PretikaPsychological Horrorतेरहवीं अमावस

भाग 20 : चंद्रा देवी का रहस्य

Piyashi Atma · Psychological Horror · 15 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
20 of 23
Category
Psychological Horror
Reading time
15 min
Words
2942
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

25 अक्टूबर 2026। सुबह।

आरोही की आँख खुली।

रात भर वह ठीक से सो नहीं पाई। दुर्जन की राख में मिला वह सोने का ताबीज़। जिस पर "चंद्रा" नाम खुदा था। और तारीख़ — "1979 - अक्टूबर 24"।

चंद्रा देवी। भगवती दादी की नानी की सहेली। जो 1979 में "भाग गई" थीं। पर सच नहीं था। असल में दुर्जन ने उन्हें मारा था।

आरोही उठी। नीचे उतरी।

नीचे भगवती दादी और माँ बरामदे में थीं। दोनों चाय पी रही थीं। पर उनके चेहरों पर एक तनाव।

भगवती दादी की आँखों में एक अजीब सी थकान थी। रात भर वे भी सो नहीं पाई थीं।

आरोही ने पूछा, "दादी, आप ठीक हैं?"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, मुझे रात भर चंद्रा दीदी की याद आती रही। बचपन में हम कहते थे — दीदी। असल में वे मेरी नानी की सहेली थीं। पर मेरी माँ ने उन्हें दीदी कहा। तो मैं भी। जब मैं छोटी थी, वे मुझे कहानियाँ सुनाती थीं। रामायण। महाभारत। और अपने बचपन की।"

आरोही ने कहा, "दादी, मुझे और बताइए।"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, चंद्रा दीदी 1944 में पैदा हुई थीं। हमारे गाँव में। पंत परिवार से। शादी 1962 में। पति — रमेश पंत। दो बच्चे हुए। बेटा और बेटी। पर 1979 में — जब वे 35 साल की थीं — एक रात अचानक ग़ायब हो गईं। सब ने सोचा — किसी के साथ भाग गईं। रमेश पंत ने कोर्ट में तलाक़ लिया। दूसरी शादी की। पर मेरी माँ हमेशा कहती थीं — 'चंद्रा भागी नहीं। कुछ और हुआ।'"

आरोही ने कहा, "दादी, अब हमें पता चला कि सच क्या था।"

भगवती दादी ने आँखें बंद कीं।

"बेटी, दुर्जन ने उन्हें मारा। पर क्यों? चंद्रा दीदी तो कुँआरी नहीं थीं। दो बच्चों की माँ थीं।"

आरोही ने कहा, "दादी, यही तो सवाल है। दुर्जन देवीदास से अलग था। शायद उसकी अलग शर्तें थीं।"

माँ ने कहा, "बेटी, हमें ग़ौर से सोचना होगा। दुर्जन देवीदास का शिष्य था। शिष्य अपने गुरु की तरह नहीं होते। शिष्य अपनी अपनी साधना बनाते हैं।"

दोपहर के बारह बजे। आरोही, माँ, भगवती दादी और पार्वती देवी — सब पीपल के पेड़ के पास बैठे थे। पार्वती देवी अपने पोते रोहित को लाई थीं।

आरोही ने कहा, "दादी, हमें और जाँच करनी होगी। शायद दुर्जन ने और भी लोगों को मारा। शायद कोई पैटर्न है।"

रोहित ने कहा, "दीदी, मैं मदद करूँगा।"

आरोही ने रोहित को देखा। पंद्रह साल का लड़का। पर उसकी आँखों में समझदारी थी। कल रात दुर्जन के सामने भी वह डरा नहीं था।

आरोही ने कहा, "रोहित, तुम्हारी मदद चाहिए। तुम गाँव में युवा हो। तुम कंप्यूटर जानते हो?"

रोहित ने कहा, "हाँ दीदी। थोड़ा बहुत। स्कूल में सिखाया है।"

आरोही ने कहा, "अच्छा। तो हम मिलकर एक सूची बनाएँगे। रत्नपुर के आस-पास के गाँवों में पिछले 156 साल में जितने भी अजीब मौतें या ग़ायबियाँ हुई हैं। हमें उन्हें ढूँढ़ना है।"

पार्वती देवी ने कहा, "बेटी, इतना बड़ा काम?"

आरोही ने कहा, "दादी, हमें करना होगा। अगर दुर्जन जैसे और भी शिष्य हैं, तो वे भी कहीं होंगे। हमें उन्हें रोकना होगा।"

माँ ने कहा, "बेटी, तू सही कह रही है।"

रोहित ने कहा, "दीदी, मैं स्कूल के बाद रोज़ आपकी मदद करूँगा। मेरी परीक्षाएँ अगले महीने हैं। पर उसके बाद मैं पूरा समय दूँगा।"

आरोही ने रोहित का हाथ पकड़ा।

"रोहित, तुम बहुत अच्छे हो।"

पार्वती देवी ने आँखों में आँसू लाकर कहा, "बेटी, रोहित मेरा एक ही सहारा है। तू इसे संभाल कर रखना।"

आरोही ने कहा, "दादी, वादा।"

दोपहर के तीन बजे। आरोही ने अपना लैपटॉप निकाला। इंटरनेट कमज़ोर था। पर काम चलाऊ।

आरोही ने पंडित के घर की अलमारी से कुछ और कागज़ ढूँढ़े। मुख्य कागज़ पहले ही मिल गया था। पर शायद कुछ और भी।

रोहित ने कहा, "दीदी, मैं आपके साथ चलूँ?"

"हाँ रोहित। चलो।"

दोनों पंडित के घर गए।

घर अब खाली था। पंडित मर चुके थे। कुसुम भी। आर्यन भी।

अंदर घुसते ही एक अजीब सी गंध थी। पुरानी। सूखी। जैसे बरसों से किसी ने साफ़ नहीं किया हो।

पर आज हवा में एक अजीब सी हलचल थी। जैसे कुछ जीवित हो।

रोहित ने कहा, "दीदी, यह घर मुझे अच्छा नहीं लगता।"

आरोही ने कहा, "रोहित, अब यहाँ कोई नहीं है। सब मुक्त हो चुके हैं।"

पर आरोही ने अपने ताबीज़ को छाती पर लगाया। सावधानी से।

दोनों पंडित की अध्ययन कक्ष में गए।

आरोही ने पंडित की अध्ययन कक्ष में जाकर बड़ी अलमारी खोली।

अंदर बहुत सी पुरानी किताबें। कुछ धर्म की। कुछ ज्योतिष की। और कुछ...

तांत्रिक की।

आरोही ने सावधानी से एक तांत्रिक किताब निकाली। बहुत पुरानी। पन्ने पीले। कुछ जगह जले हुए।

किताब पर हिंदी में लिखा था — "देवीदास संहिता।"

आरोही ने पन्ने पलटे।

अंदर देवीदास के शिष्यों की सूची थी।

आरोही ने ग़ौर से पढ़ा।

"देवीदास के शिष्य:

दुर्जन — 1870, दिल्ली में
वीरभद्र — 1875, नेपाल में
कालीचरण — 1878, बनारस में
रुद्रनाथ — 1882, कोलकाता में
प्रचंडी — 1886, राजस्थान में
भैरवदास — 1889, गुजरात में
महाकाल — 1895, तमिलनाडु में"**

आरोही की आँखें फैलीं।

सात शिष्य।

और दुर्जन तो पहला था। सबसे कमज़ोर। बाक़ी छह...

आरोही ने रोहित को दिखाया।

रोहित ने कहा, "दीदी, तो देवीदास ने पूरे भारत में शिष्य बनाए थे?"

आरोही ने कहा, "हाँ। पर इनमें से कितने अभी ज़िंदा हैं?"

आरोही ने आगे पढ़ा।

"हर शिष्य को गुरु ने अपनी एक शक्ति दी। और हर शिष्य ने अपनी अपनी साधना चुनी। दुर्जन — कुँआरी लड़कियों की बलि। वीरभद्र — विधवाओं की। कालीचरण — बच्चों की। रुद्रनाथ — गर्भवती स्त्रियों की। प्रचंडी — जुड़वाँ बच्चों की। भैरवदास — शादी की पहली रात की दुल्हनों की। महाकाल — बड़ी बहनों की।"

आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।

सात प्रकार की बलि।

पूरे भारत में।

रोहित ने कहा, "दीदी, यह तो बहुत बुरा है। मेरी छोटी बहन भी है। और मेरी माँ — गर्भवती नहीं, पर..."

आरोही ने रोहित का हाथ पकड़ा।

"रोहित, चिंता मत कर। हम इन सब को रोकेंगे।"

रोहित ने सिर हिलाया।

आरोही ने कहा, "हाँ रोहित। और यह पिछले 150 साल से हो रहा है।"

आरोही ने आगे के पन्ने पर और पढ़ा।

"हर शिष्य ने अपनी शक्ति का उपयोग किया। हर 13 साल पर एक बलि। पर कुछ शिष्यों ने ज़्यादा भी की। कालीचरण ने बहुत सी बलि दी हैं। बनारस में। पर वहाँ बच्चे बहुत मरते हैं। तो किसी को शक नहीं होता।"

आरोही की छाती में एक ठंडा दर्द।

बनारस।

पवित्र नगरी।

जहाँ रोज़ बच्चे मरते हैं। बीमारी से। ग़रीबी से।

पर उनमें से कुछ...

कालीचरण ने मारे।

आरोही ने आगे के पन्ने पलटे।

एक और सूची।

"शिष्यों की मृत्यु/जीवन:

दुर्जन — मर गया 24 अक्टूबर 2026, रत्नपुर में — आरोही शर्मा द्वारा
वीरभद्र — मर चुका 1962 में, नेपाल में — काठमांडू की एक विधवा के परिवार ने
कालीचरण — जीवित, बनारस में — शायद
रुद्रनाथ — जीवित, कोलकाता में — शायद
प्रचंडी — जीवित, राजस्थान में — शायद
भैरवदास — मर चुका 1988 में, गुजरात में — कारण अज्ञात
महाकाल — जीवित, तमिलनाडु में — शायद"**

आरोही ने चौंककर देखा।

पर यह सूची अजीब थी। दुर्जन की मौत की तारीख़ — 24 अक्टूबर 2026 — कैसे किसी ने पहले लिख दी?

आरोही ने ग़ौर से देखा।

नहीं। यह हस्तलिपि अलग थी। ताज़ी। जैसे किसी ने अभी-अभी लिखा हो। स्याही अभी तक थोड़ी गीली थी।

पंडित की तो हस्तलिपि नहीं थी। पंडित एक महीने पहले मर चुके थे। तो यह हाल की लिखावट।

तो किसने?

आरोही ने रोहित को दिखाया।

रोहित ने कहा, "दीदी, यह लिखावट पंडित की नहीं है। और ना ही आर्यन की। क्योंकि मैंने पिछले साल एक बार आर्यन की लिखावट देखी थी।"

आरोही ने पूछा, "फिर किसकी?"

रोहित ने कहा, "मुझे नहीं पता। पर यह किसी ने अभी-अभी लिखा। शायद आज सुबह। शायद कल रात।"

आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।

तो कोई और था। इस गाँव में। जो देवीदास संहिता के बारे में जानता था। और जो आरोही की मदद कर रहा था।

पर कौन?

आरोही ने किताब के आख़िरी पन्ने पर देखा।

वहाँ एक नोट था।

**"जो भी यह पढ़े — जान लो। मैं देवीदास संहिता का रक्षक हूँ। तेरहवीं की रात के बाद मैंने यह अपडेट किया। आरोही, तुम्हारा काम अभी बाक़ी है। तीन शिष्य अभी जीवित हैं। कालीचरण, रुद्रनाथ, प्रचंडी, महाकाल। इन चारों को रोकना होगा। नहीं तो बरसों तक और लड़कियाँ, विधवाएँ, बच्चे, माँएँ मरती रहेंगी।

— एक मित्र"**

आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।

कौन था यह "मित्र"?

क्या यह असली दुनिया का कोई व्यक्ति था?

क्या यह किसी आत्मा का संदेश था?

रोहित ने कहा, "दीदी, यह कौन हो सकता है?"

आरोही ने कहा, "मुझे नहीं पता। पर कोई है जो हमारा सहायक है।"

शाम को। आरोही ने भगवती दादी को सब बताया।

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, तू क्या करेगी?"

आरोही ने कहा, "दादी, मुझे इन चार शिष्यों को ढूँढ़ना होगा। एक-एक करके।"

पार्वती देवी ने कहा, "बेटी, यह बहुत बड़ा काम है। तू अकेली कैसे करेगी?"

आरोही ने कहा, "दादी, मैं अकेली नहीं हूँ। रोहित मदद करेगा। और शायद...और भी लोग।"

रोहित ने कहा, "दीदी, मैं तेरे साथ हूँ।"

पार्वती देवी की आँखों में एक अजीब सा डर आया।

"रोहित, तू अभी छोटा है।"

रोहित ने कहा, "नानी, मैं पंद्रह का हूँ। और कल रात मैंने दुर्जन को देखा। मुझे डर नहीं लगा। मैं दीदी के साथ जाऊँगा।"

पार्वती देवी ने कुछ पल सोचा।

फिर कहा, "बेटा, ठीक है। पर बहुत सावधान रहना।"

रोहित ने सिर हिलाया।

रात। आरोही ने भगवती दादी की तरफ़ देखा।

"दादी, चंद्रा दीदी के बारे में और जानना है। उनका परिवार अभी भी गाँव में है?"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, उनके बेटे प्रकाश पंत गाँव में हैं। शायद 60 साल के होंगे। रमेश पंत की दूसरी पत्नी से भी बच्चे हैं। पर पहली पत्नी — चंद्रा — के बेटे प्रकाश यहीं हैं।"

आरोही ने कहा, "दादी, कल हम प्रकाश काका से मिलेंगे।"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, चलो।"

26 अक्टूबर की सुबह। आरोही, भगवती दादी, और रोहित प्रकाश पंत के घर गए।

घर छोटा था। पर साफ़। बाहर एक तुलसी का पौधा। जिस पर लाल कपड़ा।

आरोही ने खटखटाया।

एक बुज़ुर्ग आदमी बाहर आया। सफ़ेद बाल। चेहरे पर झुर्रियाँ।

"जी?"

भगवती दादी ने कहा, "प्रकाश, मैं भगवती हूँ। तुझे मैं बचपन में जानती थी।"

प्रकाश पंत ने चौंककर देखा।

"दादी! आप!"

फिर उन्होंने आरोही और रोहित को देखा।

"यह?"

आरोही ने कहा, "काका, मैं आरोही शर्मा। दिल्ली से। मुझे आपकी माँ चंद्रा देवी के बारे में बात करनी है।"

प्रकाश पंत के चेहरे पर एक अजीब सी छाया आई।

"बेटी, मेरी माँ 1979 में भाग गई थीं।"

आरोही ने कहा, "काका, नहीं। आपकी माँ नहीं भागीं। उन्हें मारा गया था।"

प्रकाश पंत के हाथ काँपने लगे।

"क्या?"

आरोही ने कहा, "काका, अंदर बैठकर बात करें।"

अंदर बैठकर आरोही ने सब बताया। दुर्जन की कहानी। तेरहवीं का श्राप। और चंद्रा देवी का सोने का ताबीज़।

प्रकाश पंत ने आख़िर तक चुप रहकर सुना।

फिर बोले, "बेटी, मेरी माँ को मैंने कभी नहीं भूला। मैं उस वक़्त 13 साल का था। मेरी बहन 11 की। पिताजी ने हमें बताया — 'तुम्हारी माँ भाग गई। किसी के साथ।' मुझे विश्वास नहीं था। मेरी माँ ऐसी नहीं थीं। पर पिताजी ने कोर्ट में तलाक़ लिया। और दूसरी शादी की। मेरी सौतेली माँ ने मुझे और बहन को बहुत यातना दी। मेरी बहन 20 की उम्र में मर गई। दिल का दौरा। मेरी सौतेली माँ के कारण।"

आरोही की आँखों में आँसू।

"काका, मुझे बहुत दुख है।"

प्रकाश पंत ने कहा, "बेटी, मैं बरसों से मानता था — मेरी माँ ने हमें छोड़ा। पर अब पता चला — उन्हें मारा गया। कम से कम अब मुझे शांति मिली।"

आरोही ने ताबीज़ निकाला। चंद्रा का सोने का ताबीज़।

प्रकाश पंत ने ग़ौर से देखा।

फिर आँसू।

"बेटी, यह... यह मेरी माँ का था। यह मेरी माँ ने मुझे बचपन में एक बार दिखाया था। कहा था — 'बेटा, यह मेरी माँ ने दिया था। एक दिन तुझे दूँगी।' पर वे कभी नहीं दे सकीं।"

आरोही ने ताबीज़ प्रकाश पंत को दिया।

"काका, यह अब आपका।"

प्रकाश पंत ने ताबीज़ को छाती से लगाया।

फिर बहुत देर तक रोए।

भगवती दादी ने प्रकाश पंत का हाथ पकड़ा।

"प्रकाश, तेरी माँ को शांति मिली अब। वह मुक्त है।"

प्रकाश पंत ने कहा, "दादी, धन्यवाद।"

रोहित बगल में चुप बैठा था। पर उसकी आँखों में भी आँसू। एक 15 साल का लड़का। पर 47 साल पुराने दुख को समझ रहा था।

आरोही ने पूछा, "काका, आपके पास आपकी माँ की कोई और चीज़ है? कोई फ़ोटो? कोई लिखा हुआ?"

प्रकाश पंत ने कहा, "बेटी, सौतेली माँ ने सब जला दिया। पर एक चीज़ मैंने बचाई थी।"

प्रकाश पंत उठे। अलमारी में गए। एक छोटा सा डिब्बा निकाला। खोला।

अंदर एक पुरानी डायरी थी।

"बेटी, यह मेरी माँ की डायरी है। मैंने बचपन में बचाई थी। पिताजी को नहीं दिखाई।"

आरोही ने डायरी ली।

खोली।

पहला पन्ना।

"आज मैं दुर्जन बाबा से मिली। एक अजनबी आदमी। कहते हैं — जवान। पर आँखों में बुढ़ापा। मुझे कुछ अजीब सा लगा।"

आरोही ने आगे पढ़ा।

चंद्रा देवी दुर्जन से मिलती रहीं। बरसों तक। दुर्जन उन्हें कुछ मंत्र सिखाता। कुछ शक्ति देता।

"5 फरवरी 1977 — दुर्जन ने मुझे एक अजीब सा मंत्र सिखाया। बोला — यह पढ़ने से मेरी बीमारी ठीक होगी। मुझे शक हुआ। पर मैंने पढ़ा। तेरे दिनों में मेरा बुखार सचमुच उतरा।"

"12 सितंबर 1978 — दुर्जन आज बहुत ख़ुश है। बोला — मेरी शक्ति बढ़ रही है। पर मुझे थोड़ी और चाहिए। तुम मुझे कुछ और मंत्र पढ़ो।"

"3 जनवरी 1979 — मैं अजीब सी थकान महसूस कर रही हूँ। रात को नींद नहीं आती। सपने बहुत बुरे। पर दुर्जन कहता है — सब ठीक है।"

पर एक दिन — 20 अक्टूबर 1979 —

"आज मुझे पता चला। दुर्जन बुरा है। वह मेरी शक्ति ले रहा है। मैं मर रही हूँ। धीरे-धीरे। मुझे कुछ करना होगा।"

फिर 23 अक्टूबर —

"आज दुर्जन ने कहा — कल रात मुझे अंतिम बलि देनी होगी। मेरी। मैं भाग नहीं सकती। मंत्र से बंधी हूँ। पर मैं एक चीज़ करूँगी — अपनी डायरी छुपाऊँगी। ताकि कोई इसे पढ़े। और सच जाने।"

फिर 24 अक्टूबर —

"आज मरने वाली हूँ। मेरा बेटा प्रकाश। मेरी बेटी सुशीला। मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ। मुझे माफ़ करना। यह मैंने नहीं चुना। दुर्जन ने। पर एक दिन कोई तुम्हें बताएगा। और सच सामने आएगा।"

आरोही की आँखों में आँसू।

चंद्रा देवी को पता था कि वे मरने वाली हैं। पर उन्होंने बच्चों के लिए यह डायरी छोड़ी।

आज 47 साल बाद डायरी अपने बेटे के हाथ में पहुँची।

आरोही ने प्रकाश पंत को डायरी दी।

"काका, आप पढ़िए।"

प्रकाश पंत ने पढ़ा।

बहुत देर तक। एक-एक पन्ना।

फिर रोए। बहुत रोए।

फिर कहा, "बेटी, तूने मेरी माँ को वापस लाया। धन्यवाद।"

लौटते वक़्त आरोही ने भगवती दादी से कहा, "दादी, अब हमें और भी सुराग मिलेंगे।"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, हाँ। पर एक बात। तेरा घर दिल्ली है। तू यहाँ हमेशा नहीं रह सकती।"

आरोही ने कहा, "दादी, मैं दिल्ली जाऊँगी। पर वहाँ से ही जाँच करूँगी। कालीचरण, रुद्रनाथ, प्रचंडी, महाकाल — इन चारों को ढूँढ़ूँगी।"

रोहित ने कहा, "दीदी, मैं भी मदद करूँगा। यहाँ से।"

आरोही ने रोहित के सिर पर हाथ रखा।

"रोहित, तू मेरा छोटा भाई है अब।"

रोहित मुस्कुराया।

शाम। आरोही अपने कमरे में गई।

अपने बैग से नानी की नोटबुक निकाली।

कोरी थी।

नानी अब नहीं थीं।

पर आरोही ने कहा —

"नानी, अगर आप सुन सकती हैं — मुझे आशीर्वाद दीजिए। मुझे एक बड़ी लड़ाई लड़नी है। सात नहीं, चार शिष्यों की। पर बड़ी।"

पन्ना कोरा रहा।

पर आरोही को लगा — नानी सुन रही थीं।

आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।

रात के बारह बजे। आरोही खिड़की के पास खड़ी थी।

बाहर आसमान साफ़। तारे।

आरोही ने सोचा।

देवीदास मरा। दुर्जन मरा। पर देवीदास संहिता में लिखा था — अभी चार और शिष्य ज़िंदा हैं।

कालीचरण — बनारस में। बच्चों की बलि।

रुद्रनाथ — कोलकाता में। गर्भवती स्त्रियों की।

प्रचंडी — राजस्थान में। जुड़वाँ बच्चों की।

महाकाल — तमिलनाडु में। बड़ी बहनों की।

आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।

चार बड़ी लड़ाइयाँ। पूरे भारत में।

पर आरोही अकेली नहीं थी।

रोहित। भगवती दादी। पार्वती देवी। माँ। और शायद वह अनजान "मित्र" जिसने संहिता में नोट छोड़ा था।

आरोही ने आँखें बंद कीं।

अगला पड़ाव — बनारस।

कालीचरण।

बच्चों को बचाना है।

पर पहले दिल्ली। कुछ दिनों के लिए। तैयारी। रिसर्च। पीएचडी विभाग को नई विषय बताना।

फिर बनारस।

आरोही ने अपनी घड़ी देखी। 12:30 बज गए थे।

अब सो जाना चाहिए।

पर तभी उसके फ़ोन पर एक संदेश आया।

अनजान नंबर से।

आरोही ने संदेश खोला।

"आरोही, तुम पंडित की संहिता पढ़ चुकी हो। जो मैंने लिखा था। मैं तुम्हारा मित्र हूँ। कालीचरण से मिलने से पहले, मुझसे मिलना। मैं दिल्ली में हूँ। कल मिलेंगे। दिल्ली विश्वविद्यालय के पीछे। शाम पाँच बजे। — एक मित्र"

आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।

तो वह "मित्र" असली था।

और उसे आरोही का फ़ोन नंबर भी पता था।

आरोही ने सोचा — क्या यह जाल है? कोई और शिष्य? क्या दुर्जन का ही कोई और शिष्य? या...

पर संहिता में लिखा था — यह "मित्र" उसकी मदद कर रहा था।

आरोही ने सोचा।

फिर जवाब लिखा।

"मिलूँगी।"

संदेश भेजा।

अगले क्षण फ़ोन पर एक और संदेश।

"शाबाश। मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगा।"

फिर एक तस्वीर।

एक बूढ़े आदमी की।

सफ़ेद बाल। सफ़ेद दाढ़ी। पर आँखों में एक अजीब सी चमक। ऐसी चमक जो आरोही ने पहले भी देखी थी।

बाबा जैसी।

पर बाबा तो मर चुके थे।

तो यह कौन था?

आरोही ने ग़ौर से देखा।

फिर तस्वीर के नीचे एक कैप्शन।

"मेरा नाम — भास्करानंद। मैं रामनाथ बाबा का दूसरा शिष्य हूँ। देवराज तुम्हारे साथ थे। मैं दिल्ली में हूँ। बरसों से इंतज़ार में।"

आरोही की आँखें फैलीं।

रामनाथ बाबा का दूसरा शिष्य।

तो देवराज बाबा अकेले नहीं थे। एक और शिष्य भी था। जो अभी भी ज़िंदा। दिल्ली में।

आरोही ने कल की तैयारी की।

कल दिल्ली।

नई यात्रा शुरू।

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