Pretika › Village Horror › बीराण हाल्ट — सुनसान रूट की आखिरी गाड़ी
भाग 1 — मरने लगा रूट
Piyashi Atma · Village Horror · 4 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- बीराण हाल्ट — सुनसान रूट की आखिरी गाड़ी
- Chapter
- 1 of 10
- Category
- Village Horror
- Reading time
- 4 min
- Words
- 696
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
दिशा ओझा — पत्रकार थी।
सत्ताईस साल की। एक डिजिटल पत्रिका में — फीचर लिखती थी। और — इस बार — उसका विषय था — "भारत के मरते हुए रेलवे रूट — वो लाइनें — जहाँ — अब — हफ़्ते में — सिर्फ एक गाड़ी — चलती है।"
उसकी — लिस्ट में — सबसे ऊपर — एक नाम था।
मरु मेल।
रेवाड़ी से — रामसर — 380 किलोमीटर — थार के बीच से — एक पुरानी — मीटर गेज लाइन — जिस पर — अब — सिर्फ — वीरवार की — एक गाड़ी — चलती है।
नौ स्टेशन — जिनमें से — चार — ऐसे — जहाँ — न स्टाफ है — न बस्ती — बस — एक बोर्ड — एक लैंप — और — चारों तरफ — सैकड़ों किलोमीटर तक — रेत।
दिशा — वीरवार की शाम — रेवाड़ी स्टेशन पर — उतरी।
गाड़ी — प्लेटफॉर्म पर — खड़ी थी।
पुरानी। धुंधली पीली। सात डिब्बे — जिनमें से — पाँच — खाली थे — खाली — सच में खाली — जिनमें — पंखे भी — आलस्य से — घूम रहे थे।
प्लेटफॉर्म पर — गिनती के — दस-बारह यात्री।
और — डिब्बे के — पीछे — खड़ा — एक — बूढ़ा — गार्ड —
— देवीलाल।
साठ साल का। सफेद वर्दी। कंधे पर — पुराना झोला। हाथ में — हरी झंडी — और — एक — पुरानी — पीतल की घंटी।
"आप — वो — पत्रकार वाली — हैं?" उसने — दिशा को — देखते ही — पूछा।
"जी — मैंने — अनुमति के लिए — पत्र भेजा था —"
"पढ़ा था।" देवीलाल ने — सिर हिलाया, "चलिए — सामने वाले डिब्बे में — आपकी सीट है। और — गाड़ी चलने से पहले — मेरी — तीन बातें — सुन लीजिए। क्योंकि — इस रूट पर — मैं — चालीस साल से हूँ — और — जो — मैं बताता हूँ — वो — किसी — टाइमटेबल में — नहीं लिखा।"
दिशा ने — नोटबुक खोला।
"पहली बात —" देवीलाल ने कहा, "— इस गाड़ी के — टाइमटेबल में — सात हाल्ट हैं। मगर — गाड़ी — आठ जगह — रुकती है। आठवीं जगह — कोई नक्शा नहीं जानता। रात को — किलोमीटर 218 पर — गाड़ी — रुकेगी — दो मिनट — और — वहाँ — आपको — एक — जलता हुआ — स्टेशन — दिखेगा — पूरा — लाइटों वाला — बीच — सुनसान — रेत में —"
"बीच रेत में — जलता हुआ स्टेशन?"
"बीराण हाल्ट।" देवीलाल ने — बहुत धीरे से — नाम लिया, "और — वहाँ — मेरी — तीन बातें — काम आएँगी। पहली — खिड़की से — कभी — हाथ मत हिलाना। चाहे — वहाँ — कोई — कितना भी — हाथ हिलाकर — आपको — बुलाए।"
"क्यों?"
"क्योंकि — जो — हाथ हिलाता है — उसे — बुलावा समझा जाता है। और — जिसे — बुलावा मिलता है —" देवीलाल ने — रेत की तरफ देखा, "— वो — आता ज़रूर है — मगर — जाता नहीं।"
दिशा का — कलम — रुक गया।
"दूसरी बात — वहाँ — एक — चाय वाला — होगा। कुल्हड़ में — चाय देगा। पीना — मत। मगर — मना — भी — ऐसे मत करना — जैसे — घृणा हो। मुस्कुराकर — मना करना। वहाँ — मेहमाननवाज़ी — इज़्ज़त है — और — बेइज़्ज़ती —"
"— वो — याद रखते हैं?"
देवीलाल ने — उसे — देखा। "आप — समझदार हैं।"
"और — तीसरी बात?"
"तीसरी बात — सबसे — अजीब है।" देवीलाल ने — आवाज़ — और धीमी की, "गाड़ी में — कभी-कभी — एक — बच्चा — मिलेगा। सात-आठ साल का। रोता हुआ। कहेगा — 'मुझे — उठा लो — मुझे — मेरी माँ — के पास — ले चलो।' तो — उसका — हाथ — पकड़ लेना। मगर — कभी — गोद में — मत उठाना।"
"क्यों? क्या होगा?"
देवीलाल ने — हरी झंडी — उठाई — गाड़ी चलने का — वक़्त हो गया था।
"जिसे — तुम — गोद में उठाओगे —" उसने — घंटी बजाते हुए — कहा, "— वो — तुम्हारा — हो जाएगा। हमेशा के लिए। और — तुम्हें — उसकी माँ — कभी — नहीं मिलेगी — क्योंकि — वो — इस गाड़ी में — नहीं है। वो — कहीं — और — इंतज़ार कर रही है —"
गाड़ी — चल पड़ी।
"— बहुत — दूर — जहाँ — ये गाड़ी — नहीं जाती।"