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भाग 21 : भास्करानंद बाबा से मुलाक़ात
Piyashi Atma · Psychological Horror · 13 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- तेरहवीं अमावस
- Chapter
- 21 of 23
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 13 min
- Words
- 2401
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
27 अक्टूबर 2026। दिल्ली।
आरोही और माँ दिल्ली पहुँचे। सुबह की ट्रेन से। रत्नपुर से देहरादून। फिर दिल्ली।
रास्ते में आरोही ने कई बार खिड़की से बाहर देखा। पहाड़ पीछे छूट रहे थे। रत्नपुर पीछे। पर उसकी यादें साथ।
बाबा। नानी। मीरा। रुक्मिणी। मालती। सब उसके साथ थीं।
पिताजी घर पर थे। उन्होंने आरोही और माँ को गले लगाया। पर उनके चेहरे पर एक चिंता।
पिताजी 62 साल के थे। तीन साल पहले हार्ट अटैक हुआ था। तब से दवाइयाँ। और तनाव से बचने की सलाह।
पिताजी ने कहा, "सुधा, तुम इतने दिन कहाँ थीं? मैंने बहुत कोशिश की तुम्हें फ़ोन पर पकड़ने की। कभी लगा भी नहीं।"
माँ ने कहा, "जी, वहाँ नेटवर्क नहीं था। रत्नपुर पहाड़ में। कमज़ोर सिग्नल।"
पिताजी ने आरोही की तरफ़ देखा। "बेटी, तू भी ठीक है? पीएचडी का काम पूरा हुआ?"
आरोही ने कहा, "हाँ पिताजी। ठीक हूँ। और काम... एक नई दिशा मिली है। मैं विषय बदल रही हूँ।"
पिताजी ने चौंककर देखा। "क्यों बेटी?"
आरोही ने कहा, "पिताजी, रत्नपुर के इतिहास पर लिखूँगी। बहुत रोचक कहानी है वहाँ की। महिलाओं का इतिहास। पुराने रीति-रिवाज।"
पिताजी ने कहा, "अच्छा। तेरा फ़ैसला।"
पर पिताजी ने कुछ पल आरोही को देखा।
फिर बोले, "बेटी, तू अलग लग रही है। पहले से गहरी। जैसे कुछ बदला हो। तेरी आँखें..."
आरोही ने कहा, "पिताजी, कुछ नहीं। बस थकी हुई हूँ।"
पिताजी ने कहा, "अच्छा। आराम कर।"
पर आरोही जानती थी — पिताजी सब समझ रहे थे। कुछ न कुछ। पर वे पूछ नहीं रहे थे।
क्योंकि वे दिल के मरीज़ थे। और यह सब सुनकर उनकी हालत ख़राब हो सकती थी।
आरोही ने माँ को इशारा किया। माँ ने भी समझा।
पिताजी को अभी कुछ नहीं बताना है।
शाम के पाँच बजे। आरोही दिल्ली विश्वविद्यालय के पीछे गई।
एक पुराना क़ब्रिस्तान था। जहाँ ब्रिटिश जमाने में मरे लोग दफ़नाए गए थे। पर अब क़ब्रिस्तान बंद था। कोई नहीं आता। जंगली घास। टूटी क़ब्रें। जगह-जगह पीपल के पेड़।
आरोही ने चारों तरफ़ देखा। शाम की ठंडी हवा। दूर से कहीं आज़ान की आवाज़। पर क़ब्रिस्तान में एक अजीब सी शांति।
आरोही ने अपने ताबीज़ को छाती पर लगाया। और भगवती दादी का दिया हुआ रक्षा कवच भी। दोनों गरम नहीं थे। यानी कोई ख़तरा नहीं।
एक बुज़ुर्ग आदमी एक पेड़ के नीचे बैठा था।
सफ़ेद बाल। सफ़ेद दाढ़ी। तस्वीर वाला आदमी। पर तस्वीर से भी बूढ़ा। जैसे कोई सौ साल पहले खींची तस्वीर हो।
भास्करानंद बाबा।
आरोही उनके पास गई। धीरे-धीरे। सावधानी से।
"बाबा।"
बाबा ने आँखें खोलीं। आँखें बहुत उजली। बूढ़े शरीर से मेल नहीं खातीं।
"बेटी, तू आ गई। मैं जानता था।"
आरोही ने उनके पैर छुए।
बाबा ने आरोही के सिर पर हाथ रखा।
एक अजीब सी शक्ति। जैसे कोई गरम पानी उसकी रीढ़ में उतरा।
आरोही ने कहा, "बाबा, आप कौन हैं? आपका मेरे साथ क्या रिश्ता?"
बाबा ने कहा, "बेटी, बैठ। मैं तुझे सब बताऊँगा।"
आरोही उनके पास बैठ गई। पेड़ के नीचे।
बाबा ने कहा, "बेटी, मेरा नाम भास्करानंद है। मैं 145 साल का हूँ।"
आरोही ने चौंककर देखा।
"क्या?"
बाबा ने मुस्कुराया।
"बेटी, हैरान मत हो। मेरे गुरु रामनाथ बाबा थे। जो 1913 में मरे। मरने से पहले उन्होंने मुझे और देवराज दोनों को एक-एक शक्ति दी। देवराज को रत्नपुर की रक्षा की। मुझे — देवीदास के शिष्यों की खोज। मैं 113 साल से भारत के हर कोने में घूम रहा हूँ। शिष्यों को ढूँढ़ता।"
आरोही ने पूछा, "बाबा, आपने कितनों को मारा?"
बाबा ने कहा, "दो। वीरभद्र को 1962 में। नेपाल में। भैरवदास को 1988 में। गुजरात में। बाक़ी पाँच — देवीदास, दुर्जन, कालीचरण, रुद्रनाथ, प्रचंडी, महाकाल — मैं नहीं मार सका।"
"क्यों?"
बाबा ने कहा, "बेटी, क्योंकि उन शिष्यों की शक्ति बहुत ज़्यादा थी। मैं अकेला नहीं मार सकता था। मुझे किसी की मदद चाहिए थी।"
"किसकी?"
बाबा ने आरोही की तरफ़ देखा।
"तेरहवीं की।"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
"बाबा, तो आप जानते थे कि मैं आऊँगी?"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। रामनाथ गुरुजी ने मरने से पहले कहा था — 'एक दिन एक तेरहवीं आएगी। जो मालती के ख़ून से होगी। और वह देवीदास और उसके शिष्यों को मार सकेगी।' मैं तेरा 113 साल से इंतज़ार कर रहा हूँ।"
आरोही की आँखों में आँसू।
"बाबा, पर आपने मुझसे संपर्क क्यों नहीं किया?"
बाबा ने कहा, "बेटी, मैं देवराज के फ़ैसले का सम्मान करता था। देवराज ने कहा था — 'भास्कर, तेरहवीं जब आएगी, तब वह मेरे पास आएगी। तुम मत बीच में आ। पर अगर वह जीत जाए, तो उसके साथ रहना। बाक़ी के शिष्यों के लिए।'"
आरोही ने कहा, "बाबा, तो अब आप मेरे साथ हैं?"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। अब आगे की लड़ाई हम मिलकर लड़ेंगे। पर तुझे मेरे बारे में कुछ और बातें जाननी होंगी। जो शायद तुझे पसंद न आएँ।"
आरोही ने पूछा, "क्या बातें बाबा?"
बाबा ने आँखें बंद कीं।
"बेटी, 145 साल जीना आसान नहीं। मैंने बहुत कुछ देखा। बहुत कुछ किया। कुछ अच्छा। कुछ बुरा।"
"क्या बुरा?"
बाबा ने कहा, "बेटी, 1930 में मैंने एक बड़ी ग़लती की। एक शिष्य को ढूँढ़ने के चक्कर में, मैंने एक निर्दोष आदमी को मार डाला। वह शिष्य नहीं था। पर मुझे लगा — है। बाद में पता चला — नहीं था। एक साधारण साधु था। बनारस से आया था। मुझे शक हुआ। मैंने बिना जाँच के मारा।"
आरोही ने चौंककर देखा।
"बाबा..."
बाबा ने कहा, "बेटी, मैं उसकी माँ से माफ़ी माँगने गया। पर वह पहले मर चुकी थी। दुख से। मैंने उसकी क़ब्र पर बहुत रोया। पर वह वापस नहीं आया। उसका नाम था — शिवशंकर। मेरे भाई के बराबर उम्र। शायद पच्चीस साल का।"
आरोही ने कहा, "बाबा, आप ने ग़लती की। पर आप इसका बोझ आज भी उठा रहे हैं।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। 96 साल से। हर रात मैं उस आदमी को सपने में देखता हूँ। जब तक मैं मरूँगा नहीं, यह बोझ नहीं जाएगा।"
आरोही ने बाबा का हाथ पकड़ा।
"बाबा, आप की उम्र इतनी लंबी। आप को शांति मिलनी चाहिए।"
बाबा ने कहा, "बेटी, मुझे शांति तभी मिलेगी जब बाक़ी के चार शिष्य मर जाएँगे। तब मेरा काम पूरा होगा। और मैं जा सकूँगा।"
आरोही ने कहा, "बाबा, हम मिलकर करेंगे।"
बाबा ने आरोही को देखा।
"बेटी, तू मुझे मेरी बहन जैसी लगती है। जो 1898 में मरी। हैज़े से। छोटी थी वह। बीस साल की। मुझसे पाँच साल छोटी। मैंने उसका इलाज करवाया। पर बच नहीं सकी।"
आरोही ने कहा, "बाबा, मुझे दुख है।"
बाबा ने कहा, "बेटी, यह बहुत पुरानी बात है। अब बस याद।"
आरोही ने पूछा, "बाबा, कालीचरण के बारे में बताइए।"
बाबा ने कहा, "बेटी, कालीचरण बनारस में है। बरसों से। वह अब क़रीब 175 साल का है। पर अपनी असली उम्र नहीं दिखाता। वह अपनी शक्ति से जवान दिखता है। शायद तीस-चालीस का।"
"वह कहाँ रहता है?"
बाबा ने कहा, "बनारस में कोई निश्चित जगह नहीं। पर वह गंगा के पास रहता है। घाटों पर। जहाँ बच्चे भीख माँगते हैं। वहाँ वह अपनी बलि चुनता है।"
आरोही की छाती में एक ठंडा दर्द।
"बाबा, वह बच्चों को कैसे बलि देता है?"
बाबा ने कहा, "बेटी, वह उन्हें ले जाता है। भीख माँगने वालों के बीच से कोई एक। जिसका कोई नहीं। परिवार गाँव में। बच्चा शहर में अकेला। कालीचरण उसे कुछ खिलाता है। मीठा। बच्चा उसके साथ जाता है। फिर..."
बाबा ने आँखें बंद कीं।
"फिर कोई नहीं मिलता।"
आरोही ने कहा, "बाबा, हमें रोकना होगा।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। पर कालीचरण चालाक है। वह हमेशा एक ही जगह नहीं रहता। हमें उसे ढूँढ़ना होगा। और यह मुश्किल है।"
आरोही ने कहा, "बाबा, कैसे ढूँढ़ेंगे?"
बाबा ने कहा, "बेटी, एक तरीक़ा है। कालीचरण की एक कमज़ोरी है। हर 13 साल पर उसे एक बड़ी बलि चाहिए। एक विशेष बच्चा। नौ साल का। जिसका जन्म कार्तिक अमावस को हुआ हो। ऐसे बच्चे मुश्किल से मिलते हैं। पर वह उसे ज़रूर ढूँढ़ता है।"
आरोही ने पूछा, "अगली अमावस कब?"
बाबा ने कहा, "बेटी, 2027 के कार्तिक में। एक साल बाद।"
"तो हमारे पास एक साल है?"
बाबा ने कहा, "हाँ। पर एक साल में हमें कालीचरण को ढूँढ़कर मारना होगा। नहीं तो एक और नौ साल का बच्चा मरेगा।"
आरोही ने पूछा, "बाबा, कालीचरण की पिछली बलि कब थी?"
बाबा ने कहा, "बेटी, 2014 में। तब उसने एक बच्ची को मारा था। जिसका नाम गुड़िया था। सात साल की। बनारस के एक अनाथालय से।"
आरोही की आँखों में आँसू।
"बाबा, हम पहले क्यों नहीं रोक पाए?"
बाबा ने कहा, "बेटी, तब मैंने कोशिश की थी। पर मुझे बहुत देर से पता चला। एक हफ़्ते बाद। बच्ची मर चुकी थी। मैंने कालीचरण को ढूँढ़ा। पर वह भाग गया। अपनी अगली अमावस की तैयारी में।"
आरोही ने कहा, "बाबा, इस बार हम पहले जाएँगे।"
बाबा ने कहा, "हाँ बेटी।"
आरोही ने कहा, "बाबा, हम कब बनारस जाएँगे?"
बाबा ने कहा, "बेटी, जल्दी। एक हफ़्ते बाद। मैं तेरी तैयारी करूँगा। तुझे कुछ मंत्र सिखाऊँगा। जो देवराज नहीं सिखा सका। और कुछ चीज़ें दूँगा।"
"क्या चीज़ें?"
बाबा ने अपने बैग से एक छोटा सा तांबे का बर्तन निकाला।
"बेटी, यह बर्तन। इसमें कालीचरण की शक्ति क़ैद हो सकती है। जब हम उसे मारेंगे, तो उसकी आत्मा इसमें जाएगी।"
आरोही ने बर्तन लिया।
"बाबा, और क्या?"
बाबा ने एक छोटा सा कागज़ निकाला।
"बेटी, यह एक नक्शा है। बनारस का। जिन घाटों पर कालीचरण जा सकता है। मैंने बरसों तक जाँच की।"
आरोही ने नक्शा लिया।
बाबा ने कहा, "बेटी, एक और चीज़।"
बाबा ने अपने गले से एक तांबे का हार निकाला।
"यह मेरा है। रामनाथ गुरुजी ने मुझे दिया था। इसमें बहुत शक्ति है। अब मैं तुझे देता हूँ।"
आरोही ने कहा, "बाबा, आप की चीज़ आप के पास रहनी चाहिए।"
बाबा ने कहा, "बेटी, मुझे इसकी अब ज़रूरत नहीं। मैं अपने अंत के क़रीब हूँ। तू इसे पहन।"
आरोही ने हार पहना।
एक अजीब सी गरमी उसकी छाती में हुई। सुखद।
बाबा मुस्कुराए।
"बेटी, यह हार तुझे स्वीकार कर रहा है। अच्छा।"
आरोही ने पूछा, "बाबा, आप कब मरने वाले हैं?"
बाबा ने कहा, "बेटी, जब सारे शिष्य मर जाएँगे। तब। न पहले न बाद।"
आरोही ने कहा, "बाबा, आप बहुत ज़्यादा जी चुके।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हाँ। 145 साल। मैंने भारत की आज़ादी देखी। दो विश्व युद्ध। महात्मा गांधी। नेहरू। इंदिरा। सब देखा। पर अब बहुत हुआ।"
आरोही ने बाबा का हाथ पकड़ा।
बाबा ने कहा, "बेटी, एक बात कहूँ?"
"क्या?"
बाबा ने कहा, "जब तू कालीचरण को मारेगी, तो एक चीज़ याद रखना। कालीचरण बच्चों का प्यार जीतता है। वह उन्हें मीठा देता है। खिलौने देता है। तू भी अगर बच्चे बचाना चाहती है, तो पहले उनका विश्वास जीतना होगा।"
आरोही ने कहा, "बाबा, कैसे?"
बाबा ने कहा, "बेटी, बच्चों के साथ बच्चा बनकर। उनकी भाषा में बात करके। उनके साथ खेलकर। तब वे तुझे बताएँगे — कालीचरण कहाँ है। किसे उठा रहा है। कब आ रहा है।"
आरोही ने सिर हिलाया।
बाबा ने कहा, "और एक बात। कालीचरण को मारने के लिए एक विशेष चीज़ चाहिए। जो सिर्फ़ बनारस में मिलेगी। तुझे वहाँ जाकर ही ढूँढ़नी होगी।"
"क्या चीज़ बाबा?"
बाबा ने कहा, "बेटी, कालीचरण की माँ की राख। जो 1878 में गंगा में डाली गई थी। कहीं तो होगी। कोई साधु जानता होगा।"
आरोही ने कहा, "बाबा, 148 साल पुरानी राख?"
बाबा ने कहा, "बेटी, गंगा में डाली गई हर चीज़ बहती नहीं। कुछ जमीन के अंदर जाती है। कुछ किनारे लगती है। कुछ किसी साधु के पास पहुँचती है। कालीचरण की माँ की राख भी कहीं होगी। मुझे पता है — बनारस के दशाश्वमेध घाट के पास एक साधु है। बहुत बूढ़ा। शायद 100 साल का। उसके पास एक तांबे का कलश है। जिसमें बहुत पुरानी राख। शायद वह।"
आरोही ने सिर हिलाया।
"बाबा, मैं जाऊँगी।"
रात के आठ बजे।
आरोही ने बाबा से विदा ली।
बाबा ने कहा, "बेटी, अगले हफ़्ते मैं तेरे पास आऊँगा। तेरे घर। तेरे पिताजी को बताऊँगा — मैं एक गुरु हूँ। तेरी पीएचडी में मदद कर रहा हूँ। पिताजी को असली बात मत बताना। उनका दिल कमज़ोर है।"
आरोही ने कहा, "बाबा, धन्यवाद।"
बाबा ने आरोही के सिर पर हाथ रखा।
"बेटी, जा। शांति से।"
आरोही घर लौटी।
घर पहुँचकर आरोही ने माँ को सब बताया।
माँ ने चौंककर कहा, "बेटी, तो बाबा असली हैं।"
आरोही ने कहा, "हाँ माँ। और वे मेरे साथ आगे भी रहेंगे।"
माँ ने कहा, "बेटी, मुझे भी बनारस आना है।"
आरोही ने कहा, "माँ, नहीं। आप पिताजी के साथ रहिए। पिताजी को अकेला नहीं छोड़ सकते। और आप को भी आराम चाहिए। पिछले हफ़्ते आप देवीदास के पास बहुत सहा।"
माँ ने कहा, "बेटी, तू अकेली कैसे जाएगी?"
आरोही ने कहा, "माँ, मैं अकेली नहीं। भास्करानंद बाबा हैं। और शायद रोहित भी। मैं उसे बुलाऊँगी।"
माँ ने कहा, "बेटी, रोहित तो अभी छोटा है।"
आरोही ने कहा, "माँ, वह 15 का है। पर उसकी हिम्मत अच्छी है। और उसे कंप्यूटर आता है। जो हमें मदद करेगा।"
माँ ने कहा, "अच्छा। पर बेटी, एक वादा।"
"क्या माँ?"
"हर दिन फ़ोन करना। एक बार। जब तक तू बनारस में है। अगर एक दिन भी फ़ोन न आया, मैं ख़ुद वहाँ आ जाऊँगी।"
आरोही ने माँ को गले लगाया।
"माँ, वादा।"
माँ ने कहा, "और एक बात। पिताजी को कुछ नहीं बताना। अगर पूछे — कहना 'पीएचडी के लिए बनारस जा रही हूँ। रिसर्च के लिए।' वे मान जाएँगे।"
आरोही ने सिर हिलाया।
रात के दस बजे। आरोही अपने कमरे में गई।
अपनी नोटबुक निकाली। पर वह अब नानी वाली नहीं थी। नई नोटबुक। जो उसने आज दिन में ख़रीदी थी।
पहले पन्ने पर लिखा —
"मिशन 1 — कालीचरण। बनारस। नवंबर 2026।
टीम — मैं, भास्करानंद बाबा, रोहित।
लक्ष्य — कालीचरण को मारना। बच्चों को बचाना।
तैयारी — नक्शा। कालीचरण की माँ की राख। मंत्र।"
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
फिर अपने फ़ोन पर रोहित को संदेश भेजा।
"रोहित, अगले हफ़्ते बनारस जाना है। तुम आ सकते हो?"
कुछ देर बाद जवाब आया।
"दीदी, हाँ। नानी से पूछ लिया है। नानी ने कहा — 'हाँ बेटा, जा। आरोही बहन तेरी रक्षा करेगी।' मैं आऊँगा।"
आरोही मुस्कुराई।
फिर उसने भगवती दादी को भी संदेश किया।
"दादी, मैं और बाबा और रोहित बनारस जा रहे हैं। कालीचरण के लिए। आप हमारे लिए दुआ करना।"
भगवती दादी का जवाब आया।
"बेटी, मैं तेरे लिए हर रात दीया जलाती हूँ। कार्तिक अमावस से ही। तुझे शक्ति मिले।"
आरोही की आँखों में आँसू।
बाहर आसमान साफ़ था। तारे।
लंबी लड़ाई की शुरुआत।
पर अब वह अकेली नहीं थी।
बाबा — 145 साल का अनुभव।
रोहित — जवान हिम्मत।
माँ — दूर से समर्थन।
भगवती दादी — दुआ।
पार्वती दादी — रत्नपुर से मदद।
और आरोही ख़ुद — एक तेरहवीं। जिसकी शक्ति में बारह बहनें थीं।
पाँच दिन बाद बनारस।
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