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भाग 22 : बनारस की पहली रात
Piyashi Atma · Psychological Horror · 14 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- तेरहवीं अमावस
- Chapter
- 22 of 23
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 14 min
- Words
- 2639
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
तेरहवीं अमावस
भाग 22 : बनारस की पहली रात
3 नवंबर 2026। बनारस।
आरोही, भास्करानंद बाबा, और रोहित बनारस पहुँचे। सुबह की ट्रेन से। दिल्ली से बनारस — 12 घंटे का सफ़र।
रात भर आरोही सो नहीं पाई। बाबा भी बैठे रहे। रोहित को सुला दिया। पर बाबा और आरोही जागते रहे।
बाबा ने कहा, "बेटी, तूने रत्नपुर में क्या-क्या देखा?"
आरोही ने पूरी कहानी बताई। पंडित से लेकर देवीदास तक। मीरा से लेकर मालती तक। बारह बहनें। अंगूठी टूटना। आर्यन। कुसुम।
बाबा ने आख़िर तक चुप रहकर सुना।
फिर बोले, "बेटी, तूने बहुत बड़ा काम किया। पर एक बात — मालती ने तुझे बताया कि तू उसकी वंशज है। यह बात मुझे भी लगती है — तेरहवीं शक्ति सिर्फ़ मालती के ख़ून से आती है। पर एक और बात है।"
"क्या बाबा?"
बाबा ने कहा, "बेटी, मालती अकेली नहीं थी। उसकी छह बहनें भी थीं। सब भी देवीदास ने बरसों तक शिकार किए। शायद उनकी वंशज भी अभी ज़िंदा हैं। और शायद वे भी तेरहवीं की शक्ति रखती हैं।"
आरोही ने चौंककर कहा, "बाबा, यह तो नई बात है।"
बाबा ने कहा, "बेटी, मुझे यह पता चला बहुत साल पहले। पर मैंने किसी को नहीं बताया। क्योंकि जब तक एक तेरहवीं नहीं आती, बाक़ी की तेरहवीं शक्तियाँ सोई रहती हैं। पर अब जब तू आ गई, तो शायद वे भी जागें।"
आरोही ने कहा, "बाबा, कहाँ हैं वे?"
बाबा ने कहा, "बेटी, अलग-अलग जगहों में। एक बनारस में। एक कोलकाता में। एक तमिलनाडु में।"
आरोही ने कहा, "बाबा, तो हर शिष्य के पास एक तेरहवीं है?"
बाबा ने कहा, "बेटी, हो सकता है। पर मुझे पक्का नहीं। हमें ढूँढ़ना होगा।"
रेलवे स्टेशन के बाहर एक ऑटो लिया। बनारस के अंदर घुसे।
गलियाँ संकरी। पुरानी। हर कोने में मंदिर। हर कोने में लोग। भीड़। शोर।
पर एक अजीब सी बात आरोही ने महसूस की।
हवा में एक अजीब भारीपन। जो देहरादून या दिल्ली में नहीं था। रत्नपुर से भी अलग। यहाँ मौत की गंध। लाशों के जलने की। धूप की। और कुछ और।
बाबा ने आरोही की तरफ़ देखा।
"बेटी, महसूस कर रही है?"
आरोही ने कहा, "हाँ बाबा। यह जगह अजीब है।"
बाबा ने कहा, "बेटी, बनारस मौत की नगरी है। यहाँ रोज़ लाशें जलती हैं। रोज़ आत्माएँ आती और जाती हैं। सामान्य लोग इसे महसूस नहीं करते। पर तेरी तेरहवीं शक्ति यहाँ बहुत मज़बूत होगी।"
रोहित ने कहा, "दीदी, मुझे भी थोड़ा अजीब लग रहा है।"
आरोही ने रोहित का हाथ पकड़ा।
"रोहित, तू सावधान रहना। यहाँ बहुत सी बुरी आत्माएँ हैं।"
बाबा ने कहा, "पहले हम अपने ठिकाने पर जाएँगे। फिर शाम को घाट पर।"
बाबा ने पहले से एक धर्मशाला में कमरा किया हुआ था। दशाश्वमेध घाट के पास। पुरानी बिल्डिंग। पर साफ़।
धर्मशाला के मालिक एक बूढ़े पंडित थे। उन्होंने बाबा को देखते ही पहचान लिया।
"भास्कर! तू कब आया?"
बाबा ने कहा, "आज सुबह। यह मेरी शिष्या आरोही। और यह उसका छोटा भाई रोहित।"
पंडित जी ने आरोही और रोहित को आशीर्वाद दिया।
"बेटी, यहाँ रहना। तेरा ख़याल रखा जाएगा।"
आरोही ने कहा, "धन्यवाद जी।"
पंडित जी ने बाबा से कहा, "भास्कर, इस बार का काम क्या है?"
बाबा ने कहा, "पंडित जी, कालीचरण।"
पंडित जी की आँखों में एक अजीब सा डर आया।
"भास्कर, कालीचरण अभी भी ज़िंदा है?"
बाबा ने कहा, "हाँ। पर आज नहीं। बहुत जल्दी नहीं।"
पंडित जी ने कहा, "भास्कर, सावधान रहना। कालीचरण कोई साधारण नहीं। मैंने बरसों पहले सुना था — वह बच्चों को ज़िंदा जलाता है। गंगा किनारे।"
आरोही की छाती में एक ठंडा दर्द।
बाबा ने कहा, "पंडित जी, इसीलिए हम आए हैं।"
दोपहर को सब ने आराम किया। थके हुए थे।
शाम के चार बजे आरोही उठी।
रोहित अभी भी सो रहा था। थकान।
बाबा भी बैठे थे। ध्यान में।
आरोही ने कहा, "बाबा, मैं थोड़ा घूमने जाऊँ?"
बाबा ने आँखें खोलीं।
"बेटी, अकेले नहीं। पर एक काम कर। आज रोहित के साथ मणिकर्णिका मत जाना। पहले कुछ हल्के घाटों पर। अस्सी घाट। दशाश्वमेध घाट। बच्चों को देखना। बात करना।"
आरोही ने कहा, "बाबा, समझ आया।"
बाबा ने कहा, "और कुछ मिठाई ले जाना। बच्चे मीठे से जल्दी बात करते हैं।"
आरोही ने रोहित को जगाया।
रोहित उठ बैठा।
"दीदी, कहाँ?"
आरोही ने कहा, "अस्सी घाट। चलो।"
चार बजे के बाद। बनारस की सबसे सुंदर घंटी। सूरज ढल रहा था। घाटों पर आरती की तैयारी। दिये जलाए जा रहे थे। पंडे मंत्र पढ़ रहे थे।
अस्सी घाट पर आरोही और रोहित पहुँचे।
पहले एक मिठाई की दुकान से लड्डू ख़रीदे। एक बड़ा पैकेट। दुकानदार ने कहा, "बेटी, ये बच्चों के लिए हैं ना? आज मैं तुझे कुछ छूट दूँगा।"
आरोही ने कहा, "जी।"
दुकानदार ने कहा, "यहाँ बहुत बच्चे हैं। सब भूखे। रोज़ कोई न कोई उनके लिए मिठाई ख़रीदता है।"
आरोही ने कहा, "अच्छा। धन्यवाद।"
फिर घाट पर उतरे।
घाट पर बहुत से लोग। तीर्थयात्री। पंडे। साधु। और भिखारी।
गंगा नदी बह रही थी। शांत। पर बहुत गहरी। किनारे पर लाशें जलती दिख रहीं थीं। दूर मणिकर्णिका घाट की तरफ़।
भिखारियों में बहुत से बच्चे थे। छोटे-छोटे। कोई पाँच का। कोई सात का। कोई दस का। सब मैले। सब भूखे।
आरोही की छाती में एक दर्द उठा।
इनमें से कोई भी अगला हो सकता था।
एक बच्ची आरोही के पास दौड़कर आई। शायद आठ साल की। मैले कपड़े। पर बड़ी सुंदर आँखें।
"दीदी, दो रुपये दे दो।"
आरोही ने बैठकर बच्ची को देखा।
"बेटी, तेरा नाम क्या है?"
बच्ची ने कहा, "मुनिया।"
आरोही ने एक लड्डू निकाला। बच्ची को दिया।
बच्ची की आँखें खिल उठीं।
"दीदी, धन्यवाद!"
मुनिया ने लड्डू खाया। जल्दी-जल्दी। जैसे कई दिनों से भूखी थी।
आरोही ने कहा, "मुनिया, तू यहाँ अकेली?"
बच्ची ने कहा, "नहीं दीदी। मेरी माँ भी है। बीमार। घर पर।"
"घर कहाँ?"
बच्ची ने घाट के पीछे की तरफ़ इशारा किया।
"वहाँ। एक झोपड़ी में। मेरा बाप पिछले साल मर गया। बुख़ार से।"
आरोही की आँखों में आँसू।
"मुनिया, तू पढ़ती है?"
बच्ची ने कहा, "नहीं दीदी। स्कूल जाने का पैसा नहीं।"
आरोही ने अपने पर्स से एक 100 रुपये का नोट निकाला। मुनिया को दिया।
"बेटी, यह ले जा। माँ के लिए दवा।"
मुनिया ने नोट कसकर पकड़ा।
"दीदी, आप बहुत अच्छी हो।"
आरोही ने कहा, "मुनिया, एक बात पूछूँ?"
"हाँ दीदी।"
"क्या यहाँ घाट पर कोई अजीब आदमी आता है? जो बच्चों को मीठा देकर ले जाता है?"
मुनिया की आँखें बड़ी हुईं।
"दीदी, आप को कैसे पता?"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
"मुनिया, बता।"
मुनिया ने आस-पास देखा। कोई नहीं सुन रहा था।
फिर धीरे से बोली, "दीदी, एक चाचा आता है। शाम को। मुँह पर काली दाढ़ी। सुंदर कपड़े। हाथ में मीठे का डिब्बा। वह बच्चों को बुलाता है। कहता — 'मेरे साथ चलो। बहुत मिठाई दूँगा। अच्छा खाना। नए कपड़े।' कुछ बच्चे उसके साथ गए। पर वे कभी वापस नहीं आए।"
आरोही की छाती में एक ठंडा दर्द।
"मुनिया, कितने बच्चे गए?"
बच्ची ने कहा, "पिछले साल में तीन। और मेरी सहेली — रानी — पिछले हफ़्ते।"
आरोही की आँखों में आँसू।
"मुनिया, तू उस चाचा से बचना।"
बच्ची ने कहा, "दीदी, मैं बच रही हूँ। मेरी माँ ने बताया था।"
रोहित ने पूछा, "मुनिया, वह चाचा कब आता है?"
बच्ची ने कहा, "अमावस के दिनों में ज़्यादा। पर कभी-कभी हर हफ़्ते।"
रोहित ने पूछा, "मुनिया, वह चाचा कब आता है?"
बच्ची ने कहा, "अमावस के दिनों में ज़्यादा। पर कभी-कभी हर हफ़्ते।"
रोहित ने पूछा, "मुनिया, वह चाचा कैसा दिखता है? पूरा बताओ।"
मुनिया ने सोचा।
"दीदी, वह लंबा है। मेरे बाप जितना। पर मेरे बाप से जवान। शायद तीस के आस-पास। काली दाढ़ी। लंबे बाल। हाथ में हमेशा एक अंगूठी। लाल पत्थर की। और गले में एक काली मणि की माला।"
आरोही ने रोहित की तरफ़ देखा।
रोहित ने कहा, "दीदी, यह ठीक देवीदास जैसा है। लाल पत्थर की अंगूठी।"
आरोही ने कहा, "हाँ। शिष्य गुरु की तरह ही होते हैं।"
रोहित ने कहा, "दीदी, आज तो बहुत जल्दी अमावस नहीं।"
आरोही ने कहा, "पर हो सकता है वह कभी भी आए। मुनिया, तेरी माँ का नाम क्या है?"
बच्ची ने कहा, "शीला।"
आरोही ने कहा, "मुनिया, मैं तेरे घर आऊँगी। अभी। तेरी माँ से मिलना है।"
बच्ची ने कहा, "चलो दीदी।"
मुनिया आरोही और रोहित को अपने घर ले गई।
घाट के पीछे। एक छोटी सी झोपड़ी। टूटी हुई। छत टिन की।
अंदर एक अधेड़ महिला थी। बहुत कमज़ोर। बिस्तर पर।
मुनिया ने कहा, "माँ, यह दीदी है।"
शीला ने आरोही को देखा।
आरोही ने कहा, "जी नमस्ते। मैं दिल्ली से आई हूँ। रिसर्च के लिए।"
शीला ने कहा, "बेटी, बैठ।"
आरोही और रोहित बैठे। कुर्सी नहीं थी। ज़मीन पर।
आरोही ने कहा, "आप की बीमारी क्या है?"
शीला ने कहा, "बेटी, टी.बी. है। दो साल से। पैसे नहीं दवा के लिए।"
आरोही ने अपने पर्स से 500 रुपये निकाले। शीला को दिए।
"आप कल डॉक्टर के पास जाइए। दवा लीजिए।"
शीला ने आँसू पोंछे।
"बेटी, आप देवी हैं।"
आरोही ने कहा, "जी, मुझे मुनिया के बारे में बात करनी है।"
शीला ने कहा, "क्या?"
आरोही ने कहा, "आप जानती हैं — घाट पर एक आदमी आता है। बच्चों को उठा ले जाता है।"
शीला के चेहरे पर डर आया।
"हाँ बेटी। मैंने सुना है। मैंने मुनिया को हमेशा सावधान किया है। पर मैं बहुत डरती हूँ। मैं बीमार हूँ। अगर मैं मर गई, तो मुनिया अकेली रह जाएगी। और वह आदमी उसे उठा ले जाएगा।"
आरोही ने कहा, "शीला जी, आप चिंता मत कीजिए। मैं यहाँ हूँ। मैं उस आदमी को रोकूँगी।"
शीला ने आरोही का हाथ पकड़ा।
"बेटी, आप कैसे रोकेंगी? पुलिस भी नहीं रोक पाई।"
आरोही ने कहा, "मैं पुलिस से अलग हूँ।"
शीला ने आरोही की आँखों में देखा।
फिर धीरे से बोली, "बेटी, आप की आँखें अलग हैं। जैसे किसी दूसरी दुनिया की। क्या आप कोई साधु हैं?"
आरोही ने कहा, "जी नहीं। पर मुझे कुछ शक्ति मिली है। जो मुझे इस काम के लिए दी गई है।"
शीला ने आरोही के पैर छुए।
"बेटी, आप मेरी मुनिया को बचा लीजिए। मैं कुछ नहीं दे सकती। पर आप का एहसान।"
आरोही ने शीला को उठाया।
"शीला जी, यह मेरा फ़र्ज़ है।"
रोहित ने एक बात कही जो आरोही ने ग़ौर से सुनी।
"शीला जी, आप एक बात बताइए। क्या पिछले सालों में उस चाचा ने कोई बच्ची ली है जिसका जन्म कार्तिक अमावस को हुआ हो?"
शीला ने चौंककर देखा।
"बेटा, तू यह क्यों पूछ रहा है?"
रोहित ने कहा, "बस।"
शीला ने कहा, "मुझे याद नहीं। पर एक बच्ची थी — पिछले साल। रानी। मुनिया की सहेली। रानी का जन्म कार्तिक अमावस को हुआ था। मुझे उसकी माँ ने बताया था।"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
"शीला जी, रानी अभी कहाँ है?"
शीला ने आँखें बंद कीं।
"बेटी, रानी पिछले हफ़्ते गायब हुई। शायद कालीचरण ले गया।"
आरोही की आँखों में आँसू।
तो कालीचरण ने अपनी अगली बलि पहले से ले ली?
पर अगली अमावस तो 2027 में थी।
एक साल बाद।
क्यों जल्दी?
आरोही ने कहा, "शीला जी, धन्यवाद। हमें अब जाना होगा।"
घर लौटते वक़्त रोहित ने कहा, "दीदी, अब हम क्या करेंगे?"
आरोही ने कहा, "रोहित, अब हमें कालीचरण को ढूँढ़ना होगा। और मुनिया जैसे बच्चों को बचाना होगा।"
रोहित ने कहा, "दीदी, कालीचरण अगर कभी भी आ सकता है, तो हमें पहले उसे ढूँढ़ना होगा। जल्दी।"
आरोही ने सिर हिलाया।
रात के आठ बजे। बाबा के साथ बैठकर आरोही ने सब बताया।
बाबा ने चौंककर सुना।
"बेटी, तूने पहले ही दिन उसकी गंध पा ली। बहुत अच्छा।"
आरोही ने कहा, "बाबा, हमें कल मणिकर्णिका जाना चाहिए।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। पर पहले सुबह दशाश्वमेध घाट के उस साधु के पास। जिसने मुझसे बात की थी। कालीचरण की माँ की राख शायद उसके पास हो।"
रोहित ने कहा, "बाबा, वह साधु कौन है?"
बाबा ने कहा, "बेटा, उसका नाम रामप्रसाद है। बहुत बूढ़ा है। शायद 100 साल का। दशाश्वमेध घाट पर एक कोने में रहता है। कोई ध्यान नहीं देता। पर वह बहुत बड़ा तांत्रिक है।"
आरोही ने कहा, "अच्छा।"
बाबा ने कहा, "बेटी, एक और बात। कल मणिकर्णिका जाते वक़्त — मुझे लगता है — तेरे साथ कुछ आत्माएँ आएँगी।"
"क्या आत्माएँ?"
बाबा ने कहा, "बेटी, जो बच्चे कालीचरण ने पहले मारे। उनकी आत्माएँ शायद तुझसे मिलें। अगर वे मिलें, तो सुनना। ग़ौर से।"
आरोही ने सिर हिलाया।
रात के दस बजे। आरोही अपने कमरे में गई।
खिड़की खोली।
बाहर बनारस की रात। घाटों पर आरती की आवाज़ें। मंत्रों की। घंटियाँ बज रही थीं। दूर से गंगा की लहरों की।
पर एक अजीब सी बात।
खिड़की के बाहर एक छोटी सी छाया थी।
एक बच्ची की।
आरोही ने चौंककर देखा।
"कौन?"
छाया धीरे-धीरे सामने आई।
एक छोटी बच्ची। सात साल की। सफ़ेद कपड़ों में। पर कपड़े जले हुए। आधे राख। बालों में भी जले के निशान। एक हाथ में एक टूटी हुई गुड़िया।
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
बच्ची ने कहा, "दीदी, मेरा नाम गुड़िया है। 2014 में कालीचरण ने मुझे मारा। मैं आपकी मदद करने आई हूँ।"
आरोही की आँखों में आँसू आ गए।
गुड़िया।
बाबा ने बताया था।
12 साल पहले मरी।
आरोही ने कहा, "गुड़िया, अंदर आ।"
गुड़िया की आत्मा अंदर आई।
खिड़की के पास बैठी।
"दीदी, मैं आपको बताऊँगी — कालीचरण कहाँ है।"
आरोही ने कहा, "गुड़िया, बता।"
गुड़िया ने कहा, "दीदी, कालीचरण मणिकर्णिका घाट के पास एक पुरानी हवेली में रहता है। दो सौ साल पुरानी। जिसे लोग भूतिया कहते हैं। कोई अंदर नहीं जाता। पर वहीं वह रहता है। और वहीं उसका तहख़ाना।"
आरोही ने कहा, "गुड़िया, तहख़ाने में क्या है?"
गुड़िया ने अपनी छोटी सी आँखें बंद कीं।
"दीदी, वहाँ बहुत बच्चे हैं। मरे हुए। मेरी तरह। और एक बच्ची — रानी — जो पिछले हफ़्ते लाई गई। अभी ज़िंदा है। पर बहुत कमज़ोर।"
आरोही की छाती में एक ठंडा दर्द।
"गुड़िया, रानी अभी ज़िंदा है?"
गुड़िया ने सिर हिलाया।
"दीदी, हाँ। पर कालीचरण उसे अगली अमावस तक बचाकर रखा है। नौ साल की। कार्तिक अमावस को पैदा हुई।"
आरोही ने कहा, "गुड़िया, हम उसे बचाएँगे।"
गुड़िया ने कहा, "दीदी, जल्दी। कालीचरण अगले पंद्रह दिनों में एक और छोटी बलि करेगा। किसी छोटे बच्चे की। अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए।"
आरोही ने कहा, "गुड़िया, मुनिया..."
गुड़िया ने कहा, "दीदी, हाँ। मुनिया अगली शिकार हो सकती है। कालीचरण उसे देख चुका है।"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
"गुड़िया, हमें अभी कुछ करना होगा।"
गुड़िया ने कहा, "दीदी, कल सुबह उस साधु के पास जाइए। रामप्रसाद बाबा। वे आपकी मदद करेंगे। मेरी माँ की राख वहीं है। और मेरी शक्ति भी।"
आरोही ने कहा, "तेरी माँ की राख?"
गुड़िया ने कहा, "दीदी, मेरी माँ भी 1970 में कालीचरण की बलि थी। तब से मेरी माँ भी बंधी है। रामप्रसाद बाबा ने मेरी माँ की राख को बचाकर रखा। कालीचरण से।"
आरोही की आँखों में आँसू।
"गुड़िया, तेरी माँ भी..."
गुड़िया ने कहा, "दीदी, हमारे पूरे परिवार पर श्राप है। मेरी माँ। मेरी नानी। मेरी परनानी। सब कालीचरण की बलि। एक-एक करके।"
आरोही ने कहा, "गुड़िया, यह श्राप आज ही ख़त्म होगा।"
गुड़िया मुस्कुराई। छोटी सी। पर सच्ची।
"दीदी, धन्यवाद।"
फिर गुड़िया की आत्मा हवा में विलुप्त हुई।
आरोही खिड़की के पास खड़ी रही।
बहुत देर तक।
बनारस की रात में गंगा की लहरों की आवाज़ आ रही थी।
आरोही ने आँखें बंद कीं।
गुड़िया। रानी। मुनिया। और न जाने कितनी बच्चियाँ।
कालीचरण। एक 175 साल का राक्षस।
आरोही ने अपना ताबीज़ छाती पर लगाया।
फिर बाबा का दिया हुआ तांबे का हार।
फिर भगवती दादी का रक्षा कवच।
तीन सुरक्षा।
पर कालीचरण के लिए तीनों काफ़ी होंगी?
आरोही ने अपनी नोटबुक निकाली। लिखा —
"बनारस — पहला दिन।
खोज — मुनिया, शीला, रानी (कालीचरण के पास), गुड़िया की आत्मा।
अगला क़दम — कल सुबह रामप्रसाद बाबा। दशाश्वमेध घाट।
चेतावनी — कालीचरण मुनिया को टारगेट कर रहा है। जल्दी करना होगा।"
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
फिर बिस्तर पर लेटी।
पर नींद नहीं आ रही थी।
बाहर की गंगा।
गुड़िया की छोटी सी आत्मा।
मुनिया की भूखी आँखें।
रानी जो अभी कहीं ज़िंदा थी। कालीचरण के तहख़ाने में।
पंद्रह दिन।
पंद्रह दिन में कालीचरण को रोकना है।
आरोही ने आँखें बंद कीं।
कल सुबह रामप्रसाद बाबा।
फिर मणिकर्णिका।
फिर कालीचरण की हवेली।
फिर लड़ाई।
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