PretikaVillage Horrorकालकूट — वो गाँव जो नक्शे पर नहीं है

भाग 1 — नक्शे से बाहर का गाँव

Pretika · Village Horror · 31 मिनट

Writer
Pretika
Story
कालकूट — वो गाँव जो नक्शे पर नहीं है
Chapter
1 of 2
Category
Village Horror
Reading time
31 min
Words
6167
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अध्याय 1 · नक्शे से बाहर का गाँव

रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे जब आर्यन की गाड़ी का GPS पहली बार बंद हुआ। पहाड़ी सड़क पर कोहरा इतना घना था कि headlights की रोशनी सिर्फ दस फीट आगे जाकर दीवार से टकरा जाती। उसने स्टीयरिंग पर हाथ कसा और बड़बड़ाया, "साला network भी इसी जगह जाना था।"

पीछे की सीट पर मीरा सो रही थी। उसका सिर खिड़की से टिका हुआ था, और उसके बाल कांच पर बिखरे हुए थे। पच्चीस साल की मीरा — आर्यन की मंगेतर — जो दिल्ली से मसूरी जाने के इस रास्ते को "रोमांटिक road trip" कह रही थी, अब चार घंटे से बेसुध सो रही थी।

आर्यन ने एक नज़र पीछे डाली और मुस्कुरा दिया। फिर उसकी नज़र वापस सड़क पर आई — और उसका मुँह खुला रह गया।

सड़क खत्म हो चुकी थी।

कोहरे के पार, headlights की रोशनी में एक मिट्टी का रास्ता दिख रहा था। उसके दोनों तरफ ऊँचे-ऊँचे देवदार के पेड़ खड़े थे — इतने सीधे, इतने बेहरकत, मानो किसी ने उन्हें वहाँ खड़ा कर दिया हो और हुक्म दिया हो कि हिलना नहीं। हवा थी, मगर पेड़ नहीं हिल रहे थे।

"क्या बकवास है..." आर्यन ने गाड़ी रोक दी। GPS अभी भी डेड था। उसने फोन उठाया — कोई signal नहीं। नेटवर्क की उस जगह जो छोटी सी bar होती है, वहाँ सिर्फ एक x का निशान था।

उसने हेडलाइट्स बंद कीं और फिर on कीं। एक पल को लगा कि कोहरे में, बहुत दूर, कोई खड़ा था। एक आकृति — दुबली, लंबी, मुँह की जगह सिर्फ अंधेरा। मगर जब उसने आँखें मलकर फिर देखा, तो वहाँ कुछ नहीं था।

"आर्यन?" मीरा की नींद टूट गई थी। उसने अंगड़ाई ली, "हम कहाँ हैं? रुक क्यों गए?"

"मीरा, GPS खराब हो गया है। और लग रहा है हम गलत रास्ते पर आ गए।"

मीरा ने आगे झाँककर देखा। फिर वो भी चुप हो गई।

"ये... ये कौन सी जगह है, आर्यन?"

"पता नहीं।"

दोनों कुछ देर चुप रहे। गाड़ी का engine धीमे-धीमे गुनगुना रहा था। बाहर, कोहरे के अंदर से, एक आवाज़ आई — जैसे कोई दूर से धीरे-धीरे घंटा बजा रहा हो। टन। टन। टन।

"कोई मंदिर है शायद," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में डर नहीं, उत्सुकता थी।

"मीरा, हमें वापस मुड़ जाना चाहिए।"

"वापस कहाँ? तुमने ही कहा था पीछे का रास्ता बंद था landslide से।"

आर्यन को याद आया। हाँ, घंटा भर पहले उन्होंने एक मलबे का ढेर देखा था जिसके आगे का रास्ता सेना ने बंद किया हुआ था। एक रास्ता था जो साइड से जाता था — वही रास्ता जो उसे यहाँ ले आया।

"ठीक है। चलो थोड़ा और आगे जाकर देखते हैं। शायद कोई गाँव हो जहाँ रात गुज़ार सकें।"

गाड़ी आगे बढ़ी। मिट्टी का रास्ता पथरीला था, और गाड़ी हर pothole पर हिचकोले खा रही थी। दस मिनट तक देवदार के पेड़ों की दीवार चलती रही। फिर अचानक, जैसे किसी ने पर्दा खोल दिया हो, कोहरा छँटा।

सामने एक गाँव था।

कोई बीस-तीस घर। पत्थर और लकड़ी के बने हुए। हर घर की खिड़की में एक दीया जल रहा था — मगर कोई बल्ब नहीं, कोई बिजली नहीं। एक पुरानी सी पत्थर की मूरत गाँव के बीच में थी, जिसकी शक्ल नहीं पहचानी जा रही थी क्योंकि किसी ने उस पर एक लाल कपड़ा डाल रखा था।

और सबसे अजीब बात — गाँव के entrance पर एक लकड़ी का बोर्ड था, जिस पर हाथ से लिखा था:

"कालकूट में आपका स्वागत है। कृपया सूरज ढलने के बाद घर से बाहर न निकलें।"

मीरा ने जोर से कहा, "ये तो perfect है! एक रात इसी गाँव में रुक जाते हैं। कितनी authentic जगह है।"

आर्यन ने कुछ नहीं कहा। उसकी नज़र उस मूरत पर थी। वो लाल कपड़ा हिल रहा था — मगर हवा नहीं चल रही थी।

गाँव में घुसते ही गाड़ी का engine अपने आप बंद हो गया।

"अरे यार," आर्यन ने चाबी घुमाई, "अब क्या हुआ?"

इग्निशन बिल्कुल dead थी।

तभी एक खटखटाहट हुई — खिड़की पर। मीरा चीख पड़ी।

बाहर एक बूढ़ा आदमी खड़ा था। शायद सत्तर-अस्सी साल का। सफेद धोती, सफेद कुर्ता, और हाथ में एक लालटेन। उसकी आँखें — दोनों आँखों में मोतियाबिंद का दूधिया रंग था। वो अंधा था।

मगर वो सीधे आर्यन की तरफ देख रहा था।

"बाहर निकलो, बेटा," बूढ़े ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ कांप रही थी, मगर शब्द साफ थे, "अंदर मत बैठो गाड़ी में। कालकूट में रात को गाड़ी में बैठना मना है।"

"क्यों?" मीरा ने पूछा।

बूढ़े की दूधिया आँखें मीरा की तरफ मुड़ीं। "क्योंकि बेटी, गाड़ी एक बंद डिब्बा है। और बंद डिब्बों में... वो आ जाते हैं।"

"वो कौन?"

बूढ़े ने जवाब नहीं दिया। बस लालटेन ऊपर उठाई और कहा, "मेरे पीछे आओ। मेरे घर में जगह है।"

आर्यन और मीरा एक-दूसरे को देखकर गाड़ी से उतरे। बाहर ठंड हड्डियों तक उतर रही थी। और अचानक आर्यन को महसूस हुआ — गाँव में कोई आवाज़ नहीं थी। कुत्ता नहीं भौंक रहा था, झींगुर नहीं बोल रहे थे, हवा नहीं थी।

पूरी तरह सन्नाटा।

बूढ़ा आगे-आगे चल रहा था। मीरा ने आर्यन का हाथ पकड़ लिया। "इसको कैसे पता चला कि हम यहाँ हैं? ये अंधा है।"

"पता नहीं।"

बूढ़े का घर गाँव के आखिरी छोर पर था। दो कमरों का छोटा सा पत्थर का मकान। अंदर एक आग जल रही थी चूल्हे में। एक बूढ़ी औरत — शायद उसकी पत्नी — रोटियाँ सेक रही थी। उसने ऊपर देखा, मेहमानों को देखा, और बिना कुछ कहे दो और रोटियाँ बेलनी शुरू कर दी।

बूढ़े ने उन्हें बैठाया। "मेरा नाम तुलसीराम है। ये मेरी पत्नी, गंगा। तुम्हारा नाम क्या है, बेटा?"

"आर्यन। ये मीरा है।"

"कहाँ से आए?"

"दिल्ली से। मसूरी जा रहे थे। GPS खराब हो गया।"

तुलसीराम ने एक लंबी साँस ली। फिर बोला, "GPS खराब नहीं हुआ, बेटा। GPS में कालकूट है ही नहीं। ये गाँव किसी नक्शे पर नहीं है। नब्बे साल से नहीं है।"

मीरा ने हैरानी से पूछा, "ये कैसे हो सकता है? पंचायत? सरकारी रिकॉर्ड?"

"कुछ भी नहीं, बेटी। नब्बे साल पहले एक रात, सब कुछ बदल गया।"

"क्या हुआ था नब्बे साल पहले?"

तुलसीराम कुछ देर चुप रहा। फिर उसने अपनी अंधी आँखें ऊपर उठाईं — मानो वो छत के पार कुछ देख रहा हो।

"कालकूट गाँव में पाँच सौ लोग रहते थे। एक रात — अमावस की रात — सब के सब मर गए। एक रात में। एक साथ।"

आर्यन ने ठंड महसूस की। "कैसे?"

"यही तो किसी को पता नहीं चला।"

गंगा ने रोटी की थाली रखी। उसकी हाथ कांप रहा था।

तुलसीराम बोलता रहा, "जब अंग्रेज़ अफसर अगले दिन आए — उन्होंने पाँच सौ लाशें देखीं। हर घर में। हर कमरे में। मगर एक भी ज़ख्म नहीं था किसी पर। न खून, न चोट, कुछ नहीं। सब के चेहरे पर बस एक चीज़ थी — डर। ऐसा डर जैसे मरते वक्त उन्होंने कुछ ऐसा देखा हो जो... इंसानों के देखने की चीज़ नहीं थी।"

"फिर?"

"फिर अंग्रेज़ों ने गाँव सील कर दिया। नक्शे से हटा दिया। और जो बच्चे बच गए थे — सिर्फ बारह — उन्हें दूर के orphanage में भेज दिया।"

मीरा ने पूछा, "तो यहाँ अभी कौन रहता है?"

तुलसीराम मुस्कुराया। एक अजीब सी मुस्कान। "उन्हीं बारह बच्चों के बच्चे, बेटी। हम तीस लोग हैं। सब उन्हीं की औलादें। हम यहाँ वापस आए — क्योंकि हमें आना ही था।"

"क्यों?"

तुलसीराम ने जवाब नहीं दिया।

बाहर, अचानक, घंटे की वो आवाज़ फिर शुरू हो गई। टन। टन। टन।

तुलसीराम का चेहरा सख्त हो गया। "बारह बज रहे हैं। अब कोई बात नहीं। चुप। बिल्कुल चुप।"

"क्यों?" आर्यन ने फुसफुसाकर पूछा।

"क्योंकि अब वो जाग गई है।"

"वो कौन?"

तुलसीराम ने आर्यन की तरफ अपनी अंधी आँखें घुमाईं। और पहली बार आर्यन को महसूस हुआ कि वो आँखें — वो उसे सच में देख रही हैं।

"कालकूट की रानी। और उसने तुम दोनों को भीतर बुलाया है, बेटा। इसका मतलब है — तुम वापस नहीं जाओगे।"

मीरा ने आर्यन का हाथ इतनी ज़ोर से पकड़ा कि उसके नाखून आर्यन की चमड़ी में धँस गए।

और चूल्हे की आग — अचानक, खुद-ब-खुद, बुझ गई।

अध्याय 2 · गंगा की कहानी

अंधेरे में सिर्फ एक चीज़ सुनाई दे रही थी — गंगा की साँसें। तेज़, टूटी-फूटी।

तुलसीराम ने कुछ ढूँढा। फिर एक माचिस की आवाज़ आई। एक छोटी सी लौ जली। बूढ़े ने एक मोमबत्ती जलाई, और कमरे में पीली रोशनी फैल गई।

"डरो मत," उसने कहा, "वो अंदर नहीं आ सकती। इस घर में नहीं।"

"क्यों नहीं?" आर्यन ने काँपती आवाज़ में पूछा।

तुलसीराम ने दीवार की तरफ इशारा किया। मीरा और आर्यन ने देखा — दीवार पर एक चित्र बना हुआ था। काले कोयले से। एक त्रिकोण के अंदर एक आँख। और उसके चारों तरफ देवनागरी में कुछ शब्द लिखे थे जो आर्यन पढ़ नहीं पाया।

"ये क्या है?"

"बंधन। नब्बे साल पुराना। हर घर में है इस गाँव के। ये एक रोक है। उसे अंदर आने से रोकती है।"

"उसको मतलब... कालकूट की रानी?"

"हाँ।"

"वो कौन है?" मीरा ने पूछा।

गंगा ने पहली बार बोला। उसकी आवाज़ धीमी और कांपती थी, मगर उसमें एक ठहराव था। "वो हम सब की दादी है, बेटी।"

"क्या?"

गंगा ने मोमबत्ती के पास जाकर बैठा। उसकी पुतलियाँ रोशनी में चमक रही थीं। "बैठो। मैं कहानी सुनाती हूँ।"

मीरा और आर्यन फर्श पर बिछे एक मोटे ऊनी कंबल पर बैठ गए।

गंगा ने बोलना शुरू किया।

"नब्बे साल पहले की बात है। इस गाँव की एक रानी थी — मतलब, गाँव की प्रधान, मुखिया। उसका नाम था — अहिल्या। वो बहुत खूबसूरत थी, बहुत समझदार। मगर उसका एक राज़ था जो किसी को नहीं पता था।"

"क्या राज़?"

"वो तंत्र-मंत्र करती थी। काली विद्या। उसका पति, अमरनाथ — एक सीधा-सादा आदमी — एक रात सच जान गया। उसने अहिल्या को एक तहखाने में पकड़ा, जहाँ वो... एक बच्चे की बलि देने वाली थी।"

मीरा का चेहरा सफेद पड़ गया।

गंगा कहती रही, "अमरनाथ ने पंचायत बुलाई। पूरे गाँव के सामने अहिल्या को पेश किया। पाँच सौ लोगों ने सर्वसम्मति से फैसला किया — अहिल्या को ज़िंदा जलाया जाएगा। ये उन दिनों की बात है जब अंग्रेज़ों के कानून पहाड़ी गाँवों तक नहीं पहुँचते थे।"

"उन्होंने उसे जलाया?"

"हाँ। मगर मरने से पहले, अहिल्या ने पूरे गाँव को श्राप दिया। उसने कहा — 'जिन पाँच सौ लोगों ने मुझे आग दी है, उन पाँच सौ की जान मैं एक रात में लूँगी। मैं वापस आऊँगी। और ये गाँव — ये हमेशा-हमेशा के लिए मेरा रहेगा।'"

"और एक साल बाद?"

गंगा ने सिर हिलाया। "एक साल बाद, उसी अमावस की रात, गाँव के सब लोग सोते वक्त मर गए। एक रात में। पाँच सौ लोग। एक साथ।"

"मगर बच्चे? वो बारह बच्चे?"

गंगा ने मुस्कुराकर कहा, "बच्चे क्योंकि अहिल्या के अपने थे, बेटी। बच्चे तो उसी के थे। उसके खून के। उसके वंश के। वो उन्हें क्यों मारती?"

आर्यन ने हैरानी से पूछा, "मतलब... आप सब... अहिल्या के वंशज हैं?"

"हाँ।"

"फिर आप यहाँ क्यों आए वापस?"

तुलसीराम ने जवाब दिया, "क्योंकि वो हमें बुलाती है, बेटा। हर पीढ़ी में, अहिल्या एक को बुलाती है। उसके खून का एक — कालकूट आता है, यहाँ रहने आता है। मरने तक। ये हमारी सज़ा है। पाँच सौ लोगों को मारने में जो खून बहा — वो हमारे भीतर है। हमें भुगतना है।"

मीरा ने पूछा, "मगर हम तो कुछ नहीं हैं इस सब में! हम तो बस गलत रास्ते पर आ गए।"

तुलसीराम ने धीरे से सिर हिलाया। "कोई गलत रास्ते पर कालकूट नहीं आता, बेटी। अहिल्या किसी को भी अंदर नहीं आने देती। जो अंदर आ गया है — समझो, उसे बुलाया गया है।"

"पर हमें क्यों?"

तुलसीराम ने उसकी तरफ देखा। फिर मीरा की तरफ। उसकी अंधी आँखें थम गईं — जैसे वो कुछ पहचानने की कोशिश कर रहा हो।

"बेटी," उसने धीरे से कहा, "तुम्हारे परिवार में किसी का नाम 'मनोरमा' था कभी?"

मीरा चौंक गई। "हाँ! मेरी परदादी का नाम मनोरमा था। आपको कैसे पता?"

तुलसीराम की मुट्ठियाँ कस गईं। गंगा ने एक तेज़ साँस ली।

"मनोरमा," तुलसीराम फुसफुसाया, "अहिल्या की सबसे बड़ी बहन का नाम था।"

कमरा ठंडा पड़ गया। मीरा को अपनी हड्डियों में बर्फ महसूस हुई।

"नहीं," उसने कहा, "मेरी परदादी पंजाब से थीं। इनका कालकूट से क्या लेना-देना?"

"पता नहीं, बेटी। मगर अहिल्या जानती है। अहिल्या ने तुम्हें पहचाना। इसीलिए तुम यहाँ हो।"

बाहर, घंटे की आवाज़ फिर शुरू हुई। मगर इस बार वो दूर नहीं थी। वो पास आ रही थी।

टन।

टन।

टन।

गंगा खड़ी हो गई। उसके चेहरे पर डर था। "तुलसीराम, ये पास क्यों आ रही है? ऐसा कभी नहीं हुआ!"

"क्योंकि लड़की उसकी अपनी खून की है। बंधन कमज़ोर हो गया।"

तभी, खिड़की पर एक खटखटाहट हुई।

तीन बार।

धीमी।

मीरा खिड़की की तरफ देखने लगी। "मैं देखूँ?"

"नहीं!" तुलसीराम चीखा, "खिड़की मत देखो! कोई भी खिड़की मत देखो! ज़मीन पर देखो — सिर्फ ज़मीन पर!"

मीरा ने आँखें झुका लीं। मगर एक पल को — एक छोटे से पल को — उसे लगा कि खिड़की के बाहर एक चेहरा था। बहुत पास। एकदम कांच से लगा हुआ। और उस चेहरे की आँखें — वो आँखें मीरा को पहचानती थीं।

खटखटाहट बंद हो गई।

कुछ देर सन्नाटा रहा।

फिर एक आवाज़ आई। एक औरत की आवाज़। बाहर से। मीठी, मद्धम, धीमी।

"मनोरमा... तू आ गई?"

मीरा का दिल रुक गया।

"मनोरमा... इतने साल कहाँ थी? मैं तेरा इंतज़ार कर रही थी।"

"मीरा, मत सुनो!" आर्यन ने उसके कान बंद करने की कोशिश की।

मगर मीरा खड़ी हो गई थी। उसकी आँखें खाली थीं। जैसे कोई trance में हो।

"मनोरमा... दरवाज़ा खोल। मुझे अंदर आने दे।"

मीरा एक कदम दरवाज़े की तरफ बढ़ी।

"मीरा! रुको!" आर्यन ने उसका हाथ पकड़ा।

तुलसीराम तेज़ी से उठा। उसने मेज़ पर रखे एक पीतल के बर्तन से कुछ राख निकाली और मीरा के माथे पर लगा दी। "अहिल्या के नाम पर, अहिल्या से रक्षा हो!"

मीरा एक झटके से वापस आई। उसने आँखें झपकीं। "क्या हुआ? मैं कहाँ जा रही थी?"

"बैठ जाओ, बेटी। और एक काम करो — रात भर अपनी आँखें खुली रखना। मत सोना। अगर सो गई — तो वो सपने में आएगी।"

बाहर की आवाज़ बंद हो चुकी थी।

मगर अब, घर के अंदर एक नई आवाज़ आ रही थी।

कोई हँस रहा था।

बहुत धीरे।

बहुत पास।

तुलसीराम ने मोमबत्ती ऊपर उठाई।

गंगा कोने में खड़ी थी।

मगर उसकी आँखें — वो काली पड़ गई थीं। पूरी काली। सफेद हिस्सा भी नहीं था।

और वो हँस रही थी।

"तुलसीराम," गंगा ने कहा — मगर ये गंगा की आवाज़ नहीं थी। ये किसी और की थी। "तेरी पत्नी अब मेरी है। और कल रात — पूरा गाँव मेरा होगा।"

अध्याय 3 · तीस की पंचायत

तुलसीराम चीखा नहीं। रोया नहीं। बस अपनी पत्नी की तरफ देखता रहा। उसकी अंधी आँखों से आँसू बहने लगे।

"गंगा..." उसने धीरे से कहा।

"गंगा अब नहीं है, बूढ़े," गंगा का शरीर बोला, "मैं हूँ।"

"तू उसमें कैसे आई? घर में बंधन है।"

"बंधन तेरे और मेरे बीच था, तुलसीराम। मगर इस लड़की" — गंगा का सिर मीरा की तरफ घूमा — "इसके आते ही बंधन कमज़ोर हो गया। और जब बंधन कमज़ोर हुआ — तेरी पत्नी का दिल भी कमज़ोर हो गया। पुराना डर — वो डर जो उसने सत्तर साल छुपाया हुआ था — खुल गया। और मैं अंदर आ गई।"

गंगा ने एक कदम आगे बढ़ाया। तुलसीराम ने मीरा और आर्यन के सामने अपना हाथ फैलाया।

"रुक," उसने कहा, "गंगा बीच में है। तू उसका दिल खाएगी, अहिल्या?"

"मैं चाहूँ तो खा लूँ। मगर नहीं खाऊँगी — अभी नहीं। मुझे मनोरमा चाहिए। और बस।"

"मनोरमा नहीं है यहाँ। ये मीरा है।"

"मनोरमा का खून है। वही बात है।"

मीरा ने कांपते हुए पूछा, "तू मुझसे क्या चाहती है?"

गंगा ने अपना सिर एक तरफ झुकाया। एक अजीब सी, गैर-इंसानी हरकत। "मेरे साथ चल। बस इतना। मेरे साथ चल और मेरा काम पूरा कर। फिर तू आज़ाद। आर्यन भी आज़ाद। ये गाँव भी आज़ाद।"

"कौन सा काम?"

"नब्बे साल पहले मेरा एक काम अधूरा रह गया था। मनोरमा को इसे पूरा करना है।"

तुलसीराम ने सिर हिलाया, "नहीं, अहिल्या। ये लड़की कोई काम नहीं करेगी। ये यहाँ से जाएगी। मैं तुझे रोकूँगा।"

गंगा हँसी। एक खोखली, ठंडी हँसी। "तू कैसे रोकेगा, बूढ़े? तू अंधा है। और तेरी पत्नी मेरे कब्जे में है। अगर तू मुझे रोकने की कोशिश करेगा — मैं इसका दिल फाड़ दूँगी। एक झटके में।"

"तो ले जा मेरी जान। पर इन बच्चों को मत छू।"

"तेरी जान का क्या फायदा? तू अंधा है, बूढ़े। तेरी जान बेकार है।"

गंगा फिर हँसी। फिर अचानक उसकी आँखें वापस सफेद हो गईं। शरीर लड़खड़ाया। वो ज़मीन पर गिर गई।

"गंगा!" तुलसीराम भागकर उसके पास गया।

गंगा बेहोश थी। मगर उसके चेहरे पर अब अहिल्या की मुस्कान नहीं थी।

"वो चली गई," तुलसीराम ने कहा, "अभी के लिए। मगर कभी भी आ सकती है। अब हमें कुछ करना होगा।"

"क्या?" आर्यन ने पूछा।

"पंचायत। आज रात ही। गाँव के तीसों लोगों की पंचायत।"

"क्यों?"

तुलसीराम ने अपनी पत्नी को कंबल ओढ़ाया। फिर उठा। "क्योंकि बेटा, ये अब तुम दोनों का मामला नहीं। ये पूरे गाँव का मामला है। अहिल्या नब्बे साल बाद इतनी ताकतवर हो गई है कि वो किसी एक के शरीर में घुस सकती है। ये पहली बार हुआ। मतलब — वो वापस आने वाली है। पूरी की पूरी।"

"क्या मतलब पूरी की पूरी?"

तुलसीराम ने आर्यन के कंधे पर हाथ रखा। उसकी आवाज़ धीमी थी।

"मतलब, बेटा, अहिल्या एक शरीर लेकर ज़िंदा होने जा रही है। और जब वो ज़िंदा होगी — सिर्फ ये गाँव नहीं, बेटा। पूरा हिंदुस्तान खतरे में होगा। पाँच सौ लोग तो उसने नब्बे साल पहले मारे थे। अब अगर वो लौटी — पाँच करोड़ भी कम पड़ेंगे।"

मीरा को चक्कर आने लगा। वो कुर्सी पर बैठ गई। "और मैं? वो शरीर मेरा क्यों चाहती है?"

"क्योंकि उसके पास सिर्फ अपने खून का शरीर ही चलेगा। और मनोरमा का खून — सबसे ताकतवर बच्चा था अहिल्या के परिवार में। तुम मनोरमा की परपोती हो। तुम्हारा शरीर उसका सबसे आसान घर है।"

"मैं कुछ नहीं करूँगी! मैं उसमें नहीं घुसने दूँगी!"

"बेटी, तेरे चाहने से नहीं होगा। अहिल्या तुझे अपने तरीके से तोड़ेगी। पहले डर। फिर लालच। फिर प्यार। और अगर ये सब काम न करे — फिर वो आर्यन को मारेगी। तेरी आँखों के सामने।"

आर्यन ने कुछ नहीं कहा।

"तो रास्ता क्या है?" मीरा ने पूछा।

तुलसीराम ने एक लंबी साँस ली। "एक ही रास्ता है। और वो आसान नहीं।"

"क्या?"

"अहिल्या को हमेशा के लिए खत्म करना। और ये काम सिर्फ तुम कर सकती हो, बेटी। मनोरमा का खून ही उसे बंद कर सकता है।"

"मैं? मैं कैसे करूँ?"

तुलसीराम ने जवाब नहीं दिया। बस उठ खड़ा हुआ।

"पहले पंचायत। फिर बात।"

✦ ✦ ✦

पंचायत आधी रात के बाद हुई। गाँव के बीचों-बीच, उसी पत्थर की मूरत के सामने जिस पर लाल कपड़ा था। आर्यन और मीरा एक तरफ खड़े थे। तीस लोग — गाँव के बच्चों से लेकर बूढ़ों तक — एक गोल घेरे में बैठे थे।

सब के चेहरे पर एक ही भाव था: डर।

तुलसीराम बीच में खड़ा था। उसने धीमी आवाज़ में बोलना शुरू किया।

"भाइयों, बहनों — आज जो हुआ, सब जानते हो। अहिल्या ने मेरी पत्नी पर कब्ज़ा किया। पहली बार ऐसा हुआ है। इसका मतलब क्या है?"

गाँव की सबसे बूढ़ी औरत — शायद नब्बे की — ने धीरे से कहा, "इसका मतलब वो आज़ाद होने वाली है।"

"हाँ, मासी।"

एक अधेड़ आदमी ने पूछा, "और ये लड़की? मनोरमा की पीढ़ी?"

"हाँ।"

"तो हम क्या करेंगे? लड़की को मार दें?"

मीरा ने तेज़ साँस ली। आर्यन ने उसका हाथ पकड़ा।

तुलसीराम ने हाथ उठाया। "नहीं। हम कोई हत्यारे नहीं। और लड़की को मारने से कुछ नहीं होगा। अहिल्या किसी और मनोरमा के खून को ढूँढ लेगी। ये सिर्फ मामले को टालना होगा।"

"तो क्या करें?"

तुलसीराम ने एक लंबी साँस ली। "हमें वो करना है जो नब्बे साल पहले हमारे पुरखे नहीं कर पाए। हमें अहिल्या की हड्डियाँ ढूँढनी हैं। और जलानी हैं। दोबारा। पुरानी रीत से। मगर इस बार — पूरी तरह।"

कुछ देर सब चुप रहे।

फिर एक नौजवान खड़ा हुआ। "तुलसीराम चाचा, हड्डियाँ कहाँ हैं? नब्बे साल हो गए। राख तक नहीं बची होगी।"

"राख ज़रूर बची है। और हड्डियाँ भी। अहिल्या की राख कहीं जाती नहीं — क्योंकि उसमें उसकी आत्मा बंद है। एक तंत्रिक के पास है, अभी तक।"

"कौन सा तंत्रिक?"

तुलसीराम ने सिर झुकाया। "तुम्हें पता है। हम सब जानते हैं। मगर कोई बोलता नहीं।"

"बाबा?"

"हाँ। बाबा भैरवनाथ।"

गाँव में एक हलचल मच गई। कुछ लोग तेज़ी से सिर हिलाने लगे। एक औरत खड़ी हो गई। "नहीं, तुलसीराम! बाबा के पास नहीं! वो आदमी नहीं, खुद एक पिशाच है!"

"पिशाच नहीं — मगर हाँ, खतरनाक है। बहुत खतरनाक। पर एक ही आदमी है इस इलाके में जिसके पास अहिल्या की राख है। और जो उसे जलाने का तरीका जानता है।"

मीरा ने पूछा, "ये बाबा रहते कहाँ हैं?"

"यहाँ से बीस किलोमीटर ऊपर। एक गुफा में। उस गुफा को 'काल का मुँह' कहते हैं।"

तुलसीराम ने आर्यन और मीरा की तरफ देखा।

"तुम्हें वहाँ जाना होगा। कल सुबह।"

"हम क्यों? आप गाँव वाले क्यों नहीं?"

"क्योंकि बेटी, हम गाँव से बाहर नहीं जा सकते। ये अहिल्या का श्राप है हमारे ऊपर। जैसे ही हम कालकूट की सीमा से बाहर कदम रखते हैं — हम मर जाते हैं। तीस सेकंड में। दिल फट जाता है।"

"क्या?"

"पच्चीस साल में मेरा बेटा एक बार बाहर जाना चाहा था। पैसों के लिए। सीमा पार करते ही गिर गया। ज़िंदा वापस नहीं आया।"

कमरा खामोश हो गया।

तुलसीराम बोलता रहा, "तुम लोग ही जा सकते हो। सिर्फ तुम। बाबा से अहिल्या की राख माँगो। और एक चीज़ और — जो उसके पास है — वो माँगो।"

"क्या?"

"वो ख़ुद बता देगा। मगर सावधान। बाबा की एक कीमत है हर चीज़ की। और उसकी कीमत — हमेशा भारी होती है।"

मीरा ने पूछा, "अगर हम चले गए तो? अगर हम इस सब को छोड़कर बस भाग गए तो?"

तुलसीराम ने उसे ध्यान से देखा। "अगर तू भागी, बेटी, तो अहिल्या किसी और मनोरमा को ढूँढ लेगी। ज़्यादा देर नहीं। एक हफ्ते में। और तब वो आज़ाद हो जाएगी। और जैसा मैंने कहा — पूरा हिंदुस्तान खतरे में होगा।"

मीरा ने आर्यन को देखा।

आर्यन ने सिर हिलाया।

"हम जाएँगे," मीरा ने कहा।

तुलसीराम ने अपनी जेब से एक ताबीज़ निकाला। एक काले धागे में बंधा हुआ — एक छोटा सा त्रिकोण।

"ये पहन लो, बेटी। ये गाँव वालों का बंधन है। बाबा को दिखाना। वो जानेगा कि मैं भेजा हूँ।"

मीरा ने ताबीज़ पहना।

तभी, मूरत से एक हलचल हुई।

सब चुप हो गए।

लाल कपड़ा हिल रहा था। बिना हवा के।

और उसके नीचे से — एक आवाज़ आई। बहुत धीमी। बहुत मीठी।

"मनोरमा... तू कहाँ जा रही है? मेरे पास तो आ। मैं तेरी राह देख रही हूँ।"

मीरा ने कान बंद किए।

"भागो," तुलसीराम ने कहा, "अभी। सूरज निकलने तक यहाँ से दूर हो जाओ। दिन में अहिल्या कमज़ोर होती है। रात में फिर खतरनाक।"

मीरा और आर्यन भागे।

मगर जैसे ही वो गाँव की सीमा पार करने वाले थे — आर्यन ने पीछे मुड़कर देखा।

तुलसीराम का घर। दूर से।

घर की छत पर — एक औरत खड़ी थी।

लाल साड़ी में।

और वो हाथ हिला रही थी।

अध्याय 4 · काल का मुँह

सूरज निकलते-निकलते वो कालकूट से छह किलोमीटर दूर थे।

गाड़ी अब भी काम नहीं कर रही थी, इसलिए दोनों ने पैदल चलना ही सही समझा। तुलसीराम ने एक नक्शा दिया था — हाथ से बना हुआ, टेढ़ा-मेढ़ा। उसमें गुफा का रास्ता था।

"मीरा," आर्यन ने रास्ते में कहा, "सच बता। तुझे रात को कुछ हुआ था?"

"क्या मतलब?"

"जब वो आवाज़ आ रही थी — 'मनोरमा' — तू सच में trance में चली गई थी। मैंने तेरी आँखें देखीं। तू वहाँ नहीं थी।"

मीरा कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "मुझे एक चीज़ याद आई।"

"क्या?"

"बचपन में... पाँच साल की उम्र में... मेरी परदादी मेरे सपनों में आती थी। हर रात। एक ही चीज़ कहती थी।"

"क्या?"

"वो कहती थी — 'जब वो तुझे बुलाए, मत जाना। चाहे जो हो जाए, मत जाना। तेरा खून मेरा खून है, और मेरा खून पाप का खून है। उस घर में मत जाना — कभी।'"

आर्यन रुक गया। "तेरी परदादी तुझे ये कहती थी?"

"हाँ। मगर बड़े होकर मैं भूल गई। फिर अचानक कल रात — सब याद आ गया।"

"मतलब, तेरी परदादी जानती थी।"

"लगता है। मगर उसने कभी किसी को नहीं बताया।"

"फिर मीरा... तेरी परदादी कैसे मरी?"

मीरा रुक गई। उसकी आँखें बड़ी हो गईं।

"मेरी मम्मी कहती थी — सोते-सोते। दिल का दौरा। मगर..."

"मगर क्या?"

"मेरी दादी ने एक बार चुपके से बताया था — परदादी की मौत वाली रात कुछ अजीब हुआ था। उसके बिस्तर के पास कोई और था। एक और औरत — लाल साड़ी में। नौकर ने देखा था। और भागा था। मगर परदादी सुबह मरी मिली। चेहरे पर बहुत डर था।"

आर्यन ने एक लंबी साँस ली।

"तो अहिल्या ने तेरी परदादी को भी मारा था।"

"शायद... क्योंकि वो वापस नहीं आई।"

दोनों फिर चलने लगे। अब रास्ता ऊपर चढ़ रहा था। पहाड़ी ज्यादा सख्त हो रही थी। पेड़ कम होते जा रहे थे। और हवा में एक अजीब सी गंध थी — जैसे जली हुई धूप और सड़ा हुआ मांस मिले हुए हों।

दो घंटे बाद, वो गुफा के मुँह पर पहुँच गए।

"काल का मुँह।"

नाम सही था।

गुफा का प्रवेश दरअसल एक दरार थी — पहाड़ी में। पत्थरों की तरह दिखती थी, मगर अंदर से एक हल्की सी रोशनी आ रही थी। और एक धुआँ भी।

और सबसे अजीब चीज़ — गुफा के बाहर एक झंडा गड़ा था। काला झंडा, जिस पर लाल रंग से एक आँख बनी थी।

"अंदर जाएँ?" मीरा ने पूछा।

"और कोई रास्ता नहीं।"

दोनों गुफा में घुसे।

अंदर — एक लंबी सुरंग थी। दीवारों पर देवनागरी में कुछ शब्द लिखे हुए थे। और बहुत सारी हड्डियाँ थीं — छोटी-छोटी। चूहों की? या... बच्चों की?

मीरा ने कस कर आर्यन का हाथ पकड़ा।

सुरंग के आखिर में एक बड़ा कमरा था। एक प्राकृतिक गुफा। बीच में एक हवन कुंड जल रहा था। उसके चारों तरफ हज़ारों दिये जल रहे थे। और कुंड के पीछे — एक आदमी बैठा था।

बहुत लंबा। भले बैठा हो, मगर पता चल रहा था कि खड़े होने पर सात फुट से कम नहीं होगा। बदन काली राख से ढका हुआ। बाल — कमर तक, जटाएँ। आँखें खुली थीं — मगर उनमें कोई जान नहीं थी। मानो वो trance में हो।

और उसके सामने — एक मानव खोपड़ी थी। उसमें से कुछ धुआँ निकल रहा था।

"बाबा भैरवनाथ?" आर्यन ने धीरे से बुलाया।

कोई जवाब नहीं।

"बाबा?"

धीरे-धीरे, बाबा की आँखें फोकस हुईं। उन्होंने सिर ऊपर उठाया।

और मुस्कुराए।

मगर ये एक अजीब मुस्कान थी। दाँत उनके पीले थे, और कुछ नुकीले। होंठ खून से लाल। और जब वो हँसे — उनकी हँसी इंसानी नहीं थी। एक गहरी, गुर्राने जैसी आवाज़।

"मनोरमा का खून," बाबा बोले। आवाज़ इतनी गहरी थी कि गुफा हिल गई। "बहुत दिन हो गए तेरा इंतज़ार करते। और अब आ गई।"

"आप मुझे जानते हैं?"

"मैं तुझे कई जन्मों से जानता हूँ, बच्ची। तू पहली बार नहीं आई है यहाँ। दो सौ साल पहले — तू अहिल्या की बहन थी। तेरा नाम था कात्यायिनी। और हाँ — मनोरमा भी तू ही थी।"

मीरा ने सिर हिलाया, "नहीं... नहीं।"

"हाँ। हर सौ साल में अहिल्या लौटने की कोशिश करती है। और हर बार — तू उसे रोकने आती है। हर बार तेरा एक नाम होता है। हर बार तू भूल जाती है। मगर तेरा खून याद रखता है।"

आर्यन ने मीरा को थामा। "बाबा, हम तुलसीराम चाचा से आए हैं।"

बाबा ने आर्यन को देखा। पहली बार। और उनकी आँखों में कुछ बदला।

"और तू?" बाबा ने पूछा, "तू कौन है?"

"मैं आर्यन हूँ। मीरा का मंगेतर।"

"नहीं," बाबा हँसे, "तू कोई और भी है। मगर तुझे खुद नहीं पता।"

"क्या मतलब?"

बाबा ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने मीरा से ताबीज़ माँगा।

मीरा ने ताबीज़ निकाला।

बाबा ने उसे देखा। फिर सिर हिलाया।

"ठीक है। तुलसीराम जानता है क्या माँगना है। मेरे पास अहिल्या की राख है। और एक चीज़ और।"

"क्या?"

बाबा खड़े हुए। उनकी ऊँचाई वाकई सात फुट से कम नहीं थी। वो धीरे-धीरे एक कोने में गए। एक पत्थर की मूरत के पीछे एक छोटा सा डिब्बा था। काले लकड़ी का। उन्होंने वो डिब्बा निकाला।

डिब्बे को आर्यन और मीरा के सामने रखा।

"इसमें दो चीज़ें हैं। एक — अहिल्या की राख, एक छोटी डिब्बी में। दूसरा — एक खंजर। चांदी का। उस पर मंत्र लिखे हुए हैं।"

"क्या करना है इनसे?"

"कालकूट के बीचों-बीच, उस मूरत के नीचे, अहिल्या का असली शरीर है। नब्बे साल से वहाँ दबा हुआ है। तुम्हें मूरत हटानी है। शरीर निकालना है। उसके सीने में ये खंजर मारना है। फिर शरीर पर ये राख डालना है। और सबसे ज़रूरी — आग लगाना है।"

"मगर अगर शरीर है — तो आत्मा कहाँ है? रात को क्यों भटकती है?"

"शरीर ज़मीन में है। आत्मा गाँव में बंधी है। शरीर को नष्ट करोगे — आत्मा भी नष्ट होगी।"

मीरा ने डिब्बा खोला। अंदर एक छोटी कांच की बोतल थी जिसमें राख थी। और एक खंजर — चांदी का, बहुत खूबसूरत, मगर बेहद ठंडा।

"बाबा, आपकी कीमत?"

बाबा ने मीरा को देखा। फिर मुस्कुराए।

"मेरी कीमत हमेशा एक होती है, बच्ची। एक रात की कहानी। एक स्मृति। तेरी।"

"मतलब?"

"मैं तेरी एक स्मृति हमेशा के लिए ले लूँगा। तू भूल जाएगी कुछ। शायद कुछ बहुत प्यारा। शायद कुछ छोटी सी बात। मुझे नहीं पता क्या। मगर तू कभी वापस नहीं पा सकेगी।"

"और अगर मैं ये कीमत न दूँ?"

"तो खंजर और राख तेरे काम नहीं आएगी। तुम बस गाँव लौट जाओगे। और कल रात — अहिल्या आ जाएगी।"

मीरा ने आर्यन को देखा।

आर्यन ने धीरे से सिर हिलाया, "मीरा, मत दे। हम कोई और रास्ता ढूँढेंगे।"

"कोई और रास्ता नहीं है, आर्यन। और तू सुन रहा है — पाँच करोड़ लोग।"

मीरा ने बाबा की तरफ देखा। "ठीक है।"

बाबा ने अपना हाथ बढ़ाया। उनकी उंगलियाँ लंबी थीं — और नाखून काले और नुकीले।

"अपना माथा छू," उन्होंने कहा।

मीरा ने माथा झुकाया। बाबा की उंगली ने उसके माथे को छुआ।

एक झटका लगा।

मीरा एक पल को बेहोश हो गई। फिर खुद को सँभाला।

"कुछ हुआ?" उसने पूछा।

बाबा हँसे। "बता, तेरे पाँच साल का जन्मदिन कैसा था?"

मीरा ने सोचने की कोशिश की।

कुछ नहीं था।

कोई याद नहीं।

"मुझे... मुझे याद नहीं।"

"बस। ये तेरी कीमत थी।"

मीरा की आँखों में आँसू आ गए। मगर वो रोई नहीं। डिब्बा बंद किया।

बाबा ने एक चेतावनी दी। "एक बात और सुन ले, बच्ची। अहिल्या को जलाने से पहले — एक काम और करना होगा।"

"क्या?"

"उसके शरीर के पास एक डायरी है। उसकी अपनी। वो डायरी पढ़नी होगी। उसमें एक मंत्र है — आखिरी मंत्र। बिना उस मंत्र के — खंजर और राख आधा काम करेगा। आत्मा भटकती रहेगी। पूरी आज़ादी नहीं मिलेगी।"

"मंत्र क्या है?"

"डायरी में होगा। मगर सावधान — डायरी पढ़ते वक्त, अहिल्या तुझ पर हमला करेगी। पूरी ताकत से। तू टूटेगी। तू झूठ देखेगी। तू सच भूलेगी। तेरा प्रेमी भी झूठा लगेगा। तेरी जान भी झूठी लगेगी।"

"मैं कैसे करूँगी ये?"

बाबा ने मीरा का कंधा थपथपाया। "क्योंकि तू मनोरमा है। और तू पहले भी ये कर चुकी है। तेरा खून जानता है।"

दोनों गुफा से बाहर निकले।

बाहर सूरज चढ़ चुका था।

मगर मीरा को अंदर एक खालीपन था।

पाँच साल का जन्मदिन।

वो याद नहीं रहा।

और उसे पता नहीं था — किसने उसे केक काटते हुए देखा था। उसका कौन सा favorite खिलौना था। कौन उससे प्यार करता था उस दिन।

सब मिटा दिया।

और एक बात उसे और परेशान कर रही थी।

बाबा ने आर्यन के बारे में क्या कहा था?

"तू कोई और भी है। मगर तुझे खुद नहीं पता।"

आर्यन कौन था?

अध्याय 5 · मूरत के नीचे

कालकूट वापस पहुँचते-पहुँचते दोपहर हो गई थी।

गाँव अब अलग दिख रहा था। दिन में, हर घर एक साधारण पहाड़ी मकान दिख रहा था। बच्चे बाहर खेल रहे थे। औरतें कपड़े धो रही थीं। एक आदमी अपनी बकरी को चारा खिला रहा था।

मगर सब के चेहरे — सब के — पीले थे। बेजान। जैसे वो सब अंदर से थके हुए हों।

तुलसीराम का घर खुला था। वो बाहर बैठा हुआ था, इंतज़ार में।

"आ गए।" उसके चेहरे पर एक हल्की सी राहत थी। "मिले बाबा से?"

"हाँ।" मीरा ने डिब्बा दिखाया।

"शाबाश। और कीमत?"

मीरा ने सिर झुकाया। "मेरा पाँचवाँ जन्मदिन।"

तुलसीराम ने एक लंबी साँस ली। "बस इतनी? हल्की कीमत ली। बाबा का दिल पसीज गया शायद।"

"पसीजने जैसा कुछ नहीं था, चाचा। उसने एक चीज़ कही..."

"क्या?"

मीरा ने आर्यन की तरफ देखा। फिर तुलसीराम से बोली, "उसने आर्यन को देखा और कहा — 'तू कोई और भी है। मगर तुझे खुद नहीं पता।' इसका क्या मतलब?"

तुलसीराम कुछ देर चुप रहा। फिर अपनी अंधी आँखों से आर्यन की तरफ देखा।

"बेटा," उसने धीरे से कहा, "तेरा बचपन कहाँ बीता?"

"दिल्ली में।"

"माँ-बाप?"

"दोनों हैं।"

"और गोद लिया हुआ है तू?"

आर्यन हैरान हो गया। "नहीं। ऐसा क्यों कह रहे हैं?"

"सच बता। तेरे माता-पिता ने कभी कुछ अजीब बताया तेरे जन्म के बारे में?"

आर्यन ने सोचा। पहले याद नहीं आया। फिर...

"एक बात है। मेरी माँ कहती थी मेरी कोई जन्मतिथि का certificate नहीं है। एक accident में सब कागज़ात खो गए जब मैं छोटा था।"

तुलसीराम की पलकें बंद हुईं। वो एक मिनट तक चुप रहा।

फिर बोला, "बेटा, मैंने पच्चीस साल पहले एक बच्चा कालकूट से बाहर भेजा था।"

"क्या?"

"एक औरत — गीता — उसका बच्चा था। पच्चीस साल पहले। मगर वो बच्चा यहाँ नहीं रह सकता था। क्यों? क्योंकि बच्चे का जन्म एक खास रात को हुआ था। अमावस की रात। और जब वो पैदा हुआ — गीता मर गई। और बच्चे की आँखें — पैदा होते ही — कुछ अजीब थीं। उसकी आँखों में बंधन के निशान थे।"

"बंधन के निशान?"

"त्रिकोण और आँख। वो जो हम अपनी दीवारों पर बनाते हैं — वैसे ही निशान बच्चे की आँखों में थे। पैदाइशी।"

मीरा ने आर्यन की आँखों में देखा। उसकी आँखें — बहुत साधारण लगती थीं। मगर एक बार जब रोशनी अलग पड़ती थी — एक हल्का सा निशान दिखता था। पुतली में। एक त्रिकोण।

मीरा ने पहले कभी ध्यान नहीं दिया था।

तुलसीराम बोलता रहा, "हमने उस बच्चे को पंडित जी के एक रिश्तेदार के पास भेज दिया दिल्ली में। बच्चा बड़ा हो गया वहाँ। पंडित जी का परिवार उसका असली परिवार बन गया। मगर कालकूट का काम — पच्चीस साल बाद वो बच्चा यहाँ खुद चलकर आना था।"

"क्यों?" आर्यन की आवाज़ कांप रही थी।

"क्योंकि बेटा, तेरी माँ — गीता — गाँव की सबसे ताकतवर तंत्रिक थी। उसने मरने से पहले एक काम किया था। उसने तेरे अंदर एक चीज़ डाली। एक रक्षक। एक 'खुख्री' जैसी ताकत। ये ताकत सिर्फ तब काम करेगी जब अहिल्या आज़ाद होने वाली हो। और सिर्फ तब, जब तू कालकूट में हो।"

आर्यन के पैर लड़खड़ाए। वो ज़मीन पर बैठ गया।

"मेरे माँ-बाप..."

"तेरे असली माता-पिता? तेरी माँ गीता मर गई। तेरे पिता — कोई नहीं जानता।"

"और मेरे अभी के माँ-बाप?"

"वो तेरा परिवार हैं। उन्होंने तुझे प्यार दिया, पाला। तेरा अधिकार है उन पर। मगर तेरा खून यहाँ का है, बेटा।"

मीरा ने आर्यन का हाथ पकड़ा। उसके हाथ ठंडे थे।

"और मेरा 'kismet' — कि मैं इसी मीरा से प्यार करूँ? जो कालकूट से जुड़ी है?"

तुलसीराम ने सिर हिलाया। "ये kismet नहीं है, बेटा। ये planning है। तेरी माँ गीता ने मरते वक्त एक मंत्र पढ़ा था। उसने तुझे बाँधा था — अहिल्या की दुश्मन से। उसने जाना था कि अहिल्या एक दिन मनोरमा के खून को बुलाएगी। और जब वो लड़की कालकूट आएगी — तू भी उसके साथ होगा।"

"और इस सब में मेरा क्या काम है?"

"तू मीरा का रक्षक है, बेटा। जब अहिल्या मीरा पर हमला करेगी — तेरे अंदर का बंधन जाग जाएगा। तू एक बार — सिर्फ एक बार — अहिल्या को रोक सकेगा। एक हाथ से। पर इसकी कीमत बहुत भारी है।"

"क्या?"

तुलसीराम ने आर्यन की आँखों में देखा।

"तू मर जाएगा।"

मीरा चीख पड़ी। "नहीं!"

तुलसीराम ने सिर हिलाया, "बेटी, सब कुछ सच नहीं चाहिए सुनना। मगर सच यही है। आर्यन वो ढाल है जो तुम्हें एक पल के लिए बचा सकती है। और उस एक पल में — तुम्हें खंजर मारना होगा।"

गाँव की हवा भारी हो गई।

मीरा ने आर्यन को देखा। "हम भागते हैं। अभी। मैं ये नहीं करूँगी। मैं तुझे खोने नहीं दूँगी।"

आर्यन ने उसका हाथ पकड़ा। धीरे से।

"मीरा।"

"नहीं।"

"मीरा, सुन।"

मीरा ने उसे देखा।

आर्यन के चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। जैसे कोई बहुत पुरानी बात उसे अचानक समझ आ गई हो।

"मुझे लगता है मुझे ये पहले से पता था।"

"क्या?"

"बचपन से। मुझे हर रात एक सपना आता था। एक औरत के बारे में। एक लाल साड़ी वाली। और एक दूसरी औरत — जो मुझे कहती थी 'जब वो लड़की मिलेगी, तू उसका रक्षक होगा।' और एक दिन तू मुझे café में मिली। पहली नज़र में ही — मुझे पता था। ये वही है।"

"आर्यन..."

"मीरा, मैं प्यार करता हूँ तुझे। पर अगर ये मेरा काम है — तो मैं करूँगा। और तू अपना काम करेगी। हम दोनों मिलकर ये खत्म करेंगे।"

मीरा रो पड़ी।

तुलसीराम ने एक लंबी साँस ली। "बेटी, समय कम है। शाम होने को है। और जैसे ही अंधेरा होगा — अहिल्या जागेगी। और इस बार वो किसी की भी रोक नहीं सुनेगी। आज रात — अंतिम लड़ाई होगी।"

"क्या plan है?"

"तुम दोनों, मैं, और गाँव के पाँच और लोग — हम मूरत के पास जाएँगे। मूरत हटाएँगे। ज़मीन खोदेंगे। उसका शरीर निकालेंगे। फिर डायरी पढ़ेंगे। फिर खंजर। फिर राख। फिर आग।"

"और अहिल्या?"

"वो हमें रोकेगी। हर तरीके से। और हमारा सबसे बड़ा खतरा — वो सबसे अंत में मेरी पत्नी पर वापस कब्ज़ा करेगी। गंगा अंदर से कमज़ोर है। मैं उसे बचाने की कोशिश करूँगा।"

मीरा ने पूछा, "और मैं?"

"तू डायरी पढ़ेगी, बेटी। डायरी पढ़ते वक्त — तू अपनी आँखें बंद नहीं करेगी, चाहे कुछ भी हो। तू सुनेगी, चाहे कुछ भी सुनाई दे। और जब आखिरी मंत्र आए — उसी वक्त तू खंजर मारेगी।"

"और अगर मैं डायरी पढ़ते-पढ़ते अहिल्या के काबू में आ गई?"

तुलसीराम ने आर्यन की तरफ देखा।

"तब आर्यन का काम शुरू होगा।"

✦ ✦ ✦

शाम छह बजे, सूरज पहाड़ी के पीछे जाने लगा।

आठ लोग मूरत के पास इकट्ठा हुए। तुलसीराम, आर्यन, मीरा, और गाँव के पाँच नौजवान — चार आदमी, एक औरत। सब के हाथ में फावड़ा था। एक नौजवान के हाथ में मशाल।

गंगा घर में अकेली थी। तुलसीराम ने उसे एक रस्सी से बिस्तर पर बाँध दिया था। चूँकि उसे नहीं पता था — अहिल्या किस वक्त वापस आएगी।

तुलसीराम ने मूरत के सामने झुककर एक मंत्र पढ़ा। फिर बोला, "उठाओ।"

पाँच नौजवानों ने मिलकर मूरत को उठाया।

और तब — एक आवाज़ आई। ज़मीन के नीचे से।

कोई हँसी।

सब रुक गए।

"पहले उसको देखे," तुलसीराम ने कहा, "खुदाई शुरू करो।"

पाँच आदमी फावड़े से ज़मीन खोदने लगे।

पहले एक फुट। फिर दो। फिर तीन।

तीन फुट पर फावड़ा एक चीज़ से टकराया।

"लकड़ी है।"

तुलसीराम झुका। "ताबूत है। बाहर निकालो।"

धीरे-धीरे एक काली लकड़ी का ताबूत बाहर आया। उस पर देवनागरी में कुछ शब्द लिखे थे। और एक त्रिकोण, उल्टा। एक काली पट्टी।

"खोलो।"

दो आदमियों ने ताबूत का ढक्कन उठाया।

मीरा ने अंदर देखा।

और उसका दिल रुक गया।

अंदर — एक औरत का शरीर था।

कोई कंकाल नहीं। कोई सड़ा हुआ शरीर नहीं। एक ताज़ा, सही-सलामत शरीर। मानो आज ही दफ्न किया गया हो।

नब्बे साल बाद।

औरत की आँखें बंद थीं। चेहरा शांत था। लाल साड़ी पहनी हुई थी।

और सबसे डरावनी बात —

वो साँस ले रही थी।

बहुत धीमी।

मगर ले रही थी।

मीरा ने आर्यन को देखा। आर्यन के चेहरे का खून सूख गया था।

तुलसीराम ने धीरे से कहा, "डायरी कहाँ है, बेटी? देख। उसके हाथ में होगी।"

मीरा ने झुककर देखा।

अहिल्या के दाएँ हाथ में एक काली डायरी थी। चमड़े की।

मीरा ने हिम्मत करके वो डायरी छूई।

और जैसे ही उसने डायरी छुई —

अहिल्या की आँखें खुल गईं।

पीली। चमकदार। और सीधे मीरा को देख रही थीं।

अहिल्या मुस्कुराई।

"मनोरमा," उसने कहा, "बहुत देर लगा दी।"

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