Pretika › Village Horror › रक्तवन
भाग 2 — ढकानी गाँव
Pretika · Village Horror · 5 मिनट
- Writer
- Pretika
- Story
- रक्तवन
- Chapter
- 2 of 10
- Category
- Village Horror
- Reading time
- 5 min
- Words
- 835
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
देव ने सुबह पहले काम के तौर पर पूरे कमरे की तलाशी ली।
कुछ नहीं मिला। न कोई छुपा हुआ, न कुछ चुराया हुआ। बस एक चीज़ — उसकी टेबल पर रखी फोटोफ्रेम — पिता की वो तस्वीर जो वो हमेशा साथ रखता था — उल्टी रखी हुई थी। शीशा नीचे की तरफ।
जैसे किसी ने तस्वीर देखी हो — और पलट दी हो।
देव ने सीधा उठकर रघुवीर को बुलाया।
बूढ़ा आया। पैरों के निशान देखे। उल्टी तस्वीर देखी। और एक लंबी साँस ली।
"तस्वीर में कौन है?"
"मेरे पिता।"
रघुवीर ने तस्वीर उठाई। शीशे पर अपनी उंगली फेरी।
"सुन, देव। आज से ये तस्वीर इस कमरे में मत रख। गाँव ले जा, किसी के घर रख आ। या जेब में रख — मगर चौकी में मत रख।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो रात को अंदर आया था — वो इस तस्वीर को देखने आया था। उसे पक्का करना था कि तू वही है — जिसे वो ढूँढ रहा था।"
"वो कौन? मेरे पिता?"
रघुवीर ने बहुत देर तक जंगल की तरफ देखा।
"बेटा, चौबीस साल हो गए तेरे बाप को गए। अगर वो अब भी अंदर है — तो वो तेरा बाप नहीं रहा। ये बात आज ही अपने दिल में उतार ले। वरना ये जंगल तुझे भी ले जाएगा — उसी तरह जिस तरह उसे ले गया।"
✦ ✦ ✦
ढकानी गाँव चालीस-पचास घरों का बसा हुआ था। पत्थर के मकान, मुड़ी हुई सलाखों वाले आंगन, और हर घर के दरवाज़े के ऊपर — एक चीज़ जो देव को हर जगह दिखी।
लोहे की एक कुंडी — उल्टी लटकी हुई। जैसे नाल की तरह, मगर उल्टी।
"ये क्या है?" देव ने एक दुकानदार से पूछा।
दुकानदार ने पहले उसका मुँह देखा। फिर चौकी की वर्दी देखी। फिर धीरे से बोला, "उल्टी कुंडी — बचाव का निशान है, साहब। जंगल वाली सीधा आती है। जो भी सीधा आता है — उल्टे से टकराता है।"
"जंगल वाली? कौन?"
दुकानदार ने जवाब नहीं दिया। बस सामान गिनने लगा।
गाँव में देव ने सरपंच से मुलाकात की — ठकुरदारी सिंह, साठ साल का, दाढ़ी वाला, बैंस का लोहे का नुकीला हुक्का हाथ में लिए। सरपंच ने उसे चाय पिलाई, हाल-चाल पूछे, मगर जब देव ने जंगल का नाम लिया — आदमी के चेहरे का खून उतर गया।
"सुन, अफसर साहब। मैं तुझे एक ही बात कहूँगा। तेरी नौकरी जंगल की रखवाली है — तो रखवाली कर। काटने से रोक, शिकारियों से रोक। मगर —"
"मगर?"
"अंदर मत जा। कभी नहीं। दिन में भी नहीं। ये जंगल दूसरे जंगलों जैसा नहीं है। यहाँ रास्ता वही मिलता है — जो जंगल दिखाना चाहता है।"
"मेरे पिता इसी जंगल में गायब हुए थे। चौबीस साल पहले।"
सरपंच के हुक्के की चिलम काँप गई।
"श्याम रावत का बेटा है तू?" उसने धीरे से पूछा।
"तुम जानते थे उन्हें?"
"जानता था?" सरपंच ने एक करुण हँसी हँसी, "तेरे पिता को जंगल में भेजने वाला फैसला — इसी गाँव की पंचायत ने किया था। और उस पंचायत में बैठा एक आदमी — मैं था।"
देव खड़ा हो गया। "मतलब?"
"मतलब बेटा — तेरे पिता गायब नहीं हुए थे।"
सरपंच ने आँखें झुका लीं।
"उन्हें दिया गया था।"
✦ ✦ ✦
उस शाम देव चौकी लौटा तो उसका दिमाग सरपंच की बात से भटक रहा था।
दिया गया था।
किसे? क्यों?
सरपंच ने आगे कुछ नहीं बताया था। "बारह साल बाद फिर बताऊँगा," बस इतना कहा था, "जब समय आएगा। अभी तो एक साल बचा है।"
रात हुई। देव ने कुंडी लगाई। तस्वीर जेब में रखी। और बिस्तर पर लेटकर सोचने लगा।
रात के ढाई बजे — दरवाज़े पर खटखट हुई।
देव उठकर बैठ गया।
खट... खट... खट...
तीन।
उसने राहत की साँस ली। इंसान है। उसने दरवाज़े तक पहुँचकर पूछा, "कौन है?"
बाहर से एक बच्चे की आवाज़ आई। रोती हुई।
"साहब... मुझे बचा लो... मैं जंगल में रास्ता भूल गया... मेरे पैर में काँटा चुभा है... मैं ढकानी का हूँ... टोटी का बेटा..."
देव का हाथ कुंडी तक पहुँचा।
और रुक गया।
एक बात अजीब थी।
ढकानी गाँव में उसने आज दिन भर घूमा था। उसने दुकानदार से सारे बड़े-बूढ़े गिनवाए थे चाय की चर्चा में।
गाँव में टोटी नाम का कोई आदमी नहीं था।
देव ने धीरे से पीछे कदम रखा।
बाहर बच्चा रोता रहा। "साहब... खोलो ना... ठंड लग रही है..."
देव ने चुपके से खिड़की की परदे की ओट से बाहर झाँका।
देहरी पर — कोई बच्चा नहीं था।
एक औरत खड़ी थी। लंबे बाल, सफेद साड़ी, और चेहरा — चेहरा नीचे झुका हुआ था, बालों में डूबा।
और उसके पैर —
उसके पैर उल्टे थे।
एड़ी आगे, उंगलियाँ पीछे।
और जैसे ही देव ने उसे देखा — औरत रुक गई। रोना बंद कर दिया। और धीरे-धीरे — एकदम धीरे — अपना सिर ऊपर उठाया।
देव ने परदा छोड़ दिया। वो दीवार से लिपट गया। साँस रोक ली।
बाहर — खामोशी।
फिर — खटखट शुरू हुई।
खट... खट... खट... खट...
चार।
खट... खट... खट... खट... खट...
पाँच।
खटखट रुकी नहीं। वो बढ़ती गई। छह... सात... दस... बीस... पचास... तेज़, और तेज़, और तेज़ — जैसे दरवाज़े पर एक नहीं, सौ हाथ पटक रहे हों। दरवाज़ा अपने बन्धनों पर काँप रहा था।
देव ने कोठरी से किरोसीन का डिब्बा उठाया और माचिस खोली। "आग लगा दूँगा!" उसने चीखकर कहा, "कसम से आग लगा दूँगा पूरी चौकी को!"
खटखट — रुक गई।
एकदम।
और फिर — दरवाज़े के नीचे की दरार से — कुछ अंदर आया।
एक पत्ता।
सूखा, मुड़ा हुआ पत्ता।
देव ने उसे उठाया। पत्ते पर — किसी ने नाखून से खरोंचकर लिखा था:
"एक साल।"