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भाग 16 : तीसरे दरवाज़े का खुलना
Piyashi Atma · Psychological Horror · 13 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- तेरहवीं अमावस
- Chapter
- 16 of 23
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 13 min
- Words
- 2401
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
रुक्मिणी की आत्मा हवा में विलुप्त हुई।
आरोही और माँ अकेली रह गईं।
पर अकेली नहीं। सुरंग की दीवारों पर बारह चेहरे थे। मालती का भी। सब आरोही को देख रहे थे।
आरोही ने माँ से कहा, "माँ, ऊपर क्या हो रहा होगा?"
माँ ने कहा, "बेटी, चिंता मत कर। रुक्मिणी उन्हें बचाएगी।"
आरोही ने अपने बैग से नानी की नोटबुक निकाली। खोली।
पन्ने पर धीरे-धीरे शब्द उभरे।
"बेटी, ऊपर सब ठीक है। मैं भी वहाँ हूँ। पार्वती और भगवती को थोड़ा दर्द है। पर वे ज़िंदा हैं। रुक्मिणी ने कुसुम को रोक दिया। कुसुम अभी पेड़ के नीचे बेहोश है।"
आरोही ने राहत की साँस ली।
"नानी, धन्यवाद।"
"बेटी, अब बारह बजने वाले हैं। तैयार रह। तीसरा दरवाज़ा खुलेगा। जो अंदर होगा, वह तुझे दिखेगा। पर एक बात याद रख — देवीदास का असली शरीर एक बूढ़े आदमी का है। बहुत बूढ़ा। हड्डियों का ढाँचा। पर उसके पास शक्ति है। मत डरना।"
आरोही ने कहा, "नानी, मुझे क्या करना है?"
"बेटी, अंदर घुसते ही अपनी माँ से रुक्मिणी की चूड़ी लेना। और अपने बैग से मालती की चूड़ी की जोड़ी की दूसरी चूड़ी निकालना। पर सबसे पहले — देवीदास की अंगूठी की तरफ़ देख। जो उसकी उँगली में है। दोनों चूड़ियाँ एक साथ उस अंगूठी पर लगाना।"
आरोही ने कहा, "नानी, अंगूठी छूने से क्या मुझ पर असर होगा?"
"बेटी, हाँ। एक तेज़ धक्का। पर तेरे साथ बहनें हैं। और मैं भी। तू टिकेगी।"
आरोही ने कहा, "नानी, और मंत्र?"
"बेटी, बाबा का दिया हुआ मंत्र। पहले पढ़ना। ताकि रुक्मिणी की आत्मा शांति से मुक्त हो। फिर अंगूठी तोड़ना।"
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
अपनी घड़ी देखी।
11:30।
आधा घंटा।
आरोही ने अपनी माँ को गले लगाया।
"माँ, चाहे कुछ भी हो जाए, मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ।"
माँ की आँखों में आँसू आए।
"बेटी, मैं भी।"
फिर माँ ने कहा, "बेटी, एक बात कहनी है। अगर मुझे कुछ हो जाए..."
"माँ, ऐसा मत कहिए।"
"बेटी, कहनी है। अगर मुझे कुछ हो जाए, तो अपने पिताजी को यह बताना कि मैं ख़ुशी से गई। तुझे बचाकर।"
आरोही ने माँ को कसकर पकड़ लिया।
"माँ, आपको कुछ नहीं होगा। मैंने वादा किया है।"
माँ ने कहा, "बेटी, वादे टूट सकते हैं। पर तेरा वादा — तेरहवीं को बचाना — वह सबसे बड़ा है।"
आरोही ने माँ का हाथ पकड़ा।
बहुत देर तक।
11:45।
पंद्रह मिनट।
सुरंग में हवा बदलने लगी। ठंडी से गरम। और गरम से बहुत गरम।
दीवार पर बारह चेहरे हिलने लगे। सात मुक्त बहनें मुस्कुरा रहीं थीं। पाँच बंधी बहनें अब कुछ बोल रही थीं। पर आवाज़ धीमी।
आरोही ने पास जाकर सुना।
कमला। "दीदी, आज मुक्ति।"
राधा। "दीदी, तेरा शुक्रिया।"
चंपा। "दीदी, हम भी तेरे साथ हैं।"
जानकी (1978)। "दीदी, आज मैं भी घर जाऊँगी।"
आरोही की आँखों में आँसू आए।
पर एक चेहरा अभी भी चुप था। मालती।
आरोही ने मालती के चेहरे पर हाथ रखा।
"मालती दीदी, तुम मेरी सबसे बड़ी बहन हो। सबसे पुरानी। आज तुम्हें भी मुक्ति।"
मालती के चेहरे पर एक हल्की सी हलचल।
फिर एक कोमल आवाज़ आई। मालती की।
"बच्ची, मैं तुझसे शर्मिंदा हूँ।"
आरोही चौंकी।
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने कुसुम के शरीर में तेरहवीं की सेवा की। मैंने पंडित की मदद की। मैंने बरसों तक आर्यन को यातना दी।"
आरोही ने कहा, "मालती दीदी, आप मजबूर थीं। देवीदास के बंधन में।"
"नहीं बच्ची। शुरू में मजबूर थी। पर एक समय आया जब मैंने ख़ुद चुना। पंडित के साथ रहने का। क्योंकि पंडित मुझे प्यार करता था। जबकि मेरा असली पति — देवीदास — ने मुझे बरसों पहले धोखा दिया था।"
आरोही ने कहा, "क्या मतलब?"
मालती ने कहा, "बच्ची, देवीदास ने कहा कि उसके गुरु ने मुझे बलि दी। पर सच यह है — देवीदास ने ख़ुद मुझे बलि दी। अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए। मुझे धोखा दिया। मैं उसकी पत्नी थी। और उसने मुझे मारा।"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
"तो मालती दीदी, देवीदास ने आज मुझसे झूठ बोला।"
"हाँ बच्ची। देवीदास हमेशा झूठ बोलता है।"
आरोही ने पूछा, "मालती दीदी, आप उसकी पत्नी थीं। तो प्यार भी था?"
मालती ने कहा, "बच्ची, प्यार था। शुरू में। हम बीस साल के थे जब शादी हुई। मैं उन्नीस। वह बीस। हम एक साथ बड़े हुए। पर देवीदास तांत्रिक बना। और तांत्रिक बनते-बनते वह मुझसे दूर होता गया। एक दिन जब उसे शक्ति चाहिए थी, तो उसने मुझे बलि दे दी। अपने ही हाथ से। मैं मरते वक़्त सिर्फ़ इतना बोल पाई — 'देवीदास, तुम्हारा अंत मेरे ख़ून की एक कुँआरी करेगी।' और मर गई।"
आरोही ने कहा, "तो आप देवीदास की पहली शिकार हैं। और तेरहवीं आपके ख़ून से..."
मालती ने कहा, "हाँ बच्ची। तू मेरी सातवीं पीढ़ी की परनतिनी है। मेरी बहन की। जो 1846 में दो साल की थी। वही परिवार रत्नपुर छोड़कर गया। दिल्ली। वहीं रुक्मिणी के परिवार से जुड़ा।"
आरोही की आँखें फैलीं।
"तो मैं आपकी वंशज हूँ?"
"हाँ बच्ची। और तेरहवीं तू ही हो सकती थी। क्योंकि तुझ में मेरा और रुक्मिणी दोनों का ख़ून है।"
आरोही ने कहा, "मालती दीदी, आप मेरी मदद करेंगी?"
मालती ने कहा, "हाँ बच्ची। मैं आधी रात को तीसरे कमरे में आऊँगी। कुसुम के शरीर से बाहर। और तेरे साथ लड़ूँगी।"
आरोही ने कहा, "मालती दीदी, धन्यवाद।"
मालती की आवाज़ धीमी हुई।
"बच्ची, एक और बात। जब तू अंगूठी तोड़ेगी, तो देवीदास की सारी शक्ति बाहर निकलेगी। एक बड़ा धमाका। हो सकता है, तेरहवीं मरे। पर मैं तेरी जान बचाने की कोशिश करूँगी। मेरी आत्मा तेरी आत्मा को धक्का देगी। बाहर। ताकि तू ज़िंदा रहे।"
आरोही ने कहा, "मालती दीदी, आप ख़ुद?"
"मैं मुक्त हो जाऊँगी। शांति मिलेगी। 180 साल के इंतज़ार के बाद।"
मालती की आवाज़ शांत हुई।
11:55।
पाँच मिनट।
आरोही ने खड़े होकर तैयार हो गई।
बैग में सब कुछ था। रुक्मिणी की एक चूड़ी। मालती की अंगूठी। रामनाथ बाबा का मंत्र। छुरी। ताबीज़। नानी की चांदी की डिबिया। पानी की बोतल।
और सबसे बड़ी शक्ति — माँ और बारह बहनों की उपस्थिति।
माँ ने कहा, "बेटी, मैं तेरे साथ अंदर जाऊँगी।"
आरोही ने कहा, "माँ, ख़तरा है।"
माँ ने कहा, "बेटी, मैं तेरी माँ हूँ। ख़तरा तेरे लिए, तो मेरे लिए भी।"
आरोही ने माँ का हाथ पकड़ा।
11:59।
एक मिनट।
बाहर से एक अजीब सी आवाज़ आई। कहीं दूर। घंटी बजने की। पर घंटी दिख नहीं रही थी। सिर्फ़ आवाज़।
तीसरे कमरे का दरवाज़ा हिलने लगा।
पत्थर के जोड़ खुलने लगे।
धीरे-धीरे।
12:00।
आधी रात।
दरवाज़ा खुला।
एक गहरी नीली रोशनी अंदर से आई।
आरोही ने माँ की तरफ़ देखा।
माँ ने सिर हिलाया।
दोनों अंदर घुसीं।
तीसरा कमरा।
बहुत बड़ा।
छत ऊँची। बहुत ऊँची। पत्थर के गुंबद की तरह। जिस पर पुरानी संस्कृत में मंत्र खुदे थे। वे मंत्र जल रहे थे। नीली आग में।
दीवारें भी अजीब थीं। पत्थर की, पर उन पर कुछ चलता हुआ दिख रहा था। परछाइयाँ। जो हिल रही थीं। जैसे कोई दीवार के अंदर बंद हो।
बीच में एक पत्थर की चौकी थी। उस पर एक शरीर।
एक बूढ़ा आदमी।
बहुत बूढ़ा। हड्डियों का ढाँचा। जैसे 500 साल का। चमड़ी लगभग नहीं। सफ़ेद बाल — बहुत लंबे। ज़मीन तक। सफ़ेद दाढ़ी — छाती तक।
पर आँखें खुली। और चमकीली। लाल।
देवीदास का असली शरीर।
पास में एक पुरानी तांबे की कटोरी थी। जिसमें कुछ तरल था। लाल। और उसके किनारे पर एक चाकू। पुराना। जिसकी धार अभी भी तेज़।
आरोही ने चौंककर देखा।
"देवीदास?"
बूढ़े आदमी ने हल्की सी आवाज़ में कहा — "बेटी, तू आ गई। मेरे तीसरे कमरे में।"
पर उसकी आवाज़ अलग थी। कमज़ोर। जैसे बहुत थका हुआ। जैसे उसके अंदर बहुत सी आवाज़ें एक साथ बोल रही हों।
आरोही ने पूछा, "देवीदास, तू यहाँ बरसों से हो?"
बूढ़े आदमी ने कहा — "बेटी, 200 साल से। मेरा असली शरीर यहाँ मरता नहीं। पर हिलता भी नहीं। बस पड़ा रहता है। मेरी आत्मा दूसरे शरीरों में जाती है। पर मेरा असली शरीर यहीं।"
आरोही ने कहा, "और अब तेरा असली शरीर तेरे अंत का घर बनेगा।"
आरोही ने चारों तरफ़ देखा।
कमरे की दीवारों पर एक जगह एक अजीब सी चीज़ थी।
एक बड़ी अलमारी। पत्थर की। जिसमें बारह छोटी-छोटी शीशियाँ थीं। हर एक में एक हल्का सा नीला धुआँ।
बारह लड़कियों की आत्माएँ।
पर तेरहवीं शीशी अभी खाली थी।
आरोही की।
देवीदास ने कहा, "बेटी, बैठ। तेरे लिए तेरहवीं शीशी तैयार है।"
आरोही ने कहा, "देवीदास, मैं तेरी शीशी में नहीं आऊँगी।"
देवीदास ने अपना हाथ उठाया।
उँगली में अंगूठी। लाल पत्थर वाली।
अंगूठी का पत्थर अब सफ़ेद हो गया था। लगभग बर्फ़ सफ़ेद।
देवीदास ने कहा, "बेटी, तेरे पास पाँच बहनों की शक्ति नहीं। मेरे पास पाँच नाम अभी बंधे हैं। कमला। राधा। चंपा। जानकी। मालती। पर मालती अलग। वह देवीदास की पत्नी। बंधन कमज़ोर।"
आरोही ने कहा, "देवीदास, आज तेरा अंत।"
देवीदास ने कहा, "बेटी, अभी नहीं।"
देवीदास ने अपने हाथ हवा में उठाए।
कमरे में एक तेज़ हवा चली।
आरोही ने अपने बैग से रुक्मिणी की चूड़ी निकाली। और माँ से रुक्मिणी की दूसरी चूड़ी माँगी।
माँ ने दी।
आरोही के हाथ में दो चूड़ियाँ थीं। रुक्मिणी की जोड़ी।
पर एक और चीज़ चाहिए थी।
मालती की अंगूठी।
आरोही ने अपने बैग से अंगूठी निकाली।
देवीदास चौंका।
"बेटी, मत छू।"
आरोही ने कहा, "देवीदास, मैं तेरी अंगूठी नहीं तोड़ रही। मैं तेरी दूसरी अंगूठी तोड़ रही हूँ। तेरी और मालती की शादी की।"
आरोही ने मालती की अंगूठी को अपने पत्थर के फ़र्श पर पटकी।
अंगूठी टूटी।
एक तेज़ नीली रोशनी निकली।
देवीदास चीख़ा।
उसका बूढ़ा शरीर काँपने लगा।
तभी हवा से एक और आकृति उभरी।
मालती।
अपनी असली आत्मा में।
अधेड़ महिला। सादे कपड़ों में। पर आँखों में तेज़ चमक।
"देवीदास, अंत तेरा।"
आरोही ने रुक्मिणी की दो चूड़ियाँ हाथ में लीं।
अब बाबा का मंत्र।
पढ़ना शुरू किया।
संस्कृत में। बहुत पुराने शब्द। जिन्हें आरोही ने कभी नहीं सुना था। पर आज उसके होंठों से निकल रहे थे।
"ॐ रुक्मिणि माता, तेरहवीं आ चुकी है। तेरा बंधन टूटेगा। तेरी शक्ति मुक्त होगी। सारी बहनें आज़ाद होंगी।"
आरोही ने पहली चूड़ी अपने हाथ में ली। और देवीदास की अंगूठी की तरफ़ बढ़ाई।
देवीदास ने चीखा — "मत करना!"
पर आरोही ने पहली चूड़ी अंगूठी पर पहनाई।
एक तेज़ नीली रोशनी।
देवीदास ने अपनी उँगली को खींचने की कोशिश की। पर वह हिल नहीं सका।
आरोही ने दूसरी चूड़ी उठाई।
पर तभी कुछ हुआ।
तीसरे कमरे का दरवाज़ा किसी ने बाहर से खटखटाया।
एक चीख़।
रुक्मिणी की आवाज़ आई।
"दीदी! कुसुम आ रही है! सावधान!"
आरोही ने माँ की तरफ़ देखा।
माँ ने कहा, "बेटी, दूसरी चूड़ी लगा! जल्दी!"
आरोही ने दूसरी चूड़ी अंगूठी पर लगाने की कोशिश की।
पर तभी कमरे में एक बड़ी आवाज़ हुई।
कुसुम अंदर आ चुकी थी।
पर यह कुसुम नहीं थी।
यह मालती नहीं थी।
यह कोई और था।
एक ऐसा चेहरा जो आरोही ने पहले नहीं देखा था।
एक जवान लड़की। पर आँखें बहुत पुरानी।
आरोही ने चौंककर देखा।
"तुम कौन हो?"
लड़की ने कहा — "मैं तेरी तेरहवीं बहन हूँ।"
आरोही की आँखें फैलीं।
"क्या मतलब?"
लड़की ने कहा — "मैं आरोही हूँ। पर एक और आरोही। जो तेरे साथ बंधी है। तेरहवीं शीशी में।"
आरोही ने देवीदास की तरफ़ देखा।
देवीदास हँस रहा था। कमज़ोरी में भी।
"बेटी, तू सोचती है तू बारह बहनों की तेरहवीं है। पर सच यह है — मेरे तहख़ाने में तेरहवीं शीशी नहीं है। है। पर वह पहले से भरी है। एक और आरोही की आत्मा से। जो 2000 में मरी।"
आरोही ने चौंककर कहा, "क्या?"
देवीदास ने कहा, "बेटी, तू 2000 में पैदा नहीं हुई। तू पहले मरी थी। मेरी असली तेरहवीं। एक साल की उम्र में। मैंने तुझे बचाया। पर तेरी असली आत्मा को अपनी शीशी में क़ैद किया। और तेरे शरीर में अपनी बनाई हुई आत्मा डाली।"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन।
"तो मैं... मैं असली आरोही नहीं हूँ?"
देवीदास ने कहा, "बेटी, तू आरोही है। पर तू भी बंधन में है। मेरे। जो शीशी में है — वह तेरी बहन आत्मा है। तेरी दूसरी। तेरहवीं। अगर तू अंगूठी तोड़ेगी, तो वह मुक्त होगी। पर तू भी टूटेगी।"
आरोही ने कहा, "देवीदास, तू फिर झूठ बोल रहा है।"
पर तभी मालती ने कहा — "बच्ची, यह सच है। मैं जानती हूँ।"
आरोही ने माँ की तरफ़ देखा।
माँ की आँखों में आँसू।
"बेटी, यह... यह सच है।"
आरोही ने कहा, "माँ, आपने कभी नहीं बताया?"
माँ ने कहा, "बेटी, मुझे नहीं पता था। नानी ने बरसों पहले कुछ कहा था। कि तू एक साल की उम्र में बीमार पड़ी थी। बहुत बीमार। मरने वाली। पर एक बुज़ुर्ग बाबा आए। उन्होंने तुझे बचाया। कहा — 'यह लड़की चालीस साल तक ज़िंदा रहेगी।' मैंने ग़ौर नहीं दिया। पर आज लगता है — वह देवीदास था।"
आरोही की आँखों में आँसू।
तो वह असली आरोही नहीं थी।
वह एक ग़ुलाम आत्मा थी। देवीदास की।
पर तभी...
एक कोमल आवाज़ आई।
"आरोही, मेरी बहन।"
आरोही ने पलटकर देखा।
तेरहवीं शीशी की तरफ़।
उसमें से एक धुँआ निकल रहा था। नीला।
धुआँ धीरे-धीरे एक लड़की का रूप बनाने लगा।
आरोही जैसी। पर आँखों में एक अलग सी शांति।
असली आरोही।
आरोही ने चौंककर देखा।
"तुम... तुम मैं हो?"
असली आरोही ने कहा — "बहन, मैं तेरा हिस्सा हूँ। जब तू एक साल की थी, तब हम एक थे। पर देवीदास ने हमें बाँटा। मुझे शीशी में क़ैद किया। और तेरे शरीर में एक बंधन डाला। ताकि तू बड़ी होकर उसकी तेरहवीं बने।"
आरोही की आँखों में आँसू।
"बहन, तुम मुझसे नाराज़ हो?"
असली आरोही ने कहा — "नहीं। तूने अच्छा किया। तूने बरसों तक मेरा जीवन जीया। पर आज हमें एक होना होगा। तेरहवीं की रात। अंगूठी टूटेगी। और हम मिलेंगे।"
आरोही ने कहा, "पर देवीदास ने कहा — मैं टूटूँगी।"
असली आरोही ने कहा — "नहीं। हम मिलेंगे। एक होंगे। जो तूने बरसों तक जीया, वह मेरी यादें बन जाएँगी। और जो मैंने शीशी में देखा, वह तेरी। हम एक आरोही होंगे।"
आरोही ने कहा, "बहन, धन्यवाद।"
आरोही ने दूसरी चूड़ी उठाई।
अंगूठी पर लगाई।
देवीदास ने आख़िरी बार चीखा।
"नहीं!"
लेकिन देर हो चुकी थी।
दो चूड़ियाँ अब देवीदास की उँगली की अंगूठी पर एक साथ थीं।
आरोही ने अंतिम मंत्र पढ़ा।
"ॐ रुक्मिणि माता, तेरा बंधन आज टूटे।"
एक बहुत तेज़ नीली रोशनी।
पूरे कमरे में।
एक धमाका।
पर आरोही ने आँखें नहीं बंद कीं।
देवीदास की उँगली पर अंगूठी टूटी।
लाल पत्थर चूर-चूर हुआ।
देवीदास का बूढ़ा शरीर धीरे-धीरे राख हुआ। पहले उँगली। फिर हाथ। फिर बाजू। फिर पूरा शरीर।
200 साल की देवीदास की यात्रा आज ख़त्म।
पर आरोही के अंदर भी कुछ हो रहा था।
असली आरोही की आत्मा उसमें समा रही थी।
बारह बहनों की शक्ति भी।
आरोही की आँखों में एक नई चमक आई।
फिर वह ज़मीन पर गिर पड़ी।
बेहोश।
माँ चीखी।
"बेटी!"
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