PretikaVillage Horrorबीराण हाल्ट — सुनसान रूट की आखिरी गाड़ी

भाग 2 — आठवाँ हाल्ट

Piyashi Atma · Village Horror · 3 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
बीराण हाल्ट — सुनसान रूट की आखिरी गाड़ी
Chapter
2 of 10
Category
Village Horror
Reading time
3 min
Words
599
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

गाड़ी शाम ढलते-ढलते रेत में उतर गई।

दिशा ने अपनी ज़िंदगी में ऐसा खालीपन कभी नहीं देखा था।

चारों तरफ रेत—रेत और रेत। ढूलती हुई, लहराती हुई—सुनहरी, फिर लाल, फिर काली। बीच में एक पुराना खंभा। कहीं एक मरा हुआ पेड़ अपनी जड़ों से झुका हुआ, जैसे किसी से कुछ माँग रहा हो।

स्टेशन आए और गुज़र गए।

**"काला बोर — 2 मिनट"**

बोर्ड, एक लैंप और सैकड़ों किलोमीटर की खामोशी।

**"नागौर रोड — 2 मिनट"**

बोर्ड, एक लैंप और खामोशी।

रात ढल गई।

डिब्बे में अब बस पाँच यात्री रह गए थे।

एक बूढ़ी अम्मा—बीज बेचने वाली—जो कोने में सो रही थीं। दो मज़दूर अपने थैलों पर सिर रखे हुए थे।

और एक नौजवान, जो अभी कुछ स्टेशन पहले ही चढ़ा था—

चमकीली शर्ट, सोने की चेन, कान में इयरफोन और फोन में वीडियो बना रहा था।

> **"भाई साहब, देखो... ये है इंडिया की सबसे खाली ट्रेन। डरावनी एकदम! मैं हूँ रॉकी और मैं आज आपको दिखाऊँगा इस रूट का राज़..."**

रॉकी।

ज़मीन का दलाल।

दिशा ने उसके बारे में पहले सुना था। ये रूट बंद होने वाला था और ये वो लोग थे, जो रेलवे की ज़मीन हड़पने आए थे—रिसॉर्ट बनाने, सोलर प्लांट लगाने।

और तभी देवीलाल डिब्बे में आए और धीरे से दिशा के पास बैठे।

**"अब आएगा।"**

उन्होंने बस इतना कहा।

✦ ✦ ✦

गाड़ी धीमी हुई।

दिशा ने अपनी घड़ी देखी।

**रात 10:47।**

बाहर पूरी काली रेत थी, तारों भरे आसमान के नीचे।

और फिर दूर—

**रोशनी दिखाई दी।**

एक चमकती हुई लाइन—रोशनियों की—रेत के बीचों-बीच।

जैसे-जैसे गाड़ी करीब गई—

दिशा की आँखें फटी रह गईं।

एक पूरा स्टेशन खड़ा था।

प्लेटफॉर्म। बेंच। बल्बों की लड़ियाँ, जैसे किसी त्योहार में लगती हैं।

एक चाय की दुकान, जिसमें लैंप जल रहा था और भाप उठ रही थी।

और प्लेटफॉर्म पर—

**भीड़ खड़ी थी।**

सैकड़ों लोग।

मगर ऐसी भीड़, जो दिशा ने कभी नहीं देखी थी।

सब त्योहार के कपड़ों में थे।

महिलाएँ लाल-हरी ओढ़नियों में, सिर पर चाँदी के गहनों के ढेर। पुरुष पगड़ियों में—कुछ की पगड़ियों पर कलगी, जैसी शादी में होती है।

बच्चे नए कपड़ों में।

और सबके हाथों में—

**सामान।**

ट्रंक। पेटियाँ। कपड़े के बंडल। किसी के हाथ में मिठाई का डिब्बा। किसी के कंधे पर बाँसुरी।

और सब गाड़ी की तरफ देख रहे थे और—

**हाथ हिला रहे थे।**

मुस्कुराते हुए।

गाड़ी रुकी।

दरवाज़े खुले।

और लोग चढ़ने लगे।

बिल्कुल शांति से। कतार में।

एक स्टेशन मास्टर पुरानी वर्दी में, हाथ में लालटेन और टिकट पंच लिए आगे खड़ा था। हर टिकट पंच करता हुआ।

और कोई भी भागता नहीं था। ठेलता नहीं था।

सब इतने सहज थे—

**जैसे ये उनकी रोज़ की गाड़ी हो।**

दिशा अपनी सीट पर जमी हुई देख रही थी।

और तभी—

**चाय वाला आया।**

डिब्बे में घुसा। ट्रे में कुल्हड़ लिए हुए।

और पहला कुल्हड़ सीधा दिशा को बढ़ाया—

मुस्कुराते हुए।

उसका चेहरा दिशा ने करीब से देखा।

गोल, सूजा हुआ, धूल में सना।

और उसकी मुस्कान बहुत सच्ची थी। बहुत गर्म।

मगर उसकी आँखें—

**उसकी आँखें ऐसी थीं, जैसे किसी बुझे हुए चूल्हे की।**

दिशा ने देवीलाल की बात याद की।

उसने मुस्कुराकर सिर हिलाया।

**"बहुत शुक्रिया, मगर मैंने अभी चाय पी है।"**

चाय वाले ने एक पल उसे देखा।

फिर उसने सिर झुकाया और आगे बढ़ गया।

और दिशा ने नोटिस किया—

उसकी ट्रे, जो कुल्हड़ों से भरी थी—

उसमें से भाप उठ रही थी।

मगर कुल्हड़—

**सूखी रेत से भरे थे।**

✦ ✦ ✦

और तभी पीछे से एक आवाज़ आई।

रॉकी खिड़की के पास खड़ा था। अपना फोन ऊँचा किए हुए।

वो हँसते हुए बाहर प्लेटफॉर्म पर खड़ी भीड़ को दिखा रहा था।

और उसने हाथ उठाकर—

**हिला दिया।**

> **"हाय! बोलो हाय! मेरे दोस्तों, कह रहे हैं हाय!"**

देवीलाल उठ खड़ा हुआ।

**"नहीं!"**

मगर देर हो चुकी थी।

प्लेटफॉर्म पर खड़ी सैकड़ों लोगों की मुस्कानें—

**एक साथ रुक गईं।**

और फिर—

सैकड़ों हाथ—

**एक साथ उठे।**

और हिलने लगे।

धीरे-धीरे।

**सिर्फ रॉकी के लिए।**

गाड़ी चल पड़ी।

**बीराण हाल्ट पीछे रह गया।**

मगर रॉकी खिड़की से चिपका खड़ा रहा।

दिशा ने देखा—

उसका चेहरा सफेद पड़ गया था।

क्योंकि जब तक स्टेशन दिखाई देता रहा—

वो भीड़—

**उसे देखती रही।**

और हाथ हिलाती रही।

और अब डिब्बे के अंदर—

जो त्योहार वाले यात्री चढ़े थे—

वो सब—

**एक-एक करके रॉकी की तरफ मुड़ रहे थे।**

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