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भाग 17 : आत्माओं की मुक्ति
Piyashi Atma · Psychological Horror · 15 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- तेरहवीं अमावस
- Chapter
- 17 of 23
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 15 min
- Words
- 2845
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
माँ चीखी।
"बेटी!"
आरोही ज़मीन पर पड़ी थी। साँसें नहीं आ रही थीं। चेहरा पीला। आँखें बंद।
माँ दौड़कर उसके पास आईं। उसका सिर अपनी गोद में रखा। हाथ काँप रहे थे।
"बेटी, आँख खोल! आँख खोल बेटी!"
पर आरोही की आँखें बंद थीं। बदन ठंडा हो रहा था।
माँ ने अपनी छाती पर हाथ रखा। दिल की धड़कन तेज़ हो रही थी। शायद वह भी मर जाएँगी। बेटी के साथ।
पर तभी — एक अजीब सी शांति। कमरे में।
तीसरे कमरे में एक अजीब सी शांति थी। देवीदास का बूढ़ा शरीर राख हो चुका था। ज़मीन पर बस एक सफ़ेद पाउडर बचा था। कुछ भी हिल नहीं रहा था। कोई हवा नहीं। कोई आवाज़ नहीं।
पर कमरे में कुछ और हो रहा था।
बारह शीशियाँ धीरे-धीरे टूट रही थीं। एक-एक करके। और हर शीशी से एक नीला धुँआ निकल रहा था।
पहली शीशी टूटी। रुक्मिणी की आत्मा बाहर आई। सफ़ेद कपड़ों में। पर अब लाल नहीं। साफ़ सफ़ेद। जैसे 156 साल का बोझ उतर गया हो।
रुक्मिणी की आत्मा माँ के पास आई।
"सुधा दीदी, आरोही ठीक है। बस उसकी आत्मा असली आरोही के साथ मिल रही है। एक क्षण लगेगा।"
माँ ने रोते हुए कहा, "रुक्मिणी, मेरी बेटी..."
रुक्मिणी ने कहा, "दीदी, मेरा शुक्रिया। 156 साल के बाद मुझे शांति मिली।"
रुक्मिणी की आत्मा हवा में उड़ी। ऊपर की तरफ़। और छत में गुम हो गई।
एक-एक करके सारी शीशियाँ टूटीं।
तुलसी। जब उसकी शीशी टूटी, वह छोटी लड़की खिलखिलाकर हँसी। बरसों बाद हँसी थी। "दीदी, अब मैं अपनी गुड़िया के पास जाऊँगी।"
लक्ष्मी। एक जवान लड़की। हाथ में एक फूल। "दीदी, धन्यवाद। मेरे परिवार को यह बताना।"
कौशल्या। शादी के जोड़े में। पर आज मुस्कुरा रही थी। "दीदी, बाबा को कहना — मैंने उन्हें माफ़ किया।"
पार्वती। "दीदी, मेरा भाई कहीं है? मुझे उसे देखना है।"
आरोही ने कहा, "पार्वती दीदी, आपका भाई अब नहीं है। पर आपकी परिवार वाले हैं। उनके पास जाओ।"
कमला। एक साधारण लड़की। "दीदी, धन्यवाद।"
राधा। "दीदी, मैं जा रही हूँ।"
चंपा। "दीदी, तेरा एहसान।"
जानकी (1978)। "दीदी, आज मैं भी घर जाऊँगी।"
सुनीता। "दीदी।"
रोहिणी। तेरह साल की। मासूम। "दीदी, मुझे मेरी माँ के पास ले जाना। किसी को बताना।"
आरोही ने कहा, "हाँ बहन।"
मीरा। शादी के जोड़े में। पर अब शांत। "दीदी, तू ठीक है ना?"
आरोही ने सिर हिलाया।
हर एक की आत्मा माँ और आरोही के पास आई। हर एक ने धन्यवाद कहा। हर एक ने आशीर्वाद दिया।
फिर सब हवा में गुम हुईं।
पर तेरहवीं शीशी अभी टूटी नहीं थी।
क्योंकि उसमें आरोही की असली आत्मा अभी भी थी।
आरोही की आत्मा तेरहवीं शीशी से निकलकर, धीरे-धीरे उसके शरीर में जा रही थी। असली आरोही अब आरोही बन रही थी। बरसों बाद।
माँ ने ग़ौर से देखा।
आरोही की छाती धीरे-धीरे हिलने लगी।
एक साँस।
फिर दो।
फिर आँखें।
आरोही ने आँखें खोलीं।
पर आँखें अब अलग थीं। पहले से गहरी। समझदार। जैसे कोई नई आत्मा उनके पीछे थी।
माँ की आँखों में आँसू आ गए।
"बेटी!"
आरोही ने माँ की तरफ़ देखा।
धीरे से बोली, "माँ..."
पर आरोही की आवाज़ में एक नई कँपन थी।
"माँ, मैं ज़िंदा हूँ।"
माँ ने आरोही को कसकर पकड़ा।
दोनों बहुत देर तक रोती रहीं।
फिर आरोही ने कहा, "माँ, मुझे कुछ अजीब लग रहा है।"
"क्या बेटी?"
"मुझे दो जीवन याद हैं। एक — मेरा। जो मैंने बरसों तक जीया। दिल्ली। पीएचडी। दोस्त। आप। पिताजी। दूसरा — असली आरोही का। जो शीशी में थी। जिसने बरसों तक तहख़ाने से बाहर की दुनिया नहीं देखी। पर सब कुछ महसूस किया।"
माँ ने कहा, "बेटी, अब तुम एक हो।"
आरोही ने अपने हाथ देखे। वे भी अलग लग रहे थे। पर उसके अपने।
आरोही ने कहा, "माँ, मुझे लगता है — मैं मरी नहीं। मैं जीवित हूँ। पर मैं भी अब सिर्फ़ मैं नहीं।"
माँ ने आरोही का हाथ पकड़ा।
"बेटी, तू मेरी बेटी है। जितनी पहले थी, उतनी अब भी। बस थोड़ी और गहरी।"
आरोही ने माँ को गले लगाया।
आरोही ने चारों तरफ़ देखा।
तीसरा कमरा अब बदल रहा था।
दीवारें हिल रही थीं। छत से पत्थर गिर रहे थे। धूल उड़ रही थी। नीली आग जो कमरे में जल रही थी, अब बुझ रही थी। एक-एक करके।
तहख़ाना ढह रहा था।
देवीदास की मौत के साथ, उसका पूरा घर भी नष्ट हो रहा था।
आरोही ने कहा, "माँ, भागना होगा। जल्दी।"
माँ ने कहा, "बेटी, दरवाज़ा?"
आरोही ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। तीसरे कमरे का दरवाज़ा जो कुसुम के आने से खुला था — अब आधा बंद हो रहा था।
आरोही ने माँ का हाथ पकड़ा।
पर एक क्षण के लिए आरोही रुकी। तेरहवीं शीशी की तरफ़ देखा। जिसमें उसकी असली आत्मा थी। अब खाली।
फिर देवीदास की राख की तरफ़ देखा।
फिर टूटी हुई अंगूठी। रुक्मिणी की दो चूड़ियाँ अभी भी उस पर थीं।
आरोही ने चूड़ियाँ नहीं छुईं। छोड़ दीं।
क्योंकि वे अब रुक्मिणी की थीं। और रुक्मिणी अब मुक्त थी।
दोनों दौड़ीं।
दरवाज़े से बाहर निकलीं।
पीछे तीसरा कमरा ढह गया। एक बड़ा धमाका। पत्थर के टुकड़े हवा में उड़े।
दूसरे कमरे — जो सुरंग थी — में आरोही और माँ ने दौड़ना जारी रखा।
सुरंग की दीवारें भी हिल रही थीं। बारह चेहरे जो पहले उकेरे हुए थे — वे अब दीवारों से गायब हो रहे थे। एक-एक करके। जैसे उन्होंने अपनी शक्ति दे दी हो।
पर एक चेहरा अभी भी बचा था।
मालती।
मालती की आत्मा दीवार से बाहर आई।
"बच्ची, रुक।"
आरोही और माँ रुक गईं।
मालती ने कहा, "बच्ची, मैं तेरे साथ आ रही हूँ। बाहर। कुसुम के पास। मेरा एक काम बाक़ी है।"
आरोही ने कहा, "क्या मालती दीदी?"
मालती ने कहा, "बच्ची, कुसुम का शरीर बरसों से मेरे साथ है। अब जब मैं बाहर हूँ, कुसुम का शरीर मर जाएगा। पर उससे पहले मुझे उसकी अंतिम इच्छा पूरी करनी है।"
"क्या इच्छा?"
"असली कुसुम की आत्मा — जो बरसों पहले मरी — उसकी अंतिम इच्छा थी कि आर्यन को उसकी माँ मिले। मरने से पहले वह चाहती थी कि उसका बेटा जान ले — उसकी माँ उसे प्यार करती थी।"
आरोही ने कहा, "पर मालती दीदी, आर्यन तो..."
मालती ने कहा, "आर्यन की आत्मा मुक्त हो चुकी है। पर अभी वह इस दुनिया में है। तेरहवीं की रात के अंत तक। मैं उसे कुसुम के शरीर में एक क्षण के लिए रखूँगी। ताकि वह अपनी माँ से मिल सके।"
आरोही की आँखों में आँसू आए।
"मालती दीदी, आप बहुत अच्छी हैं।"
मालती ने कहा, "बच्ची, अब चल। सुरंग ढह रही है।"
तीनों दौड़ीं।
आरोही और माँ ने पहले कमरे में पहुँची।
पहला कमरा भी ढह रहा था। बारह चूड़ियों की टोकरी अब खाली थी। क्योंकि सारी बहनें मुक्त हो चुकी थीं।
आरोही ने अपने बैग से पाँच चूड़ियाँ निकालीं। जो उसने पहले लीं थीं। उन्हें ज़मीन पर रखा। और मन में कहा —
"कमला, राधा, चंपा, जानकी, और अनजान बहन — तुम सब अब मुक्त। घर जाओ।"
पाँच चूड़ियाँ एक-एक करके गायब हुईं।
आरोही ने माँ का हाथ पकड़ा।
दोनों सीढ़ियों की तरफ़ भागीं।
पीछे मालती की आत्मा।
पहला कमरा ढह गया।
दोनों सीढ़ियाँ चढ़ीं।
मंदिर के अंदर पहुँचीं।
देवी की मूर्ति की तरफ़ देखा।
रुक्मिणी का चेहरा अब ग़ायब था। मूर्ति अब असली देवी की थी। शांत। सुंदर।
आरोही ने देवी को प्रणाम किया।
फिर माँ और आरोही मंदिर से बाहर आईं।
बाहर एक अजीब सी शांति थी।
अमावस की रात। पर आसमान अब पहले जैसा काला नहीं। बादल हट गए थे। तारे दिख रहे थे।
पीपल के पेड़ के पास कुंड अभी भी जल रहा था। पर आग नीली नहीं। साफ़ पीली।
भगवती दादी और पार्वती देवी बैठी थीं। चोटिल। पर ज़िंदा।
पेड़ के नीचे कुसुम बेहोश पड़ी थीं। पास में रुक्मिणी की आत्मा।
आरोही और माँ भगवती दादी की तरफ़ दौड़ीं।
"दादी!"
भगवती दादी ने आँखें खोलीं।
"बेटी! तू..."
आरोही ने दादी को गले लगाया।
"दादी, हो गया। देवीदास मर गया। मीरा मुक्त हुई।"
भगवती दादी की आँखों से आँसू बहने लगे।
"मेरी मीरा..."
पायल की झनझनाहट।
मीरा की आवाज़ आई।
"माँ, मैं जा रही हूँ। शांति की जगह। पर मैं हमेशा आपके साथ रहूँगी। जब भी आप पायल को छुएँगी, मैं यहीं हूँगी।"
भगवती दादी ने पायल छुई।
"मीरा, बेटी, जा। शांति से।"
एक कोमल आवाज़।
"माँ, अलविदा।"
फिर पायल ठंडी हुई।
आरोही ने पायल उतारी। भगवती दादी को दी।
"दादी, यह अब आप की। हमेशा।"
भगवती दादी ने पायल को छाती से लगाया।
पार्वती देवी ने कहा, "आरोही बेटी, तूने हमें सब बचा लिया।"
आरोही ने पार्वती देवी के पैर छुए।
"दादी, आप की मदद के बिना कुछ न होता।"
पार्वती देवी ने कहा, "बेटी, मेरा पोता ठीक है। कल सुबह उसका निशान गायब हो गया। मैंने ख़ुद देखा।"
आरोही ने कहा, "अच्छा।"
पार्वती देवी ने आगे कहा, "बेटी, एक बात है। कुसुम..."
आरोही ने कुसुम की तरफ़ देखा।
कुसुम अभी भी बेहोश थीं।
पर तभी मालती की आत्मा कुसुम के शरीर के पास गई।
एक धीमी सी नीली रोशनी।
मालती की आत्मा कुसुम के शरीर में समा गई।
पर यह मालती नहीं थी।
कुसुम की आँखें खुलीं। पर वह असली कुसुम थी। बरसों पहले मरी हुई कुसुम। जिसे मालती ने एक क्षण के लिए अपने शरीर में लिया था।
कुसुम ने आवाज़ की।
"आर्यन?"
आरोही ने चौंककर देखा।
तभी हवा में एक और आकृति उभरी।
आर्यन।
पर यह देवीदास वाला आर्यन नहीं था। यह असली आर्यन था। जो 2000 में मरा। जिसकी आत्मा बरसों तक क़ैद थी।
आर्यन ने अपनी माँ को देखा।
"माँ..."
कुसुम ने अपने बेटे को गले लगाया। एक क्षण के लिए। पर पूरे प्यार से।
"बेटा, मुझे माफ़ करना। मैं तुझे बचा नहीं सकी।"
आर्यन ने कहा, "माँ, आप कहाँ थीं इतने साल?"
कुसुम ने कहा, "बेटा, मैं मर चुकी थी। तेरे पिताजी ने मुझे मारा। जब तू छह साल का था। पर मैं तुझे देखती रही। एक शीशी में। अब मैं तुझसे मिल रही हूँ। एक क्षण के लिए।"
आर्यन की आँखों में आँसू।
"माँ, मुझे साथ ले चलो।"
कुसुम ने कहा, "हाँ बेटा। साथ चलेंगे।"
माँ और बेटे की आत्माएँ हवा में एक साथ उठीं।
आरोही ने देखा।
दो नीली रोशनियाँ। एक साथ। ऊपर की तरफ़।
फिर आसमान में गुम हो गईं।
कुसुम का शरीर धीरे-धीरे ज़मीन पर पड़ा रह गया। पर अब उसमें कोई आत्मा नहीं थी।
खाली।
आरोही ने कुसुम के पैर छुए।
"चाची, आप शांति से जाएँ।"
भगवती दादी और पार्वती देवी ने भी कुसुम के पैर छुए।
फिर तीनों ने कुसुम के शरीर को धीरे-धीरे उठाया।
पीपल के पेड़ के नीचे रखा।
आरोही ने कहा, "अब बाबा के पास चलना है।"
चारों गाँव की तरफ़ चलीं।
रास्ते में गाँव के दरवाज़े खुल रहे थे। लोग बाहर आ रहे थे। हर घर के दरवाज़े पर जो लाल चूड़ियाँ थीं — वे अपने आप गायब हो रही थीं।
देवीदास का श्राप टूट चुका था।
गाँव में एक अजीब सी शांति थी। जो पहले कभी नहीं थी। पक्षी गा रहे थे — पहली बार बरसों में। कुत्ते भौंक रहे थे। पर सामान्य आवाज़ में। न कि उस सुर में जो देवीदास के समय था।
एक बूढ़ी औरत आरोही के पास आई। बहुत बूढ़ी। शायद अस्सी की। हाथ में लाठी।
"बेटी, तू तेरहवीं है?"
आरोही ने कहा, "जी दादी।"
बूढ़ी औरत ने आरोही के पैर छुए।
"बेटी, तूने मेरे परिवार को बचाया। मैं जोशी परिवार से हूँ। लक्ष्मी और सुनीता मेरी पूर्वज थीं। तेरा हमेशा एहसान।"
आरोही ने बूढ़ी औरत को उठाया।
"दादी, आप मत झुकिए।"
एक और आदमी आया। युवा। रावत परिवार से। कौशल्या का पोता।
"बहन, तेरा शुक्रिया।"
एक-एक करके पूरे गाँव के लोग आ रहे थे। हर किसी ने आरोही को धन्यवाद कहा।
पार्वती देवी का पोता भी बाहर आया। उसके गले में अब निशान नहीं था। वह भागकर पार्वती देवी से लिपटा।
"नानी!"
पार्वती देवी रोने लगीं।
आरोही ने भगवती दादी से कहा, "दादी, बाबा के पास चलिए।"
घर पहुँचीं।
बाबा एक चारपाई पर पड़े थे।
पर उनकी साँसें चल रही थीं।
आरोही उनके पास बैठी।
"बाबा, हो गया।"
बाबा ने धीरे से आँखें खोलीं।
"बेटी..."
बाबा की आवाज़ बहुत कमज़ोर।
आरोही ने कहा, "बाबा, आप कैसे हैं?"
बाबा ने कहा, "बेटी, मैं जा रहा हूँ। रामनाथ गुरुजी मुझे बुला रहे हैं।"
आरोही की आँखों में आँसू आए।
"बाबा, नहीं। आप यहीं रहिए।"
बाबा ने कहा, "बेटी, 133 साल बहुत हो गए। अब मुझे शांति चाहिए।"
बाबा ने आरोही का हाथ पकड़ा।
"बेटी, तूने अच्छा किया। बहुत अच्छा। मुझे तुझ पर गर्व है।"
आरोही ने कहा, "बाबा, धन्यवाद। आप के बिना कुछ न होता।"
बाबा ने कहा, "बेटी, एक बात। रामनाथ गुरुजी की राख — जो अभी बची है — उसे मेरे साथ ले जा। कुंड में डाल। ताकि हम दोनों एक साथ मुक्त हों।"
आरोही ने सिर हिलाया।
बाबा ने आँखें बंद कीं।
एक साँस।
फिर कुछ नहीं।
बाबा चले गए।
आरोही ने बाबा के पैर छुए।
रोई।
बहुत देर तक।
भगवती दादी और माँ ने भी अपने आँसू बहाए।
बाबा 133 साल तक ज़िंदा रहे थे। एक-एक तेरहवीं का इंतज़ार करते। एक-एक बलि होते देखते। अपने गुरुजी की आत्मा को बंधन में। अपनी अपनी शक्ति को बंद।
आज उन्हें शांति मिली।
पर आरोही के लिए यह बड़ा नुक़सान था। बाबा उसके गुरु थे। पिता जैसे। जो पहले दिन से उसके साथ थे।
आरोही ने बाबा के माथे पर हाथ रखा।
"बाबा, धन्यवाद। मैं आपको कभी नहीं भूलूँगी।"
बाबा के चेहरे पर एक शांति थी। जो बरसों से नहीं थी।
आरोही ने अपने बैग से नानी की नोटबुक निकाली।
एक आख़िरी पंक्ति उभर रही थी।
"बेटी, अब मेरा भी काम पूरा। मैं भी जा रही हूँ। पर तेरे साथ हमेशा रहूँगी। जब भी तुझे मेरी ज़रूरत होगी, मैं यहाँ हूँगी।"
आरोही की आँखों में आँसू।
"नानी, धन्यवाद।"
"बेटी, अलविदा।"
फिर पन्ना कोरा हो गया।
हमेशा के लिए।
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
नानी भी चली गईं। पर उन्होंने अपना वादा पूरा किया — तेरहवीं की रात उसके साथ रहीं।
सुबह हुई।
24 अक्टूबर, 2026।
आरोही, माँ, भगवती दादी, पार्वती देवी — सब पीपल के पेड़ के पास इकट्ठे हुए।
कुंड अभी भी जल रहा था।
आरोही ने बाबा को कुंड के पास लिटाया। रामनाथ बाबा की बाक़ी राख कुंड में डाली।
कुंड की आग बड़ी हुई।
फिर बाबा के शरीर को भी।
आग नीली हुई।
एक क्षण के लिए दो आत्माएँ दिखीं — देवराज बाबा और रामनाथ बाबा। एक साथ। मुस्कुरा रहे थे। हाथ पकड़े।
फिर दोनों हवा में गुम हुए।
आरोही ने आँखें बंद कीं।
बाबा को अलविदा।
रामनाथ बाबा को अलविदा।
आर्यन को अलविदा।
कुसुम को अलविदा।
बारह बहनों को अलविदा।
मालती दीदी को अलविदा।
पंडित जी को अलविदा।
आरोही की आँखों में आँसू।
पर उसके होंठों पर मुस्कान।
क्योंकि सब आज़ाद थे।
156 साल के बाद।
आरोही ने अपनी माँ को देखा।
माँ भी आँसू पोंछ रही थीं।
आरोही ने कहा, "माँ, अब हम घर जाएँगे। दिल्ली।"
माँ ने कहा, "बेटी, हाँ।"
पर तभी भगवती दादी ने कहा, "बेटी, एक बात है।"
"क्या दादी?"
भगवती दादी ने कहा, "यह गाँव अब तुझ पर टिका है। तेरहवीं का श्राप टूटा है। पर गाँव को एक नई शुरुआत चाहिए। तू क्या करेगी?"
आरोही ने कुछ पल सोचा।
"दादी, मैं दिल्ली जाऊँगी। पर हर साल कार्तिक अमावस को यहाँ आऊँगी। एक हवन करने। बहनों को याद करने।"
भगवती दादी ने सिर हिलाया।
"बेटी, यह अच्छा है।"
आरोही ने आगे कहा, "दादी, मैं अपनी पीएचडी का विषय भी बदलूँगी। अब मैं इसी कहानी पर लिखूँगी। रत्नपुर का इतिहास। बारह बहनें। मालती। सब।"
माँ ने कहा, "बेटी, अच्छा फ़ैसला।"
रत्नपुर का सूरज उग रहा था।
पहली बार बरसों के बाद।
गाँव में एक नई सुबह।
आरोही ने माँ का हाथ पकड़ा।
लंबी लड़ाई के बाद, आराम का समय।
पर आरोही जानती थी — कुछ चीज़ें अभी बाक़ी थीं। रत्नपुर लौटना होगा। कहानी लिखनी होगी। और शायद...
शायद अपनी शादी भी।
पर वह बाद की बात।
अभी बस — शांति।
आरोही ने अपनी माँ के साथ पीपल के पेड़ के पास कुंड की तरफ़ देखा।
आग अब बुझ रही थी। धीरे-धीरे। बाबा का शरीर राख हो चुका था।
भगवती दादी ने कहा, "बेटी, राख इकट्ठा करके गंगा में डालेंगे। यह हमारा फ़र्ज़ है।"
आरोही ने सिर हिलाया।
पार्वती देवी अपने पोते के साथ जा रही थीं। कहीं दूर से आवाज़ें आ रही थीं — गाँव के लोग एक दूसरे को गले लगा रहे थे। पहली बार बरसों में। बरसों तक जो डर था — वह ख़त्म हो गया था।
गाँव में एक बूढ़ा आदमी आरोही के पास आया। उम्र क़रीब पचहत्तर। हाथ में एक पुरानी छड़ी।
"बेटी, मेरा नाम प्रेम शर्मा है। मैं जानकी 1978 का भाई हूँ। मेरी बहन आज मुक्त हुई। तेरा एहसान।"
आरोही ने कहा, "काका, बहुत ख़ुशी हुई।"
प्रेम शर्मा ने कहा, "बेटी, मैंने बरसों तक इसका इंतज़ार किया। मेरी बहन थोड़ी छोटी थी मुझसे। 1978 में जब वह चली गई, मैंने सोचा — मेरी ज़िंदगी बर्बाद। पर अब मुझे शांति मिली।"
काका ने आरोही के सिर पर हाथ रखा।
"बेटी, तेरा जीवन लंबा हो।"
आरोही की आँखों में आँसू।
दोपहर हो गई।
गाँव में सारे लोग इकट्ठे हुए। हर परिवार से कोई न कोई आया। बारह बहनों के परिवार वाले। पंडित परिवार का कोई नहीं — क्योंकि वे ख़त्म हो चुके थे। पर उनकी जगह पर एक नया माहौल था। एक नई शुरुआत।
गाँव के लोगों ने मिलकर बाबा की समाधि बनाने का फ़ैसला किया। जंगल में। बाबा की झोपड़ी के पास। जहाँ वे बरसों तक अकेले रहे थे।
फिर आरोही और माँ अपने रास्ते पर चलीं।
एक नया रास्ता। एक नई कहानी।
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