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भाग 3 — दूल्हन की सीट

Piyashi Atma · Village Horror · 4 मिनट

रात गहरी हो गई।

डिब्बे में अब अजीब सन्नाटा था।

त्योहार वाले यात्री अपनी-अपनी सीटों पर बैठ चुके थे। कहीं एक बूढ़ा हारमोनिका बजा रहा था—धीमी, पुरानी शादी की धुन **"बंबी नाच, नचाइ धे"**—मगर इतनी धीमी कि वो धुन नहीं, विलाप लगती थी।

और रॉकी कोने की सीट पर कुंडली मारकर बैठा था। फोन कब का बंद हो चुका था और उसके दोनों तरफ—

दो त्योहार वाले यात्री बैठे थे।

उसे देखते हुए।

मुस्कुराते हुए।

दिशा ने देवीलाल से धीरे से पूछा,

**"उसे क्या होगा?"**

देवीलाल ने सिर हिलाया।

**"मैंने मना किया था। अब देखिए उसकी किस्मत। बुलावा दिया है। वो आएँगे उसके साथ चलेंगे। हर वीरवार, हर रूट, जब तक..."**

**"जब तक?"**

**"जब तक वो खुद उनमें से एक न हो जाए।"**

✦ ✦ ✦

रात साढ़े ग्यारह बजे दिशा वाशरूम जाने के लिए उठी और डिब्बे के बीच से गुज़री।

और तभी उसने वो सीट देखी।

कोच S2 की बीच वाली, खिड़की के पास की एक सीट, जिस पर कोई नहीं बैठा था—

मगर जिस पर गेंदे के फूलों की एक माला रखी थी।

ताज़ी। गीली। जैसे अभी किसी ने रखी हो।

उस सीट के सामने वाली सीट पर दो औरतें बैठी थीं, जो उस खाली सीट की तरफ झुककर बातें कर रही थीं—

जैसे वहाँ कोई बैठा हो।

**"चिंता मत करो, हीरा। गाड़ी वक़्त पर है। बारात इंतज़ार कर रही होगी। नंदू काका बाँसुरी ले आए हैं। देखो अम्मा, आप रोइए मत। विदाई में रोना होता ही है, मगर अभी तो खुशी मनाइए..."**

दिशा ठहर गई।

खाली सीट खाली थी।

मगर खिड़की के शीशे में—

**उसका परावर्तन खाली नहीं था।**

शीशे में उस सीट पर एक लड़की बैठी थी।

सोलह-सत्रह साल की।

दुल्हन के जोड़े में। लाल बाँधनी। सिर पर ओढ़नी झुकी हुई। हाथों में कलाई तक चूड़ियाँ।

और उसकी गोद में एक पोटली।

उसकी आँखों में—

**आँसू और उम्मीद, दोनों।**

शीशे में वो बैठी थी।

सामने वो नहीं थी।

दिशा की साँस अटक गई।

और उसी पल—

शीशे में दुल्हन ने सिर उठाया।

और दिशा की तरफ देखा।

**परावर्तन के आर-पार।**

उसके होंठ बिना आवाज़ के हिले—

**"गाड़ी वक़्त पर है ना...?"**

दिशा ने न जाने क्यों—

सिर हिला दिया।

दुल्हन आँसुओं के बीच मुस्कुराई।

और फिर—

शीशे में वो भीड़ में घुल गई।

✦ ✦ ✦

वाशरूम से लौटते वक्त दिशा ने डिब्बे के दूसरे सिरे पर—

**उसे देखा।**

एक बच्चा।

सात-आठ साल का।

पुराना, उदास कुर्ता पहने हुए। कोने में खड़ा था और रो रहा था—बिना आवाज़ के। बस आँसू बह रहे थे।

और जैसे ही दिशा उसके पास से गुज़री—

**उसने उसका हाथ पकड़ लिया।**

हाथ बर्फ जैसा ठंडा था।

**"दीदी..."**

उसने ऐसी आवाज़ में कहा, जो बहुत रात की, बहुत दूर की खिड़कियों से आती है।

**"मुझे मेरी माँ के पास ले चलो ना। मुझे उठा लो ना..."**

दिशा की रीढ़ में सर्द लहर दौड़ गई।

**तीसरा नियम।**

उसने घुटने टेके और बच्चे की आँखों में देखा।

और उसने वो किया, जो उसका दिल कहता था—मगर वैसे, जैसे नियम कहता था।

उसने बच्चे का हाथ दोनों हाथों में पकड़ा, मगर उठाया नहीं।

**"उठाऊँगी नहीं, बेटा।"** उसने बहुत धीरे से कहा, **"मगर हाथ ज़रूर पकड़ूँगी। और तुम्हारी माँ ढूँढने में मदद ज़रूर करूँगी। तुम्हारी माँ कहाँ है?"**

बच्चे ने रोते हुए कहा—

**"माँ गाड़ी में चढ़ने लगी थी, मगर आँधी आ गई और मैं उसका हाथ छोड़ गया। और मैं गाड़ी में चढ़ गया, और माँ रह गई। और गाड़ी चल पड़ी, और मैं रोता रहा, और गाड़ी चलती रही..."**

दिशा का दिल टूट गया।

**"कब की बात है, बेटा?"**

बच्चे ने आँसू पोंछे।

**"मुझे नहीं पता, दीदी। मुझे बस इतना याद है कि उस रात बहुत रेत उड़ रही थी और माँ चीख रही थीं—'गुड्डू! गाड़ी रोको! मेरा गुड्डू!'—और गाड़ी नहीं रुकी।"**

दिशा ने उसका ठंडा हाथ अपने हाथों में लिया।

**"गुड्डू, तुम मेरे साथ चलो।"** उसने कहा, **"मैं तुम्हारी माँ ढूँढूँगी। वादा करती हूँ।"**

और बच्चा उसके साथ चल पड़ा—

उसका छोटा, ठंडा हाथ उसकी मुट्ठी में।

और डिब्बे के दूसरे सिरे पर खड़ा देवीलाल—

ये सब देख रहा था।

उसकी बूढ़ी आँखों में आँसू भर आए थे।

और वो बुदबुदा रहा था—

**"पचास साल... पचास साल बाद किसी ने उसका हाथ थामा..."**

Writer
Piyashi Atma
Story
बीराण हाल्ट — सुनसान रूट की आखिरी गाड़ी
Chapter
3 of 10
Category
Village Horror
Reading time
4 min
Words
682
Language
Hindi (हिंदी)
Price
5 parts free · 5 unlock with coins

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