PretikaPsychological Horrorतेरहवीं अमावस

भाग 10 : पंडित का बलिदान और समाधि पर की रात

Piyashi Atma · Psychological Horror · 17 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
10 of 23
Category
Psychological Horror
Reading time
17 min
Words
3381
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

तेरहवीं अमावस
भाग 10 : पंडित का बलिदान और समाधि पर की रात
सुबह पाँच बजे। आरोही की आँख खुली। बाहर अभी अँधेरा था।
एक बुरा सपना उसे जगा गया था।
सपने में उसने देखा — पंडित समाधि पर बैठे हैं। मंत्र पढ़ रहे हैं। लेकिन उनके पीछे देवीदास खड़ा है। बड़ा। जलता हुआ। उसने पंडित के कंधे पर हाथ रखा।
पंडित पीछे नहीं देखते। बस पढ़ते रहते हैं।
फिर देवीदास ने कहा — "राधेश्याम, तू मर जाएगा। लेकिन एक शर्त पर मैं तुझे बचा सकता हूँ। बस अपनी भतीजी को मुझे दे दे।"
पंडित ने कोई जवाब नहीं दिया।
तब सपना बदला। पंडित का चेहरा आरोही के चेहरे में बदल गया। और देवीदास ने अपना हाथ आरोही के गले पर रखा।
आरोही की आँख खुली।
छह दिन बचे थे। आज पंडित राधेश्याम अपने पिता की समाधि पर जाने वाले थे। मंत्र पढ़ने। पंडित परिवार का बंधन तोड़ने।
आरोही उठी। मुँह धोया। नीचे उतरी।
माँ रसोई में थीं। चाय बना रही थीं। भगवती देवी अभी सो रही थीं।
"माँ।"
"बेटी।"
"पंडित जी आज जाने वाले हैं। हमें उनके साथ जाना चाहिए।"
माँ ने कहा, "बेटी, बाबा ने कहा था कि पंडित अकेले जाएँगे।"
"पर माँ, अगर देवीदास ने रास्ते में उन्हें रोका, तो?"
माँ ने चाय आरोही को दी।
"बेटी, हम पीछे-पीछे चलेंगे। दूर से देखेंगे। पंडित को पता नहीं चलेगा। पर हम रक्षा में रहेंगे।"
आरोही ने सिर हिलाया।
छह बजे भगवती देवी उठीं। तीनों ने साथ चाय पी।
तभी दरवाज़े पर एक खटखटाहट।
कुसुम।
पंडित की पत्नी। लाठी टेकते हुए। एक टाँग नहीं थी, फिर भी। शायद पंद्रह साल में पहली बार वे घर से निकली थीं।
आरोही ने चौंककर उन्हें अंदर लिया।
"चाची, आप कैसे?"
कुसुम ने कहा, "बेटी, राधेश्याम अभी-अभी निकले। समाधि की तरफ़। मैं तुझे बताने आई।"
"चाची, आप कैसे यहाँ पहुँचीं?"
कुसुम मुस्कुराईं।
"बेटी, बरसों बाद मैं चली। पहली बार। पर मुझे आज चलना ही था। मुझे तुझे कुछ बताना है।"
तीनों ने कुसुम को बैठाया।
कुसुम ने कहा, "बेटी, जब मेरी शादी हुई थी, तब मैं सिर्फ़ अठारह की थी। पंडित परिवार में कुछ अजीब है — यह मुझे शादी के तीन दिन बाद ही पता चल गया था। पहली रात मेरी सास ने मुझे एक चीज़ दी थी। एक तांबे की अंगूठी। कहा था — 'बेटी, इसे हमेशा पहनकर रखना। यह तुझे बचाएगी।'"
आरोही ने चौंककर पूछा, "अंगूठी?"
"हाँ बेटी। लेकिन देवीदास वाली नहीं। यह एक और अंगूठी थी। पर मैंने कभी नहीं पहनी। मैंने अपनी सास से पूछा — 'क्यों?' उन्होंने कहा — 'बेटी, यह मत पूछ। बस पहन ले।' मुझे उनकी बात अजीब लगी। मैंने अंगूठी अलमारी में रख दी। कभी नहीं पहनी।"
आरोही ने पूछा, "वह अंगूठी अभी भी अलमारी में है?"
"हाँ बेटी। शायद। पंद्रह साल से मैंने नहीं देखा।"
आरोही ने माँ की तरफ़ देखा। एक विचार आया।
पर पहले कुसुम को बात पूरी करने दी।
कुसुम ने आगे कहा, "मेरे पति — राधेश्याम — शुरू में अच्छे थे। पर उनके पिताजी की मृत्यु के बाद वे बदल गए। एक रात मैंने देखा कि वे तांत्रिक साधना कर रहे हैं। मैंने पूछा। उन्होंने कहा — 'यह पुश्तैनी है। मुझे करना पड़ेगा।'"
"तो आपको सब पता था?"
"हाँ बेटी। पर मैंने कभी नहीं बताया। मैं डरती थी। और फिर आर्यन हुआ। मैंने सोचा — अब मैं अपने बेटे के लिए ज़िंदा रहूँगी। पर आर्यन बचपन से बीमार था। सब बीमारियाँ। मैंने राधेश्याम से कई बार पूछा। उन्होंने कहा — 'यह श्राप है। कुछ नहीं होगा।' मैं समझी नहीं। पर एक दिन मैंने अपनी सास की डायरी पढ़ी। जो अलमारी में थी। और तब मुझे सच पता चला।"
आरोही ने पूछा, "क्या सच?"
कुसुम ने आँखें बंद कीं।
"पंडित परिवार की हर पीढ़ी में एक बेटा देवीदास को बलि के रूप में देना होता है। सिर्फ़ पंडित पिता की मौत नहीं होती जवानी में। पंडित बेटा भी बचपन से बीमार रहता है। ताकि बाद में उसे बलि देना आसान हो।"
आरोही की आँखें फैलीं।
"तो आर्यन..."
"आर्यन एक बलि थी। मेरे पति ने उसे तेरह साल पहले देवीदास को दे दिया था। जब मीरा को उठाया गया, तब आर्यन को भी दिया गया। पर आर्यन बच्चा था। सिर्फ़ पंद्रह साल का। देवीदास ने उसे तब नहीं मारा। पर एक बीज बो दिया। जो धीरे-धीरे उगता गया। और दो साल पहले आर्यन के अंदर से देवीदास बाहर आ गया। असली आर्यन मर गया।"
आरोही रोने लगी।
"चाची, आपने यह पहले क्यों नहीं बताया?"
कुसुम ने कहा, "बेटी, क्योंकि मैं ख़ुद भी डर के मारे चुप थी। पर आज पंडित समाधि पर जा रहे हैं। वे अपना बंधन तोड़ने वाले हैं। और मुझे लगा कि तुझे भी सच पता होना चाहिए।"
आरोही ने कहा, "चाची, हम पंडित के साथ जा रहे हैं।"
कुसुम ने कहा, "बेटी, मुझे भी ले चलो।"
"चाची, आप कैसे?"
"बेटी, अगर मेरा पति मर रहा है, तो मैं उसे अकेला नहीं मरने दूँगी। पिछले पंद्रह साल हमारे बीच बहुत ग़लत हुआ है। पर वह मेरा पति है। मैं अंत में उसके साथ हूँगी।"
आरोही ने माँ की तरफ़ देखा।
माँ ने सिर हिलाया।
"चलो।"
पंडित के पिता की समाधि गाँव के बाहर थी। एक पहाड़ी पर। जहाँ पंडित परिवार के सारे पूर्वज दफ़्न थे। एक छोटा सा श्मशान। पर पुराने पत्थर की समाधियाँ थीं। हर समाधि पर एक ही तरह का त्रिशूल। और नीचे एक ही तरह की तारीख़ — मृत्यु की। लेकिन आरोही ने ग़ौर से देखा। हर समाधि पर मरने वाले की उम्र 32 से कम थी। किसी की 30। किसी की 28। किसी की 32।
पंडित परिवार में कोई भी बुज़ुर्ग नहीं मरा था। सब जवानी में गए। श्राप के हाथों।
पंडित की पिताजी की समाधि सबसे बीच में थी। बड़ी। ऊँची। ऊपर एक पत्थर का त्रिशूल।
पर उस त्रिशूल के आस-पास एक अजीब सी हवा थी। जैसे कोई अदृश्य ऊर्जा उसकी रक्षा कर रही हो।
चारों जब पहाड़ी पर पहुँची, तो पंडित पहले से वहाँ थे। समाधि के सामने बैठे। हाथ में बाबा का दिया हुआ कागज़। मंत्र पढ़ रहे थे।
पर आकाश में बादल घने हो रहे थे। हवा तेज़ हो रही थी। जैसे कोई तूफ़ान आ रहा हो। जबकि पूरा दिन साफ़ था।
आरोही ने कहा, "यहाँ रुक जाएँ। दूर से देखते हैं।"
तीनों एक चट्टान के पीछे छिप गईं। कुसुम भी।
पंडित का मंत्र चलता रहा। धीरे-धीरे। संस्कृत में। पर कुछ शब्द ऐसे थे जो आरोही ने पहले कभी नहीं सुने थे। बहुत पुरानी लिपि। शायद तांत्रिक शब्दावली।
तभी हवा में एक आकृति उभरी।
देवीदास। विक्रम के रूप में। पर इस बार बहुत बड़ा। शायद दस फुट लंबा। आँखें लाल। पूरा चेहरा जलती हुई राख जैसा।
देवीदास ने पंडित की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
"राधेश्याम! रुक जा! अगर तूने यह मंत्र पूरा किया, तो तू मर जाएगा।"
पंडित ने पलटकर नहीं देखा। बस मंत्र पढ़ता रहा।
देवीदास चिल्लाया, "राधेश्याम! तेरा बेटा मेरे पास है! अगर तू यह मंत्र पूरा किया, तो मैं आर्यन को हमेशा के लिए मार दूँगा! उसकी आत्मा नरक में डाल दूँगा!"
पंडित का हाथ काँपा। एक पल के लिए। पर फिर वे मंत्र पढ़ते रहे।
आरोही ने कुसुम की तरफ़ देखा।
कुसुम रो रही थीं। पर उन्होंने चट्टान के पीछे से पंडित को देखा। और बहुत धीरे से बोलीं —
"हिम्मत रख, राधेश्याम। पहली बार सही काम कर रहा है।"
पंडित का मंत्र आधा पूरा हुआ। तेज़ हवा ने अब पूरे पहाड़ी को घेर लिया था। पेड़ झुक रहे थे। धूल उड़ रही थी। धूल में आरोही को अजीब चीज़ें दिखीं — हज़ारों साये। जो देवीदास के साथ आए थे। शायद वे बारह बहनें थीं। शायद कोई और।
एक साया चट्टान के पीछे आया। जहाँ आरोही छिपी थी। बहुत क़रीब। आरोही ने ताबीज़ को उठाया। साये ने उसे देखा। और पीछे हट गया।
पर एक और साया आया। और दूसरा। और तीसरा। धीरे-धीरे चट्टान के आस-पास साये जमा हो रहे थे। जैसे वे भी लड़ाई में हिस्सा लेने आए थे।
आरोही ने माँ की तरफ़ देखा। माँ ने भी देखा। पर माँ ने कहा —
"बेटी, ये साये देवीदास के नहीं हैं। ये हमारे साथ हैं।"
"आपको कैसे पता?"
"नानी बता रही हैं मुझे।"
आरोही ने आँखें बंद कीं। सचमुच। हवा में एक कोमल आवाज़ थी। जो सिर्फ़ माँ सुन सकती थीं। नानी की आवाज़।
देवीदास ने एक और चाल चली। उसने अपना रूप बदला। आर्यन का रूप ले लिया।
"पिताजी! रुक जाइए! अगर आप यह मंत्र पूरा करेंगे, तो मैं मर जाऊँगा! मैं ज़िंदा हूँ! सच में!"
पंडित का हाथ फिर काँपा।
लेकिन कुसुम चट्टान के पीछे से चीख़ी —
"राधेश्याम! वह आर्यन नहीं है! आर्यन दो साल पहले मर गया! यह देवीदास है! रुकना मत!"
पंडित ने सुना। और अपने आपको सँभाला।
मंत्र पूरा किया।
पंडित के हाथ से बाबा का कागज़ जल उठा। लेकिन आग नीली थी। एक अजीब सी रोशनी। आग हवा में उड़ी। और देवीदास के चेहरे पर लगी।
देवीदास चीख़ा। एक बहुत ज़ोरदार चीख़। जैसे उसका पूरा शरीर जल रहा हो।
आर्यन का रूप ग़ायब हुआ। विक्रम का रूप वापस आया। पर वह भी जल रहा था।
"राधेश्याम! तूने मुझे धोखा दिया!"
पंडित ने अपने पिता की समाधि पर हाथ रखा।
"पिताजी, मेरे परिवार को माफ़ करना। मैंने आपकी ग़लती सुधारने की कोशिश की। अब मैं आपके पास आ रहा हूँ।"
पंडित ज़मीन पर गिरे।
देवीदास हवा में घुल गया। लेकिन जाते-जाते चिल्लाया —
"आरोही! तूने पंडित को मार डाला! तेरहवीं की रात मैं इसका बदला लूँगा!"
देवीदास ग़ायब हुआ। लेकिन उसकी चीख़ पहाड़ी में गूँजती रही। बहुत देर तक। जैसे पहाड़ ख़ुद उस चीख़ को दोहरा रहे हों।
तूफ़ान अचानक रुक गया। बादल छट गए। हवा शांत।
समाधि के आस-पास के साये भी ग़ायब हो गए।
कुसुम चट्टान से बाहर निकलीं। लाठी टेकते हुए। धीरे-धीरे समाधि की तरफ़ चलीं। पहली बार पंद्रह साल में उनके क़दम स्थिर थे। जैसे उन्हें अपने पैर पर विश्वास लौट आया हो।
आरोही, माँ, और भगवती देवी उनके पीछे।
पंडित ज़मीन पर पड़े थे। साँसें धीमी। पर आँखें खुली। समाधि के ठीक सामने। जैसे वे अपने पिता के गले लग रहे हों।
कुसुम उनके पास बैठीं। पंडित का सिर अपनी गोद में रखा।
पंडित की आँखों में आँसू आए।
"कुसुम... माफ़ कर..."
कुसुम ने कहा, "राधेश्याम, तूने सही काम किया। अंत में। मैं तुझे माफ़ करती हूँ।"
पंडित ने अपनी काँपती उँगली से कुसुम के चेहरे को छुआ।
"कुसुम, तेरा पैर... मैंने... मैं शर्मिंदा हूँ।"
कुसुम ने कहा, "अब मत सोच। बस अब आराम कर।"
पंडित ने आरोही की तरफ़ देखा।
"बेटी, मेरे बेटे आर्यन की आत्मा... उसे मुक्त करना। मेरे लिए। मैं यह वादा पूरा नहीं कर सका।"
आरोही ने सिर हिलाया।
"पंडित जी, वादा।"
पंडित ने आँखें बंद कीं।
एक साँस।
फिर कुछ नहीं।
पंडित मर गए।
कुसुम रोने लगीं। बहुत ज़ोर से। पंद्रह साल की चुप्पी टूटी। उनकी आवाज़ पहाड़ी में गूँज रही थी। जैसे सारा दुख एक साथ बाहर आ रहा हो।
आरोही ने अपनी माँ को देखा। माँ भी रो रही थीं। अपने चाचा के लिए। जिन्हें वे कभी जान नहीं पाईं। जिनसे उन्हें बस एक बार मिलने का मौक़ा मिला — और वह भी अंत में।
भगवती देवी ने कुसुम का हाथ पकड़ा।
"सहेली, अब तू अकेली नहीं है।"
पर उनके आँसुओं के बीच एक अजीब सी शांति थी।
पंडित परिवार का बंधन टूट गया था। 168 साल बाद। पहली बार।
आरोही ने पंडित के शरीर की तरफ़ देखा। एक अजीब सी बात हुई थी। पंडित का चेहरा — जो जीवन भर तनाव में रहा था — अब बहुत शांत था। जैसे कोई भारी बोझ उतर गया हो। पहली बार वे अपने पिता के पास आराम से थे।
आरोही ने बाबा की दी हुई चीज़ें अपने बैग से निकालीं। मंत्र-बद्ध ताबीज़। सिंदूर की शीशी। दोनों को पंडित के शरीर पर छिड़का।
तांबे का ताबीज़ पंडित के शरीर के पास आते ही चमका। जैसे उसने पंडित की आत्मा को आशीर्वाद दिया हो।
चारों समाधि पर पंडित का अंतिम संस्कार किया। बहुत साधारण। कुसुम ने मुखाग्नि दी। बहुत लंबे समय के बाद पंडित ने कुछ सम्मान से जाना।
आग जल रही थी। हवा में लकड़ी की गंध थी। कुसुम पंडित के पास बैठी थीं। रो रही थीं। पर उनके आँसुओं में एक अजीब सी शांति थी।
आरोही ने माँ के कान में कहा, "माँ, पंडित जी ने आर्यन के लिए वादा माँगा था। कि हम उसकी आत्मा को मुक्त करेंगे।"
माँ ने कहा, "बेटी, वादा पूरा करेंगे। तेरहवीं की रात।"
आरोही ने कहा, "अगर मैं ज़िंदा बची तो।"
माँ ने आरोही के हाथ पकड़े।
"बेटी, तू ज़िंदा बचेगी। नानी हैं तेरे साथ।"
आरोही ने आग की तरफ़ देखा। धुआँ आकाश की तरफ़ जा रहा था। सीधा। जैसे कोई रास्ता बन रहा हो।
एक क्षण के लिए आरोही को लगा कि उस धुएँ में कुछ है। कोई परछाईं। शायद पंडित की आत्मा। जो अब मुक्त थी।
फिर धुआँ बादलों में मिल गया।
शाम हो गई।
चारों गाँव लौटीं।
कुसुम ने कहा, "बेटी, अब मैं तेरे साथ हूँ। अपने घर नहीं लौटूँगी। वहाँ बहुत सारी बुरी यादें हैं। मैं भगवती दादी के घर रहूँगी। तेरहवीं तक।"
पर एक बात कुसुम ने कही जो सबको चौंका गई।
"बेटी, मेरे पैर में एक बात हुई है।"
"क्या चाची?"
कुसुम ने अपना पैर उठाया। पैर तो नहीं था। पर उन्होंने अपने घुटने से नीचे देखा। और वहाँ धीरे-धीरे एक चीज़ बन रही थी। धुँधली। जैसे किसी ने आत्मा से पैर बुन दिया हो।
"बेटी, पंडित की मौत के बाद से मेरा पैर धीरे-धीरे बन रहा है। शायद उसका बंधन टूटा है। शायद मैं फिर से चल सकूँगी।"
आरोही की आँखों में आँसू आए। नानी ने रात को कहा था — कुसुम को उसके पैर का नक़ली बनाना। अब वह अपने आप हो रहा था।
भगवती देवी ने कहा, "कुसुम, तू मेरी सहेली है। हमेशा से। अब हम एक साथ हैं। मीरा भी अब हमारे साथ है — कहीं न कहीं। और तेरा पंडित भी। हम अकेली नहीं हैं।"
कुसुम ने भगवती देवी के हाथ पकड़े।
"भगवती, मुझे बरसों बाद आज एक बात याद आई। जब हम बचपन में साथ खेलते थे। तूने एक बार मुझसे कहा था — 'कुसुम, कभी अगर हम बूढ़ी हुईं तो अपनी बहूओं के साथ मिलकर बैठेंगे। पान खाएँगे। कहानियाँ सुनाएँगे।' मुझे यह याद है।"
भगवती देवी की आँखों में आँसू आए। "हाँ। मुझे भी याद है।"
"हमारी बहूएँ नहीं हैं। पर आज मैं और तू बूढ़ी हो चुकी हैं। और शायद आरोही हमारी बहू जैसी है।"
आरोही मुस्कुराई। पहली बार पाँच दिनों में।
आरोही ने माँ की तरफ़ देखा।
माँ की आँखों में उदासी थी।
आरोही ने पूछा, "माँ, क्या हुआ?"
माँ ने कहा, "बेटी, आज मेरे चाचा गुज़र गए। मेरे पिताजी के भाई। जिनसे मैं कभी नहीं मिली। पर आज एक क्षण के लिए मिली।"
आरोही ने माँ को गले लगाया।
माँ ने आगे कहा, "बेटी, मेरे पिताजी ने कभी अपने भाई के बारे में बात नहीं की। पर मरने से पहले उन्होंने कहा था — 'सुधा, अगर कभी मेरा भाई मिले, तो उसे बताना — मैंने उसे माफ़ किया।' मैं तब नहीं समझी। पर आज मैंने पंडित के कान में यह बात कही थी। मरने से पहले। शायद उन्होंने सुना।"
आरोही ने कहा, "माँ, आपने सही किया।"
रात हो गई। चारों घर पहुँचीं।
रास्ते में गाँव की गलियों में एक अजीब सी शांति थी। जैसे पंडित की मौत के बाद पूरे गाँव को साँस मिली हो। कहीं-कहीं दरवाज़ों पर बने त्रिकोण-आँख के निशान धुँधले पड़ रहे थे। जैसे उनकी शक्ति कम हो रही थी।
आरोही ने ग़ौर से देखा। हाँ। सचमुच। निशान मिट रहे थे।
पंडित की मृत्यु ने देवीदास के बंधन को सचमुच कमज़ोर किया था।
रात के दस बजे। आरोही अपने कमरे में थी।
पर आज पहली बार उसने खुद को अकेला नहीं महसूस किया।
नीचे माँ थीं। भगवती दादी। कुसुम। और शायद नानी की आत्मा भी वहीं थी, अदृश्य।
पंडित की मौत ने कहानी को बदला था। लेकिन कुछ और भी हुआ था। जिसे आरोही धीरे-धीरे समझ रही थी।
देवीदास अब उस भाग की तरफ़ जा रहा था जहाँ वह ज़्यादा हिंसक होगा। ज़्यादा नीच। ज़्यादा ख़तरनाक।
आरोही ने खिड़की खोली। बाहर देखा। रात साफ़ थी। पहली बार पाँच दिनों में आसमान में तारे दिख रहे थे।
पर एक सितारा नहीं था।
चाँद। कार्तिक की अमावस पास आ रही थी। पाँच दिन बाद वह पूरी तरह से ग़ायब होगा।
तेरहवीं की रात।
आरोही ने खिड़की बंद की। नोटबुक खोली। पन्ना पलटा।
एक नई पंक्ति उभरी।
"बेटी, पंडित की मृत्यु से देवीदास कमज़ोर हुआ है। पर वह अब ज़्यादा ख़तरनाक भी हुआ है। घायल जानवर सबसे ख़तरनाक होता है। सावधान रह। और अगले पाँच दिनों में उसे और कमज़ोर करने के तीन तरीक़े हैं।"
आरोही ने पूछा, "नानी, कौन से तीन तरीक़े?"
पन्ने पर तीन पंक्तियाँ उभरीं।
"1. बारह लड़कियों की आत्माओं को कुछ शक्ति देना। ताकि वे देवीदास से लड़ सकें।
2. कुसुम को उसके पैर का नक़ली बनाना। ताकि वह लड़ाई में मदद कर सके।
3. देवराज बाबा को अपनी शक्ति का पूरा उपयोग कराना। बिना उन्हें मारे।"
आरोही ने कहा, "नानी, यह तीनों कैसे होंगे?"
"बेटी, कल सुबह देखेगी। एक-एक करके सब खुलेगा। पर एक चेतावनी। देवीदास कल एक हमला करेगा। शायद तुझ पर नहीं। किसी और पर। तेरे क़रीबी पर। तैयार रहना।"
आरोही ने पूछा, "किस पर हमला होगा?"
पर पन्ना अब कोरा था।
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
रात गहरी होती जा रही थी।
आरोही ने अपने बैग से कमला देवी की डायरी निकाली। कुछ पल तक उसे देखती रही। यह डायरी उसके पास कितनी पुरानी चीज़ों की चाबी थी।
उसने पन्ने पलटे।
एक पन्ने पर एक नई पंक्ति उभर रही थी। रुक्मिणी की हस्तलिपि।
"दीदी, मैंने आज देखा। पंडित के मरने से मेरा एक बंधन थोड़ा ढीला हुआ है। पहली बार 156 साल में मुझे थोड़ी सी हवा मिली है। धन्यवाद।"
आरोही ने कहा, "रुक्मिणी, अगर तुम सचमुच शिकार हो, तो मुझे बताओ। तुम्हारी असली चूड़ी कहाँ है?"
पन्ने पर एक और पंक्ति उभरी।
"दीदी, असली चूड़ी देवीदास की मूर्ति के हाथ में है। जो मूर्ति सुरंग में है। पर उस मूर्ति को तेरहवीं अमावस की रात ही छू सकते हैं। किसी और दिन नहीं। क्योंकि उसी रात देवीदास का शरीर सबसे कमज़ोर होता है।"
आरोही ने कहा, "और नानी की डिबिया में क्या है?"
"दीदी, मुझे नहीं पता। पर मुझे एक ही उम्मीद है — कि उसमें कुछ ऐसा है जो तेरहवीं अमावस को असली चूड़ी तक पहुँचने में मदद करे।"
आरोही ने डायरी बंद कर दी।
पाँच दिन बचे।
और पंडित की मौत ने कहानी को एक नई दिशा दी थी।
पर देवीदास कल किस पर हमला करेगा?
क्या माँ पर? क्या भगवती दादी पर? क्या कुसुम पर?
क्या बाबा पर?
आरोही की छाती में एक अजीब सा डर उठा।
क्या वह किसी अपने को खो देगी?
क्या माँ को? माँ अभी-अभी पहुँची थीं।
क्या भगवती दादी को? जिन्होंने अपनी बेटी मीरा को खो दिया था।
क्या कुसुम को? जो पंद्रह साल की चुप्पी के बाद ज़िंदा हुई थीं।
क्या बाबा को? जो 133 साल से इस दिन का इंतज़ार कर रहे थे।
आरोही ने माला जपी। हनुमान चालीसा। एक बार। दो बार। तीन बार।
खिड़की के बाहर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी।
पर आरोही जानती थी — शांति का यह अर्थ नहीं कि ख़तरा नहीं है। शायद देवीदास तैयारी कर रहा था। कल के लिए।
रात लंबी थी।
बहुत लंबी।
आरोही सोने की कोशिश करती रही। पर आँखें बंद करते ही उसे पंडित का चेहरा दिखता। उनकी अंतिम मुस्कान। और उनकी अंतिम बात — "बेटी, आर्यन को मुक्त करना।"
आरोही ने वादा किया था।
अब उस वादे को पूरा करना था।
आगे पाँच दिन थे। और हर दिन में शायद एक नई मौत होगी।
पर आरोही अब डरी नहीं थी।
क्योंकि उसके पास अब एक परिवार था। जो पहले नहीं था।
नानी। माँ। दादी। कुसुम चाची। बाबा।
और शायद रुक्मिणी भी। किसी न किसी तरह से।
आरोही ने अपनी आँखें बंद कीं।
और सो गई।
पर सोते-सोते एक अंतिम सोच आई। तेरहवीं अमावस को अगर वह ज़िंदा बच गई, तो क्या करेगी? यह गाँव छोड़ देगी? दिल्ली लौट जाएगी? पीएचडी पूरी करेगी? शादी करेगी?
या फिर वह यहीं रहेगी? भगवती दादी के साथ। कुसुम चाची के साथ। इस गाँव की रक्षक बनकर।
पता नहीं।
पर एक बात पक्की थी।
पहले तेरहवीं अमावस से गुज़रना था।
और उससे पहले अगले पाँच दिनों में देवीदास के हमलों को झेलना था।
बाहर हवा फिर से बहने लगी थी। धीरे-धीरे। दूर कहीं कोई कुत्ता भौंका। पर अकेला। पहली बार पूरा गाँव सुर में नहीं था।
पंडित की मौत ने कुछ ज़रूर तोड़ा था।
आरोही ने आख़िरी बार खिड़की की तरफ़ देखा।
बादलों के बीच से चंद्रमा का एक छोटा सा टुकड़ा दिखा। बहुत पतला। बस एक रेखा। जैसे किसी ने आसमान में उँगली से एक हल्की धार खींची हो।
पाँच दिन बाद वह पूरी तरह ग़ायब हो जाएगा।
तेरहवीं अमावस।

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