PretikaPsychological Horrorतेरहवीं अमावस

भाग 14 : तेरहवीं का दिन

Piyashi Atma · Psychological Horror · 17 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
14 of 23
Category
Psychological Horror
Reading time
17 min
Words
3308
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

तेरहवीं अमावस
भाग 14 : तेरहवीं का दिन
23 अक्टूबर, 2026। तेरहवीं अमावस।
सुबह छह बजे। आरोही की आँख खुली।
बाहर आसमान ग्रे था। सूरज नहीं निकल रहा था। बादल घने। जैसे पूरे दिन रात रहने वाली हो।
आरोही ने खिड़की के बाहर देखा। आज पक्षी नहीं थे। कुत्ते नहीं थे। कोई इंसान नहीं। पूरे गाँव में जैसे कोई अकेला नहीं। पर आरोही जानती थी — हर घर में लोग थे। बस डरे हुए।
आरोही उठी। मुँह धोया। नीचे उतरी।
नीचे भगवती दादी और कुसुम बरामदे में थीं। दोनों चुप। बाबा अभी भी बेहोश थे। एक चारपाई पर।
आरोही ने बाबा के पास जाकर उनका हाथ पकड़ा।
"बाबा, आज मुझे आपकी ज़रूरत है।"
बाबा ने हाथ हिलाया। पर आँखें नहीं खोलीं।
भगवती दादी ने कहा, "बेटी, बाबा शाम तक होश में आ जाएँगे। शायद।"
आरोही ने कहा, "शायद।"
कुसुम ने कहा, "बेटी, चाय पीएगी?"
आरोही ने कहा, "नहीं चाची। पहले एक काम करना है।"
कुसुम ने कहा, "बेटी, आज तुझे क्या करना है?"
आरोही ने कहा, "चाची, आज सुबह मैं आर्यन की समाधि पर जाऊँगी। जो पंडित के पिताजी की समाधि के पास है।"
कुसुम ने कहा, "क्यों बेटी?"
"क्योंकि आर्यन की आत्मा देवीदास के पास बंधी है। तेरहवीं की रात मुझे उसे भी मुक्त कराना है। मैंने पंडित जी को वादा किया था।"
कुसुम की आँखों में आँसू आए।
"बेटी, धन्यवाद।"
आरोही ने भगवती दादी से भी पूछा, "दादी, आप कैसे हैं?"
भगवती दादी ने कहा, "बेटी, ठीक हूँ। पर मन बहुत भारी। मीरा आज मुक्त होगी। तेरह साल बाद। पर मेरी बेटी वापस नहीं आएगी।"
आरोही ने भगवती दादी का हाथ पकड़ा।
"दादी, मीरा हमेशा आपके साथ रहेगी। पायल में।"
भगवती दादी ने आरोही की पायल की तरफ़ देखा।
एक आवाज़ आई। पायल से।
"माँ..."
भगवती दादी की आँखों से आँसू बहने लगे।
"मीरा... बेटी..."
"माँ, मैं ठीक हूँ। और आज रात मुक्त हो जाऊँगी।"
भगवती दादी ने अपना आँचल आँखों पर रखा।
आरोही ने कहा, "दादी, मैंने माँ को वादा किया था कि मीरा आपसे बात करेंगी। पूरा हुआ।"
मीरा की आवाज़ पायल से फिर आई।
"माँ, एक बात कहनी है।"
"क्या मीरा?"
"मेरी शादी वाला जोड़ा। जो मंदिर में मिला था। उसे आज रात पहन लेना। थोड़ी देर के लिए। जब आप कुंड के पास बैठेंगी। इससे मेरी शक्ति आप में आ जाएगी।"
भगवती दादी ने कहा, "बेटी, मैं पहन लूँगी।"
पायल की गरमी कम हुई। मीरा शांत हो गई।
आरोही ने कहा, "दादी, अब मैं जाती हूँ। शाम को हम फिर मिलेंगे।"
सुबह के आठ बजे। आरोही अकेली निकली। भगवती दादी और कुसुम बाबा के पास रहीं।
पहाड़ी पर आर्यन की समाधि नई थी। पंडित की बगल में। मिट्टी अभी ताज़ी।
आरोही ने समाधि पर हाथ रखा।
"आर्यन, मुझे माफ़ करना। मैं तुम्हें पहले नहीं पहचान पाई।"
हवा में एक कोमल आवाज़ आई।
"दीदी, कोई बात नहीं।"
आरोही चौंकी।
"आर्यन?"
"हाँ दीदी। मेरी आत्मा तेरहवीं की रात मुक्त होगी। पर मैं अभी थोड़ी सी बात कर सकता हूँ। मेरे पिताजी की मौत से मेरा बंधन थोड़ा ढीला हुआ है।"
आरोही ने कहा, "आर्यन, तुम्हें क्या हुआ था?"
"दीदी, दो साल पहले पिताजी ने मुझे देवीदास को दे दिया। एक तांत्रिक साधना में। मैं जानता था कि पिताजी ऐसा करेंगे। मैंने भागने की कोशिश की। पर पिताजी ने मुझे रोक लिया। और देवीदास ने मुझे अपने शरीर में ले लिया। मेरी असली आत्मा तहख़ाने के तीसरे कमरे में क़ैद है।"
"तीसरे कमरे में?"
"हाँ दीदी। जहाँ देवीदास का असली शरीर है। मैं वहाँ हूँ। और बारह लड़कियाँ भी।"
आरोही ने पूछा, "आर्यन, वहाँ का माहौल कैसा है?"
आर्यन ने कहा, "दीदी, बहुत भयानक। ठंड। अँधेरा। और चारों तरफ़ से आवाज़ें। मरने वालों की। पर मैं वहाँ अकेला नहीं। मेरे साथ बारह लड़कियाँ हैं। और एक और आत्मा। जिसका नाम मुझे नहीं पता। बहुत पुरानी। बहुत पुरानी।"
आरोही ने कहा, "मालती?"
आर्यन ने कहा, "शायद। नाम नहीं पूछा। पर वह हम सबसे पुरानी है। और वह देवीदास से बहुत नफ़रत करती है।"
आरोही ने पूछा, "आर्यन, तेरहवीं की रात मुझे क्या करना होगा?"
आर्यन ने कहा, "दीदी, एक बात याद रखना। जब तुम तीसरे कमरे में पहुँचोगी, तो देवीदास का असली शरीर वहाँ होगा। बहुत बूढ़ा। लगभग हड्डियों का ढाँचा। पर उसकी आत्मा शक्तिशाली। तुम्हारे पास दो चूड़ियाँ होंगी — रुक्मिणी की जोड़ी। दोनों को उसकी अंगूठी पर एक साथ पहनाना होगा। तब अंगूठी टूटेगी।"
"आर्यन, अंगूठी टूटने के बाद?"
"देवीदास का असली शरीर मर जाएगा। बारह बहनें मुक्त होंगी। मैं भी।"
आरोही ने कहा, "और मैं?"
आर्यन ने कहा, "दीदी, तुम्हारी माँ को देवीदास ने कहीं रखा है। मैंने सुना है — तीसरे कमरे में नहीं। पहले कमरे में। उसे पहले बचाना होगा।"
आरोही की आँखों में आँसू आए।
"आर्यन, धन्यवाद।"
"दीदी, एक और बात। सावधान रहना।"
"क्या?"
"मेरी माँ। कुसुम। वह..."
पर तभी हवा तेज़ हुई। और आर्यन की आवाज़ ग़ायब हो गई।
आरोही ने चौंककर पूछा, "आर्यन! क्या मेरी चाची कुसुम?"
पर कोई जवाब नहीं आया।
आर्यन की आत्मा फिर से बंधन में चली गई थी।
आरोही की छाती में एक अजीब सा डर उठा।
क्या कुसुम भी कुछ छिपा रही थीं? क्या वे भी पार्वती की तरह मजबूर थीं?
पर नहीं। कुसुम ने पहले ही दिन से मदद की थी। कुसुम की सास की परदादी की अलमारी की कुंजी दी थी। मालती की अंगूठी दी थी। कुसुम पंडित से बरसों तक जुल्म सहकर आई थीं।
पर आर्यन ने चेतावनी क्यों दी?
आरोही ने सोचा।
शायद आर्यन कुछ और कहना चाहता था। शायद 'कुसुम' के बाद कोई और बात थी।
आरोही ने कुछ पल आँखें बंद कीं। पर आर्यन नहीं आया।
आरोही ने समाधि पर हाथ फेरा।
"आर्यन, आज रात तुम मुक्त होंगे। वादा।"
फिर आरोही ने पंडित की समाधि पर भी हाथ रखा।
"पंडित जी, आपका बेटा आज मुक्त होगा। आपका वादा पूरा।"
दोपहर। आरोही घर लौटी।
घर पहुँचकर उसने कुसुम को देखा। कुसुम बाबा के पास बैठी थीं। बाबा को दूध पिला रही थीं। बहुत प्यार से।
आरोही ने कुसुम को ग़ौर से देखा। कहीं कुछ शक की बात दिखी क्या?
कुसुम की आँखें साफ़ थीं। मुस्कान भी।
नहीं। कुसुम ठीक थीं।
आरोही ने ख़ुद को समझाया।
आर्यन शायद कुसुम को सावधान रहने की बात कह रहा था। शायद वे भी ख़तरे में थीं।
आरोही ने कुसुम से कहा, "चाची, आप कैसी हैं?"
कुसुम ने कहा, "बेटी, ठीक हूँ। बाबा को कुछ फ़र्क़ नहीं। पर उन्होंने कुछ पानी पी लिया।"
आरोही ने कहा, "अच्छा।"
आरोही ने कुसुम के पास बैठकर बाबा को देखा।
बाबा की साँसें अब स्थिर थीं। पहले से बेहतर। पर आँखें अभी बंद।
आरोही ने कहा, "चाची, आज एक अजीब बात हुई।"
"क्या बेटी?"
"आर्यन की समाधि पर वह मुझसे बात करने आया। पर बीच में हवा तेज़ हुई और वह चला गया। उसने कुछ कहना था। शायद आपके बारे में।"
कुसुम की आँखों में एक क्षण के लिए एक अजीब सी चमक आई।
फिर सामान्य।
"बेटी, मेरे बारे में क्या?"
"मुझे नहीं पता। पर वह चेतावनी दे रहा था। शायद।"
कुसुम ने कहा, "बेटी, आर्यन बहुत परेशान है। शायद उसकी बात पर ज़्यादा ध्यान मत दे।"
आरोही ने कुसुम को ग़ौर से देखा।
कुसुम की आवाज़ में एक क्षण के लिए बदलाव आया था। बहुत हल्का। पर आरोही ने पकड़ लिया।
पर फिर कुसुम ने आरोही को गले लगाया।
"बेटी, तू ज़्यादा सोच रही है। आज रात की तैयारी कर।"
आरोही ने सिर हिलाया।
पर उसके मन में एक बीज बो गया।
दोपहर के तीन बजे। बाबा ने आँखें खोलीं।
आरोही ने भगवती दादी को बुलाया। कुसुम को।
तीनों बाबा के पास।
बाबा ने काँपती आवाज़ में कहा, "बेटी..."
"बाबा।"
"बेटी, आज रात... मैं तेरे साथ नहीं जा सकता। मुझमें ताक़त नहीं है।"
आरोही ने कहा, "बाबा, मैं जानती हूँ।"
बाबा ने कहा, "बेटी, पर मेरे अंदर रामनाथ बाबा की राख है। शायद वे तेरे साथ जा सकें। मेरे शरीर से बाहर आकर।"
आरोही ने कहा, "बाबा, यह कैसे होगा?"
बाबा ने कहा, "बेटी, एक साधना है। तेरहवीं की रात मंदिर के बाहर एक कुंड बनाना। आग जलाना। रामनाथ बाबा की बाक़ी राख उसमें डालना। और मेरा नाम पुकारना। रामनाथ बाबा की आत्मा तेरे साथ आ जाएगी।"
आरोही ने कहा, "बाबा, आप क्या करेंगे?"
बाबा ने कहा, "बेटी, मैं यहीं रहूँगा। पर मेरे अंदर की शक्ति तेरे साथ जाएगी। रामनाथ बाबा के साथ।"
आरोही ने सिर हिलाया।
बाबा ने कहा, "पार्वती को बुलाओ।"
पार्वती देवी आईं। बाबा ने उन्हें साधना की विधि बताई।
पार्वती देवी ने कहा, "बाबा, मैं आज रात मंदिर के बाहर रहूँगी। कुंड बनाकर। रामनाथ बाबा को बुलाकर।"
बाबा ने कहा, "अच्छा। और भगवती को भी साथ रखना। भगवती की मीरा से जुड़ी शक्ति है। दो लोग मिलकर रामनाथ बाबा को शक्ति देंगे।"
भगवती दादी ने सिर हिलाया।
आरोही ने पूछा, "बाबा, और कुसुम?"
बाबा ने कहा, "कुसुम को घर पर रहना होगा। मेरे पास। मेरे शरीर की रक्षा में। क्योंकि अगर मेरा शरीर देवीदास ने ले लिया, तो सब कुछ ख़त्म।"
कुसुम ने कहा, "बाबा, मैं आपकी रक्षा करूँगी।"
आरोही ने कुसुम को देखा।
एक क्षण के लिए आरोही को लगा कि कुसुम के चेहरे पर एक अजीब सी छाया आई। जैसे कुछ छिपा रहा हो।
पर फिर आरोही ने अपने सिर को झटका दिया। नहीं। कुसुम पर शक करना ग़लत है।
बाबा ने कहा, "बेटी, एक और बात।"
"क्या बाबा?"
"जब तू तहख़ाने में उतरेगी, तेरहवीं की रात, तुझे तीन कमरे मिलेंगे। पहला — जहाँ बारह चूड़ियाँ हैं। दूसरा — जो एक सुरंग से जुड़ा। तीसरा — जो सिर्फ़ अमावस की रात खुलता है। तीसरे कमरे तक पहुँचने के लिए तुझे पहले दो को पार करना होगा।"
आरोही ने सिर हिलाया।
"बाबा, और मंत्र?"
बाबा ने अपने पास से एक छोटा सा कागज़ निकाला।
"बेटी, यह मंत्र। रामनाथ बाबा का। इसे अंगूठी तोड़ने से पहले पढ़ना। ताकि रुक्मिणी की आत्मा शांति से मुक्त हो।"
आरोही ने कागज़ लिया। अपने बैग में डाला।
शाम के छह बजे। सूरज ढल गया।
आसमान पूरा काला हो गया। बादल छाए। पर हवा नहीं बह रही थी। जैसे प्रकृति ख़ुद इंतज़ार कर रही हो।
तेरहवीं अमावस की रात शुरू हो रही थी।
आरोही ने अपने कमरे में जाकर एक बार अपने आप को शीशे में देखा। कमज़ोर लग रही थी। कई रातें नहीं सोई थीं। पर आँखों में एक अजीब सी दृढ़ता। जैसे किसी ने अंदर एक आग जला दी हो।
आरोही ने अपने बालों को बाँधा। सादे कपड़े पहने। एक सलवार कमीज़। सफ़ेद।
फिर उसने अपना बैग तैयार किया। सब कुछ अंदर। ताबीज़। छुरी। मीरा की पायल (पहन ली)। पाँच चूड़ियाँ। मालती की चूड़ी। मालती की अंगूठी। रामनाथ बाबा की राख का बचा हुआ हिस्सा (पार्वती दादी को दिया)। नानी की नोटबुक। और सबसे ज़रूरी — नानी की चांदी की डिबिया (खाली)।
आरोही ने डिबिया क्यों ली? क्योंकि नानी ने कहा था — दो चूड़ियाँ मिलने पर देवीदास का अंत। तो शायद डिबिया में दोनों को रखने के लिए जगह चाहिए।
आरोही नीचे उतरी।
बाबा ने आरोही के माथे पर हाथ रखा।
"बेटी, जा। रामनाथ बाबा तेरे साथ रहेंगे। मैं भी। किसी न किसी रूप में।"
आरोही ने बाबा के पैर छुए।
भगवती दादी और पार्वती देवी पहले ही मंदिर की तरफ़ चली गई थीं। साधना की तैयारी में। कुंड बनाने में।
कुसुम ने कहा, "बेटी, सावधान रहना।"
आरोही ने कुसुम को गले लगाया।
"चाची, धन्यवाद।"
आरोही घर से निकली।
अकेली।
रात के सात बजे।
अमावस की रात शुरू।
रास्ते में गाँव सुनसान था। दरवाज़े बंद। खिड़कियाँ बंद। कहीं कोई इंसान नहीं। बस दूर कहीं कुत्तों का सुर।
रास्ते में गाँव सुनसान था। दरवाज़े बंद। खिड़कियाँ बंद। कहीं कोई इंसान नहीं। बस दूर कहीं कुत्तों का सुर।
पर एक बात अजीब थी।
गाँव के हर दरवाज़े पर आज एक लाल चूड़ी लटकी थी। छोटी। बच्चों वाली। किसी ने बाँधी थी।
आरोही ने ग़ौर से देखा। पहले जो त्रिकोण-आँख के निशान थे, वे अब नहीं। पर अब यह लाल चूड़ियाँ।
क्या यह देवीदास की नई साधना थी?
आरोही ने ताबीज़ को हाथ में लिया।
एक चूड़ी को दूर से देखा। चूड़ी पर एक हल्की सी काली परत थी।
देवीदास की शक्ति। पूरे गाँव पर।
आरोही ने अपनी गति बढ़ाई।
आरोही ने ताबीज़ को हाथ में लिया।
गाँव के छोर तक पहुँची।
फिर मंदिर की सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ी।
पर तभी उसने एक बात देखी।
गाँव के मंदिर वाले टीले के नीचे — जहाँ बड़ा पीपल का पेड़ था — वहाँ एक कुंड था। छोटा। तांबे का। आग जल रही थी। साधारण पीली नहीं। नीली। जिसमें भगवती दादी और पार्वती देवी बैठी थीं। मंत्र पढ़ रही थीं।
आरोही ने दूर से हाथ जोड़े।
दोनों ने आरोही को देखा। सिर हिलाया।
आरोही आगे बढ़ी।
मंदिर की सीढ़ियों तक।
पहली सीढ़ी।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
एक-एक करके।
ऊपर बादलों में बिजली चमकी।
पर बारिश नहीं।
अभी।
आरोही ने अपने पैर की मीरा की पायल की तरफ़ ध्यान दिया।
पायल गरम थी। बहुत गरम।
मीरा की आवाज़ आई।
"दीदी, मैं तेरे साथ हूँ।"
आरोही ने कहा, "मीरा।"
पायल की गरमी बढ़ी।
आरोही ने आख़िरी सीढ़ी चढ़ी।
मंदिर के सामने खड़ी हुई।
अंदर घुसने से पहले, आरोही ने एक बार पीछे मुड़कर देखा।
गाँव अँधेरे में डूबा था।
बादलों के बीच से एक भी तारा नहीं।
चाँद तो कल से ही नहीं था।
अमावस की रात। सबसे काली रात।
पर दूर एक जगह — पीपल के पेड़ के पास — नीली आग दिख रही थी। कुंड। जिसमें भगवती दादी और पार्वती देवी बैठी थीं। मंत्र पढ़ रही थीं।
आरोही ने मन में उन्हें नमस्कार किया।
फिर आरोही ने अपनी माँ की सोची। जो अंदर बंधी थीं।
फिर बाबा की। जो बेहोश थे।
फिर कुसुम की। जिन पर वह अभी भी थोड़ा शक कर रही थी।
फिर आर्यन की। जो तीसरे कमरे में क़ैद था।
फिर बारह बहनों की।
सब आज उसके साथ थे। किसी न किसी रूप में।
आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ा।
अंदर घुसी।
मंदिर के अंदर एक भारी हवा थी। पहले से भारी। जैसे कोई बड़ी शक्ति यहाँ इकट्ठा हो रही हो।
आरोही ने चारों तरफ़ देखा।
देवी की मूर्ति। रुक्मिणी का चेहरा। पर आज आँखें खुली थीं।
रुक्मिणी की आवाज़ आई।
"दीदी, तू आ गई।"
आरोही ने कहा, "हाँ रुक्मिणी बुआ।"
"दीदी, नीचे जा। तहख़ाने में। तेरी माँ पहले कमरे में है।"
आरोही ने पूछा, "बुआ, तुम मेरे साथ हो?"
"हाँ दीदी। सारी बारह बहनें तेरे साथ हैं। जो मुक्त हैं, वे तेरे साथ लड़ेंगी। जो अभी बंधी हैं, वे तेरे साथ हैं — पर लड़ नहीं सकतीं।"
आरोही ने कहा, "ठीक है।"
आरोही ने ताबीज़ को दरवाज़े पर लगाया।
दरवाज़ा खुला।
नीचे उतरने लगी।
तहख़ाने का पहला कमरा।
अंदर पहुँची।
और वहाँ...
एक चारपाई पर उसकी माँ बंधी हुई थीं।
आँखें बंद। पर साँसें चल रही थीं।
आरोही दौड़ी।
"माँ!"
पर तभी एक आवाज़ आई।
पीछे से।
"आरोही, तू आ गई। मुझे यक़ीन था।"
आरोही ने पीछे मुड़कर देखा।
देवीदास। आर्यन के रूप में। कोने में खड़ा। मुस्कुरा रहा था।
पर आज उसका रूप कुछ अलग था। आर्यन का चेहरा पहले जैसा नहीं। अब उसमें कुछ और मिला था। दाढ़ी थोड़ी उग आई। आँखें और लाल। जैसे देवीदास अब आर्यन के शरीर में पूरी तरह से समा गया हो।
आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ा।
"देवीदास, माँ को छोड़ दे।"
देवीदास हँसा। ठंडी हँसी।
"बेटी, तेरी माँ यहीं है। पर उसकी नींद टूटने का समय अभी नहीं। पहले हमें कुछ बात करनी है।"
आरोही ने कहा, "क्या बात?"
देवीदास ने कहा, "बेटी, तूने पंडित को मारा। पार्वती को हमसे तोड़ा। सात बहनों के नाम लौटाए। बाबा के अंदर रामनाथ की राख डाली। और अब तू यहाँ आई है।"
"हाँ। और अब तुझे मारूँगी।"
देवीदास ने कहा, "बेटी, तू मुझे नहीं मार सकती। मेरा असली शरीर तीसरे कमरे में है। जो अभी तुझे नहीं दिखेगा।"
आरोही ने कहा, "मैं जानती हूँ। पर तीसरा दरवाज़ा तेरहवीं की रात खुलेगा।"
देवीदास चौंका।
"तुझे किसने बताया?"
आरोही ने कहा, "पार्वती दादी को तूने ख़ुद बताया था।"
देवीदास का चेहरा पहली बार गंभीर हुआ।
"बेटी, तू ज़्यादा जानती है। शायद ज़्यादा।"
"अब तेरहवीं की रात शुरू।"
देवीदास ने अपना हाथ बढ़ाया।
पर आरोही ने ताबीज़ को उसकी तरफ़ किया।
ताबीज़ जलने लगा।
देवीदास पीछे हटा।
पर उसकी आँखों में डर नहीं था। बस एक अजीब सी चालाकी।
"बेटी, यह लड़ाई अभी शुरू हुई है। और मुझे लगता है — तेरा ताबीज़ मुझे रोक नहीं सकता। बहुत देर तक।"
देवीदास ने अपनी उँगली दिखाई।
उसकी अंगूठी।
लाल पत्थर वाली।
पर पत्थर आज बहुत हल्का हो गया था। लगभग सफ़ेद।
देवीदास ने कहा, "देख। मेरी अंगूठी। सात नाम निकाल दिए तूने। पाँच बाक़ी हैं। पर पाँच काफ़ी हैं।"
आरोही ने कहा, "देवीदास, तेरी अंगूठी कमज़ोर हो गई है। तेरा अंत क़रीब है।"
देवीदास हँसा।
"बेटी, अंत मेरा नहीं। तेरा है। आज रात के बारह बजे। अमावस के बीच में।"
आरोही ने अपने बैग से मालती की अंगूठी निकाली।
देवीदास की आँखें फैलीं।
"यह... यह तेरे पास कहाँ से?"
आरोही ने कहा, "मालती की अंगूठी। तेरी पत्नी की।"
देवीदास ने कहा, "बेटी, यह मत करना।"
आरोही ने कहा, "क्यों? यह अंगूठी क्या है?"
देवीदास ने कहा, "बेटी, यह मालती की नहीं। मेरी है। जो मैंने बरसों पहले खो दी थी। इसे पाकर तूने ग़लती की।"
आरोही चौंकी।
तो मालती की अंगूठी असल में देवीदास की थी?
पर उस पर तो 'मालती' नाम खुदा था।
क्या यह और एक झूठ था?
आरोही ने अंगूठी को उलट-पुलट कर देखा।
एक और नाम था। अंगूठी के अंदर की तरफ़। बहुत छोटा। जो पहले नहीं दिखा था।
"देवीदास।"
तो यह अंगूठी सचमुच देवीदास की थी। पर बाहर 'मालती' नाम क्यों?
आरोही ने ग़ौर से सोचा।
शायद मालती और देवीदास पति-पत्नी थे। शायद यह उनकी शादी की अंगूठी थी।
आरोही ने कहा, "देवीदास, मालती तेरी पत्नी थी?"
देवीदास ने अपनी आँखें बंद कीं।
"बेटी, तू ज़्यादा जानती है।"
"बता। सच बता।"
देवीदास ने कहा, "बेटी, मालती मेरी पत्नी थी। 1846 में। तब मैं जवान था। एक साधारण तांत्रिक। मालती को मेरे गुरु ने बलि दे दी थी। एक शक्ति की साधना में। मैं रोता रहा। पर गुरु मान नहीं। तब मैंने अपने गुरु को मार डाला। और उनकी सारी शक्ति ले ली।"
आरोही ने कहा, "तो तू ख़ुद बलि नहीं देना चाहता था?"
देवीदास ने कहा, "पर मुझे शक्ति चाहिए थी। मालती की मौत के बाद। मैंने एक साधना की। ताकि मालती की आत्मा वापस आ जाए। पर वह नहीं आई। बदले में मुझे अमरता मिली। और श्राप। कि हर तेरह साल पर मुझे एक कुँआरी लड़की चाहिए। मेरी शक्ति बनाए रखने के लिए।"
आरोही ने कहा, "तो तूने बारह लड़कियाँ मारीं।"
देवीदास ने कहा, "बेटी, मैंने चाहा नहीं। पर मुझे करना पड़ा। नहीं तो मैं ख़ुद मर जाता।"
आरोही ने कहा, "और अब मैं?"
देवीदास ने कहा, "बेटी, तू तेरहवीं है। और आज रात..."
पर तभी माँ ने आँखें खोलीं।
चारपाई पर बंधी माँ।
माँ ने आरोही की तरफ़ देखा।
धीरे से बोलीं — "बेटी..."
आरोही की छाती में एक हलचल हुई।
"माँ!"
माँ ने काँपती आवाज़ में कहा, "बेटी, मेरे हाथ में..."
देवीदास ने चिल्लाया, "चुप!"
पर देर हो चुकी थी।
माँ ने अपना बँधा हुआ हाथ थोड़ा हिलाया।
आरोही ने देखा।
माँ की हथेली में एक लाल चूड़ी थी।
रुक्मिणी की असली दूसरी चूड़ी।
आरोही ने माँ की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
पर देवीदास बीच में आ गया।
"बेटी, तेरी माँ से मत मिल। पहले मुझसे बात कर।"
आरोही ने कहा, "देवीदास, मुझे तेरी बात नहीं सुननी।"
देवीदास ने कहा, "बेटी, एक बात सुन। तूने अपने अंदर की शक्ति नहीं देखी। तेरहवीं की शक्ति। जो बारह से बड़ी होती है।"
आरोही ने कहा, "क्या मतलब?"
देवीदास ने कहा, "बेटी, बारह लड़कियाँ मरीं। उनका ख़ून एक साथ मिलकर तेरे अंदर आया। तेरहवीं का। तू सिर्फ़ आरोही नहीं। तू बारह लड़कियों की शक्ति है। पर तूने इसे नहीं जगाया।"
आरोही ने चौंककर पूछा, "मुझे कैसे पता लगेगा?"
देवीदास ने कहा, "बेटी, अगर तू मुझसे लड़ना चाहती है, तो पहले अपनी शक्ति को जगा। नहीं तो तू मरेगी। और तेरी माँ भी।"
आरोही ने कहा, "यह चाल है तेरी।"
देवीदास ने कहा, "बेटी, यह चाल नहीं। सच है।"
पर तभी माँ ने कहा, "बेटी, इसकी बात मत सुन। यह चाल है। तेरहवीं की शक्ति तेरे अंदर पहले से है। सिर्फ़ तू अपनी हिम्मत से लड़। यही काफ़ी है।"
आरोही ने माँ की तरफ़ देखा।
माँ की आँखें साफ़ थीं। सच बोल रही थीं।
आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ा।
तेरहवीं की रात शुरू हो चुकी थी।
और आरोही तैयार थी।

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