PretikaPsychological Horrorतेरहवीं अमावस

भाग 15 : पहले कमरे की लड़ाई

Piyashi Atma · Psychological Horror · 16 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
15 of 23
Category
Psychological Horror
Reading time
16 min
Words
3069
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ा।

तेरहवीं की रात शुरू हो चुकी थी। और आरोही तैयार थी।

देवीदास हँसा। पर आज उसकी हँसी में एक अजीब सा कँपन था। जैसे उसे भी डर हो।

"बेटी, तू तैयार है? पर मैं तुझसे तैयार हूँ।"

देवीदास ने अपने हाथ हवा में उठाए।

तहख़ाने की दीवारें हिलने लगीं। पत्थर से धुआँ निकलने लगा। हरा। ज़हरीला।

आरोही ने अपनी नाक ढँकी। पर धुआँ फैलता जा रहा था।

तभी आरोही की मीरा वाली पायल में झनझनाहट हुई।

मीरा की आवाज़ आई।

"दीदी, अपने साथ की सात बहनों को बुला।"

आरोही ने चौंककर कहा, "मीरा, कैसे?"

"दीदी, हर एक का नाम पुकार। एक-एक करके।"

आरोही ने ताबीज़ को छाती पर लगाया। ज़ोर से पुकारा।

"रुक्मिणी बुआ!"

हवा में एक चेहरा उभरा। आरोही की तरफ़। रुक्मिणी। सफ़ेद कपड़ों में। पर आँखें साफ़।

"दीदी, मैं आ गई।"

रुक्मिणी की उपस्थिति से हरा धुआँ थोड़ा कम हुआ।

आरोही ने दूसरी पुकारी।

"तुलसी!"

एक और चेहरा। छोटी लड़की। तुलसी। हाथ जोड़े।

"दीदी।"

तीसरी। "लक्ष्मी!"

एक जवान लड़की। हाथ में एक फूल।

चौथी। "कौशल्या!"

एक शर्मीली लड़की। शादी के जोड़े में। पर आज मुक्त।

पाँचवीं। "पार्वती!"

एक चंचल लड़की। मुस्कुराते हुए।

छठी। "रोहिणी!"

तेरह साल की। मासूम।

सातवीं। "सुनीता!"

एक लंबी लड़की। बालों में फूल।

और आठवीं। "मीरा!"

मीरा। भगवती की बेटी। शादी के जोड़े में।

सात मुक्त बहनें अब आरोही के चारों तरफ़ खड़ी थीं। हर एक की उपस्थिति एक अलग सी शक्ति ला रही थी। हर एक ने अपनी माँ, बहन, दादी, या किसी और के लिए कुछ पूरा नहीं किया था।

आज वे मिलकर पूरा करेंगी।

देवीदास ने चौंककर देखा।

"बेटी, यह... यह क्या है?"

आरोही ने कहा, "देवीदास, मेरी बहनें।"

रुक्मिणी ने हाथ बढ़ाया। हरे धुएँ की तरफ़। और धुआँ ग़ायब हुआ।

देवीदास ने अपने हाथ फिर उठाए। इस बार लाल आग। पर तुलसी ने हाथ बढ़ाया। आग बुझी।

देवीदास ने काली छाया भेजी। लक्ष्मी ने रोक ली।

सात बहनों की उपस्थिति में देवीदास कमज़ोर हो रहा था।

पर वह पूरी तरह से हारा नहीं था।

देवीदास ने अपनी अंगूठी दिखाई।

लाल पत्थर अब बहुत हल्का था। पर अभी भी शक्ति थी।

देवीदास ने कहा, "बेटी, तेरे पास सात हैं। मेरे पास पाँच हैं। बराबरी नहीं। पर मैं तुझसे अभी भी ज़्यादा शक्तिशाली हूँ।"

आरोही ने कहा, "देवीदास, तुम शक्ति की गिनती करते हो। पर मेरे पास कुछ और भी है।"

"क्या?"

आरोही ने अपनी माँ की तरफ़ इशारा किया। बाहर बादलों की तरफ़ जहाँ पार्वती दादी और भगवती दादी थीं। और अपनी नानी को मन में याद किया।

"मेरे पास परिवार है। तेरे पास? तेरे पास कोई नहीं। तूने अपनी पत्नी मालती को खोया। तेरे गुरु मरे। तेरे परिवार का कोई नहीं। तू 200 साल से अकेला है।"

देवीदास का चेहरा बदला।

"बेटी, चुप!"

आरोही ने कहा, "देवीदास, तेरी सारी शक्ति अकेलेपन से आती है। पर मेरी शक्ति परिवार से। और परिवार अकेलेपन से बड़ा है।"

देवीदास ने अपने हाथ फिर उठाए। पर इस बार उनमें एक कँपन था।

आरोही ने अपनी माँ की तरफ़ देखा।

माँ अभी भी बँधी थीं। पर आँखें खुली। हाथ में लाल चूड़ी।

आरोही ने कहा, "देवीदास, पहले मेरी माँ को छोड़।"

देवीदास ने कहा, "बेटी, तेरी माँ यहीं रहेगी। तेरहवीं की रात के अंत तक।"

आरोही ने अपने बैग से मालती की अंगूठी निकाली।

देवीदास ने चौंककर देखा।

आरोही ने कहा, "अगर तूने माँ को नहीं छोड़ा, तो मैं यह अंगूठी तोड़ दूँगी।"

देवीदास ने कहा, "बेटी, वह अंगूठी मेरी है। तू उसे तोड़ नहीं सकती।"

आरोही ने कहा, "मैं तेरहवीं हूँ। मैं तोड़ सकती हूँ।"

देवीदास के चेहरे पर पहली बार असली डर दिखा।

"बेटी, मत तोड़। मैं तेरी माँ को छोड़ दूँगा। पर एक शर्त पर।"

आरोही ने कहा, "क्या?"

देवीदास ने कहा, "तू अंगूठी मुझे लौटा। और मैं तेरी माँ को छोड़ दूँगा।"

आरोही ने कहा, "नहीं। पहले माँ को छोड़। फिर मैं अंगूठी के बारे में सोचूँगी।"

देवीदास ने कुछ पल सोचा।

फिर हाथ हिलाया।

माँ के बंधन ढीले हुए।

माँ खड़ी हो गईं। धीरे-धीरे। कमज़ोर।

आरोही ने अपनी माँ का हाथ पकड़ा।

"माँ!"

माँ ने आरोही को गले लगाया।

"बेटी..."

फिर माँ ने अपनी हथेली में छिपी चूड़ी आरोही को दी।

रुक्मिणी की असली दूसरी चूड़ी।

आरोही ने चूड़ी अपनी जेब में रखी।

अब उसके पास एक चूड़ी थी। पर दूसरी चूड़ी अभी भी देवीदास की मूर्ति के हाथ में।

देवीदास ने कहा, "बेटी, अब अंगूठी दे।"

आरोही ने कहा, "देवीदास, अगर मैं यह अंगूठी तुझे दे दूँ, तो तू और शक्तिशाली हो जाएगा। मैं यह नहीं करूँगी।"

देवीदास ने कहा, "बेटी, तूने वादा किया था।"

आरोही ने कहा, "मैंने कहा था कि 'सोचूँगी।' सोचकर मैंने फ़ैसला लिया — नहीं।"

देवीदास का चेहरा गुस्से से लाल हुआ।

"बेटी, तूने मुझे धोखा दिया!"

देवीदास ने हवा में एक ज़ोरदार आवाज़ की।

तहख़ाने में एक तेज़ हवा चली। हरी आग फिर से जली।

पर आरोही और माँ के आस-पास सात बहनें खड़ी थीं। हवा उन्हें छू नहीं सकी।

आरोही ने कहा, "माँ, दूसरे कमरे में चलना है।"

माँ ने कहा, "बेटी, मैं तेरे साथ हूँ।"

आरोही ने पहले कमरे के पिछले हिस्से की तरफ़ देखा।

एक और दरवाज़ा। जो पहले नहीं था। शायद देवीदास ने बना दिया था। अंदर जाने के लिए।

दूसरा कमरा।

पर देवीदास बीच में खड़ा था।

आरोही ने कहा, "रुक्मिणी बुआ, इसे रोक।"

रुक्मिणी ने हाथ बढ़ाया।

पर देवीदास ने भी अपना हाथ बढ़ाया।

दोनों की शक्ति टकराई।

बीच में एक ज़ोरदार धमाका हुआ।

देवीदास पीछे गिरा। रुक्मिणी भी। पर रुक्मिणी की शक्ति उसके साथ थी।

आरोही ने माँ के साथ दौड़ा।

दूसरे कमरे की तरफ़।

पर दरवाज़ा बंद हो रहा था।

पत्थर धीरे-धीरे ऊपर आ रहा था।

आरोही ने माँ को पहले धकेला।

माँ अंदर गईं।

फिर आरोही।

पर आरोही का पैर बीच में फँस गया।

देवीदास हँसा।

"बेटी, तेरा पैर पकड़ लिया मैंने!"

आरोही ने अपनी छुरी निकाली। और देवीदास की मूर्ति की तरफ़ फेंकी।

पर देवीदास ने अपना हाथ हवा में हिलाया। छुरी बीच में रुकी।

आरोही ने ताबीज़ को अपने पैर पर लगाया।

देवीदास की पकड़ ढीली हुई।

आरोही अंदर गिर पड़ी।

पत्थर का दरवाज़ा बंद हो गया।

आरोही और माँ अब दूसरे कमरे में थीं।

बाहर देवीदास चीख रहा था।

पर उसकी आवाज़ धीमी।

आरोही ने माँ को उठाया।

माँ बहुत कमज़ोर थीं।

आरोही ने कहा, "माँ, आप ठीक हैं?"

माँ ने कहा, "बेटी, हाँ। पर तूने अंगूठी क्यों नहीं तोड़ी?"

आरोही ने कहा, "माँ, बाबा ने कहा था — अंगूठी तेरहवीं अमावस के बीच में तोड़नी है। रात के बारह बजे। अभी तो नौ बजे हैं।"

माँ ने कहा, "अच्छा। सही किया।"

आरोही ने चारों तरफ़ देखा।

दूसरा कमरा।

बहुत बड़ा। एक बड़ी सुरंग की तरह। लंबी। जो नीचे जा रही थी। छत ऊँची — दस-बारह फुट। दीवारें पत्थर की। बहुत पुरानी।

कमरे की हवा भारी थी। पर पहले वाले कमरे से अलग। यहाँ कुछ ठंडी थी। मरने वालों की जगह जैसी।

आगे बहुत गहरा अँधेरा।

पर सुरंग की दीवारों पर आज कुछ था।

बारह चेहरे।

पत्थर पर उकेरे हुए।

आरोही की जानी-पहचानी बहनों के चेहरे।

पर बारह में से सात मुस्कुरा रहे थे।

पाँच अभी भी बंधे। दुखी।

आरोही ने कहा, "माँ, यह अजीब है।"

माँ ने कहा, "बेटी, यह सुरंग तेरहवीं तक ले जाती है। जहाँ देवीदास का असली शरीर है। मैंने कल रात यह सुरंग सपने में देखी थी।"

आरोही ने माँ की तरफ़ देखा।

"माँ, आपने सपना देखा?"

माँ ने कहा, "बेटी, हाँ। तेरी नानी आईं। बोलीं — 'सुधा, बेटी की मदद कर। अपनी ताक़त बचा। सुरंग में सब चेहरे मिलेंगे।' मुझे तब पूरा नहीं समझ आया। अब आ रहा है।"

आरोही ने अपने बैग से टॉर्च निकाली। जलाई।

आगे बढ़ीं।

पहला चेहरा। रुक्मिणी का। मुस्कुरा रही थी।

आरोही ने चेहरे पर हाथ रखा।

"बुआ, धन्यवाद।"

रुक्मिणी की आत्मा ने पत्थर से जवाब दिया — "दीदी, तू आगे बढ़।"

दूसरा। तुलसी।

आरोही ने चेहरे को छुआ।

"तुलसी, तू छोटी थी। तेरह की। मुझे माफ़ कर।"

तुलसी की आत्मा ने कहा — "दीदी, हम सब मिलकर आगे बढ़ेंगे।"

तीसरा। लक्ष्मी।

चौथा। कौशल्या।

पाँचवाँ। पार्वती।

छठा। कमला। अभी भी बंधी।

आरोही ने चेहरे को छुआ। कोमलता से।

"कमला बहन, आज तुम्हें भी मुक्त करूँगी।"

कमला के चेहरे पर एक हल्की सी हलचल। जैसे वह उम्मीद देख रही हो।

फिर आगे।

सातवाँ। राधा। बंधी। उसकी आँखें बंद पर आँसुओं के निशान।

आठवाँ। चंपा। बंधी। मुँह खुला — जैसे वह कुछ चिल्लाना चाहती थी पर आवाज़ न आती।

नौवाँ। जानकी। बंधी।

आरोही ने चौंककर देखा।

"नानी!"

नौवाँ चेहरा उसकी नानी का था।

आरोही की आँखों में आँसू आ गए।

पर वह पत्थर पर उकेरा हुआ नानी का चेहरा नहीं। कोई और जानकी थी।

1978 वाली।

आरोही ने माँ की तरफ़ देखा।

"माँ, यह जानकी..."

माँ ने कहा, "बेटी, यह वह जानकी नहीं जो तेरी नानी है। यह 1978 वाली जानकी है। जो 13 साल की उम्र में मरी। हमारी नानी का जन्म 1926 का था। यह जानकी 1965 में पैदा हुई। तेरह साल बाद मरी।"

आरोही ने कहा, "पर नाम एक ही?"

माँ ने कहा, "बेटी, एक ही नाम पर बहुत लोग होते हैं।"

आरोही ने आगे बढ़ना जारी रखा।

दसवाँ चेहरा। सुनीता। मुस्कुरा रही।

ग्यारहवाँ। रोहिणी। मुस्कुरा रही।

बारहवाँ। मीरा। मुस्कुरा रही।

आरोही ने कहा, "माँ, पाँच बहनें अभी बंधी। कमला। राधा। चंपा। जानकी। और एक अनजान।"

पर तभी आरोही ने ग़ौर से देखा।

बारह चेहरों के बाद एक और चेहरा था।

तेरहवाँ।

बहुत पुराना।

धुँधला।

आरोही ने पास जाकर देखा।

चेहरे के नीचे नाम लिखा था।

"मालती। 1846।"

तो मालती भी बंधी थी। बंदी।

आरोही ने कहा, "माँ, मालती भी यहाँ है।"

पर मालती के चेहरे में एक अजीब बात थी। बाक़ी बहनों का चेहरा जवान था। पर मालती का चेहरा अधेड़। शायद पैंतीस-चालीस साल। यानी वह कुँआरी नहीं थी जब मरी। वह पहले से शादीशुदा थी।

आरोही ने माँ से पूछा, "माँ, मालती अधेड़ है। बाक़ी सब जवान। तो देवीदास कुँआरी लड़कियाँ ही क्यों?"

माँ ने कहा, "बेटी, क्योंकि मालती की मौत ने साधना को शुरू किया। और साधना को जीवित रखने के लिए हर तेरह साल पर एक कुँआरी चाहिए। कुँआरी की शक्ति सबसे बड़ी होती है।"

आरोही ने कहा, "माँ, मालती देवीदास की पत्नी थी। शायद उसकी आत्मा को देवीदास ने पहले क़ैद किया। और उसी के दुख से यह पूरा श्राप शुरू हुआ।"

माँ ने कहा, "हाँ बेटी। शायद।"

आरोही ने कहा, "माँ, अगर मालती मुक्त हुई, तो देवीदास ख़त्म?"

माँ ने कहा, "बेटी, शायद।"

आरोही ने मालती की अंगूठी अपने हाथ में ली।

"मालती बहन, आज मैं तुम्हें भी मुक्त करूँगी।"

पत्थर पर उकेरा हुआ मालती का चेहरा एक क्षण के लिए हिला।

फिर शांत।

आगे और सुरंग।

आरोही और माँ चलती रहीं।

बहुत देर तक।

पत्थर के फ़र्श पर कदम रखते हुए। सब कुछ बहुत धीरे। हर आवाज़ गूँज रही थी।

रास्ते में आरोही को एक अजीब सी बात दिखी। सुरंग के फ़र्श पर जगह-जगह छोटे-छोटे लाल दाग़ थे। जैसे किसी ने ख़ून की बूँदें छोड़ी हों।

आरोही ने माँ से पूछा, "माँ, यह क्या है?"

माँ ने कहा, "बेटी, यह बारह बहनों का ख़ून है। जब देवीदास ने उन्हें यहाँ से खींचा, तब उनके पैरों से यह गिरा।"

आरोही की छाती में एक दर्द उठा।

बारह लड़कियाँ। यहीं से। इन्हीं पत्थरों पर। खींची गई थीं।

आरोही ने अपनी पायल की तरफ़ ध्यान दिया। मीरा की पायल।

पायल की झनझनाहट।

मीरा की आवाज़।

"दीदी, मुझे इसी सुरंग से खींचा था। तेरह साल पहले।"

आरोही ने कहा, "मीरा, आज तेरी मुक्ति होगी।"

मीरा ने कहा, "दीदी, सुरंग के अंत में एक दरवाज़ा। उसके सामने बहुत ध्यान। क्योंकि दरवाज़ा खुलने से पहले एक परीक्षा होगी। मुझे नहीं पता क्या। पर याद रखना।"

आरोही ने सिर हिलाया।

फिर एक जगह सुरंग रुक गई।

एक बड़ी दीवार।

बीच में एक छोटा सा दरवाज़ा।

तीसरा कमरा।

पर दरवाज़ा बंद था।

आरोही ने ताबीज़ को लगाया। नहीं खुला।

आरोही ने कहा, "माँ, यह कैसे खुलेगा?"

माँ ने कहा, "बेटी, यह तेरहवीं अमावस की आधी रात को खुलेगा। पार्वती दादी ने बताया था।"

आरोही ने अपने घड़ी को देखा।

रात के दस बजे।

अभी दो घंटे बाक़ी।

आरोही ने कहा, "माँ, हमें यहाँ रुकना होगा।"

माँ ने कहा, "बेटी, चलो बैठ जाते हैं।"

दोनों दीवार से टेककर बैठीं। पत्थर की ठंड में। हड्डियों तक असर।

आरोही ने अपने बैग से एक पानी की बोतल निकाली। माँ को दी।

माँ ने पानी पिया।

पर बोतल पूरी नहीं। कुछ पानी माँ ने बचाया। दीवार पर रखा।

आरोही ने पूछा, "माँ, पानी क्यों बचाया?"

माँ ने कहा, "बेटी, तेरे लिए। तुझे ज़रूरत होगी।"

आरोही ने कहा, "माँ, मैं ठीक हूँ।"

माँ ने कहा, "बेटी, अभी। पर जब अंगूठी तोड़नी होगी, तेरा मुँह सूख जाएगा। तब पानी चाहिए।"

आरोही ने माँ को गले लगाया।

फिर दोनों चुप बैठीं। बहुत देर तक।

बाहर हवा चल रही थी। कहीं दूर से मंत्रों की आवाज़ आ रही थी। भगवती दादी और पार्वती देवी।

आरोही ने पूछा, "माँ, आपको देवीदास ने कैसे यातना दी?"

माँ ने कहा, "बेटी, पूछ मत। बहुत बुरी। पर एक बात याद रखी — तेरे लिए बचकर रहना है।"

आरोही ने माँ को गले लगाया।

"माँ, आप बहुत बहादुर हैं।"

माँ ने कहा, "बेटी, तू भी।"

माँ ने आगे कहा, "बेटी, एक बात कहूँ?"

"क्या माँ?"

"तेरी नानी ने मरने से पहले मुझसे कहा था — 'सुधा, जब तेरी बेटी तेरहवीं की रात लड़ेगी, तब तू उसके साथ होना। तेरी माँ का प्यार सबसे बड़ी शक्ति है। सारे तंत्र-मंत्र उससे कम।' मुझे तब समझ नहीं आया। पर अब।"

आरोही की आँखों में आँसू आए।

"माँ, आप कहीं नहीं जाएँगी। मेरे साथ रहेंगी।"

माँ ने कहा, "बेटी, हमेशा।"

दोनों ने कुछ पल एक-दूसरे को देखा।

फिर माँ ने पूछा, "बेटी, तूने पिताजी को क्या बताया?"

आरोही ने कहा, "माँ, कुछ नहीं। पिताजी को यह सब नहीं पता। मैंने सोचा — बताने का कोई फ़ायदा नहीं। वह डर जाते।"

माँ ने कहा, "बेटी, तूने सही किया। पिताजी दिल के मरीज़ हैं। यह सब सुनकर..."

आरोही ने माँ का हाथ पकड़ा।

"माँ, आज रात के बाद हम सब सामान्य हो जाएँगे।"

माँ ने कहा, "बेटी, इंशाल्लाह।"

आरोही ने अपने बैग से नानी की नोटबुक निकाली।

खोली।

एक नई पंक्ति उभर रही थी।

"बेटी, तू पहले कमरे में सफल हुई। अब दूसरे में हो। पर एक बात याद रख — कुसुम पर विश्वास मत कर।"

आरोही की छाती में एक दर्द उठा।

"नानी, कुसुम चाची ग़द्दार हैं?"

पन्ने पर पंक्तियाँ जल्दी उभरने लगीं।

"बेटी, कुसुम पंडित की पत्नी है। पर वह पंडित की सच्ची पत्नी नहीं। असली कुसुम बरसों पहले मर चुकी। जो कुसुम तेरे साथ है, वह... वह मालती की आत्मा है। जो देवीदास ने कुसुम के शरीर में डाली।"

आरोही ने चौंककर देखा।

"नानी, क्या?"

"हाँ बेटी। पंडित ने बरसों पहले अपनी पत्नी को मारा। और देवीदास ने मालती की आत्मा को उसके शरीर में डाला। मालती की आत्मा को तांबे की अंगूठी की मदद से नियंत्रण में रखा। पर मालती चाहती है — तेरहवीं की रात देवीदास मरे। इसीलिए वह तेरी मदद कर रही है। पर एक बात है — मालती अकेली फ़ैसला नहीं ले सकती। देवीदास उसे रोक सकता है।"

आरोही ने कहा, "नानी, तो कुसुम चाची अभी बाबा के पास हैं। अगर देवीदास ने उन्हें बुला लिया, तो..."

"बेटी, कुसुम अब कहीं भी हो सकती है। शायद बाबा को नुक़सान पहुँचा रही हो। शायद तेरे पीछे आ रही हो। पर एक बात — मालती तेरी मदद करेगी। जब तू तीसरे कमरे में पहुँचेगी।"

आरोही ने पूछा, "नानी, मालती की मदद कैसे मिलेगी?"

"बेटी, तेरे पास मालती की अंगूठी है। जब तू तीसरे कमरे में पहुँचेगी, तो अंगूठी गरम होगी। यह इशारा होगा कि मालती वहाँ है। अपनी असली आत्मा में। कुसुम के शरीर से बाहर।"

आरोही ने कहा, "पर नानी, अगर कुसुम मालती है, तो कुसुम का शरीर बाबा के पास है। मालती की आत्मा भी वहाँ। तीसरे कमरे में मालती कैसे पहुँचेगी?"

"बेटी, आधी रात को — जब तीसरा दरवाज़ा खुलेगा — मालती की आत्मा कुसुम के शरीर से बाहर निकलकर वहाँ आएगी। ख़ुद। बिना किसी की मदद के। क्योंकि तेरहवीं अमावस को बंधन कमज़ोर होते हैं।"

आरोही ने कहा, "नानी, तो कुसुम का शरीर..."

"बेटी, कुसुम का शरीर बाबा के पास। पर बिना आत्मा के। मर जाएगा शायद। पर यह पंडित का किया हुआ। सज़ा उसकी थी। कुसुम का शरीर एक ख़ोल है। जिसे बरसों पहले तोड़ा जा चुका था।"

आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।

माँ की तरफ़ देखा।

"माँ, क्या हो रहा है?"

आरोही ने सब बताया।

माँ ने चौंककर सुना।

"बेटी, तो कुसुम... मालती है।"

आरोही ने कहा, "हाँ माँ।"

माँ ने कहा, "बेटी, बाबा की चिंता है।"

आरोही ने कहा, "माँ, अब देर हो चुकी है। अब हमें बस आगे बढ़ना होगा।"

पर एक बात आरोही के मन में थी।

अगर कुसुम मालती है, तो कुसुम ने आरोही को मालती की अंगूठी क्यों दी?

क्या यह मालती की अपनी योजना थी?

क्या मालती चाहती थी कि आरोही सफल हो?

आरोही ने माँ से पूछा, "माँ, क्या मालती हमारी दोस्त है या दुश्मन?"

माँ ने कहा, "बेटी, दोस्त। मैं मानती हूँ। क्योंकि मालती को देवीदास ने बाँधा। मालती के दुख से यह श्राप शुरू हुआ। पर अब मालती ख़ुद इस श्राप को तोड़ना चाहती है। शायद वह मानती है — अगर वह मुक्त होगी, तो देवीदास भी मरेगा। और उसकी अपनी आत्मा को शांति मिलेगी।"

आरोही ने कहा, "माँ, तो मालती हमारी सहेली है।"

माँ ने कहा, "हाँ बेटी। पर एक बात — मालती ने कुसुम का शरीर लिया। और कुसुम बरसों तक ज़िंदा रही। यानी मालती चाहती तो कुसुम को छोड़ सकती थी। पर उसने नहीं छोड़ा। शायद वह पंडित की सेवा में बंधी थी। मजबूर। जैसे रुक्मिणी बंधी थी।"

आरोही ने कहा, "माँ, तो मालती भी शिकार है।"

माँ ने कहा, "हाँ।"

आरोही ने अपनी घड़ी देखी।

रात के ग्यारह बजे।

एक घंटा बचा।

आरोही ने अपने बैग से रुक्मिणी की चूड़ी निकाली। हाथ में ली।

पर तभी एक बात हुई।

चूड़ी अचानक बहुत गरम हुई।

फिर ठंडी।

फिर गरम।

फिर ठंडी।

जैसे कोई संदेश भेज रहा हो।

आरोही ने चौंककर देखा।

रुक्मिणी की आत्मा बात कर रही थी।

आरोही ने कहा, "बुआ, क्या हुआ?"

रुक्मिणी की आवाज़ आई।

"दीदी, ऊपर कुछ हो रहा है। मंदिर के बाहर। पार्वती और भगवती।"

आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन उठी।

"बुआ, क्या हुआ है?"

रुक्मिणी ने कहा, "दीदी, कुसुम वहाँ आ गई है। मालती के रूप में। और वह पार्वती और भगवती को नुक़सान पहुँचा रही है।"

आरोही की आँखें फैलीं।

"माँ!"

माँ ने कहा, "बेटी, ऊपर जाना ख़तरनाक है।"

आरोही ने कहा, "पर माँ, दादी और पार्वती को कुछ हो गया तो..."

रुक्मिणी ने कहा, "दीदी, मैं वहाँ जाऊँगी। तू यहाँ रह। दरवाज़ा खुलने का इंतज़ार कर। तेरहवीं की रात तेरे बिना नहीं होगी। मैं अपनी शक्ति से मालती को रोकूँगी।"

आरोही ने कहा, "बुआ, ठीक है। पर सावधान रहना।"

रुक्मिणी की आत्मा हवा में विलुप्त हुई।

आरोही और माँ अकेली रह गईं।

आरोही ने घड़ी देखी।

11:15।

45 मिनट बचे।

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