PretikaVillage Horrorकालकूट — वो गाँव जो नक्शे पर नहीं है

भाग 2 — अहिल्या का अंत

Pretika · Village Horror · 31 मिनट

Writer
Pretika
Story
कालकूट — वो गाँव जो नक्शे पर नहीं है
Chapter
2 of 2
Category
Village Horror
Reading time
31 min
Words
6161
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अध्याय 6 · डायरी का पहला पन्ना

मीरा अपनी जगह से नहीं हिल पाई। अहिल्या की पीली आँखें उसे जकड़े हुए थीं। हिप्नोटाइज़र की तरह।

तुलसीराम चिल्लाया, "नज़र हटाओ, बेटी! अभी!"

मीरा ने ज़बरदस्ती आँखें झुकाईं। डायरी हाथ में थी। ठंडी, बहुत ठंडी।

अहिल्या उठी।

बैठी हुई। ताबूत के अंदर। बिना किसी सहारे के। उसने अपने हाथ ऊपर उठाए, एक अंगड़ाई की तरह।

"अरे," उसने आराम से कहा, "नब्बे साल। बहुत समय हो गया था सोते।"

पाँच नौजवान पीछे हट गए। दो ने फावड़े छोड़ दिए।

तुलसीराम चिल्लाया, "कोई पीछे नहीं हटेगा! मीरा, डायरी पढ़ शुरू कर! अभी!"

मीरा ने डायरी खोली।

पहला पन्ना — पुरानी हिंदी में। उसकी खुद की लिखावट जैसी। मगर ये अहिल्या की लिखावट थी।

मीरा ने ज़ोर से पढ़ना शुरू किया —

"मेरा नाम अहिल्या। जन्म आषाढ़ की पूर्णिमा को। पिता — कालकूट के पंडित अनंतनाथ। माता — चित्रलेखा। मैं अपने माँ-बाप की दूसरी संतान। बड़ी बहन — कात्यायिनी। एक छोटी बहन और थी — मनोरमा। जो छह साल की उम्र में, मेरे एक तंत्रिक प्रयोग के दौरान, मर गई।"

मीरा रुक गई।

मनोरमा। उसका नाम। वो अहिल्या की बहन का नाम था।

अहिल्या ने मारा था अपनी बहन को।

अहिल्या ताबूत से बाहर आ गई थी। नंगे पाँव। उसके पैर ज़मीन से एक इंच ऊपर थे। वो ज़मीन को छू नहीं रही थी।

"पढ़ती रह, मनोरमा," वो हँसी, "अच्छी कहानी है। आज पता चलेगा क्यों मैंने तुझे मारा था।"

मीरा ने अगला पन्ना पढ़ा —

"मनोरमा छह साल की थी। उसने मेरा भेद देख लिया था। मैं रोज़ रात — एक तहखाने में, बच्चों की बलि देती थी। मेरी शक्तियाँ बढ़ रही थीं। मनोरमा ने एक दिन देख लिया। वो मेरे पति अमरनाथ को बताने वाली थी। मैंने उसे रोक दिया। हमेशा के लिए।"

मीरा की आवाज़ कांप रही थी।

अहिल्या आगे आ गई। उसकी आँखें मीरा के चेहरे पर थीं।

"मगर पता है, मनोरमा? तेरी आत्मा शांत नहीं हुई। वो किसी और पीढ़ी में लौटी। तेरी छोटी सी आत्मा — पंजाब चली गई। एक छोटी बच्ची में जन्म लिया। उसने भी मेरी कहानी देखी। वो भी रोकने आई। मैंने उसे भी मारा। फिर वो लौटी। और लौटी। और हर बार — मैं तुझे मारती हूँ।"

"नहीं," मीरा ने कहा। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

"पन्ना पलट, मनोरमा। अगला अच्छा है।"

मीरा ने पन्ना पलटा।

"मेरे श्राप का दिन। पंचायत ने मुझे जलाने का फैसला किया। मेरे पति अमरनाथ ने सबसे पहले मेरा हाथ पकड़ा। मेरे अपने पति ने। मैं चीखी — मैंने उससे प्यार किया था। मैंने उसके लिए सब कुछ किया था। मगर उसने मेरे ऊपर भरोसा नहीं किया। उसने पंचायत बुलाई। उसने मुझे जलाने में मदद की।"

अहिल्या एक कदम और पास आई। मीरा अपनी आवाज़ नहीं रोक पा रही थी। शब्द खुद-ब-खुद निकल रहे थे।

"जब मैं आग में जल रही थी, अमरनाथ रो रहा था। उसने कहा — 'अहिल्या, मुझे माफ कर देना।' मैंने कहा — 'अमरनाथ, मैं तुझे माफ कर दूँ। मगर मैं तुझे वापस माँगूँगी। हर पीढ़ी में। तू भी हर बार लौटेगा। और हर बार — मेरा रक्षक नहीं, मेरा खाना बनेगा।'"

मीरा रुक गई।

अहिल्या ने हँसकर आर्यन की तरफ देखा।

"समझ गई, मनोरमा? तेरा प्यारा आर्यन — वो मेरा अमरनाथ है। हर पीढ़ी में लौटता है। हर बार तेरे पास आता है। हर बार मैं उसे मारती हूँ — पर इस बार, मैं उसे ज़िंदा रखूँगी। उसे अपना दास बनाऊँगी। हमेशा-हमेशा के लिए।"

आर्यन के पैर लड़खड़ाए।

"मीरा... पढ़ती रह," तुलसीराम चिल्लाया।

मीरा ने अगला पन्ना पलटा। मगर शब्द धुंधले हो रहे थे। उसकी आँखों में आँसू भर आए थे।

"मनोरमा," अहिल्या मुलायम आवाज़ में बोली, "रुक जा। एक बात सोच। मैं तुझे एक डील देती हूँ।"

"क्या?" मीरा ने पूछा।

"मीरा, मत सुन!" तुलसीराम चिल्लाया।

अहिल्या आगे बढ़ी। उसके चेहरे से अब क्रोध हट गया था। बस एक थकान थी।

"मनोरमा, तू सोच। नब्बे साल मैं इस गाँव में बंधी हूँ। ज़िंदगी के लिए तरस रही हूँ। एक शरीर के लिए। एक धूप के लिए। एक हवा के लिए। तेरे पास सब है। मुझे सिर्फ तेरा शरीर चाहिए। एक हफ्ते के लिए।"

"क्या बकवास?"

"सच। एक हफ्ते के लिए तेरा शरीर मेरा। उसके बाद मैं ख़ुद चली जाऊँगी। मैं तुझे वापस दे दूँगी। तू और आर्यन — दोनों ज़िंदा। मैं किसी को नहीं मारूँगी। बस मुझे दुनिया देखने दे, थोड़ी सी।"

मीरा का दिल हिला।

अहिल्या के चेहरे पर — सच में — एक उदासी थी। एक तरह की human उदासी।

"मीरा, ये झूठ है!" आर्यन चीखा, "ये तुझे फँसा रही है!"

मगर अहिल्या मुस्कुराई।

"देख, मनोरमा। तू पन्ना पढ़ती जा। आखिरी पन्ना तक पहुँच। और तू देखेगी — मैंने सच कहा। मैं वैसी नहीं हूँ जैसी तुलसीराम बताता है।"

मीरा का हाथ कांप रहा था।

पर उसने पन्ना पलटा।

"पंचायत के दूसरे दिन — मेरी आत्मा गाँव में भटकने लगी। मैंने सोचा बदला। पाँच सौ लोग। एक रात में। मगर मैं मना नहीं कर पाई। मेरी ताकत ज़्यादा थी। और मेरा गुस्सा... मेरा गुस्सा सब कुछ निगल गया। मैंने पाँच सौ की जान ली। मगर एक राज़ है, जो आज तक किसी को नहीं पता।"

मीरा ने पन्ना पलटा।

"पाँच सौ में से, एक मैंने नहीं मारा था। मेरा पति। अमरनाथ। उसने ख़ुदकुशी की थी। मेरे जलने के अगले ही दिन। और जब उसकी आत्मा भी कालकूट में आई — मैंने उसे माफ नहीं किया। मैंने उसे यहीं बंद कर दिया। नब्बे साल से वो भी इस गाँव में है। मेरी तरह। बंधा हुआ।"

मीरा को अचानक एक बात समझ आई।

अमरनाथ। आर्यन। एक ही आत्मा।

"और मनोरमा," अहिल्या बोली, "तेरे प्रेमी की आत्मा अमरनाथ की है। मैं उसे मार सकती हूँ। एक झटके में। नब्बे साल का बदला। मगर अगर तू मुझे एक हफ्ता देगी — तेरा शरीर — तो मैं अमरनाथ को छोड़ दूँगी। उसे जाने दूँगी। उसकी आत्मा मुक्त।"

मीरा ने आर्यन की तरफ देखा।

आर्यन के चेहरे पर डर था।

"मीरा, सुन मत।"

"मगर अगर वो सच कह रही है... अगर तू सच में अमरनाथ है... तो मैं तुझे आज़ाद करना चाहती हूँ।"

"मीरा! ये trap है!"

तुलसीराम तेज़ी से आगे आया। "मीरा, मेरी बात सुन। ये झूठ बोल रही है। अहिल्या कभी अपनी बात नहीं रखती। वो जैसे ही तेरे शरीर में आएगी — उसे फिर वापस नहीं जाना। एक हफ्ता नहीं — हमेशा। और तेरे साथ-साथ वो हज़ारों को मारेगी।"

अहिल्या हँसी। "तुलसीराम, चुप कर। मैं अपनी बहन से बात कर रही हूँ।"

"मनोरमा तेरी बहन नहीं है, अहिल्या। और तू हमारी 'दादी' नहीं है। तू एक राक्षसी है। बस।"

अहिल्या के चेहरे पर — एक झलक — गुस्सा आया।

मगर वो रुक गई।

"पढ़ती रह, मनोरमा। तू ख़ुद तय कर।"

मीरा ने अगला पन्ना पलटा।

"पच्चीस साल पहले — गीता पैदा हुई। एक तंत्रिक। मेरी ताकतवर औलादों में से एक। उसने मेरी कहानी जानी। मगर वो मेरे साथ नहीं थी। वो मेरे खिलाफ हो गई।"

"उसने एक बच्चा पैदा किया। एक खास बच्चा। उस बच्चे में उसने एक 'रक्षक' बंधा। एक ऐसा बंधन जो मुझे — एक बार — रोक सकता है। मगर उस बंधन को जगाने का तरीका सिर्फ एक है — उस बच्चे की जान।"

मीरा रुक गई।

अगला पन्ना नहीं था।

नहीं — था। मगर खाली था।

"क्यों खाली?" मीरा ने पूछा।

अहिल्या मुस्कुराई। "क्योंकि बेटी, अगला पन्ना — आज लिखा जाएगा। तेरे और मेरे बीच।"

"क्या?"

"देख। तू तय कर। एक — आर्यन को मारने दे। उसका दिल खंजर से। फिर तू मुझे जला सकेगी। यही पुराना तरीका है। तेरा 'good' तरीका।"

"दूसरा?"

"दूसरा — एक हफ्ता मुझे दे। फिर मैं चली जाऊँगी। आर्यन ज़िंदा रहेगा। तू ज़िंदा रहेगी। बस सात दिन। और मैं वादा करती हूँ — कोई नहीं मरेगा।"

मीरा ने आर्यन की तरफ देखा।

आर्यन उसे देख रहा था।

तुलसीराम बोला, "मीरा, सोच मत। ये choice नहीं है। ये trap है।"

मगर मीरा सोच रही थी।

अगर वो आर्यन को मार दे — वो ख़ुद कैसे जिएगी?

अगर वो एक हफ्ता दे — और अहिल्या वापस न जाए?

कोई रास्ता आसान नहीं था।

तभी — अचानक — मीरा को एक बात याद आई।

बाबा भैरवनाथ ने क्या कहा था?

"डायरी पढ़ते वक्त — अहिल्या तुझ पर हमला करेगी। पूरी ताकत से। तू टूटेगी। तू झूठ देखेगी। तू सच भूलेगी।"

अहिल्या झूठ बोल रही थी।

मीरा ने एक गहरी साँस ली।

अपने हाथ की मुट्ठी खोली। उसमें खंजर का हैंडल था।

और फिर — उसने कुछ ऐसा किया जो किसी ने नहीं सोचा था।

उसने डायरी फेंक दी।

और दौड़ी।

अहिल्या की तरफ नहीं — आर्यन की तरफ।

"भागो!" उसने चीखा, "अभी!"

अहिल्या समझ गई।

और गुस्से में चीखी —

"मनोरमा! तू मेरे रास्ते में फिर आ गई!"

और कालकूट का आसमान — दोपहर के सूरज वाला आसमान — एक झटके में काला पड़ गया।

अध्याय 7 · अमरनाथ की वापसी

दुनिया दो रंगों में बँट गई थी।

आसमान काला। ज़मीन लाल — मानो खून से रंग गई हो। हवा रुक गई। पेड़ ज़मीन से उखड़कर हवा में लटकने लगे। समय रुक गया था।

मीरा भागी। आर्यन को पकड़ा। तुलसीराम पीछे आ रहा था। पाँच नौजवान — दो भाग चुके थे, तीन ज़मीन पर गिरे हुए थे, बेहोश।

अहिल्या अब ताबूत के बाहर थी। ज़मीन से दो फुट ऊपर। उसकी लाल साड़ी हवा में लहरा रही थी। उसके बाल — खुले हुए, ज़मीन तक लंबे।

और उसकी आँखें — पीली नहीं रही थीं। काली। पूरी काली।

"मनोरमा! तू कितनी बार आएगी मेरे रास्ते में?"

अहिल्या ने हाथ उठाया। एक तेज़ हवा का झोंका आया। मीरा ज़मीन पर गिर गई। आर्यन उसके ऊपर। तुलसीराम भी।

"मीरा, खंजर!" तुलसीराम चिल्लाया, "खंजर मार उसके सीने में! अभी!"

मीरा ने खंजर निकाला। उसने अहिल्या की तरफ दौड़ने की कोशिश की।

मगर अहिल्या ने एक हाथ उठाया।

मीरा ज़मीन पर पड़ी रह गई। हिल नहीं पाई।

"तू मुझ पर खंजर नहीं उठा सकती, मनोरमा। मेरा खून तेरा खून है। तेरा हाथ रुक जाएगा।"

सच था।

मीरा का हाथ कांप रहा था। मगर खंजर नहीं उठा रहा था।

अहिल्या ने आर्यन की तरफ देखा। उसकी आँखों से एक काला धुआँ निकला।

और वो धुआँ — सीधे आर्यन की तरफ बढ़ा।

"अमरनाथ। मेरे पति। मेरे प्यार। आज तू मेरे पास आएगा। नब्बे साल बाद।"

आर्यन ज़मीन पर पड़ा था। मीरा उसे थामे हुए थी।

धुआँ आर्यन की नाक से अंदर जाने लगा।

"नहीं!" मीरा चिल्लाई, "रुक! रुक!"

तुलसीराम ने ज़ोर लगाकर खड़े होने की कोशिश की।

अहिल्या ने उसकी तरफ देखा। हाथ हिलाया।

तुलसीराम का गला कस गया। वो अपने गले पर हाथ रखकर तड़पने लगा।

"बूढ़े," अहिल्या ने कहा, "नब्बे साल से तू मुझे रोकता आ रहा है। आज तू मरेगा।"

गाँव की सीमा पर — कुछ हुआ।

तुलसीराम का बंधन — गाँव से बाहर ले जाने वाला बंधन — टूट गया।

तुलसीराम का दिल फटने लगा।

"मीरा..." तुलसीराम ने आखिरी आवाज़ में कहा, "डायरी का आखिरी पन्ना... ख़ुद देख... ख़ुद..."

और वो ज़मीन पर गिर गया।

मर चुका था।

मीरा रो पड़ी।

मगर अहिल्या ने उसकी तरफ नहीं देखा। उसका सारा ध्यान आर्यन पर था।

धुआँ आर्यन के अंदर जा रहा था।

और आर्यन की आँखें बदल रही थीं।

कुछ देर बाद, आर्यन उठा।

मगर वो आर्यन नहीं था।

उसकी आँखों में अब कुछ और था। एक पुरानी चमक।

अहिल्या ज़मीन पर उतरी। आर्यन के पास गई। उसके चेहरे को छुआ।

"अमरनाथ। मैं तेरी राह देख रही थी।"

आर्यन — या जो आर्यन था — मुस्कुराया।

"अहिल्या। मैं भी।"

मीरा सहम गई।

"नहीं... आर्यन..."

अमरनाथ-आर्यन ने मीरा की तरफ देखा।

"मनोरमा," उसने कहा, मगर उसकी आवाज़ में अब आर्यन का प्यार नहीं था, "हट जा रास्ते से। मेरा और अहिल्या का काम है आज।"

"आर्यन! तू वापस आ! तू अंदर है! मैं जानती हूँ!"

अमरनाथ-आर्यन हँसा। "मनोरमा, आर्यन एक छाया था। नब्बे साल मैं इंतज़ार कर रहा था। आज मैं अपनी अहिल्या को लेने आया हूँ।"

अहिल्या मीरा की तरफ बढ़ी।

"आ। मनोरमा। आज मेरा शरीर पाने का दिन है। तेरे शरीर में मैं अमरनाथ के साथ रहूँगी। हम दोनों — एक नई ज़िंदगी शुरू करेंगे।"

मीरा ज़मीन पर थी। खंजर हाथ में था।

मगर अब — कोई बचाने वाला नहीं था।

तुलसीराम मर चुका था। आर्यन — खो चुका था।

मीरा ने आँखें बंद कर लीं।

और तभी — उसके दिमाग में एक आवाज़ आई।

तुलसीराम की आवाज़।

"डायरी का आखिरी पन्ना... ख़ुद देख... ख़ुद..."

मीरा ने आँखें खोलीं।

डायरी ज़मीन पर पड़ी थी, उससे दस फीट दूर।

अहिल्या और अमरनाथ-आर्यन उसके पास आ रहे थे।

मीरा ने हिम्मत जुटाई।

और कुछ ऐसा किया जो उसने पहले कभी नहीं किया था।

उसने अपने अंदर एक आवाज़ सुनी — जो उसकी थी, मगर बहुत पुरानी।

"मनोरमा। मेरा नाम मनोरमा है। मैं नब्बे साल से लड़ रही हूँ। मैं हर बार लौटी हूँ। और हर बार मैं हारी हूँ।"

"मगर इस बार — मैं नहीं हारूँगी।"

मीरा खड़ी हो गई।

अहिल्या रुक गई।

मीरा की आँखों में अब कुछ बदला हुआ था।

"अहिल्या," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ अलग थी, "मेरा नाम मनोरमा है। तेरी छोटी बहन। तूने मुझे छह साल की उम्र में मारा था। मैंने नब्बे साल इंतज़ार किया है इस पल का।"

अहिल्या के चेहरे का रंग बदला।

"मनोरमा... तू..."

"मैं याद कर रही हूँ। सब कुछ। उस रात तूने तहखाने में मुझे क्यों मारा था। याद है? क्योंकि मैंने एक चीज़ देखी थी।"

"क्या?" अमरनाथ-आर्यन ने पूछा।

मीरा ने अमरनाथ-आर्यन की तरफ देखा।

"अमरनाथ। तेरी प्यारी अहिल्या ने तुझे जो बताया है — सब झूठ है।"

अहिल्या चीखी, "मनोरमा! रुक!"

मगर मीरा रुकी नहीं।

"अमरनाथ। मेरी बहन ने तुझे गाँव वालों से नहीं बचाया। मेरी बहन ने तुझे ख़ुद मारा था। उसने तुझे ज़हर दिया था। फिर तेरी मौत को 'ख़ुदकुशी' का रंग दिया।"

अमरनाथ-आर्यन की आँखें फैल गईं।

"क्या?"

"हाँ। तूने पंचायत बुलाई। अहिल्या जली। मगर अहिल्या को पता था — मरने से पहले — वो अकेली नहीं रहेगी। वो तुझे भी अपने साथ ले जाएगी। तंत्र से। उसने तेरी चाय में ज़हर मिलाया था अगले ही दिन। तूने सोचा तू ख़ुदकुशी कर रहा है। मगर सच — अहिल्या ने तुझे मारा।"

अमरनाथ-आर्यन ने अहिल्या की तरफ देखा।

अहिल्या का चेहरा सख्त हो गया।

"मनोरमा झूठ बोल रही है, अमरनाथ। मेरे प्यार। मेरे जीवन।"

मगर अमरनाथ-आर्यन रुक गया था।

"अहिल्या... ये सच है?"

"नहीं!"

मीरा ने डायरी की तरफ देखा। दौड़ी।

अहिल्या ने हाथ उठाया।

मगर अमरनाथ-आर्यन ने अहिल्या का हाथ पकड़ लिया।

"अहिल्या... रुक। मुझे सच जानना है।"

मीरा डायरी तक पहुँच गई। उसने आखिरी पन्ना खोला।

और जो लिखा था — पढ़ा।

"मेरा अंतिम सच। नब्बे साल मैंने एक झूठ जिया है। मेरी मृत्यु के अगले दिन, मैंने अपने पति अमरनाथ की चाय में ज़हर मिलाया। मैंने उसे मारा क्योंकि मैं चाहती थी वो हमेशा मेरे साथ रहे। उसकी आत्मा मेरी हो जाए।"

"मगर एक काम मैंने और किया। मेरी बहन मनोरमा — जिसे मैंने छह साल की उम्र में मारा था — उसकी आत्मा को भी मैंने अपने साथ बाँधा। ताकि वो मेरे राज़ कभी किसी को न बता सके।"

"मगर मनोरमा हर पीढ़ी में नए शरीर में लौटी। एक दिन वो आज़ाद हो जाएगी। और जिस दिन वो आज़ाद होगी — मेरा अंत होगा।"

"मेरा अंत करने का तरीका — एक मंत्र। ये मंत्र मेरे ही हाथ से लिखा गया। ये मेरा कमज़ोर पल था। मैंने ये इसलिए लिखा क्योंकि मैं ख़ुद से थक गई हूँ। मैं चाहती हूँ — एक दिन — कोई मुझे रोके। एक दिन — कोई मुझे शांत करे।"

"मंत्र है — 'ओम कालिकायै नमः। अहिल्या मुक्ति। अमरनाथ मुक्ति। मनोरमा मुक्ति। तीनों एक हों, तीनों मुक्त हों, तीनों शांत हों। ओम स्वाहा।'"

मीरा ने मंत्र पढ़ा।

ज़ोर से।

और जैसे ही उसने मंत्र पढ़ना शुरू किया —

अहिल्या चीखी।

मगर अमरनाथ-आर्यन ने अहिल्या को रोक रखा था।

"अहिल्या। बस। बहुत हो गया। मुझे माफ कर।"

"अमरनाथ! ये मेरे खिलाफ हो रहा है! मैंने तुझे मारा था कबूल करती हूँ — मगर मेरे पास तुझे रखने का वो ही एक तरीका था!"

"अहिल्या, मेरी जान। मैं तुझे माफ करता हूँ। मगर अब बस। हम दोनों थक चुके हैं। हम दोनों को आज़ाद होना है।"

मीरा ने मंत्र खत्म किया।

"... ओम स्वाहा।"

और तभी —

मीरा ने खंजर उठाया।

मगर खंजर अहिल्या के सीने में नहीं चला।

मीरा ने खंजर — अमरनाथ-आर्यन के सीने में चलाया।

क्योंकि अमरनाथ-आर्यन — रक्षक — मरते हुए — एक काम कर सकता था।

अहिल्या को अपने साथ ले जा सकता था।

खंजर लगा।

अमरनाथ-आर्यन गिरा।

अहिल्या भी गिरी — क्योंकि अमरनाथ की आत्मा उसकी आत्मा से बँधी थी, अब हमेशा के लिए।

दोनों गिरे।

और एक तेज़ रोशनी फूटी।

कालकूट का काला आसमान —

फटा।

सूरज वापस आया।

लाल ज़मीन — हरी हो गई।

मगर मीरा?

मीरा अपने प्रेमी के शरीर के पास बैठी थी।

"आर्यन..." उसने धीरे से कहा।

आर्यन की आँखें खुलीं। एक पल को।

और उन आँखों में — सिर्फ आर्यन था। अमरनाथ नहीं।

"मीरा..." उसने कहा, "तूने... सही किया।"

"नहीं! आर्यन! रुक! मैं तुझे बचाऊँगी!"

"मीरा... मैं तुझसे प्यार करता था... हर जन्म में... हर बार... मैं तुझे ढूँढूँगा।"

और उसकी आँखें बंद हो गईं।

मीरा रोई।

बहुत देर रोई।

और जब उसने ऊपर देखा —

अहिल्या का शरीर गायब हो चुका था।

सिर्फ राख रह गई थी।

मीरा ने राख देखी।

और हैरान हो गई।

राख — हिल रही थी।

बहुत हल्की।

बहुत धीरे।

मगर हिल रही थी।

मीरा को एक बात समझ आई।

अहिल्या मरी थी।

मगर पूरी तरह नहीं।

अध्याय 8 · गाँव की आज़ादी

सूरज ढल रहा था जब गाँव वालों ने चिता जलाई।

दो चिताएँ। एक तुलसीराम की। एक आर्यन की।

मीरा दोनों के पास खड़ी थी। उसके आँसू सूख चुके थे। मगर अंदर — कुछ और था।

गाँव वाले अब अलग दिखते थे। उनके चेहरों पर वो थकान — गायब थी। एक नौजवान — जिसका नाम विक्रम था — पहली बार खुल कर हँसा। एक बच्ची ने पहली बार पतंग उड़ाने की बात की।

कालकूट आज़ाद था।

नब्बे साल बाद।

गंगा आई। उसके चेहरे पर अब कोई काली ताकत नहीं थी। वो रो रही थी।

"बेटी... मीरा... मेरा पति..."

मीरा ने उसे गले लगा लिया।

"उन्होंने हमें बचाया, मासी। उनकी जान बेकार नहीं गई।"

गंगा ने एक छोटी पोटली दी। "तुलसीराम ने ये तेरे लिए रखी थी। कहता था — 'अगर मैं न रहूँ — तो ये मीरा को देना।'"

मीरा ने पोटली खोली।

अंदर — एक चिट्ठी थी। तुलसीराम की लिखावट में।

"मीरा बेटी,"

"अगर तू ये पढ़ रही है — तो मतलब मैं चला गया। और मतलब तू जीत गई।"

"मगर बेटी — एक बात तुझे जाननी होगी। अहिल्या मरी नहीं है। अहिल्या मर नहीं सकती।"

"उसकी राख को बचाकर रखना। बहुत संभाल कर। मेरी एक पुरानी सी पेटी है। उसमें रखना। पेटी पर मंत्र लिखे हैं। मंत्र उसे रोकेंगे — एक समय तक।"

"मगर बेटी — एक दिन वो वापस आएगी। शायद तेरी ज़िंदगी में नहीं। शायद तेरी बेटी की ज़िंदगी में। शायद तेरी पोती की।"

"मगर वो वापस आएगी।"

"क्योंकि बेटी — अहिल्या के पास एक राज़ है जो किसी को नहीं पता। और वो राज़ — डायरी में नहीं था। वो राज़ — कालकूट के तहखाने में है।"

"तहखाना? कौन सा तहखाना?" मीरा ने ज़ोर से बोला।

पास खड़ी गंगा ने सिर हिलाया। "तहखाने की बात तो हम भी जानते हैं, बेटी। मगर पच्चीस साल से वो बंद है। तुलसीराम कहता था — कोई वहाँ नहीं जाएगा।"

मीरा ने चिट्ठी पढ़ी आगे —

"तहखाना अहिल्या के पुराने घर के नीचे है। वो घर अब खंडहर है। मगर तहखाने में जो है — वो अहिल्या से भी बड़ा है। मैंने नब्बे साल पहले एक बार वहाँ झाँका था — जब मैं छोटा था। जो देखा — वो आज तक मेरे सपनों में आता है।"

"मीरा बेटी, अगर तू कालकूट का सच जानना चाहती है — एक बार उस तहखाने में जाना होगा। मगर अकेले मत जाना। और जाना तभी — जब तू पूरी तरह तैयार हो।"

"क्योंकि बेटी — अहिल्या एक 'खिलाड़ी' थी। मगर तहखाने में जो है — वो खेल का 'मालिक' है।"

"बहुत प्यार से,"

"तेरा तुलसीराम चाचा।"

मीरा ने चिट्ठी मोड़ी।

गंगा ने पूछा, "क्या लिखा है, बेटी?"

मीरा ने चिट्ठी जेब में डाली।

"मासी, मुझे एक काम और करना है।"

"क्या?"

"तहखाने में जाना है। आज ही।"

गंगा सहम गई। "नहीं, बेटी। तहखाने में मत जा। तुलसीराम भी कहता था — कभी मत जाना।"

"मासी, मगर कुछ है वहाँ। और जो है — वो अहिल्या से जुड़ा है। और जब तक मुझे पूरा सच नहीं पता — मैं चैन से नहीं रह सकती।"

गंगा ने एक लंबी साँस ली। "बेटी, अकेली मत जा। विक्रम को ले जा। और मेरे पुराने आदमी का — एक तावीज़ था। वो ले ले। तेरी रक्षा करेगा।"

गंगा ने एक चांदी का छोटा सा बक्सा दिया। उसमें एक तावीज़ था।

मीरा ने पहना।

विक्रम को बुलाया।

तीस मिनट बाद, मीरा और विक्रम कालकूट के दूसरे छोर पर पहुँचे। एक टूटा हुआ खंडहर।

"ये अहिल्या का घर था?"

"हाँ, दीदी।"

खंडहर के बीच — एक टूटा हुआ दरवाज़ा था। नीचे जाने वाला।

मीरा और विक्रम ने मशालें जलाईं।

दरवाज़े पर ताला नहीं था। मगर दरवाज़ा खोलने में दिक्कत हो रही थी। मानो किसी ने अंदर से रोक रखा हो।

"दीदी, मुझे डर लग रहा है।"

"मुझे भी, विक्रम। मगर एक बार जाना ज़रूरी है।"

दरवाज़ा खुला।

सीढ़ियाँ नीचे जा रही थीं।

दोनों उतरे।

सीढ़ियाँ बहुत लंबी थीं। अंदाज़न पचास फीट नीचे।

और जब वो सबसे नीचे पहुँचे — एक बड़ा कमरा था।

कमरे की दीवारों पर — हज़ारों लाशों के नाम लिखे थे। देवनागरी में।

मीरा ने एक नाम पढ़ा। फिर दूसरा। फिर तीसरा।

सब नाम — बच्चों के थे।

"दीदी," विक्रम ने कांपती आवाज़ में कहा, "ये क्या है?"

मीरा ने सिर हिलाया। "ये बच्चे... ये उन सब के नाम हैं जिन्हें अहिल्या ने मारा था। बलि के लिए।"

"मगर अहिल्या के बारे में हमने जाना — उसने मनोरमा को मारा था। और बलि देने वाली थी एक बच्चे की — जब अमरनाथ ने पकड़ा।"

"विक्रम — डायरी में सिर्फ वही लिखा था। मगर देख — हज़ारों नाम। मतलब अहिल्या नब्बे साल से नहीं — सालों से बच्चों को मार रही थी। दर्जनों। शायद सैंकड़ों।"

"दीदी, मगर एक बात — सब नाम पुराने नहीं हैं। देख।"

विक्रम ने एक नाम की तरफ इशारा किया।

नाम था: "साजन। 7 साल। 2014।"

मीरा का दिल रुक गया।

"2014?"

"हाँ, दीदी। और ये देख —"

विक्रम ने और नाम दिखाए।

"रिया। 5 साल। 2018।"

"मनीष। 6 साल। 2021।"

"नित्या। 4 साल। 2023।"

मीरा ने एक तेज़ साँस ली।

"विक्रम... ये कैसे हो सकता है? अहिल्या तो नब्बे साल से बंधी थी। वो बच्चों को कैसे मार रही थी?"

विक्रम ने सिर हिलाया।

तभी, कमरे के कोने में — एक हलचल हुई।

दोनों रुके।

मशाल की रोशनी कोने में पहुँची।

और मीरा को जो दिखा — उसने उसे डरा दिया।

कोने में — एक आदमी बैठा था।

बहुत बूढ़ा। शायद सौ से ऊपर।

सफेद बाल। सफेद दाढ़ी। मगर चेहरे पर — कोई इंसानी भाव नहीं।

और आदमी की आँखें — पीली थीं। अहिल्या जैसी।

मीरा ने तावीज़ पकड़ा।

"कौन हो तुम?"

बूढ़ा आदमी मुस्कुराया।

"मैं अनंतनाथ हूँ, बच्ची।"

"अनंतनाथ?"

"अहिल्या के पिता। कालकूट के पंडित। मेरी एक बेटी थी अहिल्या। एक थी मनोरमा। एक थी कात्यायिनी।"

मीरा का दिमाग ठहर गया।

"आप... अहिल्या के पिता? आप अभी ज़िंदा हैं?"

अनंतनाथ हँसा। एक खोखली हँसी।

"बच्ची, मेरी उम्र एक सौ पच्चीस साल है। नब्बे साल पहले मेरी बेटी मरी। मगर मैं नहीं मरा। क्यों?"

"क्यों?"

अनंतनाथ खड़ा हुआ।

और मीरा ने देखा — उसके पैर ज़मीन को नहीं छू रहे थे।

बिल्कुल अहिल्या की तरह।

"क्योंकि बच्ची, मैंने अहिल्या को सिखाया था। सब कुछ। मैंने उसे तंत्र दिया। मैंने उसे काली विद्या दिखाई। मैंने उसकी मदद की हर बच्चे को मारने में।"

"क्या?"

"और जब पंचायत ने उसे जलाया — मैंने एक काम किया। मैंने ख़ुद को इस तहखाने में बंद कर लिया। तंत्र से। मैं नहीं मर सकता — जब तक मेरी अहिल्या मेरे पास न लौटे।"

मीरा ने पीछे कदम रखा।

"विक्रम... हमें भागना होगा।"

अनंतनाथ हँसा।

"भागोगे कैसे, बच्ची? तुम मेरे जाल में आ गई। और सुनो — एक बात जान लो —"

अनंतनाथ ने अपनी आँखें मीरा पर गाड़ीं।

"मेरी बेटी एक नौसिखिया थी। मगर मैं — मैं असली खिलाड़ी हूँ। पच्चीस साल से तहखाने में बैठ कर — मैंने बच्चों को मारा है। मेरी ताकत बढ़ती गई है। और अब — तू मेरे सामने है। मनोरमा का खून। मेरी छोटी बेटी का खून।"

"और इस बार — कोई 'अमरनाथ' नहीं है तुझे बचाने के लिए।"

मीरा ने तावीज़ कस कर पकड़ा।

विक्रम पीछे की तरफ भागा — सीढ़ियों की तरफ।

मगर अनंतनाथ ने हाथ उठाया।

सीढ़ियाँ — पत्थर बन गईं।

रास्ता बंद।

मीरा अकेली थी।

अब अहिल्या नहीं — अहिल्या का पिता।

और इस बार — आर्यन भी नहीं था।

अध्याय 9 · पंडित का खेल

विक्रम पत्थर बने सीढ़ियों पर हाथ मार रहा था। मगर पत्थर हिल नहीं रहा था।

"दीदी, क्या करें?"

मीरा ने अनंतनाथ को देखा। उसकी पीली आँखें — मानो दो दीये जल रहे हों।

"अनंतनाथ," मीरा ने हिम्मत से कहा, "तू क्या चाहता है?"

"मैं चाहता हूँ — मेरी बेटी अहिल्या वापस आए।"

"वो मर चुकी है। उसकी राख तक है मेरे पास।"

"मरी नहीं है, बच्ची। मरी हुई आत्मा को तू पकड़ कर ला सकती है। मेरी मदद से।"

"मैं क्यों मदद करूँगी?"

अनंतनाथ हँसा।

"क्योंकि बच्ची — तू नहीं जानती। मगर तेरे पेट में एक बच्चा है।"

मीरा का दिल रुक गया।

"क्या?"

"दो हफ्ते हो गए। तुझे ख़ुद नहीं पता। मगर मैं देख सकता हूँ। तंत्र से।"

"नहीं... ये झूठ है।"

"बच्ची, मेरा झूठ बोलना बेकार है। बच्चा आर्यन का है। और वो बच्चा — एक खास बच्चा होगा। क्योंकि तू मनोरमा है। और आर्यन अमरनाथ था। और वो दोनों — सबसे ताकतवर तंत्रिक थे अहिल्या के अलावा।"

मीरा ने पेट पर हाथ रखा।

अंदर — कुछ था। एक हल्की सी हलचल। पहली बार उसे महसूस हुई।

"तो तू क्या चाहता है?"

"बच्चा। नौ महीने बाद। पैदाइश के समय — बच्चे को मेरे पास लाना। मैं उस बच्चे के शरीर में अहिल्या को बुलाऊँगा।"

"नहीं!"

"बच्ची, सोच। अगर तू मना करेगी — मैं तुझे अभी मार दूँगा। बच्चा भी मरेगा। दोनों।"

"और अगर मैं हाँ कर दूँ?"

"तू ज़िंदा रहेगी। तेरा बच्चा पैदा होगा। नौ महीने तू उसे प्यार करेगी। फिर तू उसे मेरे पास लाएगी। और बच्चा — मेरा। बस।"

मीरा को एक बात समझ आई।

अनंतनाथ झूठ बोल रहा था।

अहिल्या जिस तरह झूठ बोलती थी — वैसे ही।

"अनंतनाथ — तू ये नहीं कर सकता। एक बच्चे के शरीर में अहिल्या को नहीं बुला सकता। मनोरमा का खून ज़रूरी है। मेरा खून।"

अनंतनाथ की मुस्कान — एक पल को — कमज़ोर हुई।

मीरा को पता चला — वो सच कह रही थी।

"तू मुझे चाहिए था। मेरा शरीर। बच्चे के लिए नहीं — मेरे लिए। और इसी लिए तूने ये बच्चे की कहानी बनाई — ताकि मैं डर जाऊँ। ताकि मैं हाँ कह दूँ।"

अनंतनाथ ने आँखें संकीर्ण कीं।

"बच्ची — तू अपनी बहन से ज़्यादा होशियार है।"

"और तू — अपनी बेटी से ज़्यादा कमज़ोर है।"

अनंतनाथ ने हाथ उठाया।

मीरा ने तावीज़ ऊपर किया।

तावीज़ चमका।

अनंतनाथ का हाथ रुक गया।

"ये क्या है?"

"तुलसीराम का तावीज़।"

अनंतनाथ हँसा। "वो बूढ़ा? उसका तावीज़ मुझे रोकेगा? बच्ची, मेरी ताकत के सामने — वो तावीज़ एक खिलौना है।"

अनंतनाथ ने ज़ोर लगाया।

तावीज़ चटका।

मीरा सहम गई।

अनंतनाथ ने एक तेज़ कदम बढ़ाया।

"विक्रम! भाग!" मीरा ने चिल्लाया।

मगर विक्रम ज़मीन पर गिर चुका था। अनंतनाथ ने उसे एक नज़र में बेहोश कर दिया था।

अब सिर्फ मीरा।

अनंतनाथ ने मीरा का गला पकड़ा।

मीरा ने उसकी आँखों में देखा।

और तभी — मीरा को कुछ याद आया।

बाबा भैरवनाथ की बात।

"तू पहले भी ये कर चुकी है। तेरा खून जानता है।"

मनोरमा हर पीढ़ी में लौटी थी।

और हर बार — कुछ सीखा था।

मीरा ने आँखें बंद कीं।

और अपने अंदर — मनोरमा को बुलाया।

पहली बार सच में।

पूरी ताकत से।

"मनोरमा... आ। मेरी मदद कर। आज आखिरी बार।"

और मीरा को महसूस हुआ — उसके अंदर कुछ जागा।

एक पुरानी ताकत।

जो उसकी अपनी थी।

मीरा ने आँखें खोलीं।

और अनंतनाथ — पीछे हट गया।

"तू... तू कौन है, बच्ची?"

"मैं मीरा हूँ। और मैं मनोरमा हूँ। और मैं कात्यायिनी हूँ। मैं तेरी छोटी बेटी हूँ — और तेरी सबसे बड़ी बेटी भी।"

अनंतनाथ का चेहरा सख्त हो गया।

"बकवास।"

"नहीं — सच। तेरी तीन बेटियाँ थीं — अहिल्या, कात्यायिनी, मनोरमा। मगर पता है क्या? कात्यायिनी और मनोरमा — एक ही आत्मा थीं। तू नहीं जानता था। मैं उन दोनों में से एक थी — हर बार लौटी।"

अनंतनाथ ने सिर हिलाया।

"नहीं। ऐसा नहीं हो सकता।"

"हुआ है। और इस जन्म में — मैं दोनों एक साथ हूँ। पूरी ताकत के साथ।"

मीरा ने अपने हाथ ऊपर उठाए।

अंदर से — एक गर्मी आई।

तावीज़ — जो टूट चुका था — वापस जुड़ गया। चमका।

अनंतनाथ ने पीछे कदम बढ़ाया।

"बच्ची..."

"पिता," मीरा ने कहा, "तू नब्बे साल से इस तहखाने में बंद है। मैं तुझे आज़ाद करूँगी। मगर मेरे तरीके से।"

मीरा ने एक मंत्र पढ़ा।

अहिल्या वाले मंत्र का दूसरा रूप।

"ओम कालिकायै नमः। अनंतनाथ मुक्ति। पिता आज़ाद हो। पिता शांत हो। ओम स्वाहा।"

अनंतनाथ चीखा।

मगर मीरा रुकी नहीं।

"पिता — तूने अपनी बेटी को गलत रास्ता दिखाया। उसे काली विद्या सिखाई। उसके साथ बच्चों को मारा। तू ज़िम्मेदार है — अहिल्या से ज़्यादा। आज तेरा अंत भी होगा।"

अनंतनाथ ने तेज़ी से एक मंत्र पढ़ने की कोशिश की।

मगर मीरा का मंत्र — पूरा था।

"... ओम स्वाहा।"

अनंतनाथ का शरीर — धुएँ में बदल गया।

मगर वो धुआँ — मीरा की तरफ भागा।

अंदर जाने की कोशिश की।

मगर मीरा के अंदर — मनोरमा थी। पूरी ताकत से।

धुआँ अंदर नहीं घुसा। वापस उछला। और कमरे की छत में फँस गया।

बंद हो गया।

अनंतनाथ — मरा नहीं। मगर अब बंद हो गया था। हमेशा के लिए। एक धुआँ बनकर।

मीरा ने एक लंबी साँस ली।

विक्रम धीरे-धीरे जागा।

"दीदी? क्या हुआ?"

"विक्रम — हमने जीत लिया। चल। बाहर चलते हैं।"

सीढ़ियाँ — फिर पत्थर से वापस सीढ़ी हो गईं।

दोनों ऊपर आए।

बाहर — सूरज ढल चुका था। मगर अब अंधेरा डरावना नहीं था। यह सिर्फ रात थी। सामान्य रात।

कालकूट — पूरी तरह आज़ाद था।

मीरा ने आसमान देखा।

तारे आए थे।

पहली बार — गाँव वालों ने तारे देखे।

नब्बे साल बाद।

मगर मीरा को एक काम और था।

पेट पर हाथ रखा।

अंदर — एक हलचल।

अनंतनाथ ने सच कहा था।

बच्चा था।

आर्यन का बच्चा।

और मीरा को यकीन था — बच्चा कोई आम नहीं होगा।

बच्चा — सबसे खास होगा।

मगर एक डर भी था।

अहिल्या मरी नहीं। राख हिल रही थी।

अनंतनाथ बंद हो गया था — मगर मरा नहीं था।

कालकूट में पंद्रह साल पुरानी एक भी कहानी ज़िंदा रहती है — वो वापस आ सकती है।

मगर अभी —

अभी — एक रात की शांति थी।

मीरा गंगा के घर लौटी।

गंगा ने उसे देखा। समझ गई।

"बेटी — तेरे चेहरे पर अब डर नहीं।"

"नहीं, मासी। मगर सावधानी है।"

गंगा ने मीरा को गले लगाया।

मीरा ने गंगा से एक बात पूछी।

"मासी — तुलसीराम चाचा कहते थे — कालकूट का सबसे बड़ा राज़ तहखाने में है। मगर मुझे लगता है — एक बड़ा राज़ अभी बचा है।"

गंगा के चेहरे पर एक छाया आई।

"क्या, बेटी?"

"अनंतनाथ ने कहा — अहिल्या नौसिखिया थी। वो मास्टर था। मगर अनंतनाथ भी — किसी का शिष्य था। मुझे यकीन है। और जो असली मास्टर है — वो कहीं और है।"

गंगा ने एक लंबी साँस ली।

"बेटी — एक नाम है जो हम बूढ़े नहीं लेते। मगर तूने आज सब कर दिया। शायद तू सुनने के लायक है।"

"क्या?"

"कालकूट के पुराने पहाड़ों में — एक मठ है। बहुत पुराना। नब्बे साल से बंद है। उसका नाम है — 'काली घाटी का मठ।' वहाँ एक तंत्रिक रहता था। उसने अनंतनाथ को सिखाया था। उसने अहिल्या को भी देखा था बचपन में। उस तंत्रिक का नाम था — महाकाल।"

"वो ज़िंदा है?"

गंगा ने सिर हिलाया।

"पता नहीं, बेटी। मगर एक बात है — वो जो था — आम तंत्रिक नहीं था। वो किसी देवता का अंश था। या किसी राक्षस का। कोई नहीं जानता।"

मीरा ने सोचा।

महाकाल।

कालकूट का असली रहस्य।

"मासी — मैं अब दिल्ली जाऊँगी। मेरा बच्चा होगा। मैं उसकी रक्षा करूँगी। मगर एक बात मुझे लगता है —"

"क्या?"

"नौ महीने बाद, जब मेरा बच्चा पैदा होगा — महाकाल हमें ढूँढेगा। और मुझे तैयार रहना होगा।"

गंगा ने मीरा का माथा चूमा।

"तू तैयार है, बेटी। तेरे अंदर मनोरमा है, कात्यायिनी है, और अब — एक नई ताकत भी है।"

अगले दिन सुबह, मीरा कालकूट से निकली।

गाड़ी अब चल रही थी।

कालकूट का बंधन — अब कमज़ोर था। मीरा बाहर जा सकती थी।

मगर जाते-जाते, मीरा ने एक काम किया।

अहिल्या की राख — एक छोटे चांदी के बक्से में डाली। और बक्से पर — मंत्र लिखे।

राख वहीं रखी।

कालकूट में।

तुलसीराम के पुराने घर में।

"बच्ची — तू ये क्यों कर रही है? जला क्यों नहीं देती?" गंगा ने पूछा।

मीरा ने मुस्कुराकर कहा, "मासी — कुछ चीज़ें — पास रखनी पड़ती हैं। दुश्मन को पास रखो — दोस्त से ज़्यादा।"

"मतलब?"

"मासी — एक दिन — मुझे अहिल्या की ज़रूरत पड़ेगी। महाकाल के खिलाफ।"

गंगा का चेहरा सफेद पड़ गया।

मगर मीरा हँसी।

"मासी — चिंता मत करना। मैं तैयार रहूँगी।"

और गाड़ी निकल पड़ी।

कालकूट से बाहर।

मीरा का हाथ — पेट पर था।

और अंदर — एक छोटा सा दिल — पहली बार धड़का।

अध्याय 10 · नौ महीने बाद

दिल्ली। नौ महीने बाद।

मीरा अपने फ्लैट में थी। बारिश हो रही थी बाहर। उसका पेट भारी था। डॉक्टर ने कहा था — कोई भी दिन पैदाइश हो सकती है।

नौ महीने में बहुत कुछ बदला था।

मीरा ने एक नई ज़िंदगी शुरू की थी। आर्यन के बिना। कठिन था। मगर उसने सहा।

अहिल्या की राख — एक छोटे चांदी के बक्से में — मीरा के बिस्तर के नीचे थी। तुलसीराम के मंत्रों से बंधी।

और हर रात — मीरा को एक सपना आता था।

एक आदमी का। बहुत लंबा। काले कपड़े। आँखें — दो बड़े-बड़े सूर्य।

महाकाल।

सपने में महाकाल सिर्फ देखता था। मगर देखता रहता था।

मीरा ने गंगा को कई बार फोन किया था। गंगा ने एक दिन बताया था — "बेटी, मैं भी सपने में देख रही हूँ उसे। वो आ रहा है।"

अब — आज की रात — दर्द शुरू हुआ।

पैदाइश का दर्द।

मीरा ने एम्बुलेंस बुलाई।

मगर बारिश इतनी तेज़ थी — एम्बुलेंस फँस गई।

मीरा अकेली थी अपने फ्लैट में।

अकेली — और दर्द में।

तभी — दरवाज़े पर एक खटखटाहट हुई।

मीरा ने दरवाज़ा खोला।

बाहर — एक औरत खड़ी थी। शायद चालीस की। बहुत साधारण कपड़े। मगर उसकी आँखों में — एक बात थी।

मीरा को कहीं देखी हुई लगी।

"मीरा?" औरत ने कहा।

"हाँ। आप कौन?"

"मेरा नाम कात्यायिनी है। मैं तेरी बहन हूँ।"

मीरा का दिल रुक गया।

"क्या?"

"बेटी, अंदर आ। दर्द में है। मैं मदद करूँगी।"

मीरा को कुछ सोचने का वक्त नहीं था। दर्द बढ़ रहा था।

औरत अंदर आई। दरवाज़ा बंद किया।

"मीरा — मैं तुलसीराम चाचा की बहन की पोती हूँ। पच्चीस साल पहले — कालकूट से एक बच्चा भेजा गया था। एक लड़का — आर्यन। मेरी माँ ने उसे पाला। हम बहन-भाई थे — आर्यन और मैं।"

"क्या?"

"हाँ। मगर एक बात आर्यन को भी नहीं पता थी। मेरा भी एक राज़ था। मैं भी कालकूट से आई हूँ। और मेरे अंदर — कात्यायिनी की आत्मा है। तुम्हारी पुरानी बहन।"

मीरा को एक राहत मिली।

"तू झूठ नहीं बोल रही?"

"नहीं, बेटी। और सुन — गंगा मासी ने मुझे आज भेजा। वो जानती थी आज तेरा बच्चा होगा। और वो जानती थी — महाकाल आज आएगा।"

कात्यायिनी ने मीरा को बिस्तर पर लिटाया। पानी गर्म किया। तौलिया तैयार किया।

दर्द बढ़ता गया।

और बाहर — बारिश और तेज़ हो गई।

बिजली कड़की।

और उस बिजली की रोशनी में —

खिड़की के बाहर — एक चेहरा था।

लंबा, काला, दो आँखें — सूर्य जैसी।

महाकाल।

मीरा ने चीख निकाली। "वो आ गया!"

कात्यायिनी ने खिड़की देखी।

"हाँ। और उसने हमें ढूँढ लिया।"

"अब क्या?"

"बेटी — सुन। तेरा बच्चा अब पैदा होगा। और महाकाल — बच्चे को चाहिए। मगर हमें उसे रोकना होगा।"

मीरा का दर्द बेपनाह था।

कात्यायिनी ने एक चांदी की कटोरी निकाली। उसमें एक लाल पत्थर था।

"ये क्या है?"

"महाकाल का पत्थर। नब्बे साल पहले — गंगा मासी की दादी ने महाकाल को एक बार रोका था। एक छोटे से पत्थर से। ये उसी का टुकड़ा है। मेरी माँ के पास था। मैं ले आई।"

कात्यायिनी ने पत्थर को मीरा के पेट पर रखा।

पत्थर चमका।

दर्द — कम हुआ।

बच्चा — आसानी से बाहर आया।

एक लड़की।

मीरा ने उसे देखा।

लड़की की आँखें खुलीं।

और मीरा का दिल भर आया।

लड़की की आँखों में — आर्यन की आँखें थीं।

मगर एक बात और थी।

लड़की के माथे पर — एक छोटा सा निशान था। एक त्रिकोण।

अनंतनाथ के तंत्र का निशान।

कात्यायिनी ने सिर हिलाया। "बेटी — ये बच्ची खास है। मगर खास होने का मतलब है — खतरा भी।"

तभी — दरवाज़े पर एक तेज़ खटखटाहट हुई।

मीरा कांप गई।

दरवाज़ा खुद-ब-खुद टूट गया।

और बाहर — महाकाल खड़ा था।

लंबा। बहुत लंबा। शायद आठ फुट। काले कपड़े। दाढ़ी सफेद। आँखें — दो सूरज।

मगर उसके चेहरे पर — कोई गुस्सा नहीं था।

बस एक शांति।

"मनोरमा," उसने कहा। उसकी आवाज़ — पहाड़ों जैसी थी।

मीरा ने अपनी बच्ची को सीने से लगा लिया।

"दूर रह।"

"डर मत, बच्ची। मैं तेरी बच्ची नहीं ले जाऊँगा।"

"क्या?"

महाकाल ने एक कदम बढ़ाया।

कात्यायिनी ने पत्थर ऊपर किया।

महाकाल मुस्कुराया।

"पत्थर रख दे, कात्यायिनी। मैं तुम्हें मारने नहीं आया।"

"फिर क्यों आया?"

महाकाल ने मीरा की बच्ची को देखा।

"बच्ची को देखने। नब्बे साल मैं इंतज़ार कर रहा था। और मैं इंतज़ार करता रहूँगा।"

"किस बात का?"

महाकाल ने मीरा को देखा।

"बच्ची, सुन। मैं तेरा दुश्मन नहीं हूँ। मैं तेरा 'engineer' हूँ।"

"क्या?"

"नब्बे साल पहले — एक 'plan' बना था। बहुत पुराना plan। कालकूट के सब लोगों को मारना ज़रूरी था — क्योंकि वो रास्ते में थे। अहिल्या को भी मारना ज़रूरी था — क्योंकि वो छोटी मछली थी। मनोरमा को बार-बार लौटाना ज़रूरी था — क्योंकि वो 'चाबी' थी। और अब — तेरा बच्चा — वो दरवाज़ा है।"

"दरवाज़ा?"

"बच्ची — तेरी बेटी एक खास आत्मा का शरीर है। एक बहुत पुरानी आत्मा का। एक देवता का — या एक राक्षस का। जब वो ग्यारह साल की होगी — उसके अंदर वो आत्मा जाग जाएगी। और जब वो जागेगी — दुनिया बदलेगी।"

मीरा ने अपनी बच्ची को कस कर पकड़ा।

"मैं इसे रोकूँगी। मैं अपनी बच्ची की रक्षा करूँगी।"

महाकाल ने सिर हिलाया।

"बच्ची — तू नहीं रोक सकती। मगर तू तैयार कर सकती है उसे। उसे प्यार दे। उसे ज़िंदगी दे। उसे सच बताना — एक दिन। और एक चीज़ और सिखाना — कैसे चुनना है। क्योंकि एक दिन — तेरी बेटी को चुनना होगा।"

"क्या चुनना होगा?"

"देवता बनना — या राक्षस। एक दरवाज़ा खोलना — या बंद रखना।"

महाकाल ने एक कदम पीछे लिया।

"मैं अब जाता हूँ। ग्यारह साल बाद — फिर मिलेंगे।"

"रुक!" मीरा ने कहा, "तू कौन है? सच।"

महाकाल ने मुस्कुराकर कहा —

"मैं वो हूँ जो हर कहानी के पीछे है। मैं वो हूँ जो तेरी पुरखों को जानता है। मैं वो हूँ जो तेरी बेटी को जानता है। मेरा एक नाम — महाकाल। मेरा दूसरा नाम — काल। मेरा तीसरा नाम — समय।"

"और मेरा चौथा नाम — कोई नहीं जानता।"

महाकाल बारिश में गायब हो गया।

मीरा अपनी बेटी के साथ बैठी रही।

कात्यायिनी ने पत्थर रखा।

"बेटी — तेरी बच्ची का नाम क्या रखेगी?"

मीरा ने अपनी बच्ची को देखा।

बच्ची की आँखें — खुली थीं। और उन आँखों में — कुछ था जो शब्दों से बाहर था।

"मेरी बेटी का नाम — आरना।"

"क्यों?"

"क्योंकि — आर्यन का अंश। और मनोरमा का खून। दोनों मिलकर — आरना।"

कात्यायिनी ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।

बाहर — बारिश रुक गई थी।

सुबह आ रही थी।

मीरा ने अपनी बच्ची को सीने से लगाया।

और एक वादा किया।

"आरना। मैं तुझे प्यार दूँगी। मैं तुझे ताकत दूँगी। मैं तुझे सच बताऊँगी। और जब तू ग्यारह साल की होगी — तू तैयार होगी। चाहे जो आए — हम साथ होंगे।"

बच्ची ने आँखें बंद कीं। सो गई।

मीरा ने आसमान देखा।

सूरज निकल रहा था।

मगर एक बात मीरा जानती थी।

अहिल्या की राख — अभी भी बक्से में थी।

अनंतनाथ — अभी भी तहखाने में था, धुएँ की तरह।

महाकाल — कहीं था। ग्यारह साल इंतज़ार कर रहा था।

और कहीं — किसी पुराने मठ में — एक और राज़ था जो अभी सामने नहीं आया था।

कालकूट की कहानी — खत्म नहीं हुई थी।

बस — एक हिस्सा खत्म हुआ था।

मीरा ने अपनी बेटी की तरफ देखा।

और धीरे से — उसके कान में एक मंत्र फुसफुसाया।

"ओम कालिकायै नमः। आरना — रक्षित हो। आरना — मुक्त हो। आरना — ज़िंदगी जीए। ओम स्वाहा।"

और सुबह की पहली किरण — आरना के माथे पर पड़ी।

बच्ची ने हल्के से एक मुस्कान दी।

पहली बार।

कहानी का पहला अध्याय — खत्म।

दूसरा अध्याय — ग्यारह साल बाद शुरू होगा।

Season 1 — समाप्त

मीरा ने अपनी बेटी को गोद में रखा।

दिल्ली की सुबह थी।

मगर कहीं — पहाड़ों में — एक मठ में — एक दरवाज़ा खुला।

और एक छाया — मुस्कुराई।

"ग्यारह साल," छाया ने फुसफुसाया, "मैं इंतज़ार कर सकती हूँ।"

Season 2 — जल्द ही आएगा।

कालकूट: काली घाटी का मठ।

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