Pretika › Village Horror › रक्तवन
भाग 1 — नई पोस्टिंग
Pretika · Village Horror · 5 मिनट
नियम तीन हैं —
एक: रात में जंगल से कोई बुलाए तो जवाब मत देना — चाहे आवाज़ किसी भी अपने की हो।
दो: दरवाज़े पर तीन खटखट हो तो खोलना। चार हो तो — कभी नहीं।
तीन: जंगल के पेड़ मत गिनना। वो गिनना पसंद नहीं करते।
✦ ✦ ✦
देव रावत ने मड़ई रेंज का नाम पहली बार तब सुना, जब उसका ट्रांसफर लेटर हाथ में थमा दिया गया।
"मड़ई?" सीनियर ऑफिसर ने अजीब नज़रों से उसे देखा था, "तूने खुद ये पोस्टिंग माँगी है?"
"जी सर।"
"क्यों? वहाँ कोई खुद जाना नहीं चाहता। आखिरी गार्ड ने चार महीने में इस्तीफा दे दिया। उससे पहले वाला..." सीनियर ने बात अधूरी छोड़ी, "जा। पेपर तैयार हैं।"
देव ने कारण किसी को नहीं बताया था।
मड़ई रेंज के जंगल में — चौबीस साल पहले — उसके पिता गायब हुए थे। वनरक्षक थे वो भी। एक रात चौकी से निकले, और वापस नहीं आए। देव तब चार साल का था। माँ ने बरसों कहा — "पापा जंगल में खो गए।" मगर दादी ने मरते-मरते एक और बात कही थी —
"खोया नहीं तेरा बाप, देव। बुलाया गया।"
✦ ✦ ✦
मड़ई रेंज की चौकी जंगल के बिल्कुल किनारे थी। एक कमरे की पक्की इमारत, सामने एक सड़क — जो तीन किलोमीटर नीचे ढकानी गाँव में जाकर खत्म होती थी — और पीछे, उत्तर की तरफ, जंगल।
जंगल को देखते ही देव के रोंगटे खड़े हो गए।
ऐसा जंगल उसने ज़िंदगी में नहीं देखा था। पेड़ — साल, देवदार, बांझ — इतने घने, इतने ऊँचे, कि दोपहर का सूरज भी अंदर झाँक नहीं पा रहा था। और सबसे अजीब बात — जंगल के किनारे से लेकर सौ कदम तक — एक भी पक्षी नहीं था। न चिड़िया, न कौवा। चारों तरफ पहाड़ चिड़ियों से भरे थे, मगर इस जंगल के ऊपर से कोई पक्षी उड़ता भी नहीं था।
"यही मड़ई है?"
पीछे से आवाज़ आई। एक बूढ़ा आदमी खड़ा था — लाठी पर टिका, गांजा-सा चेहरा, मगर आँखें तेज़। वनविभाग की पुरानी वर्दी।
"रघुवीर। रिटायर्ड गार्ड। गाँव में रहता हूँ। साहब ने कहा था नए अफसर आ रहे हैं — तो आ गया देखने।"
"देव रावत।"
रघुवीर ने उसका नाम सुना। और उसकी आँखें एक पल के लिए रुक गईं।
"रावत? ... श्याम रावत का कुछ लगता है तू?"
देव का दिल धड़का। "मेरे पिता थे।"
रघुवीर बहुत देर कुछ नहीं बोला। फिर धीरे से बोला, "अंदर चल। चाय बना। कुछ बातें ऐसी हैं जो खुले आसमान के नीचे नहीं होतीं।"
✦ ✦ ✦
चौकी के अंदर रघुवीर ने तीन नियम बताए।
"पहला — रात में जंगल से कोई बुलाए तो जवाब मत देना। आवाज़ माँ की हो, बाप की हो, बीवी की हो — फर्क नहीं पड़ता। जंगल आवाज़ें चुराता है। जो जवाब देता है — वो अपना पता देता है। और जिसका पता जंगल को मिल जाए..."
"तो?"
"तो वो बुलाता रहता है। रोज़। हर रात। ज़रा करीब से। जब तक आदमी खुद चलकर न आए।"
देव ने चाय का कप नीचे रखा। "और दूसरा नियम?"
"रात को दरवाज़े पर खटखट हो — तो पहले गिन। इंसान तीन बार खटखटाता है। हमेशा। तीन। अगर चार बार खटखट हो — दरवाज़ा मत खोलना। चाहे बाहर कोई चीखे, रोए, मरता हो। चार खटखट वाला — इंसान नहीं होता।"
"और तीसरा?"
रघुवीर ने खिड़की से जंगल की तरफ देखा।
"पेड़ मत गिनना। कभी नहीं। बहुत से नौजवान गार्ड आते हैं — बोर होते हैं — पेड़ गिनते हैं। एक दिन, दो दिन। फिर उन्हें गड़बड़ दिखती है। आज चालीस पेड़ दिखे, कल तालीस। परसों उनतालीस। आदमी पागल हो जाता है ये सोचकर कि गिनती में गलती कहाँ हुई।"
"और असल में गलती कहाँ होती है?"
रघुवीर ने आँखें मटकाईं।
"गलती कोई नहीं होती, बच्चा। पेड़ बढ़ते हैं। हर बारह साल में — एक पेड़ बढ़ता है।"
✦ ✦ ✦
रघुवीर चला गया। शाम ढली। देव ने खाना बनाया, खाया, और बिस्तर पर लेट गया।
रात के ग्यारह बजे, जंगल से आवाज़ आई।
पहले उसे लगा — हवा है।
फिर आवाज़ साफ हुई।
"देव..."
उसका खून जम गया।
"देव... बेटा..."
वो आवाज़ वो थी जिसे उसने सिर्फ पुराने टेप रिकॉर्डर में सुना था। चौबीस साल पुरानी रिकॉर्डिंग में। उसके पिता की आवाज़।
"देव... आ... बेटा... इतने साल हो गए... आ..."
देव बिस्तर पर पत्थर-सा जम गया। उसके हाथ काँप रहे थे। आँखों से आँसू बह रहे थे। चौबीस साल का इंतज़ार — एक बाप की आवाज़ का — उसके सीने में भटक रहा था।
जवाब दे। एक बार बस। एक बार बोल दे "पापा"।
मगर रघुवीर की बात याद आई।
जंगल आवाज़ें चुराता है।
देव ने कानों पर हाथ रख लिए। दांत भींच लिए। और रात भर — वो आवाज़ बुलाती रही।
"देव... देव... देव..."
सुबह चार बजे आवाज़ रुकी।
देव ने आँखें खोलीं।
और उसका दिल रुक गया।
चौकी का दरवाज़ा — जो उसने रात को अंदर से कुंडी लगाकर बंद किया था —
खुला था।
हल्का सा।
और दरवाज़े की देहरी पर — गीली मिट्टी के नंगे पैरों के निशान थे।
अंदर आते हुए।
बाहर जाते हुए नहीं।
- Writer
- Pretika
- Story
- रक्तवन
- Chapter
- 1 of 10
- Category
- Village Horror
- Reading time
- 5 min
- Words
- 826
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
और कहानियाँ · More stories
- तेरहवीं अमावस · Piyashi Atma
- हमज़ाद · Pretika
- उस जिन्न की आख़िरी मोहब्बत · Pretika
- डूबे गाँव की जनगणना · Pretika