PretikaPsychological Horrorतेरहवीं अमावस

भाग 13 : ग़द्दार की पहचान और तीसरा हमला

Piyashi Atma · Psychological Horror · 17 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
13 of 23
Category
Psychological Horror
Reading time
17 min
Words
3257
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

तेरहवीं अमावस
भाग 13 : ग़द्दार की पहचान और तीसरा हमला
रात के तीन बजे। आरोही की नींद टूटी।
कुसुम बगल में सो रही थीं। पर आरोही की आँखें खुल गईं। कुछ अजीब सा था।
पहले तो आरोही को लगा कि यह उसका बुरा सपना है। पर नहीं। जागी हुई थी वह।
एक अजीब सी गंध। जली हुई मिट्टी की। और उसके साथ कुछ मीठा — चमेली के फूल जैसा। लेकिन चमेली के फूल यहाँ नहीं थे। यह मौसम भी नहीं था। और रत्नपुर की ऊँचाई पर चमेली नहीं उगती।
आरोही ने पायल की तरफ़ ध्यान दिया। मीरा की पायल। हल्की सी झनझनाहट।
मीरा की आवाज़ आई — बहुत धीमी।
"दीदी, बाहर कोई है। पर वह ख़तरनाक नहीं। इंसान है।"
आरोही ने अपनी उंगली से पायल को छुआ। शांत होने का इशारा।
आरोही उठ बैठी। कमरे में इधर-उधर देखा।
खिड़की खुली थी।
पर आरोही ने रात को खिड़की बंद की थी। ख़ुद अपने हाथों से। कुंडी भी लगाई थी।
आरोही उठी। खिड़की के पास गई। धीरे से। ताकि कुसुम की नींद न टूटे।
बाहर बरामदे में कोई खड़ा था। एक साया। पर उसकी परछाईं ज़मीन पर थी। यानी वह इंसान था। भूत नहीं।
आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ा। छुरी भी उठाई।
साया धीरे-धीरे मुड़ा।
एक बूढ़ी औरत। जो कल हवन में आई थी। बिष्ट परिवार से। जिसका नाम पार्वती देवी था।
आरोही ने चौंककर देखा।
"पार्वती दादी? आप यहाँ इस वक़्त क्यों?"
पार्वती देवी की आँखें अजीब थीं। सामान्य नहीं। एक अजीब सी चमक। जैसे कोई और उनके अंदर से देख रहा हो।
"बेटी, मुझे तुझसे एक बात कहनी है।"
आरोही ने कहा, "क्या दादी?"
पार्वती देवी ने हाथ बढ़ाया। उसमें एक छोटी सी शीशी थी। नीले रंग की।
"बेटी, यह पानी पी ले। यह तेरे लिए वरदान है। रामनाथ बाबा की शक्ति है इसमें।"
आरोही ने ग़ौर से देखा।
पार्वती देवी के हाथ काँप रहे थे। पर उनकी आँखें स्थिर थीं।
आरोही ने ताबीज़ को शीशी के पास ले जाकर लगाया।
ताबीज़ जलने लगा। शीशी अंदर से हरी हो गई। ज़हरीली।
पार्वती देवी की आँखों में डर आया।
"बेटी... मैं... मुझे माफ़ कर..."
आरोही ने कहा, "दादी, आप ग़द्दार हैं?"
पार्वती देवी ज़मीन पर बैठ गईं। रोने लगीं।
"बेटी, देवीदास ने मुझे धमकाया। कल हवन के बाद मैं घर लौटी। मेरे पोते के गले में एक निशान बन गया था। त्रिकोण-आँख। देवीदास ने कहा — 'अगर तूने तेरहवीं को नहीं मारा, तो तेरा पोता तीन दिनों में मरेगा। पंद्रह साल का है वह। बचा ले।' मैं क्या करती बेटी? मेरा एक ही पोता है। बहू विधवा है। बेटा दस साल पहले चला गया। पोता ही सब कुछ है।"
आरोही की आँखों में आँसू आए।
पार्वती देवी ने कहा, "बेटी, मुझे माफ़ कर। मैंने ग़लत किया। पर मेरे पोते के लिए..."
आरोही ने कहा, "दादी, आप ने कल तो तुलसी बहन को मुक्त कराने में मदद की।"
पार्वती देवी ने कहा, "हाँ बेटी। पर देवीदास ने मुझे धमकाया कि मैं आज तुझे मार दूँ। और मेरी बहू ने कल दोपहर तेरी माँ को देखा — भगवती के घर आते हुए। शायद देवीदास को मैंने ही बताया था।"
आरोही की छाती में एक हलचल हुई।
"आप... आप ने माँ को देखा?"
"नहीं। मेरी बहू ने। पर मैंने बात की थी बहू से। और शायद देवीदास सुन रहा था। मुझे नहीं पता।"
आरोही ने पूछा, "दादी, आप को यह ज़हर देवीदास ने दिया था?"
पार्वती देवी ने सिर हिलाया।
"हाँ बेटी। कल शाम को। देवीदास ने मुझे एक तांबे की डिबिया दी। कहा — 'यह तेरहवीं को पानी के साथ पिला दे। सुबह पूजा के समय। यह ज़हर उसे धीरे-धीरे अंदर से खा जाएगा। तेरहवीं की रात तक वह कुछ भी नहीं कर सकेगी।' मैंने डिबिया ली। सारी रात सो नहीं सकी। अंत में सोचा — यह मैं नहीं कर सकती। इसलिए बरामदे में आ गई।"
आरोही ने कहा, "पर आपने शीशी पानी के रूप में क्यों दी?"
पार्वती देवी ने कहा, "बेटी, मुझे यह पता नहीं कि क्या बोलूँ। मैं डरी हुई थी। बस मुँह से जो निकला बोल दिया।"
आरोही ने कहा, "दादी, अब क्या करूँ मैं?"
पार्वती देवी ने कहा, "बेटी, मुझे बाबा के पास ले चल। बाबा शायद मेरे पोते को बचा सकें। और मैं तुम्हारी मदद करूँगी।"
आरोही ने सिर हिलाया।
"चलिए।"
दोनों नीचे उतरीं। बहुत धीरे। ताकि कुसुम की नींद न टूटे।
बाबा सो रहे थे। पर आरोही की आवाज़ सुनकर उठे।
आरोही ने सब बताया।
बाबा ने पार्वती देवी की तरफ़ देखा। लंबे समय तक। बहुत ग़ौर से।
"पार्वती, तू भी 1926 वाली पार्वती के परिवार से है। तुम्हारी परदादी। तेरा पोता तेरी बहन जैसा है — देवीदास के लिए।"
पार्वती देवी ने रोते हुए कहा, "बाबा, बचा लीजिए मेरे पोते को।"
बाबा ने कहा, "बेटी, बचाऊँगा। पर तुझे एक काम करना होगा।"
"क्या बाबा?"
बाबा ने कहा, "तेरहवीं की रात मंदिर के बाहर मंत्र पढ़ेगी। मेरे साथ। मैं तेरहवीं अकेली मंदिर नहीं जाने दूँगा। पर बाहर से हमारी शक्ति चाहिए।"
पार्वती देवी ने सिर हिलाया।
"मंज़ूर बाबा।"
बाबा ने अपने कोने से एक तांबे की छोटी सी पट्टिका निकाली। पार्वती देवी को दी।
"यह अपने पोते के गले में बाँध दे। इसे देवीदास तोड़ नहीं सकता। तेरहवीं की रात तक तेरा पोता सुरक्षित रहेगा।"
पार्वती देवी ने पट्टिका ली। उठ खड़ी हुईं।
"बाबा, मुझे माफ़ कर दो।"
बाबा ने कहा, "बेटी, माफ़ी की बात नहीं। बचा अपने पोते को। जल्दी।"
पार्वती देवी घर से निकलीं।
पर जाते-जाते उन्होंने आरोही की तरफ़ देखा। बहुत गंभीरता से।
"बेटी, एक बात और।"
आरोही ने पूछा, "क्या दादी?"
पार्वती देवी ने कहा, "देवीदास ने कल मुझे एक बात बताई। जिसका मुझे मतलब नहीं समझ आया। बोला — 'पार्वती, तेरहवीं की रात मंदिर में एक तीसरा दरवाज़ा है। जो सबसे नीचे। जिसे किसी ने नहीं खोला। पर जब सारी बहनें मुक्त होंगी, वह अपने आप खुलेगा।'"
आरोही चौंकी।
"तीसरा दरवाज़ा?"
"हाँ बेटी। शायद यह उसका असली शरीर वाला कमरा है। शायद वहाँ तक हमें पहुँचना होगा।"
आरोही ने कहा, "दादी, धन्यवाद।"
पार्वती देवी चली गईं।
आरोही ने बाबा से पूछा, "बाबा, यह तीसरा दरवाज़ा?"
बाबा ने कहा, "बेटी, यह देवीदास ने पार्वती को क्यों बताया?"
आरोही ने कहा, "शायद उसे यक़ीन था कि पार्वती दादी मुझे मार डालेंगी। तो उसने अपनी शेखी बघारी।"
बाबा ने कहा, "हाँ शायद।"
आरोही ने बाबा से पूछा, "बाबा, क्या हम पार्वती दादी पर विश्वास कर सकते हैं?"
बाबा ने कहा, "बेटी, अब हमारे पास विकल्प नहीं है। और उसकी पोती के गले में निशान सचमुच है। मैंने कल हवन के वक़्त देखा था। पर तब मुझे लगा — शायद संयोग है। अब समझ आया।"
आरोही ने कहा, "बाबा, कल की साधना कमज़ोर हुई क्या? पार्वती दादी की मंशा तो शुद्ध नहीं थी।"
बाबा ने कहा, "बेटी, नहीं। साधना उसकी मंशा से नहीं, ख़ून से चली। पार्वती की परदादी 1926 में मरी थीं। पार्वती के अंदर उनका ख़ून है। साधना काम कर गई।"
आरोही ने कहा, "बाबा, यह सुनकर मन को शांति मिली।"
बाबा ने कहा, "बेटी, एक बात कहूँ?"
"कहिए।"
"मुझे लगता है — देवीदास कल तुझे मारने की कोशिश करेगा। तेरहवीं की रात से एक दिन पहले। तेरी कमज़ोर करने की कोशिश करेगा। सावधान रह।"
आरोही ने सिर हिलाया।
फिर आरोही ने भगवती दादी की तरफ़ देखा।
"दादी, आज सुबह बाबा के साथ मंदिर जाने की योजना है। ठीक है?"
भगवती दादी ने कहा, "बेटी, हाँ। बाबा और मैं तेरे साथ जाएँगे। कुसुम घर पर रहेगी।"
आरोही ने कहा, "ठीक है।"
सुबह। दो दिन बचे।
बाबा ने आरोही को कहा, "बेटी, आज हम एक और काम करेंगे। बाक़ी पाँच बहनों को मुक्त करने की कोशिश।"
आरोही ने कहा, "बाबा, चार परिवार नहीं मिले हैं।"
बाबा ने कहा, "बेटी, एक और तरीक़ा है। अगर परिवार नहीं है, तो उनकी अपनी चीज़ काम आ सकती है। कोई पुरानी वस्तु। कोई कपड़ा। कोई गहना। जो उनके शरीर के पास थी।"
"कहाँ मिलेगी वह चीज़?"
"मंदिर के तहख़ाने में। जो बारह चूड़ियों की टोकरी है, वहाँ हर बहन की कुछ न कुछ चीज़ है। हर एक की चूड़ी उसकी अपनी थी।"
आरोही ने कहा, "बाबा, तो हमें फिर तहख़ाने में जाना होगा।"
बाबा ने कहा, "हाँ। पर इस बार सुरंग से नहीं। बल्कि मंदिर से। सामने से।"
"बाबा, वहाँ देवीदास होगा।"
बाबा ने कहा, "नहीं बेटी। अभी तेरहवीं की रात नहीं है। देवीदास अभी अपने असली शरीर के पास है। तहख़ाने के तीसरे कमरे में। जो हमें दिखता नहीं। पहला कमरा — जहाँ बारह चूड़ियाँ हैं — वहाँ शायद हम जा सकते हैं। पर सावधानी से।"
आरोही ने सिर हिलाया।
दोपहर के तीन बजे। आरोही, बाबा, और भगवती दादी मंदिर पहुँचीं।
कुसुम घर पर रहीं। अगर देवीदास कोई और चाल चले, तो कुसुम कमरे में रहकर सूचना दे सके। कुसुम का पैर अब पूरा बन चुका था। वह चल सकती थीं।
मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ीं। बाबा धीरे-धीरे। कमज़ोरी से। कल के हमले से उनकी शक्ति अभी पूरी नहीं लौटी थी।
अंदर घुसीं।
मंदिर के अंदर आज एक अजीब सी शांति थी। पिछली बार जब आरोही आई थी, तब हवा भारी थी। पुराने धूप की गंध। सड़ी हुई। पर आज हवा हल्की थी। जैसे कुछ बदला हो।
आरोही ने बाबा को दिखाया।
बाबा ने कहा, "बेटी, सात बहनों की शक्ति निकलने से मंदिर की शक्ति भी कमज़ोर हुई है। यह अच्छा है।"
देवी की मूर्ति की तरफ़ आरोही ने देखा। जिस पर रुक्मिणी का चेहरा था।
आज उस चेहरे में एक और बदलाव था। आँखें बंद थीं। पर मुस्कान थी।
जैसे रुक्मिणी शांत हो।
आरोही ने मन में रुक्मिणी को नमस्कार किया।
देवी की मूर्ति के पीछे वाला दरवाज़ा।
आरोही ने ताबीज़ को लगाया।
दरवाज़ा खुला।
तीनों नीचे उतरीं।
पहला कमरा। बारह चूड़ियों की टोकरी। और देवीदास की मूर्ति।
आरोही ने ग़ौर से मूर्ति को देखा। पहले जब उसने देखा था, तब मूर्ति के हाथ में एक अंगूठी थी। लाल पत्थर वाली। आज भी थी। पर एक बात बदली थी। अंगूठी में जो लाल पत्थर था, वह अब हल्का पड़ गया था। जैसे उसकी चमक कुछ कम हुई हो।
आरोही ने बाबा को दिखाया।
बाबा ने कहा, "बेटी, यह अंगूठी। इसमें बारह लड़कियों के नाम बंधे हैं। सात नाम मुक्त हुए हैं। इसीलिए अंगूठी की चमक कम हो रही है।"
आरोही ने कहा, "बाबा, अगर हम पाँच और नाम मुक्त कर दें, तो अंगूठी बुझ जाएगी।"
बाबा ने कहा, "हाँ बेटी। पर देवीदास के लिए ख़तरा है। इसीलिए वह अब हर हमला तेज़ी से कर रहा है।"
बाबा ने कहा, "बेटी, टोकरी के पास जा। सावधानी से।"
आरोही टोकरी के पास गई। चूड़ियों को छूने की कोशिश नहीं की। बस देखा।
हर चूड़ी का नाम-पत्र। रुक्मिणी। तुलसी। लक्ष्मी। कौशल्या। पार्वती। कमला। राधा। चंपा। जानकी। सुनीता। रोहिणी। मीरा।
पर एक चूड़ी और थी। एक नाम-पत्र गिरा हुआ। आरोही ने ग़ौर से देखा।
नाम था — "मालती। 1846।"
आरोही ने चौंककर बाबा को देखा।
"बाबा, मालती?"
बाबा ने कहा, "बेटी, क्या?"
आरोही ने चूड़ी दिखाई।
बाबा ने पढ़ा। और उनकी आँखें फैलीं।
"बेटी, यह... यह तो 1846 की है। रुक्मिणी से पहले।"
आरोही ने पूछा, "बाबा, मतलब देवीदास ने रुक्मिणी से पहले भी किसी को मारा था?"
बाबा ने सिर हिलाया।
"हाँ बेटी। शायद। मालती नाम की किसी लड़की को। 1846 में। तेरह साल पहले। रुक्मिणी 1870 में। तेरह-तेरह के अंतर पर सब गिनतियाँ मिलती हैं।"
आरोही ने कहा, "पर बाबा, हमें बताया गया कि रुक्मिणी पहली थी।"
बाबा ने कहा, "बेटी, यह झूठ है। शायद देवीदास ने मालती की कहानी छिपाई। ताकि कोई उसे न ढूँढ़े।"
भगवती दादी ने कहा, "बाबा, तो मालती कौन थी?"
बाबा ने कहा, "मुझे नहीं पता। पर अगर हम मालती के बारे में जान सकें, तो शायद देवीदास की एक और कमज़ोरी हमें मिल जाए।"
आरोही ने कहा, "बाबा, अगर मालती 1846 में मरी थी, तो देवीदास और भी पुराना है। 1857 में रुक्मिणी की शादी से पहले वह पहले से इस गाँव में था।"
बाबा ने कहा, "बेटी, और शायद उससे भी पुराना। कौन जाने। शायद 1833 में एक और लड़की। 1820 में एक और।"
आरोही ने चूड़ी अपने बैग में डाली।
फिर बाबा ने कहा, "बेटी, एक बात और है। अगर मालती पहली है, तो शायद वह देवीदास की पहली शिकार नहीं। शायद देवीदास की अपनी माँ है। या बहन। या पत्नी। कोई ऐसी जिसने उसे बनाया।"
आरोही चौंकी।
"बाबा, यह कैसे?"
बाबा ने कहा, "बेटी, एक तांत्रिक कभी अकेले नहीं बनता। हर काले तांत्रिक के पीछे कोई ऐसी घटना होती है — जिसने उसे बनाया। जैसे उसकी माँ का मरना। बहन का। पत्नी का। शायद मालती वही थी।"
आरोही ने कहा, "तो मालती को हम कैसे ढूँढ़ें?"
बाबा ने कहा, "बेटी, मुझे नहीं पता। पर तेरहवीं की रात शायद हमें पता चलेगा।"
आरोही ने चूड़ी अपने बैग में डाली।
बाबा ने कहा, "बेटी, अब सावधानी से। हमें उन पाँच बहनों की कोई चीज़ लेनी है — जिनके परिवार नहीं मिले। कमला, राधा, चंपा, जानकी, और शायद एक अनजान।"
आरोही ने टोकरी के पास सावधानी से हाथ बढ़ाया। एक-एक करके पाँच चूड़ियाँ निकालीं। हर एक को अलग कपड़े में लपेटा। अपने बैग में डाला।
लेकिन जैसे ही उसने आख़िरी चूड़ी उठाई, तहख़ाने की दीवारें हिलीं।
देवीदास की मूर्ति की आँखें खुलीं।
लाल रोशनी। बहुत तेज़।
बाबा ने चीखा, "बेटी, भाग!"
तीनों सीढ़ियों की तरफ़ भागीं।
पर मूर्ति ने अपना हाथ बढ़ाया। पत्थर का हाथ। पर अब वह चल रहा था। जैसे मूर्ति में जान आ गई हो।
हाथ ने बाबा को पकड़ लिया।
"बाबा!"
बाबा ने चिल्लाया, "बेटी, तू और भगवती भागो! मैं इसे रोकूँगा!"
आरोही ने कहा, "बाबा, हम आपको नहीं छोड़ेंगे!"
बाबा ने कहा, "बेटी, मंत्र पढ़! रामनाथ बाबा का!"
आरोही ने कोशिश की। पर उसे मंत्र पूरा नहीं आता था।
तभी मूर्ति के हाथ से बाबा को एक चोट लगी। बाबा दीवार से टकराए। ज़मीन पर गिरे।
आरोही दौड़ी। बाबा के पास।
बाबा के मुँह से ख़ून बह रहा था।
बाबा ने काँपती आवाज़ में कहा, "बेटी... कवच... टूट गया..."
आरोही ने बाबा के सीने पर देखा। तांबे का कवच अब चूर-चूर था।
मूर्ति ने अपना हाथ फिर उठाया। इस बार बाबा की तरफ़। अंतिम वार के लिए।
आरोही ने अपने बैग से रामनाथ बाबा की राख वाला कलश निकाला। खोला। और मूर्ति की तरफ़ फेंका।
राख हवा में उड़ी।
मूर्ति पर लगी।
एक चीख़ गूँजी। बहुत ऊँची। जैसे कई आवाज़ें एक साथ चीख रही हों।
मूर्ति में से एक धुँआ निकला। लाल-काला। और मूर्ति फिर से पत्थर की हो गई। हाथ नीचे। आँखें बंद।
पर राख का एक हिस्सा बाबा के मुँह में भी गया।
बाबा की आँखें फैलीं।
बाबा ने कहा, "रामनाथ... गुरुजी..."
फिर बाबा की आँखें बंद हो गईं।
आरोही ने बाबा को हिलाया।
"बाबा!"
बाबा की साँसें चल रही थीं। पर धीमी। बहुत धीमी।
भगवती दादी ने कहा, "बेटी, बाबा को ऊपर ले चल।"
दोनों ने बाबा को उठाया। सीढ़ियाँ चढ़ीं। मंदिर के बाहर। नीचे। गाँव तक।
रास्ते में बाबा के मुँह से एक अजीब सी आवाज़ आती रही। जैसे वे किसी से बात कर रहे हों। पर होश में नहीं थे।
आरोही ने बहुत ग़ौर से सुना।
बाबा कह रहे थे — "रामनाथ गुरुजी... आ जाओ... मेरे पास आ जाओ... तेरहवीं आ चुकी है... अब तुम मुक्त हो जाओ..."
आरोही की आँखों में आँसू आए।
रामनाथ बाबा की राख। जो बाबा के मुँह में गई थी। शायद वह असर कर रही थी। शायद रामनाथ बाबा और देवराज बाबा की आत्माएँ अब एक हो रही थीं।
पर आरोही को नहीं पता था — यह अच्छा था या बुरा।
घर पहुँची। बाबा को एक चारपाई पर लिटाया।
बाबा की साँसें अभी भी चल रही थीं। पर वे बेहोश थे।
आरोही ने कुसुम से कहा, "चाची, बाबा को कुछ हुआ है।"
कुसुम ने चौंककर देखा।
"बाबा जी!"
पर बाबा नहीं बोले।
आरोही ने अपनी आँखें बंद कीं।
तीसरा हमला। बाबा पर। दूसरी बार।
नानी ने कहा था — तीन हमले। एक पर वे साथ रहेंगी। एक बहुत बड़ा होगा।
पहला — बाबा पर। दूसरा — माँ पर। तीसरा — बाबा पर फिर से।
पर अब बाबा बेहोश थे। और तेरहवीं की रात एक दिन बाद।
क्या बाबा उठ पाएँगे?
आरोही ने कुसुम की तरफ़ देखा।
कुसुम ने कहा, "बेटी, बाबा के लिए मैं देखभाल करूँगी। तू क्या करेगी?"
आरोही ने कहा, "चाची, मैं अकेली तेरहवीं की रात मंदिर जाऊँगी। बाबा या नहीं बाबा।"
भगवती दादी ने आँखें पोंछीं।
"बेटी, यह ठीक नहीं है।"
आरोही ने कहा, "दादी, दूसरा रास्ता नहीं है।"
कुसुम ने कहा, "आरोही, एक और बात। पंडित के घर की अलमारी में एक चीज़ थी। जो मैंने तुझे नहीं दी। मैं भूल गई थी। अब याद आया।"
आरोही ने कहा, "क्या चाची?"
कुसुम ने अपने आँचल से एक छोटी सी तांबे की अंगूठी निकाली। लाल पत्थर वाली। पर बहुत हल्की।
आरोही चौंकी।
"चाची, यह... देवीदास वाली अंगूठी?"
कुसुम ने कहा, "नहीं बेटी। यह मेरी सास ने मुझे शादी की पहली रात दी थी। मैंने कभी नहीं पहनी। पर आज याद आया — अलमारी में थी। जब हम गए थे कागज़ लेने। मैं भूल गई। शायद यह देवीदास की अंगूठी की जोड़ी है।"
आरोही ने अंगूठी ली।
गरम थी। पर सुरक्षित।
आरोही ने ग़ौर से देखा। इसमें एक अजीब सा संस्कृत शब्द खुदा था।
"मालती।"
आरोही की आँखें फैलीं।
"चाची, इस पर मालती लिखा है।"
कुसुम ने कहा, "मालती? कौन मालती?"
आरोही ने कहा, "चाची, यह अंगूठी 1846 वाली एक लड़की की है। जो देवीदास की पहली शिकार थी।"
कुसुम ने कहा, "बेटी, तो मेरी सास ने यह क्यों रखी थी?"
आरोही ने कहा, "शायद वे जानती थीं। शायद मालती से उनका कोई रिश्ता था। पंडित परिवार की तरफ़ से।"
आरोही ने अंगूठी अपने बैग में डाली। बहुत सावधानी से। एक कपड़े में लपेटकर।
तेरहवीं की रात शायद यह अंगूठी काम आए।
रात के दस बजे। आरोही अपने कमरे में गई।
नोटबुक खोली।
एक नई पंक्ति उभर रही थी।
"बेटी, बाबा उठ नहीं सकेंगे। कल तक। पर तेरहवीं की रात वे तुझे मिलेंगे। किसी न किसी रूप में।"
आरोही ने पूछा, "नानी, कैसे?"
"बेटी, बाबा की आत्मा अभी भी मुक्त नहीं है। रामनाथ बाबा के बंधन में है। लेकिन आज उन्होंने रामनाथ बाबा की राख अपने अंदर ले ली। इससे कुछ बदला है। तेरहवीं की रात पता चलेगा।"
आरोही ने कहा, "नानी, माँ ठीक हैं?"
पन्ने पर एक क्षण के लिए चुप्पी।
फिर एक पंक्ति उभरी।
"बेटी, तेरी माँ अभी ज़िंदा हैं। पर देवीदास उन्हें यातना दे रहा है। तेरहवीं की रात तक वे बहुत कमज़ोर हो चुकी होंगी।"
आरोही की आँखों में आँसू आए।
"नानी, मैं क्या करूँ?"
"बेटी, कल एक दिन है। सो जा। ताक़त बचा। तेरहवीं की रात के लिए।"
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
एक दिन बचा था।
नीचे बाबा बेहोश थे। भगवती दादी उनकी देखभाल कर रही थीं। कुसुम बरामदे में।
आरोही ने खिड़की के बाहर देखा।
रात साफ़ थी। लगभग साफ़। बादलों के बीच से एक बहुत पतला चंद्रमा। बहुत पतला।
कल रात वह भी नहीं होगा।
तेरहवीं अमावस।
आरोही ने अपने बैग को देखा। उसमें बहुत सी चीज़ें थीं। ताबीज़। छुरी। मीरा की पायल (जो पहन ली थी)। पाँच बहनों की चूड़ियाँ। मालती की चूड़ी। मालती की अंगूठी। नानी की नोटबुक। रामनाथ बाबा की राख का बचा हुआ हिस्सा। बहुत कुछ।
पर सबसे बड़ी चीज़ माँ के पास थी।
रुक्मिणी की असली दूसरी चूड़ी।
तेरहवीं की रात दोनों चूड़ियाँ मिलेंगी।
और श्राप टूटेगा।
या फिर आरोही मरेगी।
आरोही ने अपनी आँखें बंद कीं।
नानी। मीरा। रामनाथ बाबा। सब उसके साथ थे।
पर देवीदास भी उतना ही मज़बूत।
एक रात के लिए।
आरोही ने खिड़की बंद की। बिस्तर पर आई।
सो गई।
पर रात भर सपनों में उसे बारह लड़कियाँ दिखीं। सब अलग-अलग समय की। सब अलग-अलग रूप में। पर सब एक ही बात कह रही थीं —
"दीदी, कल हम तेरे साथ हैं।"
और एक तेरहवीं लड़की भी थी। पीछे। धुँधली। जिसका चेहरा अभी भी साफ़ नहीं था।
आरोही ने सपने में उससे पूछा — "तुम कौन हो?"
लड़की ने जवाब दिया — "मैं मालती हूँ। 1846 की। मैं इंतज़ार कर रही हूँ।"
आरोही की आँख खुली। एक झटके से।
बाहर सुबह हो गई थी।
तेरहवीं का दिन।
आज रात। कार्तिक की अमावस।

← पिछला भाग  ·  अगला भाग →

तेरहवीं अमावस · सभी भाग →

और कहानियाँ · More stories