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भाग 11 : बाबा पर हमला और अतीत के राज़
Piyashi Atma · Psychological Horror · 17 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- तेरहवीं अमावस
- Chapter
- 11 of 23
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3336
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
तेरहवीं अमावस
भाग 11 : बाबा पर हमला और अतीत के राज़
सुबह छह बजे। आरोही की आँख खुली।
खिड़की के बाहर एक अजीब सी शांति थी। हवा नहीं बह रही थी। पक्षी नहीं गा रहे थे। जैसे पूरा गाँव अपनी साँस रोक कर बैठा हो।
आरोही ने आँखें मलीं। बदन थका हुआ था। कल का दिन बहुत भारी था। पंडित की मौत। कुसुम का दुख। नानी की चेतावनी।
आरोही उठी। नीचे उतरी।
नीचे माँ, भगवती देवी, और कुसुम बरामदे में बैठी थीं। तीनों चाय पी रही थीं। पर उनके चेहरों पर एक अजीब सा तनाव था।
"क्या हुआ?" आरोही ने पूछा।
माँ ने कहा, "बेटी, कुसुम ने एक सपना देखा। बाबा के बारे में।"
कुसुम ने कहा, "बेटी, सपने में बाबा घायल थे। उनकी झोपड़ी जल रही थी। और वे बाहर पड़े थे। ज़मीन पर। हरे रंग की आग थी। तांत्रिक आग। और उनके शरीर पर काले जले के निशान थे।"
आरोही की छाती में एक धड़कन तेज़ हुई।
"चाची, यह कब का सपना है?"
"अभी। भोर के समय। मैंने आँख खोलते ही तुझे बताने की सोची।"
आरोही ने कहा, "हमें बाबा के पास जाना होगा। अभी।"
भगवती देवी ने कहा, "बेटी, चाय पी ले पहले।"
"नहीं दादी। समय नहीं है।"
माँ ने कहा, "बेटी, चलो।"
चारों तैयार हुईं। आरोही ने अपना बैग उठाया। ताबीज़। छुरी। नानी की डिबिया। सब कुछ।
लेकिन दरवाज़े से बाहर निकलते ही एक अजीब सी बात हुई।
गाँव की गलियों में आज कोई नहीं था। एक भी नहीं। दुकानें बंद। घरों के दरवाज़े बंद। खिड़कियाँ बंद।
जैसे पूरा गाँव कहीं छिप गया हो।
आरोही ने भगवती देवी से पूछा, "दादी, यह क्या है?"
भगवती देवी ने कहा, "बेटी, आज सुबह गाँव के लोगों को कोई डर लगा। शायद पंडित की मौत की खबर फैल गई। शायद देवीदास ने कोई संदेश भेजा। लोग डर के मारे अंदर छिप गए।"
आरोही ने कहा, "तो अच्छा। हम बिना किसी की नज़र में गए बाबा के पास पहुँच सकते हैं।"
चारों तेज़ चलीं।
जंगल का रास्ता आज भी काला था। पेड़ पीले। पर एक चीज़ बदल गई थी। जमीन पर जो निशान थे — किसी अदृश्य पैर के — वे आज नहीं थे। जैसे देवीदास ने अपनी शक्ति कहीं और लगा दी हो।
तीस मिनट में चारों बाबा की झोपड़ी पहुँचीं।
लेकिन जो देखा — कुसुम का सपना सच था।
बाबा की झोपड़ी जल रही थी। धीरे-धीरे। छत से धुआँ उठ रहा था। दीवारें कच्ची थीं — पूरी तरह जलने में कुछ वक़्त लगता।
आग की रंग अजीब थी। पीली नहीं। हरी। जैसे कोई तांत्रिक आग हो।
और बाहर, ज़मीन पर, बाबा पड़े थे।
आस-पास की ज़मीन काली पड़ी थी। जैसे किसी ने वहाँ जहरीली शक्ति फैलाई हो। पेड़ों की पत्तियाँ पीली। कुत्ते नहीं भौंक रहे थे — हालाँकि हर जंगली जगह में कुत्ते होते हैं।
आरोही दौड़ी।
बाबा के पास बैठी।
"बाबा! बाबा!"
बाबा की साँसें चल रही थीं। पर धीमी। बहुत धीमी। उनके शरीर पर कहीं-कहीं जले हुए निशान थे। कपड़े फटे। दाढ़ी में ख़ून। एक हाथ की उँगली टूटी हुई। पैर में एक गहरा घाव।
आरोही ने अपने ताबीज़ को बाबा के माथे पर रखा।
ताबीज़ जलने लगा। पीली रोशनी। पर बाबा के माथे पर लगते ही एक अजीब सी बात हुई — बाबा के घाव धीरे-धीरे कम होने लगे। जैसे ताबीज़ की शक्ति उन्हें ठीक कर रही हो।
बाबा की आँखें खुलीं।
"बेटी..."
"बाबा, क्या हुआ?"
"देवीदास... कल रात... आया था... मेरी झोपड़ी में..."
माँ ने भी बाबा के पास बैठकर उनका हाथ पकड़ा। "बाबा, आप कैसे बचे?"
बाबा ने काँपते हुए कहा, "मेरे... तांबे के... कवच से..."
बाबा ने अपने सीने पर हाथ रखा। वहाँ एक तांबे की छोटी सी प्लेट थी। जिसमें अब एक बड़ी दरार थी। जैसे किसी ने बहुत ज़ोर से मारा हो।
बाबा ने आगे कहा, "बेटी, देवीदास मुझे मार नहीं सका। पर मेरी शक्ति... आधी... ले गया।"
आरोही ने कहा, "बाबा, आप हमारे साथ चलिए। गाँव में। हम आपकी देखभाल करेंगे।"
बाबा ने सिर हिलाया।
"नहीं बेटी। मैं... झोपड़ी में... रहूँगा। यहाँ... मेरी शक्ति... सबसे मज़बूत है।"
आरोही ने कहा, "बाबा, आपकी झोपड़ी जल रही है।"
बाबा ने हल्की सी हँसी हँसी।
"बेटी... मंत्र से बचा लूँगा।"
बाबा ने अपने हाथ उठाए। धीरे-धीरे। और कुछ बुदबुदाया।
अजीब बात हुई।
झोपड़ी में जो आग थी, वह धीरे-धीरे बुझ गई। बिना पानी के। बिना किसी और चीज़ के।
लेकिन बाबा और भी कमज़ोर हो गए।
आरोही ने कहा, "बाबा, बहुत हुआ। अब आराम कीजिए।"
चारों ने बाबा को अंदर ले गईं। झोपड़ी में। एक चारपाई पर लिटाया।
अंदर बहुत सी चीज़ें थीं। पुरानी किताबें। तांबे के बर्तन। एक कोने में एक छोटी सी अलमारी। और दीवार पर एक पुरानी तस्वीर — एक बुज़ुर्ग तांत्रिक की। शायद यह रामनाथ बाबा थे। तस्वीर की आँखें अजीब सी थीं। जीवित सी।
अंदर बहुत सी चीज़ें थीं। पुरानी किताबें। तांबे के बर्तन। एक कोने में एक छोटी सी अलमारी।
आरोही ने बाबा के लिए पानी लाया। बाबा ने पिया।
फिर बाबा ने कहा, "बेटी, अब मुझे तुझे एक बात बतानी है। जो मैंने आज तक नहीं बताई।"
आरोही ने कहा, "बताइए बाबा।"
बाबा ने अपनी आँखें बंद कीं। कुछ देर के लिए। जैसे बहुत पुरानी बात याद कर रहे हों।
"बेटी, 1913 में जब मैंने कौशल्या को बचाने की कोशिश की थी, तब मैं अकेला नहीं था। मेरे साथ एक और आदमी था। मेरे गुरु के गुरु। जो उस वक़्त 90 साल के थे। उनका नाम था — रामनाथ बाबा।"
"रामनाथ बाबा?"
"हाँ। वे बहुत बड़े तांत्रिक थे। पर उन्होंने अपनी शक्ति का इस्तेमाल कभी बुरे काम में नहीं किया। जब उन्हें रत्नपुर के श्राप के बारे में पता चला, वे ख़ुद यहाँ आए। मुझे सिखाने। और कौशल्या को बचाने की योजना बनाई।"
"फिर क्या हुआ?"
"बेटी, हमारी योजना अच्छी थी। लेकिन मैंने एक ग़लती की। मैंने रामनाथ बाबा को कहा — 'गुरुजी, आप बाहर रहिए। मैं अंदर जाऊँगा। मैं जवान हूँ। शक्ति में हूँ।' रामनाथ बाबा ने मुझे रोका। बोले — 'बेटा, यह लड़ाई तेरे बस की नहीं। मुझे जाने दे।' पर मैंने नहीं सुनी।"
बाबा की आँखों में आँसू आए।
"बेटी, मैं कौशल्या के घर में गया। रक्षा-चक्र बनाया। पर देवीदास ने मुझे धोखा दिया। मेरी शक्ति ले ली। मैं बेहोश हो गया। जब होश आया, तो कौशल्या जा चुकी थी। और... और रामनाथ बाबा भी।"
आरोही ने पूछा, "उन्हें क्या हुआ?"
"रामनाथ बाबा ने मुझे बचाने के लिए अपनी जान दे दी। उन्होंने अपने आपको एक बंधन में बाँधा। और उस बंधन को देवीदास के साथ जोड़ दिया। जब तक मैं ज़िंदा हूँ, रामनाथ बाबा की आत्मा बंधन में है। पर उनकी आत्मा देवीदास को कमज़ोर करती है। हर पल।"
आरोही ने चौंककर पूछा, "यानी अगर आप मर जाएँ, तो रामनाथ बाबा की आत्मा भी मुक्त होगी?"
"हाँ। और उस पल देवीदास की आधी शक्ति ग़ायब हो जाएगी।"
आरोही ने आँखें बंद कीं।
अब समझ आया कि बाबा उन्हें मरने की शर्त क्यों रख रहे थे।
पर बात यहीं तक नहीं थी।
बाबा ने कहा, "बेटी, एक और बात है। रामनाथ बाबा ने मरने से पहले मुझसे एक वादा लिया था। बोले — 'देवराज, जब कोई तेरहवीं आए, तो उसे मेरा नाम बताना। मेरी शक्ति उसके साथ रहेगी। पर उसे एक चीज़ ढूँढ़नी होगी।'"
आरोही ने पूछा, "क्या?"
"रामनाथ बाबा की चिता की राख। जो मैंने एक तांबे के कलश में रखी है। बरसों से। पर मैं भूल गया था। आज मुझे याद आया।"
बाबा ने कोने की तरफ़ इशारा किया।
"बेटी, वहाँ एक कलश है। लाल कपड़े में लिपटा। ला।"
आरोही उठी। कोने में गई। वहाँ धूल भरी चीज़ों के बीच एक लाल कपड़ा दिखा। उसने कपड़ा हटाया। अंदर एक तांबे का छोटा सा कलश। बहुत पुराना।
आरोही ने कलश उठाया। बाबा के पास लाई।
बाबा ने कलश हाथ में लिया। खोला।
अंदर सफ़ेद राख। बहुत बारीक।
बाबा ने कहा, "बेटी, यह राख तुझे रखनी होगी। तेरहवीं की रात इसे तेरहवीं अमावस के मंदिर के तहख़ाने में छिड़कना। जहाँ देवीदास की मूर्ति है। यह राख देवीदास को कुछ पल के लिए कमज़ोर करेगी। उन पलों में तुझे अंगूठी तोड़नी होगी।"
आरोही ने कलश को अपने बैग में डाला।
"बाबा, नानी ने रात को कहा था — तीन तरीक़े हैं देवीदास को कमज़ोर करने के। यह पहला था। क्या है यह?"
बाबा ने कहा, "बेटी, यह तीनों में सबसे बड़ा है।"
आरोही ने कहा, "बाबा, नानी ने कहा है कि आपको मरने की ज़रूरत नहीं। तीसरा रास्ता है।"
बाबा ने कहा, "बेटी, नानी सही कह रही हैं। पर मुझे नहीं पता कि तीसरा रास्ता क्या है। शायद तेरहवीं की रात हमें पता चलेगा।"
बाबा की झोपड़ी में सब ने कुछ देर आराम किया। दोपहर हो गई।
आरोही ने बाबा से पूछा, "बाबा, देवीदास ने आप पर हमला क्यों किया?"
बाबा ने कहा, "बेटी, क्योंकि पंडित की मौत के बाद देवीदास कमज़ोर हुआ है। वह अब अपनी पूरी शक्ति समेटना चाहता है। और मैं एक ऐसा आदमी हूँ जो उसे परेशान करता है। अगर मैं मर जाऊँ, तो उसे थोड़ी और शक्ति मिलेगी।"
"पर वह आपको नहीं मार सका।"
"हाँ। मेरा तांबे का कवच मुझे बचाता है। मेरे गुरु का दिया हुआ। पर आज उसने कवच को क्षति पहुँचाई। अगली बार वह इसे तोड़ सकता है। पर मैंने भी सीखा है।"
"क्या?"
"बेटी, आज मैंने देवीदास को देखा। बहुत क़रीब से। मैंने उसकी शक्ति की गंध महसूस की। मैं जानता हूँ अब — वह कहाँ ज़्यादा कमज़ोर है। कहाँ ज़्यादा मज़बूत।"
"कहाँ कमज़ोर है?"
"अपने असली शरीर के पास। तहख़ाने के तीसरे कमरे में। क्योंकि वहाँ उसकी आत्मा और शरीर एक साथ हैं। पर एक कमज़ोरी की क़ीमत भी है — वहाँ उसकी असली अंगूठी है। और उस अंगूठी में उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। दो-तरफ़ा तलवार।"
आरोही ने कहा, "बाबा, यानी अगर मैं तीसरे कमरे तक पहुँच सकूँ, तो अंगूठी तोड़ सकती हूँ।"
बाबा ने कहा, "हाँ। पर पहुँचना बहुत मुश्किल है।"
माँ ने कहा, "बाबा, हम आपकी रक्षा करेंगे।"
बाबा ने मुस्कुराया।
"बेटी, तुम्हारा एहसान बहुत बड़ा है। पर अब मुझे भी अपनी शक्ति से बाहर आना होगा। बहुत साल से मैंने अपनी पूरी शक्ति नहीं दिखाई। क्योंकि मैं मरना नहीं चाहता था। मरता तो देवीदास मज़बूत होता। पर अब स्थिति बदली है। पंडित की मौत ने कुछ खोला है। शायद अब मैं भी अपनी पूरी शक्ति इस्तेमाल कर सकूँ। बिना अपनी जान गँवाए।"
आरोही ने कहा, "बाबा, यह अच्छी बात है।"
बाबा ने कहा, "बेटी, एक और बात। मुझे आज सुबह रामनाथ बाबा की आवाज़ सुनाई दी। पहली बार 113 साल में। उन्होंने मुझसे कहा — 'देवराज, तेरहवीं आ चुकी है। अब तेरी बारी है। मैं भी तेरे साथ हूँ।'"
आरोही की आँखों में आँसू आए।
"बाबा, यानी रामनाथ बाबा हमारी मदद करेंगे?"
"हाँ बेटी।"
बाबा ने आगे कहा, "और यह भी कहा उन्होंने — 'देवराज, तूने मुझसे कहा था कि तू मर जाएगा तब मैं मुक्त हूँगा। पर मैं तेरी मौत नहीं चाहता। तेरहवीं की रात मैं ख़ुद बंधन से बाहर आऊँगा। बिना तेरी मौत के। मेरी शक्ति से।'"
आरोही ने कहा, "बाबा, यह... यह अद्भुत है।"
बाबा ने कहा, "बेटी, तेरी नानी सही कहती हैं। तीसरा रास्ता है। शायद रामनाथ बाबा और तेरी नानी मिलकर कुछ योजना बना रहे हैं। जो हम नहीं जानते। पर वह हमारी जान बचाएगी।"
भगवती देवी ने कहा, "बाबा, मीरा भी हमारे साथ है। कहीं न कहीं।"
बाबा ने कहा, "हाँ। और शायद कौशल्या भी। और तुलसी। और लक्ष्मी। सब बारह लड़कियाँ। सब हमारी तरफ़ हैं। बस देवीदास ने उन्हें बाँधा है। अगर हम उनका बंधन तोड़ सकें, तो हमारे पास बारह मददगार हैं।"
आरोही ने कहा, "बाबा, नानी ने कहा था — बारह लड़कियों की आत्माओं को शक्ति देना। यह कैसे होगा?"
बाबा ने कहा, "बेटी, यह मैं कल बताऊँगा। आज मैं थका हूँ।"
बाबा ने आँखें बंद कीं।
चारों ने बाबा को आराम करने दिया।
शाम को चारों गाँव लौटीं। बाबा को अकेला नहीं छोड़ा। उन्हें अपने साथ ले आईं। एक बुज़ुर्ग आदमी। एक बुज़ुर्ग औरत। एक विधवा। और आरोही। और उसकी माँ। सब एक ही घर में।
रात के आठ बजे। भगवती देवी ने खाना बनाया। सब ने साथ खाया।
बाबा ने खाना खाते हुए कहा, "इतने साल बाद घर का खाना खाया। मीठा है।"
भगवती देवी मुस्कुराईं।
आरोही ने पूछा, "बाबा, आपने आख़िरी बार घर का खाना कब खाया था?"
बाबा ने सोचा।
"शायद 1913 में। जब मेरी पत्नी थीं। उसके बाद मैंने कभी नहीं खाया। जंगल में जो मिला, खा लिया। फल। जड़ें। कभी दूध जो कोई गाँव वाला दे जाता।"
माँ की आँखों में आँसू आए।
"बाबा, 113 साल बिना घर के खाने के?"
बाबा ने हँसकर कहा, "बेटी, मुझे मौत नहीं आई। खाने की क्या बात। मुझे मेरे पूर्वजों की माफ़ी नहीं मिली। घर की गंध बहुत दूर की बात है।"
कुसुम ने बाबा के लिए एक और रोटी परोसी।
"बाबा, अब आप हमारे परिवार में हैं। जितना खाना है, खाइए।"
बाबा ने कुसुम को देखा।
"बेटी, तेरा पैर कैसा है?"
कुसुम ने अपना पैर उठाया। अब वह लगभग पूरा बन चुका था। बस थोड़ी सी धुंधलाहट थी।
"बाबा, कल तक पूरा हो जाएगा।"
बाबा ने कहा, "बहुत अच्छा।"
रात के दस बजे। आरोही अपने कमरे में गई।
नोटबुक खोली।
एक नई पंक्ति उभर रही थी।
"बेटी, आज देवीदास ने बाबा पर हमला किया। यह उसका पहला हमला था। अगले चार दिनों में तीन और होंगे। एक हमला रोज़। एक पर मैं तेरे साथ रहूँगी। पर एक हमला बहुत बड़ा होगा। जो शायद तेरी जान का हो सकता है।"
आरोही ने पूछा, "नानी, वह कौन सा दिन होगा?"
"बेटी, मुझे नहीं पता। पर तेरे पास एक चीज़ है जो तुझे बचाएगी।"
"क्या?"
"मीरा की चाँदी की पायल।"
आरोही चौंकी।
"नानी, वह पायल तो मेरे बैग में है। मैंने पहनी नहीं है।"
"बेटी, कल पहन ले। और उतारना मत। तेरहवीं की रात तक।"
आरोही ने बैग से पायल निकाली। हाथ में ली।
पायल भारी थी। बहुत पुरानी। मीरा के परदादा की बनवाई हुई। जिसमें कोई पुरानी शक्ति थी। चाँदी की, पर उसमें कुछ और भी था — कोई तांबा। कोई मंत्र। कोई ऊर्जा।
आरोही ने पायल पहनी।
एक अजीब सी झनझनाहट उसके पैर में हुई। जैसे कोई ऊर्जा उसके शरीर में दौड़ रही हो। बहुत तेज़। फिर धीरे-धीरे शांत।
फिर एक कोमल आवाज़ आई। मीरा की।
"दीदी, मैं तेरे साथ हूँ। पायल में। जब तू मुझे बुलाएगी, मैं जवाब दूँगी।"
आरोही की आँखों में आँसू आए।
"मीरा।"
"दीदी, मुझे अपनी माँ से एक बात कहना। कि मैं ठीक हूँ। और मैंने उन्हें कभी नहीं छोड़ा।"
आरोही ने कहा, "मीरा, मैं कहूँगी।"
"दीदी, एक और बात।"
"क्या मीरा?"
"तेरहवीं की रात, जब तू तहख़ाने जाएगी, मुझे भी अपनी साथी बनाना। मैं तेरे साथ आऊँगी। मेरी आत्मा तुझे रास्ता दिखाएगी। मैं वहाँ रह चुकी हूँ। मैं जानती हूँ कहाँ क्या है।"
आरोही ने कहा, "ठीक है मीरा।"
पायल में झनझनाहट कम हुई। लेकिन शक्ति बनी रही।
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
पाँच दिन बचे।
अगली सुबह। बाबा उठे। पहले से बेहतर लग रहे थे। पर अभी भी कमज़ोर।
आरोही ने भगवती देवी से कहा, "दादी, आप बाबा की देखभाल कीजिए। मैं और माँ आज तहख़ाने के ऊपर वाले मंदिर में जाएँगी। असली चूड़ी को देखने। दूर से।"
भगवती देवी ने कहा, "बेटी, सावधान रहना।"
आरोही और माँ निकलीं। कुसुम भी साथ आना चाहती थीं। पर उनका पैर अभी पूरा नहीं बना था। धीरे-धीरे ठीक हो रहा था। हर दिन थोड़ा और असली दिखता। जैसे कोई अदृश्य चीज़ धीरे-धीरे इसे बुन रही थी।
रास्ते में माँ ने आरोही से पूछा, "बेटी, तूने पायल पहनी है?"
"हाँ माँ।"
"मीरा की?"
"हाँ। नानी ने कहा था। पायल में मीरा की आत्मा है।"
माँ ने आरोही का हाथ पकड़ा।
"बेटी, तू अकेली नहीं है। इतनी सारी आत्माएँ तेरे साथ हैं। मीरा। नानी। रुक्मिणी। शायद रामनाथ बाबा भी। सब मिलकर तेरी रक्षा करेंगे।"
आरोही ने कहा, "माँ, मैं डरी नहीं हूँ। पर एक चीज़ मुझे परेशान कर रही है।"
"क्या?"
"अगर मुझे इनके लिए अपना बलिदान देना पड़े, तो क्या मैं दे सकूँगी?"
माँ ने रुककर आरोही को देखा।
"बेटी, तू पहले ही दे चुकी है। तूने अपनी शादी छोड़ी। अपना करियर छोड़ा। अपनी माँ को छोड़कर यहाँ आई। तू पहले से बलिदान दे रही है।"
आरोही ने अपनी माँ को गले लगाया।
रास्ते में दोनों चुप चलती रहीं।
मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ीं।
अंदर घुसीं।
देवी की मूर्ति। जिस पर अब भी रुक्मिणी का चेहरा था।
आरोही ने माँ को दिखाया।
माँ ने चौंककर देखा।
"बेटी, यह... यह चेहरा..."
"माँ, यह रुक्मिणी है।"
माँ ने कहा, "बेटी, यह चेहरा तेरे नाना जैसा दिखता है।"
आरोही चौंकी।
"क्या?"
माँ ने कहा, "हाँ बेटी। तेरे नाना के चेहरे में कुछ रुक्मिणी जैसा था। मैंने कभी सोचा नहीं था। पर अब देखकर लगता है। नाना के जबड़े में, आँखों की बनावट में — एक हल्की सी समानता।"
आरोही ने ग़ौर से देखा।
सच में। रुक्मिणी और उसके नाना में एक हल्की सी समानता थी। जैसे उनके ख़ून में कुछ था जो पीढ़ियों तक चला।
क्या यह इसलिए था कि नाना पंडित परिवार से थे? और पंडित परिवार 1857 से रुक्मिणी की कहानी में उलझा था? हो सकता है कि रुक्मिणी और पंडित परिवार में कोई पुराना रिश्ता हो — पितृ-कुल से।
तभी आरोही को एक विचार आया।
अगर पंडित शिवनाथ शर्मा — जिन्होंने 1870 में चिट्ठी लिखी थी — रुक्मिणी की भाभी की तरफ़ से रिश्तेदार थे, तो यह बताता है कि रुक्मिणी और पंडित परिवार आपस में जुड़े थे। शादी से पहले।
आरोही ने माँ से पूछा, "माँ, नाना ने कभी रुक्मिणी का नाम लिया था?"
माँ ने सोचा।
"बेटी, एक बार। मरने से पहले। उन्होंने कहा था — 'सुधा, अगर कभी तुझे रुक्मिणी नाम की कोई चीज़ मिले, तो सावधान रहना। वह मेरे परिवार का पुराना श्राप है।'"
आरोही ने कहा, "माँ, तो नाना जानते थे। पर उन्होंने पूरा नहीं बताया।"
माँ ने कहा, "शायद वे मुझे डराना नहीं चाहते थे।"
आरोही ने मंदिर के पिछले हिस्से की तरफ़ देखा। जहाँ तहख़ाने का दरवाज़ा था।
आज उसने खोलने की कोशिश नहीं की। बस दूर से देखा।
देवीदास शायद अंदर था। अपनी असली मूर्ति के पास।
तेरहवीं की रात। पाँच दिन बाद।
आरोही ने आँखें बंद कीं।
तब तक इंतज़ार।
पर तभी उसके पैर की मीरा वाली पायल में एक झनझनाहट हुई।
मीरा की आवाज़ आई।
"दीदी, यहाँ से चली जा। जल्दी। कोई आ रहा है।"
आरोही ने माँ का हाथ पकड़ा।
"माँ, चलिए। जल्दी।"
दोनों मंदिर से बाहर निकलीं। सीढ़ियाँ तेज़ी से उतरीं।
पीछे मंदिर में कोई आवाज़ आई। कोई अंदर आया था। किसी के भारी क़दम।
आरोही ने पीछे नहीं देखा। बस माँ को पकड़कर तेज़ चलती रही।
जब दोनों गाँव पहुँचीं, आरोही ने पीछे देखा।
मंदिर की ऊँची सीढ़ियों पर कोई खड़ा था। दूर से देखने पर पहचाना नहीं जा सका। पर आरोही ने ग़ौर से देखा।
वह विक्रम था। पर उसका शरीर बदल रहा था। बहुत तेज़ी से। एक शरीर से दूसरा।
देवीदास अपना नया शरीर ढूँढ़ रहा था।
तेरहवीं की तैयारी के लिए।
आरोही ने माँ की तरफ़ देखा।
माँ ने कहा, "बेटी, अब वह और तेज़ हो रहा है। हमें सावधान रहना होगा।"
आरोही ने सिर हिलाया।
चार दिन बचे।
रास्ते में माँ ने कहा, "बेटी, मुझे एक और सपना आया कल रात। तेरी नानी का।"
"क्या माँ?"
"नानी ने कहा — 'सुधा, आरोही की सबसे बड़ी लड़ाई अपने ही मन से होगी। बाहर की लड़ाई बाद में। पहले वह अपने अंदर के डर को हराए।'"
आरोही ने कहा, "माँ, मैं समझ रही हूँ। जब देवीदास ने मीरा को धोखा दिया, वह उसकी माँ के रूप में आया। जब कौशल्या को, तब भी माँ के रूप। सब लड़कियों को उसने प्यारे लोगों के रूप में धोखा दिया। यही उसकी सबसे बड़ी चाल है।"
"हाँ बेटी।"
"तो मुझे तैयार रहना होगा। जब कोई मेरे प्यारे लोगों के रूप में आए, तो मैं शक करूँ। हर बार।"
माँ ने कहा, "बेटी, ताबीज़ हमेशा पास रख। ताबीज़ भूत और इंसान में फ़र्क़ जानता है।"
आरोही ने अपने गले में लटके ताबीज़ को छुआ।
गरम था। पर सुरक्षित।
चारों घर पहुँचीं।
रात के दस बजे। आरोही अपने कमरे में गई।
नोटबुक खोली।
पन्ने पर एक और पंक्ति उभर रही थी।
"बेटी, आज देवीदास ने अपनी असली शक्ल दिखानी शुरू की। कल वह और भी बुरा होगा। तैयार रहना।"
आरोही ने पूछा, "नानी, कल क्या होगा?"
पर पन्ना कोरा था।
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
बाहर कुत्ते फिर से भौंकने लगे थे। एक साथ। सुर में। पंडित की मौत के बाद जो शांति थी, वह अब ग़ायब हो रही थी।
देवीदास अपनी शक्ति समेट रहा था।
चार दिन।
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