदा — कि गाँव खुद एक आदमी देगा। हर बारह साल में। बदले में जंगल बाकी गाँव को नहीं छुएगा। खेत सलामत। मवेशी सलामत। बच्चे सलामत। बस — बारह साल में एक जान।"
"और गाँव ने मान लिया।"
"गाँव ने मान लिया। सौ साल से ये चल रहा है। कोई बाहर का मुसाफिर, कोई अनाथ, कोई बेसहारा — जिसका कोई न हो। पंचायत चुनती है। अमावस की रात उसे जंगल के किनारे बाँध दिया जाता है। सुबह — बाँधने वाली रस्सी ढीली मिलती है। आदमी — गायब। और जंगल में — एक नया पेड़ उग आता है।"
"और चौबीस साल पहले..."
रघुवीर ने आँखें झुका लीं।
"चौबीस साल पहले पंचायत ने एक मुसाफिर चुना था। मगर उस रात — किसी गलती से — चुना हुआ आदमी भाग निकला। और भोर होने को थी। बच्चा भूखा था। अगर उस रात प्राण न मिलता — जंगल गाँव पर टूट पड़ता। पंचायत घबरा गई। और तभी — तेरे पिता — श्याम रावत — वनरक्षक — रात की गश्त पर अपनी चौकी से निकले। अकेले। बिना साथी के।"
देव की आँखों से आँसू बहने लगे।
"उन्होंने तेरे पिता को बुलाया। कहा — साहब, जंगल में कोई फँसा है, मदद चाहिए। तेरे पिता गए। अच्छे आदमी थे तेरे पिता। बिना सवाल किए चल पड़े। और जंगल के किनारे — पंचायत के आदमियों ने —"
रघुवीर रुक गया।
"बोलो, काका।"
"— उन्हें बेहोश करके बाँध दिया।"
देव की मुट्ठियाँ कस गईं। उसके दाँत भींच गए। आँखों के सामने — चौबीस साल पुरानी वो तस्वीर तैर रही थी। पिता की मुस्कान।
"पंचायत में कौन-कौन था?"
"देव..."
"कौन था, काका?"
रघुवीर ने उसकी आँखों में देखा।
"सरपंच ठकुरदारी सिंह का बाप। दुकानदार गीनाराम का बाप। पुरोहित रघुनाथ जोशी — आज भी ज़िंदा है, नब्बे साल का। और... और एक आदमी और। जिसने उस रात श्याम रावत की रस्सी बाँधी थी।"
"कौन?"
रघुवीर की आँखों से एक आँसू गिरा।
"मैं।"