PretikaPsychological Horrorतेरहवीं अमावस

भाग 12 : बारह बहनों को शक्ति और दूसरा हमला

Piyashi Atma · Psychological Horror · 15 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
12 of 23
Category
Psychological Horror
Reading time
15 min
Words
2993
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

तेरहवीं अमावस
भाग 12 : बारह बहनों को शक्ति और दूसरा हमला
सुबह सात बजे। आरोही की आँख खुली।
रात भर वह अजीब सपनों में रही थी। सपनों में बारह लड़कियाँ थीं। रुक्मिणी। तुलसी। लक्ष्मी। कौशल्या। और आठ और।
सब उससे एक ही बात कह रही थीं — "दीदी, हमें मुक्त कर।"
पर एक बात अजीब थी। सपने में बारहवीं लड़की — मीरा — के पीछे कोई तेरहवीं भी थी। धुँधली। जिसका चेहरा साफ़ नहीं था। जो चुप थी।
क्या वह आरोही ख़ुद थी? या कोई और?
आरोही ने चेहरा धोया। नीचे उतरी।
नीचे बाबा ने पहले ही सब को बुला रखा था। भगवती देवी। कुसुम। माँ। सब बैठे थे। और बाबा उनके सामने।
बाबा ने कहा, "बेटी, आज हमें एक साधना करनी है।"
आरोही ने पूछा, "क्या साधना?"
बाबा ने कहा, "बेटी, बारह बहनों को शक्ति देने की। तेरी नानी ने कहा था न — बारह लड़कियों की आत्माओं को कुछ शक्ति देना। यह वही है।"
"कैसे बाबा?"
बाबा ने कहा, "बेटी, तेरी नानी ने रात को मुझे भी सपने में बताया। रामनाथ बाबा भी थे उस सपने में। दोनों ने मिलकर एक विधि बताई।"
बाबा ने अपने बैग से कुछ चीज़ें निकालीं। एक तांबे का बर्तन। कुछ जड़ी-बूटियाँ। एक छोटी सी कटोरी। और सफ़ेद कपड़े के बारह छोटे टुकड़े।
आरोही ने ग़ौर से देखा। जड़ी-बूटियाँ बहुत पुरानी थीं। सूखी। पीली। कुछ में हरी रंगत थी। बाबा ने बताया —
"बेटी, ये जड़ी-बूटियाँ रामनाथ बाबा ने 1912 में दी थीं। मुझसे। मैंने बरसों तक संभालकर रखीं। पानी नहीं मिलने दिया। हवा नहीं लगने दी। ताकि इनकी शक्ति बनी रहे। आज इस्तेमाल का समय आ गया।"
आरोही ने पूछा, "बाबा, कपड़े क्या हैं?"
बाबा ने कहा, "बेटी, ये कपड़े मैंने ख़ुद बुने हैं। पिछले तीस साल में। हर तेरहवीं की तैयारी में। पर मैं कभी साधना नहीं कर पाया — क्योंकि तेरहवीं कोई नहीं थी मेरे पास। आज तू है।"
बाबा ने कहा, "बेटी, हमें बारह बहनों के नाम बोलना होगा। हर एक के लिए एक कपड़े का टुकड़ा। एक-एक करके हम मंत्र पढ़ेंगे। और हर एक को उसका नाम लौटाएँगे।"
आरोही ने पूछा, "नाम लौटाना क्या?"
बाबा ने कहा, "बेटी, जब देवीदास ने इन लड़कियों को क़ैद किया, तब उनका नाम भी छीना। हर एक अब बस 'तेरहवीं की बहन' है। पहले वे रुक्मिणी थीं। तुलसी। लक्ष्मी। इत्यादि। पर देवीदास ने उनके नाम अपनी अंगूठी में क़ैद कर लिए। इसीलिए वे कुछ करने में असमर्थ हैं।"
आरोही ने कहा, "बाबा, नाम कैसे लौटाएँगे?"
बाबा ने कहा, "बेटी, जिस लड़की का पूर्वज इस साधना में शामिल होगा, उसे बुलाकर उसका नाम पुकारेंगे। तेरा पूर्वज तू है — रुक्मिणी की तरफ़ से। भगवती का पूर्वज वह है — मीरा की तरफ़ से। इस तरह हर बहन के लिए एक पूर्वज चाहिए।"
आरोही की छाती में एक बात आई।
"बाबा, हमारे पास तो बस दो पूर्वज हैं। मैं और भगवती दादी। बाक़ी दस के?"
बाबा ने कहा, "बेटी, बाक़ी दस के पूर्वज पूरे गाँव में हैं। हमें उन्हें ढूँढ़ना होगा।"
आरोही ने कहा, "पर बाबा, गाँव वाले सब डरे हुए हैं। दरवाज़े बंद। कोई बाहर नहीं आ रहा।"
बाबा ने कहा, "बेटी, उन्हें बाहर लाना होगा। तुझे। तेरी माँ को। भगवती को। कुसुम को।"
कुसुम ने कहा, "बाबा, मुझे पूरे गाँव के लोग जानते हैं। मैं पंडित की पत्नी थी। मैं जाऊँगी।"
बाबा ने कहा, "अच्छा। कुसुम, तू और भगवती जाओ। हर घर में। बारह लड़कियों के परिवार वालों को ढूँढ़ो। एक-एक करके सबको बुलाओ।"
कुसुम ने पूछा, "बाबा, कौन-कौन सी लड़कियाँ थीं?"
बाबा ने कहा, "मैं तुझे लिख देता हूँ।"
बाबा ने कागज़ पर एक सूची बनाई।
"रुक्मिणी - 1870 - शर्मा परिवार (आरोही का पूर्वज)
तुलसी - 1883 - बिष्ट परिवार
लक्ष्मी - 1896 - जोशी परिवार
कौशल्या - 1913 - रावत परिवार
पार्वती - 1926 - नेगी परिवार
कमला - 1939 - सिंह परिवार
राधा - 1952 - पंत परिवार
चंपा - 1965 - शर्मा परिवार
जानकी - 1978 - मेहरा परिवार
सुनीता - 1991 - जोशी परिवार
रोहिणी - 2000 - बिष्ट परिवार
मीरा - 2013 - कुमार परिवार (भगवती का पूर्वज)"
कुसुम ने सूची ली।
"बाबा, इनमें से कई परिवार अब गाँव छोड़ चुके हैं। कई का कोई नहीं बचा।"
बाबा ने कहा, "जितने बच्चे मिलें, ला। बाक़ी के लिए हम कुछ और सोचेंगे।"
कुसुम और भगवती देवी निकलीं।
गाँव में उस दिन एक अजीब सी बात हुई। जब कुसुम पहले घर पर पहुँची, उसने खटखटाया। कोई नहीं खोला। कुसुम ने ज़ोर से कहा —
"बिष्ट परिवार, मैं कुसुम हूँ। पंडित की पत्नी। तुम्हारी परदादी तुलसी थी। जो 1883 में गुम हुई थी। हम उसे मुक्त करने वाले हैं। मदद चाहिए।"
दरवाज़ा एक दरार से खुला। एक बूढ़ी औरत ने देखा। कुसुम को पहचाना।
"कुसुम... तू यहाँ?"
"हाँ। पंडित मर गया। श्राप टूटने का समय आ गया है।"
बूढ़ी औरत की आँखों में आँसू आए।
"मेरी परदादी की परदादी। 156 साल हो गए। कोई नहीं बोलता उसका नाम।"
"आज बोलेंगे। साथ चल।"
बूढ़ी औरत ने अपना बैग लिया। और कुसुम के साथ चली।
एक-एक करके चार परिवार मिले।
पर एक बात कुसुम ने ग़ौर की।
हर घर के बरामदे में एक ताज़ी लाल चूड़ी थी। छोटी। बच्चों वाली। किसी ने रखी थी।
क्या यह देवीदास का संदेश था? यह चेतावनी थी?
कुसुम ने चूड़ियाँ नहीं छुईं। बस देखीं।
फिर तीनों बाबा के पास लौटीं।
दोपहर तक चार घर मिले। जिनके पूर्वज सूची में थे।
बिष्ट परिवार से एक बूढ़ी औरत — जो तुलसी और रोहिणी दोनों की परिवार से थीं। जोशी परिवार से एक जवान लड़का — जो लक्ष्मी और सुनीता दोनों का पूर्वज था। रावत परिवार से एक अधेड़ आदमी। नेगी परिवार से एक विधवा।
पर हर एक ने कुछ अजीब बताया।
बिष्ट औरत ने कहा, "बेटी, मुझे कल रात एक सपना आया। तुलसी और रोहिणी दोनों आईं। बोलीं — 'दादी, कल कोई आएगा। साथ चली जाना।' मैं जानती थी कोई आएगा।"
रावत आदमी ने कहा, "मुझे तीन दिन से सपने आ रहे हैं। कौशल्या के। वह मेरी परदादी की परदादी थी। बोलती — 'बेटा, मेरा नाम बुला। मुझे मुक्त कर।' मैंने सोचा — पागल हो रहा हूँ। पर आज कुसुम आई और सब समझ आया।"
नेगी विधवा ने कहा, "मेरे पति की परदादी पार्वती थीं। मरने से पहले मेरे पति ने कहा था — 'शारदा, अगर कभी कोई तेरी मदद माँगे पार्वती के लिए, तो साथ जाना।' मुझे तब समझ नहीं आया। अब आ रहा है।"
तीनों बाबा के पास पहुँचीं।
चार पूर्वज। सात बहनों के। पर पाँच बहनें अभी भी बिना पूर्वज के।
बाबा ने कहा, "बेटी, यह भी बहुत है। सात बहनें ही मुक्त हो जाएँ, तो देवीदास बहुत कमज़ोर होगा।"
तीन बजे साधना शुरू हुई।
बाबा ने आँगन में एक हवन कुंड बनाया। छोटा। तांबे का। आग जलाई। पर आज की आग अलग थी — नीली नहीं, हरी नहीं। साफ़ पीली। जैसे किसी ने सूरज की एक किरण को कुंड में डाल दिया हो।
बाबा ने मंत्र पढ़ना शुरू किया। संस्कृत में। बहुत पुराने शब्द। रामनाथ बाबा के दिए हुए मंत्र। जो 113 साल में पहली बार बोले जा रहे थे।
पाँच पूर्वज बैठे। आरोही। भगवती। तुलसी-रोहिणी की बुज़ुर्ग औरत — पार्वती देवी नाम था उनका। लक्ष्मी-सुनीता का लड़का — दीपक। कौशल्या का आदमी — रमेश। पार्वती की विधवा — शारदा।
हर एक ने अपनी बहन का नाम पुकारा। एक-एक करके।
आरोही ने पहले पुकारा।
"रुक्मिणी!"
आग की लपटें ऊँची उठीं। हवा में एक तेज़ आवाज़ आई। जैसे कोई कहीं दूर से रो रहा हो। पर वह आवाज़ धीरे-धीरे मीठी हुई।
आग के बीच में एक क्षण के लिए रुक्मिणी का चेहरा दिखा। अठारह साल की। सुंदर। लेकिन थकी हुई। जैसे बरसों बाद अपना नाम सुना हो।
रुक्मिणी ने आँखें खोलीं। असली आँखें। भूरी। पहली बार।
"दीदी..."
आरोही की आँखों में आँसू आए।
"रुक्मिणी बुआ।"
रुक्मिणी मुस्कुराई। बहुत सुंदर मुस्कान।
"दीदी, धन्यवाद। मेरा नाम लौट आया। 156 साल बाद।"
फिर वह ग़ायब हो गई।
बाबा ने कहा, "बेटी, रुक्मिणी का नाम लौट आया। अब वह मुक्त होने की तरफ़ है। पर पूरी मुक्ति तेरहवीं की रात होगी।"
भगवती देवी ने अपनी बेटी को पुकारा। "मीरा!"
आग में मीरा का चेहरा उभरा। शादी के जोड़े में। लेकिन आँखों में शांति। जो बहुत सालों से नहीं थी।
"माँ..."
भगवती देवी रोने लगीं।
"मीरा, बेटी..."
"माँ, मुझे मुक्त कर। तेरहवीं की रात। दीदी के साथ।"
भगवती देवी ने सिर हिलाया।
मीरा भी ग़ायब हुई।
एक-एक करके सात बहनों के नाम पुकारे गए।
तुलसी। जब पार्वती देवी ने पुकारा, आग में तुलसी का चेहरा उभरा। छोटी बच्ची जैसी। पर आँखों में समझ। "दादी, धन्यवाद।"
लक्ष्मी। दीपक ने पुकारा। "बहन!" और लक्ष्मी का चेहरा उभरा। मुस्कुराते हुए।
कौशल्या। रमेश ने पुकारा। "दीदी!" और कौशल्या ने अपने भाई को देखा। बहुत देर तक।
पार्वती। शारदा ने पुकारा। "जीजी!" पार्वती ने आँखें बंद कीं। संतुष्टि से।
रोहिणी। पार्वती देवी ने दूसरी बार पुकारा। "पोती!" रोहिणी अभी सिर्फ़ 13 साल की मरी थी 2013 में। उसकी आवाज़ छोटी थी। "दादी, मुझे बचाओ।"
सुनीता। दीपक ने दूसरी बार पुकारा। "मामी!" सुनीता ने सिर हिलाया।
मीरा। भगवती दादी ने पुकारा। पहले ही उभर चुकी थीं।
हर बार आग की लपटें ऊँची होतीं। हर बार एक चेहरा उभरता। हर बार शांति।
पाँच बहनें अभी भी बंधन में थीं। जानकी। कमला। राधा। चंपा। और एक और जिसका नाम बाबा अभी तक नहीं जानते थे।
बाबा ने कहा, "बेटी, अब देखते हैं देवीदास का जवाब।"
शाम को कुछ नहीं हुआ। कोई हमला नहीं। बाबा ने कहा, "देवीदास सोच रहा है। योजना बना रहा है।"
रात के आठ बजे। सब ने खाना खाया।
बाबा ने कहा, "बेटी, अब देवीदास बहुत कमज़ोर है। सात बहनों की शक्ति उसकी अंगूठी से निकल चुकी है। अंगूठी में अब बस पाँच नाम बाक़ी हैं।"
आरोही ने पूछा, "बाबा, तो हमें कल क्या करना है?"
बाबा ने कहा, "कल हम बाक़ी पाँच के परिवार ढूँढ़ेंगे। शायद कुछ मिलें।"
पर बाबा ने आगे कहा, "बेटी, एक बात याद रख। जब देवीदास बहुत कमज़ोर होता है, तब वह सबसे ज़्यादा ख़तरनाक होता है। घायल बिच्छू सबसे तेज़ डँसता है।"
आरोही ने सिर हिलाया।
रात के दस बजे। आरोही अपने कमरे में गई।
नोटबुक खोली।
"बेटी, आज बहुत अच्छा काम हुआ। सात बहनें मुक्त हुईं। शाबाश।"
आरोही ने पूछा, "नानी, कल क्या होगा?"
"बेटी, कल देवीदास दूसरा हमला करेगा। इस बार तुझ पर नहीं।"
"किस पर?"
"तेरी माँ पर।"
आरोही की छाती में एक तेज़ धड़कन उठी।
"नानी, माँ पर क्यों?"
"क्योंकि तेरी माँ ने चांदी की डिबिया लाई है। जिसमें असली चूड़ी है। शायद। देवीदास चाहेगा कि तेरी माँ मर जाए। ताकि डिबिया न खुले।"
आरोही ने कहा, "नानी, मैं माँ को बचाऊँगी।"
"बेटी, कल तू माँ के साथ रहना। एक पल भी अकेला मत छोड़ना।"
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
रात लंबी होगी।
अगली सुबह। तीन दिन बचे।
आरोही ने माँ को कहा, "माँ, आज आप मेरे साथ रहेंगी। पूरे दिन। कहीं भी अकेली नहीं।"
माँ ने कहा, "बेटी, क्यों?"
आरोही ने कहा, "माँ, नानी ने रात को कहा — आज देवीदास आप पर हमला करेगा।"
माँ ने कुछ पल सोचा।
"बेटी, ठीक है।"
चारों — आरोही, माँ, भगवती दादी, कुसुम — एक साथ रहीं। बाबा भी उनके साथ। सब बरामदे में।
पर सुबह से दोपहर तक कुछ नहीं हुआ।
दोपहर के दो बजे। कुसुम ने पूछा, "बेटी, कहीं देवीदास ने योजना बदली तो?"
आरोही ने कहा, "चाची, हम सावधान रहेंगे।"
तीन बजे। आरोही को प्यास लगी।
आरोही ने कहा, "माँ, मैं पानी लेकर आती हूँ।"
माँ ने कहा, "बेटी, मैं ला दूँ?"
आरोही ने कहा, "नहीं। आप बैठिए। मैं जल्दी आती हूँ।"
आरोही अंदर गई। रसोई में। पानी भरा। एक गिलास। फिर एक और गिलास सोचा — अपनी माँ के लिए भी। शायद वे भी प्यासी हों।
लौटी। बाहर आई। दो गिलास हाथ में।
बाहर सब बैठे थे। बाबा। भगवती दादी। कुसुम। पर माँ नहीं थीं।
आरोही की छाती में एक तेज़ दर्द उठा। एक गिलास हाथ से गिरा। पानी बरामदे पर फैला।
"माँ कहाँ?"
बाबा ने कहा, "बेटी, अभी-अभी उठकर अंदर गईं। शायद तेरे पीछे।"
आरोही ने कहा, "मैं तो अभी अंदर से आ रही हूँ। माँ अंदर नहीं थीं।"
बाबा ने कहा, "बेटी, अभी-अभी उठकर अंदर गईं। शायद तेरे पीछे।"
आरोही ने कहा, "मैं तो अभी अंदर से आ रही हूँ। माँ अंदर नहीं थीं।"
बाबा उठे। सब चौंके।
आरोही रसोई में गई। नहीं थीं।
कमरे में। नहीं थीं।
बाथरूम में। नहीं थीं।
पूरे घर में। नहीं थीं।
आरोही ने ऊपर के कमरे भी देखे। हर कोने। भगवती दादी का कमरा। बाबा का कमरा। जहाँ बाबा रुके थे।
नहीं थीं।
आरोही चीखी।
"माँ!"
लेकिन जवाब नहीं आया।
बरामदे में लौटी। कुसुम की आँखों में डर था। भगवती दादी काँप रही थीं। बाबा शांत थे — पर उनकी आँखों में एक अजीब सी उदासी थी।
आरोही ने कहा, "देवीदास ले गया। दिनदहाड़े। हमारे सामने से।"
बाबा ने कहा, "बेटी, यह सिर्फ़ देवीदास नहीं कर सकता। किसी ने उसकी मदद की।"
आरोही चौंकी। "किसने?"
बाबा ने कहा, "गाँव में कोई और है जो देवीदास की सेवा में है। पंडित के अलावा। जो हमने अभी तक नहीं पहचाना।"
आरोही ने पूछा, "कौन?"
बाबा ने कहा, "बेटी, मुझे नहीं पता। पर कोई है जिसने आज दोपहर तेरी माँ को धोखा दिया। शायद कोई गाँव वाला। शायद कोई जो कल हवन में आया था।"
आरोही ने कहा, "बाबा, हवन में सिर्फ़ चार लोग आए थे। बिष्ट बूढ़ी। जोशी लड़का। रावत आदमी। नेगी विधवा। इनमें से कोई?"
बाबा ने कहा, "बेटी, शायद। या कोई और जो आस-पास था। हमें ग़ौर से सोचना होगा।"
कुसुम ने कहा, "बेटी, मुझे एक बात याद आई। जब हम सूची लेकर गाँव में गए, तो हर घर के बरामदे में एक लाल चूड़ी थी। मैंने ग़ौर किया। मैंने कहा नहीं। पर मुझे लगा — देवीदास हर परिवार को धमका रहा था।"
आरोही ने कहा, "चाची, तो शायद देवीदास पहले से जानता था कि हम किसे बुलाएँगे।"
कुसुम ने कहा, "हाँ बेटी।"
बाबा ने कहा, "तो हमारे बीच का एक ग़द्दार है।"
तभी बरामदे से कुसुम ने चीखकर बुलाया।
"आरोही! यहाँ आ!"
आरोही दौड़ी।
कुसुम ने ज़मीन पर एक चीज़ दिखाई।
एक चांदी की डिबिया।
नानी की डिबिया।
खाली।
और उसके पास एक कागज़।
आरोही ने कागज़ उठाया। पढ़ा।
"आरोही, तेरी माँ मेरे पास है। तेरहवीं की रात मंदिर आ। अकेली। सब को घर पर छोड़। तेरी माँ की जान तेरे हाथ में है। — देवीदास।"
आरोही के हाथ से कागज़ गिरा।
तीन दिन बचे थे। और अब उसकी माँ देवीदास के पास थीं।
बाबा ने कागज़ पढ़ा। कुसुम पढ़ी। भगवती दादी पढ़ीं।
चारों चुप।
आरोही ने आँखें बंद कीं।
पहला हमला बाबा पर। दूसरा हमला माँ पर।
अगला किस पर होगा?
पर एक बात और आरोही के मन में आई।
नानी की डिबिया खाली थी।
क्या असली चूड़ी सचमुच उसमें थी? या नानी ने कुछ और छिपाया था?
क्या माँ ने डिबिया देवीदास को दी थी — जबरदस्ती से नहीं, ख़ुद?
क्या माँ पर देवीदास ने कोई मंत्र चलाया था?
या फिर...
क्या माँ ने ख़ुद कुछ योजना बनाई थी — जो आरोही को नहीं बताई?
आरोही ने डिबिया को हाथ में लिया। खाली थी। पर एक अजीब सी बात थी — डिबिया अभी भी गरम थी। जैसे कुछ पल पहले तक उसमें कुछ था।
आरोही ने डिबिया के अंदर देखा।
एक छोटा सा कागज़ था। नीचे।
आरोही ने निकाला। खोला।
नानी की हस्तलिपि में लिखा था।
"बेटी, अगर तूने यह पढ़ा, तो असली चूड़ी मेरे पास नहीं थी। मेरे पास एक और चीज़ थी। जो देवीदास के लिए ज़हर है। पर मुझे लगा — तेरहवीं की रात तक इसे छिपाकर रखना बेहतर होगा। असली चूड़ी अभी भी देवीदास के पास है। पर मेरी ज़हर की चीज़ अब तेरी माँ के पास है। और तेरी माँ ने ख़ुद देवीदास से बात की है — योजना बना ली है।"
आरोही ने चौंककर सोचा।
तो माँ ख़ुद देवीदास के पास गई थीं।
एक योजना के साथ।
बाबा ने कागज़ पढ़ा। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक आई।
"बेटी, तेरी माँ बहुत बहादुर है। उन्होंने ख़ुद अपने आप को देवीदास के हवाले किया। पर एक ज़हर की चीज़ के साथ। जो शायद तेरहवीं की रात काम आएगी।"
आरोही ने कहा, "बाबा, माँ ने मुझे नहीं बताया। क्यों?"
बाबा ने कहा, "बेटी, क्योंकि उन्हें पता था कि तू रोकेगी। तेरी माँ जानती हैं कि कुछ लड़ाइयाँ माँ को ही लड़नी होती हैं।"
आरोही की आँखों में आँसू आए।
कुसुम ने कहा, "बेटी, तेरी माँ बहुत हिम्मत वाली हैं।"
भगवती दादी ने कहा, "बेटी, हमें तेरहवीं की रात मंदिर जाना ही होगा। पर हम तेरे साथ नहीं जाएँगे। तेरी माँ की जान की बात है। और देवीदास ने कहा है 'अकेली आना।'"
आरोही ने कहा, "दादी, मैं अकेली नहीं जाऊँगी। पर सब को नहीं ले जाऊँगी। बस बाबा।"
बाबा ने सिर हिलाया।
"बेटी, तेरहवीं की रात मैं तेरे साथ रहूँगा। जिस बल से भी।"
आरोही ने कहा, "बाबा, आज रात क्या होगा?"
बाबा ने कहा, "बेटी, आज देवीदास शायद हमला न करे। उसे तेरी माँ मिल गई है। अब वह तेरा इंतज़ार करेगा।"
आरोही ने कहा, "पर बाबा, नानी ने कहा था — तीसरा हमला अभी होगा। दो दिनों में।"
बाबा ने सोचा।
"बेटी, तो हमें और सावधान रहना होगा।"
रात के दस बजे। आरोही अपने कमरे में गई।
नोटबुक खोली।
पन्ने पर एक नई पंक्ति।
"बेटी, आज तेरी माँ ने बहुत बड़ा काम किया। तुझे बचाने के लिए। पर एक बात याद रख। देवीदास चालाक है। वह तेरी माँ की ज़हर की चीज़ को छू नहीं सकता — पर वह तेरी माँ को यातना दे सकता है। ताकि वे कह दें कि ज़हर कहाँ है।"
आरोही ने पूछा, "नानी, माँ को यातना?"
"हाँ बेटी। पर तेरी माँ मज़बूत हैं। वे कुछ नहीं बताएँगी।"
आरोही ने कहा, "नानी, मैं क्या करूँ?"
"बेटी, इंतज़ार। तेरहवीं की रात तक। जब तू मंदिर आएगी, तेरी माँ वहीं मिलेगी। और तब तेरी माँ अपनी ज़हर की चीज़ तुझे देगी।"
आरोही ने कहा, "नानी, वह चीज़ क्या है?"
पन्ने पर आख़िरी पंक्ति उभरी।
"बेटी, वह चीज़ है — रुक्मिणी की असली दूसरी चूड़ी। जोड़ी की एक। दूसरी अभी भी देवीदास के पास है। पर दो चूड़ियाँ जब मिलेंगी, तब देवीदास का अंत होगा।"
आरोही की आँखें फैलीं।
तो नानी के पास थी असली दूसरी चूड़ी।
और अब वह माँ के पास थी।
देवीदास के अंदर।
तेरहवीं की रात दो चूड़ियाँ मिलेंगी।
और श्राप टूटेगा।
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
बाहर चाँद पतला हो रहा था। लगभग ग़ायब।
दो दिन बचे।

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