PretikaVillage Horrorबीराण हाल्ट — सुनसान रूट की आखिरी गाड़ी

भाग 10 — जो रूट बच गया

Piyashi Atma · Village Horror · 3 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
बीराण हाल्ट — सुनसान रूट की आखिरी गाड़ी
Chapter
10 of 10
Category
Village Horror
Reading time
3 min
Words
501
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

दिशा की स्टोरी छपी।

**"पचास साल की शादी — वो गाड़ी, जो रुकी तो बचा ली ज़िंदगियाँ और रुकी तो पूरी कर दी एक कहानी।"**

स्टोरी आग की तरह फैल गई।

लोगों ने मरु मेल के टिकट काटने शुरू किए। रेलवे बोर्ड घुटनों पर आया और एक महीने बाद नया आदेश आया—

> **"मरु मेल लाइन बंद नहीं होगी। उसे 'हेरिटेज रूट' घोषित किया जाता है और गाड़ी का नया नाम होगा—**
>
> **हीरा मरु मेल।"**

बीराण हाल्ट पर असली प्लेटफॉर्म बना।

छोटा-सा।

एक बोर्ड।

एक लैंप।

और एक पत्थर की पट्टिका, जिस पर लिखा था—

> **"यहाँ 14 मार्च 1971 की रात—**
>
> **140 लोग एक गाड़ी का इंतज़ार करते हुए रेत में डूब गए थे।**
>
> **अब यहाँ गाड़ी हमेशा रुकती है।**
>
> **और अब यहाँ कोई इंतज़ार नहीं करता।"**

और हर वीरवार गाड़ी वहाँ दो मिनट रुकती है।

दरवाज़े खुलते हैं।

मगर अब कोई नहीं चढ़ता।

प्लेटफॉर्म खाली रहता है।

बस लैंप हमेशा जलता है।

और कहते हैं, उस लैंप में देवीलाल हर हफ़्ते खुद तेल डालकर जाता है।

वहाँ खड़े होकर वो एक बात कहता है—

**"बापू, हिसाब पूरा हुआ।**

**गाड़ी रुक गई।**

**अब आप भी आराम करो।"**

✦ ✦ ✦

देवीलाल अगले साल रिटायर हुआ।

विदाई में उसे रेलवे ने एक पुरानी पीतल की घंटी दी।

और उसने अपने बापू की डायरी दिशा को दे दी।

**"अब ये कहानी आपकी है, बेटी।**

**लिखना कभी मत भूलना कि गाड़ियाँ सिर्फ लोहे की नहीं होतीं।**

**गाड़ियाँ उन लोगों की होती हैं, जो उनका इंतज़ार करते हैं।"**

रामस्वरूप मीणा उसी साल चल बसे।

वृद्धाश्रम वालों ने कहा, सोते में गए और चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी—

जो पचास साल से किसी ने उनके चेहरे पर नहीं देखी थी।

उनकी मेज पर वो खिलौना इंजन रखा था—

जिसकी चाबी—

**पचास साल बाद—**

**पहली बार—**

**पूरी घुमा दी गई थी।**

✦ ✦ ✦

### कहानी दूसरी — पहाड़ों वाला रूट

मगर कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

क्योंकि भारत में हज़ारों किलोमीटर की पटरियाँ हैं—

और हर पटरी के साथ—

**कुछ न कुछ चलता है।**

तीन साल बाद दिशा एक और असाइनमेंट पर थी—

पहाड़ों वाला रूट।

बर्फ वाला।

सुनसान।

जहाँ हफ़्ते में एक गाड़ी चलती थी।

रात हो गई थी।

गाड़ी पहाड़ों में उतर रही थी और दिशा खिड़की के पास बैठी अपनी डायरी लिख रही थी।

तभी—

**गाड़ी धीमी हुई।**

दिशा ने ऊपर देखा।

बाहर बर्फ उड़ रही थी और उस बर्फ के बीच—

एक जलता हुआ स्टेशन दिखा।

छोटा-सा प्लेटफॉर्म।

बल्बों की लड़ियाँ।

और एक चाय की दुकान, जिसमें भाप उठ रही थी।

और प्लेटफॉर्म पर—

कुछ लोग खड़े थे।

पुराने पहाड़ी कपड़ों में।

और वो सब—

गाड़ी की तरफ देख रहे थे।

दिशा की साँस ठहर गई।

और उसके बगल में बैठे एक बूढ़े गार्ड ने उसकी ओर देखा और बहुत धीरे से कहा—

**"पहली बार आई हैं इस रूट पर, बेटी?"**

दिशा ने सिर हिलाया।

**"तो सुन लो..."**

बूढ़े गार्ड ने अपनी लालटेन ठीक करते हुए कहा,

**"यहाँ तीन नियम हैं।**

**पहला—इस हाल्ट पर खिड़की से हाथ मत हिलाना।**

**दूसरा—चाय वाले की चाय गुस्से से मत ठुकराना।**

**और तीसरा—"**

उसने खिड़की के बाहर देखा, जहाँ बर्फ में वो लोग खड़े थे।

**"तीसरा—अगर कोई तुमसे पूछे कि—**

**'गाड़ी आगे जाएगी क्या?'**

**तो हमेशा कहना—**

**हाँ, जाएगी।**

क्योंकि कुछ लोगों के लिए—

तुम्हारा एक 'हाँ'—

**पचास साल की उम्मीद होती है।"**

दिशा ने बूढ़े गार्ड को देखा।

फिर खिड़की के बाहर उस जलते हुए स्टेशन को देखा।

फिर उसने अपनी डायरी खोली—

और उसके पहले पन्ने पर लिखा—

> **"कहानी दूसरी**
>
> **रूट — पहाड़ों वाला**
>
> **शुरुआत—**
>
> **हर सुनसान रूट पर—**
>
> **कोई न कोई—**
>
> **इंतज़ार कर रहा है।"**

← पिछला भाग

बीराण हाल्ट — सुनसान रूट की आखिरी गाड़ी · सभी भाग →