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भाग चौथा — मामा की अलमारी
Piyashi Atma · Real Experiences · 3 मिनट
वरुण उस रात सो नहीं पाया — और सुबह होते ही वो सीधा अपने मामा के घर पहुँचा, जो दिल्ली के पुराने इलाक़े में एक ऐसे घर में रहते थे जहाँ की दीवारों पर वक़्त की परतें जमी हुई थीं, और जहाँ की अलमारियों में वो राज़ बंद थे जिन्हें बूढ़े लोग "बीती बातें" कहकर दफ़ना देते हैं। मामा — श्रीकांत सेहगल, उम्र अड़सठ साल — वरुण को देखकर पहले तो खुश हुए, पर जब वरुण ने उनसे सीधा पूछा — "मामा, DL-1C-1273 — तीस साल पहले उस गाड़ी के साथ क्या हुआ था, और आपने उसे क्यों बेचा था?" — तो बूढ़े का चेहरा ऐसे बदला जैसे किसी ने उसके सामने उसकी क़ब्र खोलकर रख दी हो।
मामा ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा — उन्होंने अपनी अलमारी खोली, उसमें से एक पुराना लोहे का डिब्बा निकाला, उसकी चाबी अपने गले से उतारी, और डिब्बा खोलकर वरुण के सामने रख दिया। डिब्बे में तीन चीज़ें थीं — एक फटा हुआ, खून जैसे दाग़ से सना हुआ सफ़ेद साड़ी का पल्लू; एक मंगलसूत्र, जिसकी डोर टूटी हुई थी; और एक पुराना कागज़, जिस पर पेंसिल से एक नक्शा बना था — एक सड़क का, एक बरगद का, और बरगद से कुछ दूर, एक क्रॉस का निशान, जिसके नीचे लिखा था — "यहाँ।" वरुण ने कागज़ उठाया, और उसकी आँखों में आँसू आ गए — क्योंकि उसे समझ आ गया कि यह नक्शा किसका है, और यह क्रॉस किसकी क़ब्र का निशान है।
मामा की आवाज़ टूटी हुई थी जब उन्होंने बोलना शुरू किया — "बेटा, उस रात मैं शराब पीकर गाड़ी चला रहा था — मैंने किसी को ठोकर मारी, और मैं भाग निकला — पर दो किलोमीटर आगे जाकर मेरा दिल मुझे वापस खींच लाया, और जब मैं वापस पहुँचा, तो वहाँ सिर्फ़ खून था और एक टूटा हुआ मंगलसूत्र — औरत कहीं नहीं थी। मैंने उसे ढूँढा, पूरी रात ढूँढा, सूबे के किनारे खोदा, नाले में उतरा — पर वो कहीं नहीं मिली। मैं पागल हो गया था बेटा — मैंने उसके पल्लू और मंगलसूत्र को उठाया, और मैंने उस जगह का नक्शा बनाया जहाँ मुझे लगा कि शायद मैंने उसे गाड़ी में रखकर कहीं गिरा दिया था — पर सच यह है कि मुझे आज तक नहीं पता कि मैंने उसे कहाँ रखा, क्योंकि उस रात की आधी याददाश्त शराब में डूबी हुई है — और तीस साल से मैं हर रात उसी सपने को देखता हूँ, जिसमें एक औरत मुझसे पूछती है — 'मुझे कहाँ रखा?' — और मेरे पास कोई जवाब नहीं होता।" वरुण ने अपने मामा का हाथ पकड़ा — और उसी पल उसका मोबाइल वाइब्रेट हुआ, उसी अनजान नंबर से — "उन्होंने तुम्हें सच बता दिया — अब पूछो उनसे, कि उस रात गाड़ी में सिर्फ़ वो अकेले थे, या उनके साथ कोई और भी था — कोई ऐसा जिसने उन्हें भागने को कहा था, और जिसने उस औरत को उठाकर कहीं रखा था — पूछो, कि उस रात की असली ड्राइवर सीट पर कौन बैठा था।"
⏳ सस्पेंस — क्या मामा उस रात अकेले नहीं थे...? और अगर ड्राइवर मामा नहीं था, तो गाड़ी कौन चला रहा था...?
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- दिल्ली कैंट — सफ़ेद साड़ी वाली
- Chapter
- 4 of 5
- Category
- Real Experiences
- Reading time
- 3 min
- Words
- 517
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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