PretikaVillage Horrorरक्तवन

भाग 3 — गायब बच्चा

Pretika · Village Horror · 5 मिनट

Writer
Pretika
Story
रक्तवन
Chapter
3 of 10
Category
Village Horror
Reading time
5 min
Words
905
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अगले हफ्ते गाँव में हड़कंप मच गया।

छोटू — दुकानदार का आठ साल का बेटा — शाम को बकरी ढूँढने जंगल की तरफ गया था, और रात को वापस नहीं आया।

"बकरी तो खुद लौट आई!" दुकानदार रो रहा था, पंचायत के सामने, "मगर बच्चा नहीं! मेरा बच्चा!"

गाँव के लोग इकट्ठे हुए। मशालें जलीं। मगर देव ने एक अजीब बात देखी —

कोई जंगल में जाने को तैयार नहीं था।

पचास आदमी, मशालें, लाठियाँ — मगर सब जंगल के किनारे से बीस कदम दूर खड़े थे। जैसे कोई अदृश्य लकीर हो — जिसके आगे कदम रखना मना हो।

"क्या बकवास है ये?" देव चीखा, "अंदर एक बच्चा है!"

"साहब," एक बूढ़ा बोला, "अंदर कोई बच्चा नहीं है। अंदर बस उसकी आवाज़ है।"

"मुझे जाने दो," दुकानदार तड़पा, "मैं जाऊँगा..."

"तू नहीं जाएगा!" सरपंच ने उसका बाँह पकड़ लिया, "तेरा बेटा गया — अब तू भी जाएगा? तेरे बाकी बच्चों का क्या होगा?"

देव ने सरपंच को देखा। उसके चेहरे पर डर नहीं था।

अपराधबोध था।

देव को सब समझ आ गया।

"तुम लोगों को पता है अंदर क्या होता है," उसने धीरे से कहा, "तुम सब जानते हो। और तुमने कभी किसी को बचाया नहीं। मेरे पिता को भी नहीं।"

कोई कुछ नहीं बोला।

देव ने अपनी टॉर्च निकाली। कमर पर कुल्हाड़ी कसी।

"मैं जा रहा हूँ।"

"साहब!" रघुवीर भीड़ से आगे आया, "पागल मत बन!"

"रघुवीर काका — मैं वनरक्षक हूँ। मेरी नौकरी है उस जंगल की रखवाली करना। और अगर उस जंगल में एक बच्चा है — तो वो भी मेरी ज़िम्मेदारी है।"

रघुवीर ने उसका हाथ पकड़ा। कुछ उसकी हथेली में रखा — लोहे का एक छोटा टुकड़ा। उल्टी कुंडी।

"सुन मेरी बात। अंदर जो कुछ भी सुने — जवाब मत देना। जो कुछ भी दिखे — भरोसा मत करना। और भोर होने से पहले — चाहे कुछ भी हो — बाहर आ जाना। जंगल दिन में सोता है। रात में जागता है। मगर भोर के वक्त — एक घड़ी के लिए — वो अंधा होता है। उसी एक घड़ी में निकलना।"

"और अगर बच्चा मिल गया तो?"

रघुवीर की आँखों में आँसू आ गए।

"तो पहले उसके पैर देखना, बेटा।"

✦ ✦ ✦

जंगल में घुसते ही दुनिया बदल गई।

दिन था — बाहर सूरज चमक रहा था — मगर जंगल के अंदर एक नीली-सी शाम थी। पेड़ों की टहनियाँ ऊपर इतनी घनी थीं कि आसमान दिखता ही नहीं था। और हवा — हवा में एक गंध थी। गीली मिट्टी, सड़ी हुई छाल, और कुछ मीठा-सा। जैसे बहुत पुराना इत्र।

देव चलता रहा। टॉर्च की रोशनी आगे दस कदम तक ही जाती थी — उसके आगे अंधेरा रोशनी को निगल लेता था।

"छोटू!" उसने पुकारा।

कोई जवाब नहीं।

फिर — बहुत दूर से — एक आवाज़ आई।

"साहब..."

बच्चे की आवाज़। छोटू की।

देव दौड़ा। आवाज़ बाईं से आई — वो बाईं भागा। फिर आवाज़ दाईं से आई — वो दाईं मुड़ा। फिर आवाज़ पीछे से आई।

"साहब... इधर..."

उसने टॉर्च घुमाई।

तीस कदम दूर — दो पेड़ों के बीच — छोटू खड़ा था। वही नीली बनियान, वही छोटी पैंट। पीठ उसकी तरफ।

"छोटू!" देव भागा, "बेटा, तू ठीक है? मैं आ गया! चल, घर चलते हैं!"

उसने बच्चे का कंधा पकड़ा।

बच्चा घूमा।

और देव का हाथ ढीला पड़ गया।

चेहरा छोटू का था — मगर आँखें नहीं थीं। आँखों की जगह — दो खाली गड्ढे, जिनमें से पतली-पतली जड़ें निकलकर गालों पर फैल रही थीं, जैसे नसें।

और बच्चा मुस्कुराया।

"साहब," उसने छोटू की आवाज़ में कहा, "मैं अब यहीं का हूँ।"

देव पीछे हटा। उसका पैर जड़ में फँसा — नहीं, जड़ ने उसका पैर पकड़ लिया। ज़मीन से उठी हुई जड़ — हाथ की तरह — उसकी टांग पर कसती जा रही थी।

उसने कुल्हाड़ी उठाई और जड़ पर मारी।

जड़ से — खून निकला।

लाल, गाढ़ा, गर्म खून।

और पूरे जंगल से — एक सांस उठी। गहरी, दर्द भरी। हज़ार पेड़ एक साथ काँपे — बिना हवा के।

देव भागा। बिना रुके, बिना पीछे देखे। रास्ता उसे याद नहीं था — मगर उसे याद आया रघुवीर की बात। रास्ता वही मिलता है जो जंगल दिखाना चाहता है। तो उसने रास्ता ढूँढना छोड़ दिया। आँखें बंद कीं। और जहाँ से हल्की हवा आ रही थी — उसी तरफ चलने लगा।

आँखें बंद थीं — इसलिए उसने वो नहीं देखा जो उसके पीछे चल रहा था।

सैकड़ों कदम।

नंगे पैर।

उल्टे पैर।

कब आसमान खुला, कब जंगल का किनारा आया — देव को पता ही नहीं चला। जब उसने आँखें खोलीं, वो चौकी के पीछे घास में गिरा पड़ा था। सुबह हो रही थी। भोर।

उसने ऊपर देखा।

जंगल के किनारे — पहली कतार के पेड़ों के नीचे — एक कतार में लोग खड़े थे।

दस, बारह, शायद पंद्रह। आदमी, औरतें, बच्चे। पुराने ज़माने के कपड़े। सब शांत खड़े थे। सब उसे देख रहे थे।

और उन सबके पैर —

ज़मीन के अंदर थे।

टखनों तक गड़े हुए। जैसे खड़े नहीं — लगे हुए थे।

देव की आँख उन चेहरों पर एक-एक करके गई। और बीच में से — एक चेहरा उसे ऐसा लगा जैसे उसने ज़िंदगी भर शीशे में देखा है।

भले ही उस चेहरे पर पत्तियाँ उगी थीं। भले ही उसकी त्वचा छाल बन चुकी थी।

"पापा..." देव फुसफुसाया।

और उसके पिता के कंधे पर — उल्टे पैरों वाली औरत खड़ी थी।

उसने अपना सिर एक तरफ झुकाया।

और मुस्कुराई।

फिर — एक झटके में — सब गायब हो गए।

सिर्फ पेड़ रह गए।

देव घास में बैठा रहा। बहुत देर।

फिर उसने अपनी हथेली खोली। भागते वक्त उसकी मुट्ठी में कुछ आ गया था — उस चीज़ का टुकड़ा जो छोटू के कंधे पर लगी थी।

एक नीली बनियान का फटा हुआ टुकड़ा।

असली था।

मतलब छोटू सच में अंदर था।

कहीं न कहीं — अभी भी — ज़िंदा या मुर्दा — अंदर था।

और जंगल ने देव को जानबूझकर बाहर निकाला था।

उसे दिखाने के लिए — कि अंदर क्या-क्या है।

उसे ललचाने के लिए — कि वो वापस आए।

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