PretikaPsychological Horrorतेरहवीं अमावस

भाग 19 : दुर्जन का सामना

Piyashi Atma · Psychological Horror · 12 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
19 of 23
Category
Psychological Horror
Reading time
12 min
Words
2293
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

आरोही ने खिड़की बंद कर दी। पर उसकी छाती में एक तेज़ धड़कन थी।

दुर्जन। रत्नपुर में। पीपल के पेड़ के नीचे।

आरोही की उँगलियाँ काँप रही थीं। मन में एक हज़ार सवाल। दुर्जन दिल्ली में क्यों नहीं था? मालती दीदी ने कहा था — दिल्ली में। पर वह तो यहाँ। रत्नपुर में। क्या मालती दीदी ने ग़लत बताया? या फिर दुर्जन ख़ुद ही रत्नपुर आ गया? अपने गुरु के बदले के लिए?

आरोही दौड़कर नीचे उतरी। सीढ़ियों पर उसका पैर एक बार लड़खड़ाया। पर वह गिरी नहीं।

"माँ! दादी!"

माँ और भगवती दादी बरामदे में बैठी थीं। चाय पी रही थीं। दोनों ने चौंककर देखा।

आरोही ने कहा, "दुर्जन यहाँ है। रत्नपुर में। पीपल के पेड़ के नीचे। मैंने अभी-अभी देखा।"

भगवती दादी की आँखें फैलीं। हाथ से चाय का कप गिर गया। ज़मीन पर।

"बेटी, क्या?"

आरोही ने कहा, "हाँ दादी। मैंने पहचान लिया। उसकी आँखें भूरी। पर लाल चमक। जैसा मालती दीदी ने बताया था। और वह मेरी तरफ़ हाथ हिला रहा था।"

माँ ने कहा, "बेटी, वह दिल्ली में नहीं है?"

आरोही ने कहा, "नहीं माँ। वह यहाँ है। शायद अभी। बाहर।"

माँ की छाती में एक तेज़ धड़कन।

"बेटी, अगर वह यहाँ है, तो वह हमला कर सकता है। रात के इस समय।"

भगवती दादी उठ खड़ी हुईं। पहले से मज़बूती से।

"बेटी, हमें अभी पार्वती दादी को बुलाना होगा। और उसके पोते को भी। जिसके गले में बाबा का दिया ताबीज़ है।"

रात के बारह बजे। पार्वती दादी अपने पोते के साथ भगवती दादी के घर पहुँचीं।

आरोही ने सब बताया।

पार्वती दादी ने कहा, "बेटी, यह अच्छा नहीं। दुर्जन यहाँ क्यों?"

आरोही ने कहा, "पार्वती दादी, शायद बदला लेने। मैंने देवीदास को मारा। दुर्जन देवीदास का शिष्य था।"

पार्वती दादी ने कहा, "बेटी, हमें अभी उसे रोकना होगा। जब वह अकेला है। अगर उसे तैयारी करने का मौक़ा मिला, तो..."

भगवती दादी ने कहा, "पार्वती, तेरे पास वह ताबीज़ है जो बाबा ने दिया था?"

पार्वती दादी ने कहा, "हाँ। मेरे पोते के गले में।"

"पोते को ले आ। वह हमारे साथ रहेगा।"

पार्वती दादी का पोता — पंद्रह साल का — पहले से ही आया था। आरोही ने उसे पहली बार देखा। नाम था — रोहित।

रोहित ने कहा, "दीदी, मैं आप की मदद करूँगा।"

आरोही ने कहा, "बेटा, तू छोटा है।"

रोहित ने कहा, "दीदी, मेरी नानी को दुर्जन ने ही ज़हर देने पर मजबूर किया। मैं देखना चाहता हूँ — वह कमीना कैसे मरता है।"

आरोही ने रोहित के सिर पर हाथ रखा।

आरोही ने अपने बैग से दुर्जन की अंगूठी निकाली।

"दादी, यह मालती दीदी ने दी। दुर्जन की अंगूठी।"

भगवती दादी ने ग़ौर से देखा।

"बेटी, यह अंगूठी बहुत पुरानी है। शायद 1870 की। इसमें दुर्जन की शक्ति बंधी है।"

आरोही ने कहा, "दादी, इसे कैसे तोड़ेंगे?"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, यह अंगूठी सिर्फ़ तुम तोड़ सकती हो। तेरहवीं। पर तोड़ने से पहले एक मंत्र पढ़ना होगा।"

पार्वती दादी ने कहा, "मुझे एक मंत्र आता है। बाबा ने सिखाया था। बहुत साल पहले। पर वह किसी भी बुरी शक्ति को कमज़ोर करता है।"

आरोही ने कहा, "दादी, तो हम बाहर चलें?"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, नहीं। बाहर वह हमें देख लेगा। हमें उसे यहाँ बुलाना होगा।"

"कैसे?"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, तुम्हारे पास वह रक्षक कवच है — जो मैंने तुझे दिया। उसे बरामदे पर रख। वह कवच दुर्जन को अपनी तरफ़ खींचेगा। क्योंकि यह उसकी शक्ति के विपरीत है।"

आरोही ने अपने बैग से रक्षक कवच निकाला। भगवती दादी का दिया हुआ। पुराना तांबे का।

बरामदे पर रखा। खुली जगह पर।

फिर सब घर के अंदर आ गए।

खिड़की से बाहर देखा।

पंद्रह मिनट।

बाहर हवा तेज़ हो गई।

पीपल के पेड़ की तरफ़ से एक साया आया।

आरोही, माँ, भगवती दादी, पार्वती दादी, रोहित — सब खिड़की से देखते रहे।

साया बरामदे तक पहुँचा।

रुका।

रक्षक कवच के पास।

कवच हरा हुआ। शक्ति से।

साया ने कवच को छूने की कोशिश की। पर कवच ने उसे धक्का दिया। एक हल्की सी नीली रोशनी।

साया पीछे हटा।

पर तभी उसने अपना असली रूप दिखाया।

दुर्जन।

बीस साल का जवान लड़का। पर आँखें बहुत पुरानी। भूरी। पर लाल चमक।

दुर्जन ने चीखा — "आरोही! बाहर आ! मुझे अपने गुरु का बदला लेना है!"

आरोही ने भगवती दादी की तरफ़ देखा।

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, तेरहवीं तू है। बाहर तुझे ही जाना होगा।"

आरोही ने कहा, "दादी, ठीक है।"

आरोही ने अपने बैग से दुर्जन की अंगूठी निकाली। हाथ में ली।

पार्वती दादी ने कहा, "बेटी, मैं मंत्र पढ़ूँगी। जब मैं मंत्र पूरा करूँ, तो तुम अंगूठी तोड़ना।"

आरोही ने सिर हिलाया।

आरोही बरामदे पर आई।

दुर्जन आँगन में खड़ा।

"आरोही, तूने मेरे गुरु को मारा। अब तेरी बारी।"

आरोही ने कहा, "दुर्जन, तू क्यों है यहाँ? तेरा गुरु मर चुका। तेरा बंधन टूट चुका। जा। दिल्ली जा। अपनी ज़िंदगी जी।"

दुर्जन ने कहा, "बेटी, तू नहीं जानती। मेरे गुरु की मौत से मैं भी मरने लगा हूँ। मेरा शरीर धीरे-धीरे राख हो रहा है। बचाने का एक ही तरीक़ा — तुझे मारना। तेरहवीं का ख़ून। तेरे बलिदान से मुझे नई ज़िंदगी मिलेगी।"

आरोही ने कहा, "दुर्जन, मैं नहीं मरूँगी। तू ख़ुद ख़त्म होगा।"

दुर्जन हँसा।

"बेटी, तेरे पास मुझे रोकने के लिए क्या है? तेरी माँ? तेरी दादी? कोई नहीं। बाबा भी मर गया। पंडित भी। आर्यन भी। कुसुम भी। तू अकेली है।"

आरोही ने कहा, "दुर्जन, मैं अकेली नहीं। मेरे साथ बारह बहनें हैं। मालती दीदी हैं। रामनाथ बाबा हैं। नानी हैं। सब मेरे साथ।"

दुर्जन ने कहा, "बेटी, वे सब मर चुके।"

आरोही ने कहा, "पर मरने के बाद उनकी आत्माएँ ज़िंदा हैं।"

आरोही ने अंगूठी दिखाई।

दुर्जन के चेहरे पर पहली बार डर आया। सचमुच का।

"बेटी, यह अंगूठी तेरे पास कहाँ से?"

आरोही ने कहा, "मालती दीदी ने दी। तेरी अंगूठी। तूने बरसों पहले खोई थी।"

दुर्जन ने कहा, "बेटी, मत तोड़। मैं तुझे कुछ भी दूँगा। पैसा। शक्ति। जो चाहे।"

आरोही ने कहा, "दुर्जन, कुछ नहीं चाहिए। बस तेरा अंत।"

दुर्जन ने कहा, "बेटी, अगर तू मुझे मारेगी, तो तेरी माँ भी मरेगी। मैंने उन पर एक श्राप डाला है। जो मेरी मौत के साथ चलेगा।"

आरोही ने कहा, "दुर्जन, तू झूठ बोल रहा है। जैसे तेरे गुरु ने बोला।"

दुर्जन ने कहा, "बेटी, यह झूठ नहीं। सच है।"

आरोही ने माँ की तरफ़ देखा। खिड़की से।

माँ ने सिर हिलाया।

"बेटी, इसकी बात मत सुन। यह चाल है। जैसा देवीदास ने की थी।"

आरोही ने कहा, "दुर्जन, कोशिश अच्छी। पर मैं तेरे झूठ में नहीं आऊँगी।"

अंदर से पार्वती दादी ने मंत्र पढ़ना शुरू किया।

संस्कृत में। बहुत पुराने शब्द। जो बाबा ने बरसों पहले सिखाए थे।

"ॐ अघोरे शक्तिनि, दुर्जन नाश्यताम्..."

आरोही ने अंगूठी को हाथ में लिया।

दुर्जन ने आरोही की तरफ़ हाथ बढ़ाया। एक तेज़ लाल रोशनी। हवा में एक चोट के आकार में।

पर रक्षक कवच ने रोकी। रोशनी वापस लौटी। दुर्जन को छूकर।

दुर्जन एक क़दम पीछे हटा।

पर तुरंत उसने फिर कोशिश की। इस बार आरोही की तरफ़ भागा। बहुत तेज़ी से। जैसे कोई जानवर।

आरोही ने ताबीज़ को हाथ में लिया। दुर्जन के चेहरे पर लगाया।

ताबीज़ पीली रोशनी में जला।

दुर्जन चीखा। बहुत ज़ोर से। कि आस-पास के गाँव वालों की खिड़कियों की रोशनियाँ जल उठीं।

दुर्जन पीछे हटा। अपना चेहरा पकड़ा। जहाँ ताबीज़ लगा था, वहाँ जल गया था।

अंदर से पार्वती दादी की मंत्र-आवाज़ तेज़ हुई।

आरोही ने अंगूठी को दोनों हाथों से पकड़ा।

तोड़ने की कोशिश की।

पर अंगूठी टूटी नहीं।

बहुत मज़बूत। तांबे की। पर उसमें एक अजीब सी शक्ति।

दुर्जन ने कहा, "बेटी, यह अंगूठी सिर्फ़ मेरा शरीर तोड़ सकता है। तेरे हाथ से नहीं। मैंने ख़ुद बनाई थी। मेरे शरीर के एक हिस्से से।"

आरोही ने चौंककर देखा।

तो मालती दीदी ने ग़लत बताया?

नहीं। मालती दीदी ग़लत नहीं बोलतीं।

पर तो क्या रास्ता?

आरोही ने सोचा।

तभी उसे याद आया।

देवीदास की अंगूठी। दो चूड़ियाँ। एक साथ। तभी टूटी।

तो दुर्जन की अंगूठी भी...

आरोही ने दुर्जन की तरफ़ देखा।

दुर्जन की उँगली में एक और अंगूठी थी।

पर वह अलग थी। छोटी। पत्थर वाली। जिसमें एक हल्का सा नीला पत्थर।

आरोही ने कहा, "दुर्जन, तेरी उँगली की अंगूठी। दे मुझे।"

दुर्जन ने कहा, "बेटी, यह तेरे लिए नहीं। यह मेरी है।"

आरोही ने रक्षक कवच को हाथ में लिया। कवच से एक तेज़ लाल रोशनी।

आरोही ने कवच को दुर्जन की तरफ़ फेंका।

कवच ने दुर्जन को पकड़ लिया। हवा में जकड़ लिया। जैसे कोई अदृश्य रस्सी उसे बाँध रही हो।

दुर्जन नहीं हिल सका।

आरोही दौड़ी। दुर्जन के पास।

उसकी उँगली से अंगूठी उतारी। जबरन।

दुर्जन ने चीखा — "बेटी, नहीं!"

आरोही ने दोनों अंगूठियाँ हाथ में लीं।

पार्वती दादी की मंत्र-आवाज़ अपने चरम पर पहुँची।

आरोही ने दोनों अंगूठियाँ एक साथ पत्थर पर पटकीं।

एक तेज़ नीली रोशनी।

दोनों अंगूठियाँ टूटीं।

दुर्जन ने आख़िरी बार चीखा।

फिर उसका शरीर धीरे-धीरे राख हुआ। पहले उँगली। फिर हाथ। फिर पूरा।

एक मिनट में सब कुछ ख़त्म।

आरोही ने आँखें बंद कीं।

बहुत देर तक। कोई हरकत नहीं। कोई आवाज़ नहीं। बस अपनी साँसें सुनती रही। दिल की धड़कन। जो अब धीमी हो रही थी।

फिर आँखें खोलीं।

ज़मीन पर बस राख।

दुर्जन ख़त्म।

अंदर से माँ, भगवती दादी, पार्वती दादी, रोहित — सब बाहर आए।

माँ ने आरोही को गले लगाया।

"बेटी! तू ठीक है ना?"

आरोही ने कहा, "माँ, मैं ठीक हूँ।"

माँ ने आरोही के चेहरे पर हाथ रखा। जगह-जगह छोटे-छोटे घाव थे। दुर्जन की लाल रोशनी से जो लगी थी।

माँ ने अपने आँचल से आरोही का चेहरा पोंछा।

"बेटी, तू फिर से लड़ी। और जीती।"

पार्वती दादी ने कहा, "बेटी, हो गया। दुर्जन भी मर गया।"

भगवती दादी ने ज़मीन पर पड़ी राख को देखा।

"बेटी, यह राख को कल कुंड में डालना। बाबा के साथ। ताकि सब एक साथ शांति पाएँ।"

आरोही ने कहा, "दादी, पर दुर्जन एक बुरा आदमी था। उसकी राख बाबा के साथ?"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, हाँ। क्योंकि उसकी आत्मा को भी शांति चाहिए। बुरा हो या अच्छा — अंत में सब को शांति ज़रूरी।"

आरोही ने सिर हिलाया।

रोहित ने कहा, "दीदी, आप बहुत बहादुर हैं।"

आरोही ने कहा, "बेटा, तू भी। तू ने पंद्रह साल की उम्र में यह देखा। और डरा नहीं।"

रोहित ने कहा, "दीदी, मेरी नानी ने मुझे बताया। कि आप ने उन्हें भी बचाया। और मेरी जान भी।"

आरोही ने पार्वती दादी की तरफ़ देखा।

पार्वती दादी की आँखों में आँसू।

रात के दो बजे।

सब घर के अंदर आ गए।

चाय बनी।

आरोही ने कहा, "दादी, अब कुछ और तो नहीं?"

भगवती दादी ने सोचा।

"बेटी, मुझे नहीं पता। पर एक बात। शिवनाथ शर्मा की चिट्ठी में सिर्फ़ दुर्जन का नाम था। और कोई शिष्य नहीं। तो शायद अब कुछ नहीं।"

पार्वती दादी ने कहा, "बेटी, पर सतर्क रहना। अगर देवीदास ने कई शिष्य बनाए, तो..."

आरोही ने कहा, "दादी, मुझे लगता है — अब सब शांत है। दुर्जन आया क्योंकि वह देवीदास के बहुत क़रीब था। बाक़ी शिष्य — अगर हैं — शायद इतने प्रबल नहीं।"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, हाँ। शायद तू सही है।"

पर मन में एक बात थी।

आरोही ने कहा, "दादी, माँ, एक बात है। आज रात मैंने दुर्जन के चेहरे पर एक और चीज़ देखी।"

"क्या बेटी?"

"उसके गले में एक ताबीज़ था। पीला। सोने का। जिस पर एक शब्द लिखा था — जिसे मैंने ग़ौर से नहीं पढ़ा।"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, चलो देखते हैं। अगर वह ताबीज़ राख में है।"

चारों बरामदे पर गए।

आरोही ने ग़ौर से राख को देखा।

एक चीज़ चमक रही थी।

एक सोने का ताबीज़।

आरोही ने उठाया।

पीला। सोने का। पर उस पर एक अजीब सा शब्द।

"चंद्रा।"

आरोही की आँखें फैलीं।

चंद्रा।

एक और नाम।

क्या यह किसी और शिष्य का था? या किसी और शिकार का?

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, चंद्रा नाम मैंने पहले सुना है।"

"कहाँ?"

भगवती दादी ने कहा, "मेरी दादी की सहेली थी। नाम — चंद्रा देवी। जो 1979 में गुम हुई थीं। पर वह तेरहवीं नहीं थीं। बल्कि पैंतीस साल की एक शादीशुदा औरत। हम सब सोचते थे — वह भाग गईं। पति के साथ झगड़ा हुआ था।"

आरोही ने कहा, "दादी, तो शायद वह भागी नहीं। मारी गईं। दुर्जन ने।"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, हो सकता है। पर तब बाबा को नहीं पता चला।"

आरोही ने कहा, "दादी, तो शायद दुर्जन ने कई और लोगों को मारा। जो हमें नहीं पता।"

भगवती दादी की आँखों में आँसू।

पार्वती दादी ने कहा, "बेटी, अब सब ख़त्म। सोचना बंद।"

आरोही ने ताबीज़ को अपने बैग में डाला।

रात के तीन बजे।

आरोही अपने कमरे में गई।

बहुत थकी हुई। पर मन में बेचैनी।

क्या दुर्जन का अंत सचमुच सब कुछ ख़त्म कर देगा?

या और भी कुछ है?

आरोही ने नोटबुक खोली।

पर पन्ना कोरा।

नानी नहीं आईं।

आरोही ने आँखें बंद कीं।

बहुत देर तक।

फिर उसने बैग से चंद्रा वाला ताबीज़ निकाला।

ग़ौर से देखा।

ताबीज़ पर एक और चीज़ थी। पीछे। जो पहले नहीं देखी।

एक तारीख़।

"1979 - अक्टूबर 24।"

आरोही की आँखें फैलीं।

आज 25 अक्टूबर था।

कल — 24 अक्टूबर — चंद्रा की मौत का दिन था।

एक और तेरहवीं।

पर यह तेरहवीं की तरह नहीं।

एक और श्राप।

एक और शिकार।

आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ा।

रत्नपुर की कहानी अभी पूरी नहीं थी।

पर आज रात के लिए बस।

आरोही ने बिस्तर पर आँखें बंद कीं।

नींद जल्दी आ गई।

पर सपने में उसने एक और औरत देखी। जिसे वह नहीं जानती थी। लंबे बाल। शादीशुदा। लाल जोड़ा। पर आँखों में एक अजीब सा दर्द।

औरत ने आरोही से कहा — "बेटी, मैं चंद्रा हूँ। मुझे भी मुक्त करना।"

फिर सपना टूटा।

आरोही ने आँखें खोलीं।

बाहर सुबह हो रही थी।

26 अक्टूबर।

पहले जो शांति थी, वह अब बिखर गई।

एक और कहानी।

एक और श्राप।

एक और लड़ाई।

पर आरोही तैयार थी।

क्योंकि वह अब आरोही सिर्फ़ नहीं थी।

वह बारह बहनों की बहन। मालती की वंशज। और अब — शायद चंद्रा की भी उम्मीद।

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