PretikaPsychological Horrorतेरहवीं अमावस

भाग 18 : विदाई और अजीब सी शांति

Piyashi Atma · Psychological Horror · 17 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
18 of 23
Category
Psychological Horror
Reading time
17 min
Words
3220
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

24 अक्टूबर 2026। दोपहर।

रत्नपुर में एक अजीब सी शांति थी। पहली बार बरसों में।

आरोही, माँ, भगवती दादी — तीनों बाबा की झोपड़ी के पास पहुँचीं। बाबा की समाधि बनाने का काम शुरू हो गया था। गाँव के आठ आदमी मिलकर पत्थर लगा रहे थे।

आरोही ने ग़ौर से देखा। इन आदमियों को उसने पहले नहीं देखा था। बरसों तक ये अपने घरों में छिपे रहे थे। पर आज बाहर आ गए थे। कंधे से कंधा मिलाकर।

एक आदमी ने आरोही से कहा, "बेटी, हम बाबा का ऋण नहीं चुका सकते। पर उनकी समाधि हम अपने हाथों से बनाएँगे।"

आरोही ने सिर हिलाया।

पास ही एक बड़ा गड्ढा खोदा जा रहा था। कुसुम के शरीर के लिए।

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, कुसुम का अंतिम संस्कार हमें आज ही करना होगा। पंडित की समाधि के पास। दोनों साथ रहेंगे। हमेशा के लिए।"

आरोही ने कहा, "दादी, ठीक है।"

तीनों पंडित परिवार के घर पहुँचीं। कुसुम का शरीर वहीं था — जहाँ रात को उठाकर लाई थीं। पीपल के पेड़ के नीचे।

आरोही ने कुसुम के चेहरे पर देखा।

एक अजीब सी शांति थी। जो बरसों से नहीं थी।

आरोही ने माँ से कहा, "माँ, कुसुम चाची का जीवन बहुत दर्दनाक था।"

माँ ने कहा, "बेटी, हाँ। पंद्रह साल पहले असली कुसुम मर चुकी थीं। पंडित ने ही मारा। पर उसका शरीर मालती की आत्मा ने बरसों तक धारण किया। तेरे लिए। इस दिन के लिए।"

आरोही की आँखों में आँसू।

दोपहर तीन बजे। कुसुम का अंतिम संस्कार।

गाँव के लोगों ने मिलकर लकड़ियाँ इकट्ठा कीं। एक बड़ी चिता बनाई। पंडित की समाधि के बगल में। आठ आदमी लकड़ी लाए। दो औरतों ने घी, अगरबत्ती, और चंदन का तेल।

आज पहली बार गाँव में कोई अंतिम संस्कार इस तरह हुआ था — बरसों में। पहले तो लोग अपने-अपने घर में डर के मारे बंद रहते थे। आज सब बाहर आए। साथ खड़े हुए।

पर एक अजीब बात थी। जब कुसुम का शरीर चिता पर रखा गया, तो शरीर हल्का लग रहा था। बहुत हल्का। जैसे उसमें कुछ भी नहीं था। बस एक ख़ोल।

आरोही ने मुखाग्नि दी। कुसुम की कोई बेटी या पोती नहीं थी। भगवती दादी ने कहा — "बेटी, तू यह करो। तू ही कुसुम की भतीजी है। तेरी नानी उनकी भाभी थीं।"

आरोही ने आग लगाई। हाथ काँप रहे थे। पर मन शांत।

चिता जली। लपटें ऊँची उठीं। धुआँ आकाश में गया।

पर एक अजीब बात हुई।

चिता से एक अजीब सी सुगंध निकली। चमेली के फूल की। बिल्कुल वही जो आरोही ने चौथी रात अपने कमरे में महसूस की थी। जब पार्वती देवी ज़हर लेकर आई थीं।

आरोही ने माँ की तरफ़ देखा।

माँ ने भी महसूस किया।

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, यह मालती की सुगंध है। शायद वे भी अपनी विदाई ले रही हैं।"

आरोही ने आग की तरफ़ देखा।

लपटों में एक क्षण के लिए एक आकृति दिखी। दो औरतें। एक अधेड़ (मालती)। एक जवान (असली कुसुम)। हाथ पकड़े। मुस्कुरा रही थीं।

फिर आकृति गायब हुई।

आरोही ने आँखें बंद कीं।

अलविदा कुसुम।

अलविदा मालती।

पंडित की समाधि पर हाथ रखा।

"पंडित जी, आपका परिवार अब पूरा है। आर्यन, कुसुम — सब आपके पास हैं। आप शांति से रहिए।"

एक हल्की हवा।

जैसे पंडित ने जवाब दिया हो।

शाम को गाँव में एक बड़ी सभा हुई। पीपल के पेड़ के नीचे। जहाँ रात को हवन हुआ था।

पूरे गाँव के लोग इकट्ठे हुए। शायद 400। हर परिवार से कोई न कोई। बच्चे भी। जो बरसों से गाँव के बाहर नहीं निकले थे। बच्चों की आँखों में एक अजीब सी हैरानी थी। शायद उन्होंने पहली बार इतने लोगों को एक साथ देखा था। बरसों तक हर परिवार अपने अंदर सिमटा रहा।

एक बूढ़ा आदमी खड़ा हुआ। सफ़ेद कपड़ों में। उसे सब गाँव के मुखिया मानते थे। नाम था — रघुनाथ सिंह। पंचानवे साल के। पर आज उनकी आवाज़ में एक नई ऊर्जा थी।

"भाइयो-बहनो, आज हमारे गाँव पर से एक बड़ा बोझ उतरा है। 180 साल का बोझ। मालती से लेकर मीरा तक — तेरह बलिदान। आज सब मुक्त हुईं। और यह सब हुआ इस बेटी की वजह से।"

मुखिया ने आरोही की तरफ़ इशारा किया।

पूरे गाँव ने ताली बजाई। कई लोगों की आँखों में आँसू।

आरोही खड़ी हुई। उसकी माँ पीछे। भगवती दादी बगल में।

"भाइयो-बहनो, मैंने अकेले कुछ नहीं किया। मेरी माँ, भगवती दादी, पार्वती दादी, बाबा, पंडित जी, आर्यन, कुसुम चाची — सब ने अपना योगदान दिया। और सबसे बड़ी बात — बारह बहनों और मालती की शक्ति। मैं तो बस एक माध्यम थी।"

मुखिया ने कहा, "बेटी, तेरी विनम्रता सराहनीय है। पर तू ही हमारी असली नायिका है।"

आरोही ने आगे कहा, "एक बात मैं वादा करती हूँ। हर साल कार्तिक अमावस को मैं यहाँ आऊँगी। एक हवन करने। सब मुक्त हुई बहनों को याद करने। ताकि कभी कोई भी उन्हें भूले नहीं।"

मुखिया ने कहा, "बेटी, यह हमारा सौभाग्य होगा। और हम एक और चीज़ करेंगे। हम गाँव के बीच में एक स्मारक बनाएँगे। तेरह नामों का। मालती। रुक्मिणी। तुलसी। लक्ष्मी। कौशल्या। पार्वती। कमला। राधा। चंपा। जानकी। सुनीता। रोहिणी। मीरा। ताकि हर आने वाली पीढ़ी उन्हें जाने।"

आरोही ने कहा, "बहुत अच्छा।"

एक और आदमी खड़ा हुआ। कुमार परिवार से। मीरा का चचेरा भाई।

"बहन, मेरी बहन मीरा। मैं तेरा एहसान कभी नहीं भूलूँगा।"

एक-एक करके कई परिवारों के लोग खड़े हुए। हर एक ने अपनी बात कही। जोशी परिवार। रावत परिवार। नेगी परिवार। बिष्ट परिवार। पंत परिवार। मेहरा परिवार।

आरोही ने सब को सुना।

फिर मुखिया ने कहा, "बेटी, अब तुझे कुछ कहना है?"

आरोही ने कहा, "एक बात। कोई भी लड़की जो इस गाँव में पैदा हो — उसे कभी डराना मत। उसे बताना — तू तेरहवीं नहीं है। तू आज़ाद है। तू जो चाहे वो कर सकती है। यह मेरा आग्रह है।"

पूरे गाँव ने सिर हिलाया।

फिर एक बूढ़ी औरत — जोशी परिवार से, जो सुबह भी आई थीं — खड़ी हुईं।

"बेटी, मुझे एक बात कहनी है।"

"जी दादी?"

"मेरी बहू पिछले महीने गर्भवती हुई है। लड़की होगी। मुझे डर था। मैंने कहा — गर्भपात कराओ। पर अब मैं ख़ुश हूँ। मेरी पोती जीएगी। बड़ी होगी। शादी करेगी। और मेरी उम्मीद बनेगी।"

पूरे गाँव में एक अजीब सी ख़ुशी की लहर।

आरोही ने बूढ़ी औरत के पास जाकर उनके पैर छुए।

"दादी, आपकी पोती का नाम क्या रखेंगी?"

बूढ़ी औरत ने कहा, "बेटी, मैंने सोच लिया है। 'आशा।' क्योंकि तूने हमें आशा दी।"

आरोही की आँखों में आँसू।

मुखिया ने कहा, "और भी बच्चे। सुनीता जो अभी-अभी गर्भवती है। कुछ महीने में बच्चा होगा। शायद लड़का। शायद लड़की। पर इस बार डर नहीं होगा।"

सुनीता — एक जवान औरत — खड़ी हुई। पेट पर हाथ। मुस्कुराई।

"बेटी, धन्यवाद।"

एक-एक करके कई और परिवार खड़े हुए। हर एक ने अपनी कहानी बताई। हर एक ने आरोही को धन्यवाद कहा।

आरोही ने माँ की तरफ़ देखा।

माँ की आँखों में आँसू।

पर मुस्कान भी।

रात हो गई।

24 अक्टूबर की रात। पहली बार बरसों में गाँव में एक शांत रात।

आरोही, माँ, भगवती दादी — भगवती दादी के घर वापस पहुँचीं।

घर में एक अजीब सी ख़ालीपन था। बाबा नहीं थे। कुसुम नहीं थीं। पर एक शांति थी।

भगवती दादी ने खाना बनाया। तीनों ने साथ खाया।

पर बहुत कम खाया। थकान से।

खाने के बाद माँ ने कहा, "बेटी, कल हम दिल्ली के लिए निकलें?"

आरोही ने कहा, "माँ, कल क्यों? अभी हम भगवती दादी को अकेला नहीं छोड़ सकते।"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, तू फ़िक्र मत कर। मैं अकेली नहीं। पूरा गाँव मेरे साथ है। और मीरा भी — पायल में। तू जा। तेरे पिताजी भी इंतज़ार कर रहे होंगे।"

आरोही ने कहा, "दादी, पाँच दिन और रुकना चाहती हूँ। बाबा का श्राद्ध हो जाए। कुसुम का श्राद्ध हो जाए। और मैं गाँव के लोगों से बात करना चाहती हूँ।"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, ठीक है।"

माँ ने कहा, "मैं भी तेरे साथ रहूँगी।"

रात के दस बजे। आरोही अपने कमरे में गई।

बहुत दिनों बाद उसे नींद आ रही थी। असली नींद। जिसमें डर नहीं। बुरे सपने नहीं।

पर बिस्तर पर लेटते ही उसने कुछ अजीब सा महसूस किया।

खिड़की के बाहर से हवा आ रही थी। सामान्य हवा। पर उस हवा में एक बात थी। कुछ कह रही थी। बहुत धीरे।

आरोही ने खिड़की खोली। बाहर देखा।

गाँव सुनसान था। पर शांत।

पर तभी उसने एक चीज़ देखी।

पीपल के पेड़ के नीचे। एक साया। अकेला। खड़ा। आरोही की तरफ़ देख रहा।

आरोही ने ग़ौर से देखा।

पर साया इतनी दूर था कि पहचानना मुश्किल था।

क्या यह कोई गाँव वाला था? या कुछ और?

आरोही ने ताबीज़ को छाती पर रखा। जो अभी भी उसके पास था।

ताबीज़ ठंडा। यानी कोई भूत नहीं। कोई इंसान।

पर कौन?

आरोही ने कुछ देर देखा। साया हिला नहीं। बस देखता रहा।

फिर धीरे-धीरे मुड़ा। और अँधेरे में गुम हो गया।

आरोही ने खिड़की बंद की।

बिस्तर पर आई।

सोने की कोशिश की। पर साये का चेहरा आँखों में घूम रहा था।

क्या रत्नपुर की कहानी अभी पूरी नहीं हुई थी?

आरोही ने अपने आप को समझाया — शायद कोई गाँव वाला था। कुछ नहीं।

पर मन में एक हल्की सी बेचैनी।

अगली सुबह।

25 अक्टूबर।

आरोही उठी। नीचे उतरी।

भगवती दादी और माँ रसोई में थीं। चाय बना रही थीं।

आरोही ने कहा, "दादी, कल रात मैंने पीपल के पेड़ के नीचे किसी को देखा।"

भगवती दादी ने चौंककर देखा।

"कौन बेटी?"

"पता नहीं। एक साया। इंसान। पर बहुत देर तक खड़ा रहा। मुझे देख रहा था।"

भगवती दादी ने सोचा।

"बेटी, शायद कोई गाँव वाला हो। नई शांति में लोग रात को बाहर निकल रहे हैं। शायद पीपल के पेड़ के पास आया हो।"

माँ ने कहा, "पर आरोही की तरफ़ क्यों देख रहा था?"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी शायद यह देखने कि हम ठीक हैं। कल तो पूरे गाँव ने आरोही को देखा।"

आरोही ने कहा, "शायद।"

पर मन में बेचैनी बनी रही।

दोपहर। आरोही और माँ गाँव में घूमीं। जो पहले सुनसान था, आज ज़िंदा।

बच्चे खेल रहे थे। दुकानें खुल गई थीं। कोई मंदिर की तरफ़ जा रहा था। कोई खेत की तरफ़।

एक छोटा लड़का आरोही के पास आया। शायद आठ साल का। हाथ में एक फूल।

"दीदी, यह आपके लिए।"

आरोही ने फूल लिया। मुस्कुराई।

"थैंक यू बेटा। तुम्हारा नाम?"

"मेरा नाम रोहन है। मेरी माँ ने कहा — दीदी को फूल देना। क्योंकि दीदी ने हमें बचाया।"

आरोही ने रोहन के सिर पर हाथ रखा।

रोहन भाग गया।

आरोही ने माँ की तरफ़ देखा।

"माँ, यह बच्चे बड़े होंगे तो कहानी बताएँगे। मालती से लेकर मीरा तक की। यह भी सुनाएँगे कि कैसे एक तेरहवीं ने सब को मुक्त कराया।"

माँ ने कहा, "बेटी, हाँ। और तेरी कहानी सदियों तक रहेगी।"

दोनों गाँव के बाज़ार से गुज़रीं। छोटी सी बाज़ार। दस-बारह दुकानें। सब खुली।

एक चाय की दुकान पर बूढ़ा दुकानदार बैठा था। आरोही को देखकर उसने चाय बनाई। बिना कहे।

"बेटी, यह चाय तेरे लिए। मेरी तरफ़ से।"

आरोही ने कहा, "काका, पैसे..."

बूढ़े ने कहा, "बेटी, आज पैसे नहीं। आज तेरे लिए यह मुफ़्त।"

आरोही ने चाय ली। पीया। स्वादिष्ट। बरसों बाद इतनी अच्छी चाय पी।

एक दुकान — गहनों की — भी खुली थी। दुकानदार ने आरोही को बुलाया।

"बेटी, इधर आ।"

आरोही गई।

दुकानदार ने एक छोटा सा चाँदी का पेंडेंट निकाला। उस पर एक चंद्रमा उकेरा था। पर पूरा। पूर्णिमा का।

"बेटी, यह तेरे लिए। तूने हमें अमावस से पूर्णिमा दी। तेरी पहचान।"

आरोही ने पेंडेंट लिया। गले में डाला।

दुकानदार ने भी पैसे नहीं लिए।

आरोही और माँ आगे बढ़ीं।

आरोही और माँ पंडित परिवार के घर पहुँचीं। जो अब ख़ाली था। कोई नहीं। पंडित मरे। कुसुम मरीं। आर्यन दो साल पहले मरा। पूरा परिवार ख़त्म।

आरोही ने घर के अंदर देखा।

धूल। बरसों की। सब चीज़ें जहाँ थीं वहीं।

आरोही ने कहा, "माँ, यह घर अब क्या होगा?"

माँ ने कहा, "बेटी, गाँव को दे देंगे। कोई ज़रूरतमंद परिवार यहाँ रहेगा।"

आरोही ने कहा, "माँ, यह ठीक होगा।"

तभी आरोही ने कुछ देखा।

पंडित की परदादी की अलमारी। जो अब खुली थी।

आरोही ने पास जाकर देखा। अलमारी में कुछ चीज़ें अभी बचीं थीं। कुछ पुरानी किताबें। कपड़े। और एक छोटी सी लकड़ी की डिबिया।

आरोही ने डिबिया निकाली। खोली।

अंदर एक पुराना पत्र था। बहुत पीला। लगभग टूटने वाला।

आरोही ने पढ़ा। संस्कृत में।

"जो पढ़े — मैं शिवनाथ शर्मा हूँ। 1870। मेरी भाभी रुक्मिणी मर गई। पर देवीदास अकेला तांत्रिक नहीं है। उसका एक शिष्य है। जो आज भी ज़िंदा है। जिसका नाम — 'दुर्जन।' उसे भी बंधन करना होगा। नहीं तो देवीदास की मौत के बाद वह अपना काम पूरा करेगा।"

आरोही की आँखें फैलीं।

"माँ, यह देखिए।"

माँ ने पढ़ा।

माँ के चेहरे पर एक अजीब सा भाव आया।

"बेटी, यह... यह क्या है?"

आरोही ने कहा, "माँ, देवीदास का एक शिष्य था। दुर्जन। जो शायद अभी भी ज़िंदा है।"

माँ ने कहा, "बेटी, पर 1870 का शिष्य आज कैसे ज़िंदा होगा?"

आरोही ने कहा, "माँ, देवीदास 200 साल ज़िंदा था। शायद उसके शिष्य को भी अमरता का कोई तरीक़ा दिया हो।"

माँ की छाती में एक तेज़ धड़कन।

"बेटी, यह... यह ख़तरा है।"

आरोही ने पत्र को अपने बैग में डाला।

"माँ, हमें बाबा से बात करनी होगी।"

फिर याद आया।

बाबा नहीं थे।

आरोही ने आँखें बंद कीं।

"माँ, हम भगवती दादी से बात करेंगे।"

घर पहुँचकर आरोही ने भगवती दादी को पत्र दिखाया।

भगवती दादी ने पढ़ा।

बहुत देर तक चुप रहीं।

फिर बोलीं, "बेटी, मैंने कभी दुर्जन नाम नहीं सुना। पर अगर शिवनाथ शर्मा ने लिखा है, तो सच होगा।"

आरोही ने कहा, "दादी, तो हम क्या करें?"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, तू दिल्ली जा। यह पत्र अपने साथ ले। और देखते हैं। शायद दुर्जन अभी भी ज़िंदा है। शायद नहीं। पर हमें सतर्क रहना होगा।"

आरोही ने कहा, "दादी, अगर वह ज़िंदा है, तो अगला हमला मुझ पर हो सकता है।"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, अगर वह ज़िंदा है, तो अगला हमला मुझ पर हो सकता है।"

आरोही ने कहा, "दादी, नहीं। दुर्जन दिल्ली में है। तेरहवीं की रात मैंने महसूस किया — कुछ अजीब था। शायद वह दिल्ली से देख रहा था।"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, तेरहवीं की रात मैंने भी कुछ महसूस किया। पीपल के पेड़ के नीचे। जब मैं और पार्वती दादी मंत्र पढ़ रही थीं। एक बार अजीब सी हवा आई। जिसमें एक अजनबी की उपस्थिति थी। पर वह देवीदास की नहीं थी। मैंने सोचा — कुसुम। पर कुसुम अलग थी। यह कुछ और था। मैंने ग़ौर नहीं दिया।"

आरोही ने कहा, "दादी, वह दुर्जन हो सकता है।"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, हाँ।"

माँ ने पूछा, "पर दुर्जन इतने साल कहाँ था?"

आरोही ने कहा, "माँ, अगर वह देवीदास का शिष्य था, तो शायद देवीदास ने ही उसे कहीं छिपाया। दिल्ली में। पर क्यों?"

भगवती दादी ने सोचा।

"बेटी, शायद देवीदास ने दुर्जन को दिल्ली में एक और श्राप बनाने के लिए भेजा। जैसे रत्नपुर में एक श्राप था, वैसा ही दिल्ली में। पर हमें नहीं पता।"

आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।

अगर दिल्ली में भी कोई श्राप है, तो...

तो शायद वहाँ भी लड़कियाँ मरी हैं।

बरसों से।

पर किसी ने ग़ौर नहीं किया।

क्योंकि दिल्ली बहुत बड़ी है। लोग गुम हो जाते हैं। कोई पूछता नहीं।

आरोही ने कहा, "दादी, मुझे दिल्ली पहुँचकर तुरंत यह पता करना होगा।"

भगवती दादी ने कहा, "बेटी, हाँ। पर सावधानी से। दुर्जन तुझे देख रहा होगा। तेरे हर क़दम को।"

रात हो गई।

आरोही अपने कमरे में गई।

नोटबुक खोली।

पर पन्ना कोरा था। नानी नहीं आईं।

आरोही ने ज़ोर से कहा, "नानी, अगर आप हैं, तो जवाब दीजिए। दुर्जन कौन है?"

पर कोई जवाब नहीं।

आरोही ने आँखें बंद कीं।

बहुत देर तक बैठी रही।

फिर एक कोमल आवाज़ आई।

पर नानी की नहीं।

एक और औरत की।

"बेटी, तू मेरा नाम भूल गई?"

आरोही ने चौंककर देखा।

कमरे में कोई नहीं था।

पर आवाज़ फिर आई।

"बेटी, मैं मालती हूँ। मेरी आत्मा अभी पूरी तरह से नहीं गई। कुछ बातें बाक़ी हैं। कुछ राज़ जो तुझे बतानी हैं।"

आरोही ने कहा, "मालती दीदी, आप कहाँ हैं?"

"बेटी, मैं तेरे पास हूँ। अदृश्य। बहुत जल्दी जाऊँगी। पर उससे पहले तुझे एक बात बतानी है।"

आरोही ने कहा, "क्या मालती दीदी?"

मालती की आवाज़ ने कहा, "बेटी, दुर्जन ज़िंदा है। मैंने उसे देखा है। बरसों तक कुसुम के शरीर में रहते हुए। वह देवीदास के साथ था। पर उसका रूप बदलता रहता है। कभी बूढ़ा। कभी जवान। कभी औरत। कभी आदमी।"

आरोही ने चौंककर पूछा, "मालती दीदी, वह कहाँ है?"

मालती ने कहा, "बेटी, वह दिल्ली में है। अभी। तेरा इंतज़ार कर रहा है।"

आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।

"मालती दीदी, वह मुझे क्यों?"

मालती ने कहा, "बेटी, वह देवीदास का प्रिय शिष्य था। देवीदास की मौत का बदला वह ज़रूर लेगा। और वह जानता है — तूने ही देवीदास को मारा।"

आरोही ने कहा, "मालती दीदी, तो मैं क्या करूँ?"

मालती की आवाज़ ने कहा, "बेटी, दिल्ली जा। पर सावधान रह। दुर्जन तेरे क़रीब आ जाएगा। किसी न किसी रूप में। तुझे उसे पहचानना होगा।"

आरोही ने पूछा, "मालती दीदी, वह कैसा दिखेगा?"

मालती ने कहा, "बेटी, मुझे नहीं पता। वह रूप बदलता है। पर एक बात — उसकी आँखें कभी नहीं बदलतीं। भूरी। पर उनमें एक अजीब सी लाल चमक। जो सिर्फ़ रात को दिखती है।"

आरोही ने कहा, "मालती दीदी, आप मेरी मदद करेंगी?"

मालती ने कहा, "बेटी, मैं अब जा रही हूँ। मेरा समय पूरा हो गया। पर मैं तेरे लिए एक चीज़ छोड़ रही हूँ।"

एक कोमल हवा।

फिर आरोही के पैर के पास एक छोटी सी चीज़ गिरी।

आरोही ने उठाया।

एक अंगूठी।

बहुत पुरानी। तांबे की। पर इस पर 'मालती' नाम नहीं। कुछ और।

आरोही ने ग़ौर से देखा।

अंगूठी पर लिखा था — 'दुर्जन।'

आरोही की आँखें फैलीं।

मालती ने कहा, "बेटी, यह अंगूठी दुर्जन की है। मैंने बरसों पहले चुरा ली थी। कुसुम के शरीर में रहते हुए। यह उसकी कमज़ोरी है। जैसे मालती की अंगूठी देवीदास की कमज़ोरी थी।"

आरोही ने कहा, "मालती दीदी, मैं इसका क्या करूँ?"

मालती ने कहा, "बेटी, इसे संभालकर रख। जब दुर्जन तेरे सामने आए, तो इसे तोड़ना। यह उसकी शक्ति को ख़त्म करेगा।"

आरोही ने कहा, "मालती दीदी, धन्यवाद।"

"बेटी, अलविदा।"

फिर हवा शांत।

मालती चली गईं।

पर एक बात और थी।

आरोही ने कमरे में देखा।

नानी की नोटबुक पर एक नई पंक्ति उभर रही थी।

"बेटी, मालती सच बोल रही है। दुर्जन दिल्ली में है। पर उसकी पहचान मैं अभी नहीं दे सकती। तेरा अपना अनुभव तुझे बताएगा। सावधान रह।"

आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।

तो नानी भी अभी पूरी तरह से नहीं गई थीं।

अच्छा।

आरोही ने अंगूठी को अपने बैग में डाला।

अब उसके पास दुर्जन को हराने की एक चीज़ थी।

पर दुर्जन दिल्ली में था।

और आरोही परसों वहीं जा रही थी।

आरोही ने खिड़की खोली। बाहर देखा।

रात साफ़ थी। तारे। पर एक बात अजीब।

पीपल के पेड़ के नीचे — फिर से।

एक साया।

पर आज नज़दीक।

और आरोही की तरफ़ हाथ हिला रहा।

आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ा।

ताबीज़ ठंडा। इंसान।

पर आज आरोही ने पहचान लिया।

साया ने अपना चेहरा एक क्षण के लिए दिखाया।

एक जवान लड़का। बीस साल का। सुंदर। पर आँखें अजीब।

भूरी। पर लाल चमक।

आरोही ने पहचान लिया।

दुर्जन।

पर वह दिल्ली में नहीं था।

वह रत्नपुर में था।

आरोही की तरफ़ आ रहा था।

आरोही ने खिड़की बंद की। पर देर हो चुकी थी।

दुर्जन ने आरोही को देख लिया।

और आरोही ने उसे।

अब लड़ाई फिर से शुरू।

पर इस बार एक अकेले शिष्य के साथ।

अपने गुरु के बदले के लिए।

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