PretikaPsychological Horrorतेरहवीं अमावस

भाग 23 : रामप्रसाद बाबा और गुड़िया की माँ

Piyashi Atma · Psychological Horror · 12 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
23 of 23
Category
Psychological Horror
Reading time
12 min
Words
2302
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

तेरहवीं अमावस
भाग 23 : रामप्रसाद बाबा और गुड़िया की माँ
4 नवंबर 2026। सुबह छह बजे।
आरोही, भास्करानंद बाबा, और रोहित दशाश्वमेध घाट पर पहुँचे।
सुबह की गंगा। ठंडी। शांत। धुँआ हल्का हल्का। सूरज अभी उगा नहीं था। पर पूर्व में एक हल्की लाल रोशनी।
बहुत से पंडे स्नान करा रहे थे। बहुत से तीर्थयात्री गंगा में डुबकी लगा रहे थे। ॐ नमः शिवाय की आवाज़ें। भजन। मंत्र।
आरोही ने गंगा के पानी में हाथ डाला। पानी बहुत ठंडा। पर एक अजीब सी शक्ति। जैसे नदी ख़ुद ज़िंदा हो।
बाबा ने कहा, "बेटी, गंगा से आशीर्वाद ले। तेरे काम में मदद करेगी।"
आरोही ने गंगा के पानी को माथे से लगाया।
एक अजीब सी शांति आई।
बाबा ने कहा, "बेटी, इधर आ।"
तीनों घाट के एक कोने की तरफ़ चले। जहाँ भीड़ नहीं थी। जहाँ कोई पंडा नहीं आता था। एक टूटी हुई सीढ़ी। और उसके नीचे एक छोटी सी झोपड़ी। जो लगभग दिखती नहीं थी। जैसे किसी ने छिपाई हो।
बाबा ने कहा, "यही है।"
आरोही ने ग़ौर से देखा। झोपड़ी बहुत पुरानी। शायद 100 साल पुरानी। दीवारें मिट्टी की। पर उन पर एक अजीब सा रंग। तांबे का रंग।
बाबा ने खटखटाया।
एक बूढ़ी आवाज़ आई।
"कौन?"
बाबा ने कहा, "रामप्रसाद, मैं भास्कर हूँ।"
अंदर से एक हलचल। फिर दरवाज़ा खुला।
एक बहुत बूढ़ा साधु। सफ़ेद बाल। सफ़ेद दाढ़ी। पर आँखें बहुत उजली।
रामप्रसाद बाबा ने भास्करानंद बाबा को गले लगाया।
"भास्कर, तू आया। कब से इंतज़ार में था।"
बाबा ने कहा, "रामप्रसाद, यह मेरी शिष्या आरोही। और यह रोहित।"
रामप्रसाद बाबा ने आरोही को देखा।
फिर उनकी आँखें बड़ी हुईं।
"बेटी, तू तेरहवीं है।"
आरोही ने चौंककर देखा।
"बाबा, आप कैसे जानते हैं?"
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "बेटी, तेरी आँखों में मालती है। मैं मालती से कभी नहीं मिला। पर मुझे उसकी शक्ति की गंध पहचाननी आती है।"
आरोही ने पैर छुए।
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "अंदर आओ।"
अंदर झोपड़ी छोटी थी। पर साफ़। एक कोने में एक पुरानी अलमारी। एक ओर पूजा का स्थान। और बीच में कुछ पुरानी किताबें।
रामप्रसाद बाबा ने चाय बनाई।
तीनों को दी।
फिर कहा, "बेटी, तू यहाँ किस लिए आई है?"
आरोही ने कहा, "बाबा, कालीचरण।"
रामप्रसाद बाबा की आँखों में एक तेज़ चमक आई।
"बेटी, तू ने आ के अच्छा किया। मैं बरसों से इसका इंतज़ार कर रहा हूँ।"
बाबा ने कहा, "रामप्रसाद, हमें कालीचरण की माँ की राख चाहिए।"
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "है मेरे पास। मैंने बचाकर रखी है।"
रामप्रसाद बाबा उठे। अलमारी के पास गए। खोली।
अंदर एक तांबे का कलश था। बहुत पुराना।
रामप्रसाद बाबा ने कलश निकाला। आरोही को दिया।
"बेटी, यह कलश। इसमें कालीचरण की माँ की राख। 148 साल पुरानी।"
आरोही ने कलश हाथ में लिया। तांबे का। पर बहुत भारी।
आरोही ने ग़ौर से देखा।
"बाबा, यह कैसे मिली?"
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "बेटी, यह बहुत लंबी कहानी है। पर मैं संक्षेप में बताता हूँ।"
रामप्रसाद बाबा ने बैठकर कहा —
"बेटी, मेरे परदादा एक साधु थे। बनारस में। 1878 में जब कालीचरण की माँ मरी, तो मेरे परदादा ने उसकी अंतिम क्रिया की। कालीचरण की माँ का नाम गंगा था। एक विधवा। बहुत ग़रीब। कालीचरण उसका इकलौता बेटा। कालीचरण ने बचपन में अपनी माँ को बहुत यातना दी। गंगा ने बहुत सहा। पर एक दिन कालीचरण ने अपनी माँ को भी मार डाला। अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए।"
आरोही की छाती में एक ठंडा दर्द।
"बाबा, कालीचरण ने अपनी माँ को मारा?"
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। कालीचरण देवीदास का सबसे बुरा शिष्य है। वह अपने ख़ून को भी नहीं छोड़ता।"
रोहित ने पूछा, "बाबा, गंगा ने ये सब क्यों सहा?"
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "बेटा, गंगा एक विधवा थी। समाज में कोई सुनवाई नहीं। और कालीचरण एक तांत्रिक। उसकी शक्ति से गाँव के लोग डरते थे। कोई मदद को नहीं आया।"
आरोही की आँखों में आँसू।
रामप्रसाद बाबा ने आगे कहा, "मेरे परदादा को यह पता था। उन्होंने गंगा की राख गंगा में नहीं डाली। बल्कि इस कलश में रखा। और कहा — 'एक दिन कोई आएगा। जो कालीचरण को मारेगा। उस दिन यह राख काम आएगी।' मेरी परदादी ने मेरे दादा को दी। मेरे दादा ने मेरे पिताजी को। मेरे पिताजी ने मुझे। और मैं 100 साल से इंतज़ार में हूँ।"
आरोही ने कहा, "बाबा, यह राख कालीचरण को कैसे मारेगी?"
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "बेटी, कालीचरण की एक अंगूठी है। जिस पर उसकी माँ का नाम खुदा है। 'गंगा।' यह अंगूठी उसकी शक्ति का स्रोत। पर उसकी कमज़ोरी भी। अगर तू उसकी माँ की राख उस अंगूठी पर डाले, तो अंगूठी टूटेगी।"
आरोही ने कहा, "बाबा, तो हमें कालीचरण की अंगूठी लेनी होगी।"
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "हाँ बेटी। पर वह अंगूठी उसकी उँगली में है। हमेशा। कभी उतारता नहीं। तुझे उसकी उँगली तक पहुँचना होगा। जब वह जीवित हो।"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
बहुत मुश्किल काम।
रामप्रसाद बाबा ने आगे कहा, "बेटी, एक और बात। तूने गुड़िया की आत्मा को देखा?"
आरोही ने चौंककर देखा।
"बाबा, आप कैसे जानते हैं?"
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "बेटी, गुड़िया मेरे पास आती है। हर रात। बरसों से। मुझसे कहती है — 'बाबा, कोई आएगा। जो कालीचरण को मारेगा।' कल रात उसने कहा — 'बाबा, वह आ गई। कल आप को मिलेगी।' तो मैंने तेरा इंतज़ार किया।"
आरोही की आँखों में आँसू।
"बाबा, गुड़िया की माँ?"
रामप्रसाद बाबा की आँखें बंद हुईं।
फिर कहा — "बेटी, गुड़िया की माँ का नाम सुशीला था। 1970 में कालीचरण ने मारा। तब गुड़िया दो साल की थी। सुशीला की माँ का नाम कमला था। 1957 में कालीचरण ने मारा। कमला की माँ का नाम राधा था। 1944 में कालीचरण ने मारा। यह श्राप पीढ़ियों से चल रहा है। एक ही परिवार में।"
आरोही की आँखों में आँसू।
"बाबा, तो गुड़िया इस परिवार की आख़िरी थी?"
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "बेटी, नहीं। गुड़िया की एक बहन थी। वह ज़िंदा है। अभी 20 साल की। कहीं बनारस में है। मुझे पता नहीं कहाँ। पर वह ज़िंदा है।"
आरोही ने चौंककर कहा, "बाबा, गुड़िया की बहन?"
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। उसका नाम — शायद — दुर्गा। मुझे पक्का नहीं। पर गुड़िया एक बार बताई थी।"
आरोही ने कहा, "बाबा, हमें उसे ढूँढ़ना होगा।"
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। शायद वह भी तेरहवीं शक्ति रखती हो। भास्कर ने कहा था — मालती की छह बहनें थीं। अगर उनमें से एक की वंशज गुड़िया थी, तो शायद..."
आरोही की आँखें फैलीं।
तो गुड़िया मालती की एक बहन की वंशज थी।
और उसकी बहन दुर्गा — शायद तेरहवीं शक्ति की मालिक।
आरोही और दुर्गा — दो तेरहवीं।
अगर मिलकर लड़ें, तो कालीचरण को मारना आसान।
बाबा ने कहा, "रामप्रसाद, दुर्गा कहाँ हो सकती है?"
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "भास्कर, मुझे नहीं पता। पर गुड़िया कहती थी — 'मेरी बहन ज़िंदा है। पर उसे भी कोई ढूँढ़ रहा है।'"
आरोही ने कहा, "बाबा, ढूँढ़ रहा है — मतलब कालीचरण?"
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "हाँ बेटी। कालीचरण को शायद पता है — गुड़िया की एक बहन बच गई। और वह उसे भी मारना चाहता है। ताकि यह श्राप पूरा हो।"
रोहित ने कहा, "दीदी, तो दुर्गा भी ख़तरे में है।"
आरोही ने कहा, "हाँ। हमें उसे जल्दी ढूँढ़ना होगा।"
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "बेटी, एक बात। गुड़िया की माँ सुशीला की एक तस्वीर मेरे पास है। शायद उसकी बेटी दुर्गा माँ जैसी दिखे।"
रामप्रसाद बाबा अलमारी के पास गए। एक पुराना काग़ज़ निकाला।
फ़ोटो नहीं। एक पुरानी पेंटिंग। हाथ से बनी।
एक जवान महिला। बहुत सुंदर। बड़ी आँखें। लंबे बाल।
आरोही ने ग़ौर से देखा।
फिर चौंककर कहा, "बाबा, यह... यह जो घाट पर मुनिया की सहेली रानी की तस्वीर थी..."
रामप्रसाद बाबा ने चौंककर देखा।
"बेटी, तू ने रानी को देखा?"
आरोही ने कहा, "नहीं। पर शीला जी ने रानी के बारे में बताया था।"
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "बेटी, रानी दुर्गा की बेटी हो सकती है। शायद।"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
तो रानी — जो कालीचरण के तहख़ाने में थी — दुर्गा की बेटी थी?
और दुर्गा — जो तेरहवीं शक्ति की मालिक थी — गुड़िया की बहन?
आरोही ने कहा, "बाबा, हमें रानी को बचाना होगा। और दुर्गा को ढूँढ़ना होगा।"
दोपहर। तीनों धर्मशाला लौटे। कलश आरोही के बैग में। बहुत सावधानी से।
रोहित ने अपना लैपटॉप निकाला। इंटरनेट खोला। धर्मशाला में वाई-फ़ाई कमज़ोर था। पर काम चलाऊ।
आरोही ने कहा, "रोहित, ढूँढ़ो — बनारस में एक दुर्गा नाम की महिला। शायद 20 साल की। जिसकी एक बेटी हो — रानी। नौ साल की।"
रोहित ने कहा, "दीदी, यह बहुत मुश्किल है। बनारस में लाखों दुर्गा हैं।"
आरोही ने कहा, "रोहित, थोड़ा और डाल। भिखारी परिवार से। घाट के पास।"
रोहित ने कुछ देर तक ढूँढ़ा। कई साइटें खोलीं। पुरानी न्यूज़ रिपोर्ट। ख़बरें।
आधे घंटे बाद रोहित ने कहा, "दीदी, एक बात मिली।"
आरोही ने पूछा, "क्या?"
रोहित ने कहा, "एक पुरानी न्यूज़ रिपोर्ट। 2016 की। बनारस के अस्सी घाट के पास एक झोपड़ी में आग लगी। एक जवान महिला — दुर्गा नामक — बच गई। पर उसकी दो साल की बेटी बच गई। पति मर गया। दुर्गा ने अपनी बेटी को कहीं छिपा दिया। और भाग गई।"
आरोही ने कहा, "रोहित, तो दुर्गा ज़िंदा है। और उसकी बेटी..."
रोहित ने कहा, "दीदी, बेटी का नाम — रानी।"
आरोही की आँखें फैलीं।
तो सचमुच।
रानी — दुर्गा की बेटी।
और दुर्गा — गुड़िया की बहन।
आरोही ने कहा, "रोहित, दुर्गा अभी कहाँ है?"
रोहित ने कहा, "दीदी, न्यूज़ में नहीं लिखा। पर एक ज़िक्र है — 'दुर्गा ने घाट छोड़ दिया। शायद किसी मंदिर में चली गई।'"
आरोही ने कहा, "बाबा, हमें बनारस के सभी मंदिरों में ढूँढ़ना होगा।"
बाबा ने कहा, "बेटी, आसान नहीं। बनारस में हज़ारों मंदिर हैं।"
रामप्रसाद बाबा ने कहा (जो अब बाबा के साथ धर्मशाला आ गए थे), "एक तरीक़ा है। गुड़िया को बुलाकर पूछते हैं।"
आरोही ने कहा, "अच्छा।"
रामप्रसाद बाबा ने मंत्र पढ़ा।
कमरे में एक अजीब सी ठंडक फैली। खिड़की खुद ब खुद खुली। और हवा में एक हल्की सी नीली रोशनी।
कुछ पल बाद गुड़िया की आत्मा दिखी। बच्ची। सफ़ेद कपड़ों में। जले हुए। हाथ में गुड़िया।
रामप्रसाद बाबा ने कहा, "गुड़िया, बेटी, आज आ गई।"
गुड़िया मुस्कुराई।
"बाबा, आज बहुत लोग हैं यहाँ।"
आरोही ने पूछा, "गुड़िया, तेरी बहन दुर्गा कहाँ है?"
गुड़िया ने कहा, "दीदी, मेरी बहन एक मंदिर में है। संकट मोचन के पास। एक छोटा सा हनुमान मंदिर। वहाँ वह पूजा करती है। उसने बरसों से अपनी बेटी को नहीं देखा। क्योंकि वह डरती है — कालीचरण उसे भी मारेगा।"
आरोही ने कहा, "गुड़िया, धन्यवाद।"
गुड़िया ने कहा, "दीदी, एक बात और।"
"क्या गुड़िया?"
गुड़िया ने कहा, "जब आप दुर्गा से मिलेंगी, तो उसे मेरा एक संदेश देना। कहना — 'तेरी बहन गुड़िया कहती है — मुझे माफ़ कर देना। मैंने तुझे बरसों तक अकेला छोड़ दिया।'"
आरोही की आँखों में आँसू।
"गुड़िया, मैं ज़रूर कहूँगी।"
गुड़िया की आत्मा हवा में विलुप्त हुई।
शाम। आरोही, बाबा, और रोहित संकट मोचन के पास वाले छोटे हनुमान मंदिर पहुँचे।
मंदिर छोटा था। पर बहुत सुंदर। एक जवान महिला वहाँ पूजा कर रही थी।
बीस साल की। पर आँखों में बहुत सी उम्र।
आरोही ने पहचाना।
गुड़िया जैसी आँखें।
आरोही ने कहा, "दुर्गा?"
महिला ने चौंककर देखा।
"आप कौन?"
आरोही ने कहा, "मैं आरोही हूँ। मुझे तेरी बहन गुड़िया ने भेजा।"
दुर्गा की आँखों में आँसू आए।
"मेरी बहन..."
आरोही ने कहा, "दुर्गा, मैं तेरी बेटी रानी को बचाने आई हूँ। और कालीचरण को मारने।"
दुर्गा ने आरोही के हाथ पकड़े।
"दीदी, आप देवी हैं। मैंने बरसों से इंतज़ार किया।"
फिर दुर्गा ज़मीन पर बैठ गई। रोने लगी।
आरोही ने दुर्गा को गले लगाया।
बाबा ने कहा, "दुर्गा, हमें तेरी मदद चाहिए।"
दुर्गा ने आँसू पोंछे।
"बाबा, मैं क्या कर सकती हूँ? मैं बस एक साधारण महिला हूँ।"
आरोही ने कहा, "दुर्गा, नहीं। तू तेरहवीं शक्ति की मालिक है। तेरी बहन गुड़िया भी थी। पर वह छोटी उम्र में मरी। तू ज़िंदा है। और तू ने अपनी बेटी को छिपाकर बचाया।"
दुर्गा ने चौंककर कहा, "मैं?"
आरोही ने कहा, "हाँ दुर्गा। तू और मैं। हम दोनों एक साथ लड़ेंगे कालीचरण से।"
दुर्गा ने कहा, "दीदी, पर मुझे कोई तांत्रिक शक्ति नहीं आती।"
आरोही ने कहा, "दुर्गा, आती है। तू ने अपनी बेटी को छह साल तक बचाया। कालीचरण ने बहुत बार कोशिश की। पर तूने बचाया। यह भी शक्ति है।"
दुर्गा ने कहा, "दीदी, पर पिछले हफ़्ते वह मेरी बेटी को ले गया। मैं रोक नहीं पाई।"
आरोही ने कहा, "दुर्गा, चिंता मत कर। हम उसे बचाएँगे।"
दुर्गा ने आरोही के पैर छुए।
"दीदी, मैं आप के साथ हूँ। अंत तक।"
आरोही ने कहा, "दुर्गा, एक बात। गुड़िया ने तेरे लिए एक संदेश भेजा।"
दुर्गा ने चौंककर देखा।
"मेरी बहन ने?"
आरोही ने कहा, "हाँ। गुड़िया कहती है — 'मुझे माफ़ कर देना। मैंने तुझे बरसों तक अकेला छोड़ दिया।'"
दुर्गा फिर रोने लगी।
"मेरी बहन... वह तो मुझसे बड़ी थी। मैं तब चार साल की थी जब कालीचरण ने उसे लिया। मैंने तब से कभी उसका चेहरा नहीं देखा। पर मैं उसे भूली नहीं।"
आरोही ने कहा, "दुर्गा, गुड़िया तेरे साथ है। हमेशा।"
दुर्गा ने आरोही का हाथ पकड़ा।
बाबा ने कहा, "दुर्गा, कल हम मणिकर्णिका जाएँगे। कालीचरण की हवेली की तरफ़। तू भी हमारे साथ आएगी?"
दुर्गा ने सिर हिलाया।
"बाबा, हाँ।"
आरोही ने कहा, "दुर्गा, तू आज रात हमारे साथ धर्मशाला में रह। यहाँ अकेला रहना सुरक्षित नहीं। कालीचरण अब तुझे और तेज़ी से ढूँढ़ेगा।"
दुर्गा ने कहा, "दीदी, चलिए।"
रात। धर्मशाला में।
चारों बैठे थे। आरोही। बाबा। रोहित। और दुर्गा।
रामप्रसाद बाबा भी आए थे।
पाँच लोग। एक टीम।
आरोही ने अपनी नोटबुक निकाली। लिखा —
"बनारस — दूसरा दिन।
खोज — रामप्रसाद बाबा, कालीचरण की माँ की राख, दुर्गा।
नई टीम सदस्य — दुर्गा (गुड़िया की बहन, रानी की माँ, तेरहवीं शक्ति)।
अगला क़दम — कल मणिकर्णिका। कालीचरण की हवेली।
हथियार — गंगा की राख, तेरहवीं शक्ति, बाबा का ज्ञान।"
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
बाहर बनारस की रात।
गंगा। लाशें। मंदिर। और दो सौ साल पुरानी हवेली में एक राक्षस।
कल का दिन बड़ा होगा।
(भाग 23 समाप्त। भाग 24 में जारी...)

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