Pretika › Psychological Horror › तेरहवीं अमावस
भाग 9 : माँ का आगमन और नानी का सच
Piyashi Atma · Psychological Horror · 17 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- तेरहवीं अमावस
- Chapter
- 9 of 23
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3342
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
तेरहवीं अमावस
भाग 9 : माँ का आगमन और नानी का सच
आरोही अपने कमरे में लौटी। रात के दो बज चुके थे। बाहर कुत्ते अब भी भौंक रहे थे। एक साथ। सुर में। आवाज़ कभी ऊँची, कभी नीची। जैसे कोई मंत्र गा रहा हो।
आरोही ने खिड़की खोली। बाहर देखा।
गाँव की गलियों में कुत्ते नहीं थे। एक भी नहीं। पर आवाज़ आ रही थी। हर तरफ़ से। दीवारों के अंदर से। छत के ऊपर से। ज़मीन के नीचे से।
आरोही ने खिड़की बंद कर दी। पर उसका मन शांत नहीं था।
पिछली रात तहख़ाने में जो हुआ था — देवीदास से मुलाक़ात, आर्यन की मौत का सच, नक़ली चूड़ी — सब कुछ उसकी आँखों के सामने घूम रहा था।
और सबसे बुरी बात — मीरा की माला अब नहीं थी। जो उसे बचाने वाली सबसे बड़ी शक्ति थी। जिसमें एक क़ैद आत्मा थी। जो देवीदास को कमज़ोर कर सकती थी। वह अब देवीदास के तहख़ाने में थी। टूटी हुई।
आरोही ने ताबीज़ को छाती पर रखा। भगवती देवी की छुरी बगल में। नोटबुक खोली। पन्ना पलटा।
पन्ने पर एक नई पंक्ति उभर रही थी। स्याही अपने आप बन रही थी। जैसे किसी अदृश्य हाथ की उँगली लिख रही हो।
"बेटी, मैं तेरे पास आ रही हूँ। मैं जानकी।"
आरोही की छाती में एक हलचल हुई।
"नानी?"
फिर एक और पंक्ति उभरी।
"हाँ बेटी। तेरहवीं की रात मैं तेरे साथ रहूँगी। पर उससे पहले तुझे कुछ जानना है।"
आरोही ने पूछा, "क्या नानी?"
पन्ने पर धीरे-धीरे शब्द बनते गए।
"मेरे पति — तेरे नाना — का असली नाम रामजी शर्मा नहीं था। मेरे शादी से पहले उनका नाम कुछ और था। और वे रत्नपुर के थे। उन्होंने मुझसे झूठ बोला। पर मरने से पहले उन्होंने सच बताया।"
आरोही ने काँपते हाथों से पूछा, "क्या सच?"
"तेरे नाना का असली नाम कमलेश शर्मा था। और वे पंडित परिवार से थे। रत्नपुर के पंडित राधेश्याम के बड़े भाई।"
आरोही की आँखें फैलीं। उसे लगा कि उसकी सारी दुनिया घूम गई।
"कमलेश ने अपनी शादी से पहले रत्नपुर छोड़ दिया था। अपने परिवार के श्राप से बचने के लिए। उन्होंने अपना नाम बदला। पहचान बदली। दिल्ली में मुझसे शादी की। पर उन्होंने कभी नहीं बताया कि वे रत्नपुर के पंडित परिवार से थे।"
आरोही ने सोचा। यानी उसकी नानी एक तरफ़ से पंडित परिवार से जुड़ी थीं। और दूसरी तरफ़ से रुक्मिणी के परिवार से।
"बेटी, तेरे ख़ून में दो श्राप हैं। एक — रुक्मिणी का। दूसरा — पंडित का। और इसीलिए तू विशेष है। तू ही दोनों को तोड़ सकती है।"
"पर बेटी, एक और बात। तेरा नाना कमलेश — यानी तेरे नाना और पंडित राधेश्याम भाई थे। मतलब आर्यन तेरा दूर का चचेरा भाई था।"
आरोही की आँखों में आँसू आए।
आर्यन। उसका अपना रिश्तेदार। जिसे देवीदास ने दो साल पहले मार डाला था। जिसका शरीर देवीदास इस्तेमाल कर रहा था।
"बेटी, अब सो जा। सुबह तेरी माँ आएगी।"
आरोही ने पूछा, "नानी, माँ कैसे पहुँचेंगी?"
पन्ने पर आख़िरी पंक्ति उभरी।
"मैं उन्हें ले आऊँगी।"
फिर पन्ना कोरा हो गया।
आरोही ने कुछ पल तक पन्ने को देखा। शायद और कुछ लिखा जाए। पर कुछ नहीं आया।
उसने नानी को मन ही मन धन्यवाद कहा।
आरोही ने नोटबुक बंद कर दी।
रात भर वह जागती रही। बाहर कुत्तों का सुर बदलता रहा। कभी लगता कोई मंदिर की तरफ़ जुलूस निकल रहा है। कभी लगता कि गाँव के बीच कोई नाच रहा है। पर जब भी वह खिड़की से देखती, कोई नहीं दिखता।
चार बजे उसे नींद आ गई।
एक सपने में उसने देखा — नानी उसकी माँ को गाड़ी में बिठाकर पहाड़ी सड़क पर जा रही थीं। सफ़ेद साड़ी में। हाथ में एक चांदी की डिबिया।
रास्ते में एक जगह एक साया आया। नानी ने उसे रोक दिया। हाथ उठाकर।
"मुझसे नहीं गुज़र सकता तू। मैं जानकी हूँ। मेरी पोती मेरा इंतज़ार कर रही है।"
साया वापस हो गया।
गाड़ी आगे बढ़ी।
आरोही की आँख खुली।
सुबह हो चुकी थी।
आरोही नीचे उतरी। भगवती देवी बरामदे में बैठी थीं। बाहर देख रही थीं।
"बेटी, वहाँ देख।"
आरोही ने देखा।
गाँव के छोर पर एक गाड़ी आ रही थी। सफ़ेद रंग की। धीरे-धीरे।
गाड़ी उस पगडंडी पर आ रही थी जहाँ आरोही पहले दिन आई थी। जो गाँव के अंदर तक नहीं आ सकती थी। पर आज गाड़ी अंदर आ रही थी।
आरोही दौड़ी।
गाड़ी घर के सामने रुकी।
दरवाज़ा खुला।
माँ उतरीं। सुधा शर्मा। पचास साल की। एक सूती साड़ी में। हाथ में एक छोटा सा बैग। आँखें थकी हुई, पर उनमें एक अजीब सी शांति थी। जैसे किसी बड़ी ताक़त ने उन्हें बचाकर यहाँ पहुँचाया हो।
आरोही ने माँ को गले लगाया। दोनों रो रहे थे। बहुत देर तक। कुछ कहा नहीं।
ड्राइवर उतरा। एक बूढ़ा आदमी। साठ साल का। उसने गाँव को देखा। फिर माँ से बोला —
"बहन जी, मैं यहाँ नहीं रुक सकता। मुझे लौटना होगा। बहुत ठंडक है यहाँ।"
माँ ने कहा, "ठीक है भैया।"
ड्राइवर वापस गाड़ी में बैठा। पीछे पलटा नहीं। गाड़ी तेज़ी से गाँव के बाहर चली गई। जैसे कोई अदृश्य ताक़त उसे धकेल रही हो।
आरोही ने कहा, "माँ, अंदर आइए।"
तीनों अंदर गईं। भगवती देवी ने चाय बनाई।
फिर माँ ने अपने बैग से एक चांदी की डिबिया निकाली।
"बेटी, यह नानी की है।"
आरोही ने डिबिया हाथ में ली।
बहुत भारी। पुरानी। ऊपर कुछ खुदा था। संस्कृत में।
"जो प्रेम से खोले, उसी के लिए यह खुले।"
आरोही ने डिबिया खोलने की कोशिश की।
नहीं खुली।
माँ ने कहा, "बेटी, नानी ने कहा था — तेरहवीं की रात खोलना। उससे पहले नहीं।"
आरोही ने पूछा, "माँ, आप कैसे पहुँचीं?"
माँ ने कहा, "बेटी, कल रात मुझे एक सपना आया। तेरी नानी आईं। बोलीं — 'सुधा, चल। मेरी पोती को बचाना है।' मैं उठी। गाड़ी में बैठी। नानी मेरे साथ थीं। सारा रास्ता। जहाँ भी कोई साया आया, नानी ने रोका। मुझे कुछ करना नहीं पड़ा। ड्राइवर तो सो गया था। गाड़ी अपने आप चलती रही।"
आरोही की आँखों में आँसू आए।
"नानी अब कहाँ हैं?"
माँ ने कहा, "बेटी, वह तेरहवीं की रात आएँगी। तेरे साथ।"
भगवती देवी ने माँ को गले लगाया।
"बेटी, तू आ गई। अब आरोही अकेली नहीं है।"
तीनों बैठकर बहुत देर तक बातें करती रहीं।
आरोही ने माँ को सब बताया। रुक्मिणी। देवीदास। पंडित। आर्यन। बाबा। तहख़ाना। नानी का सच — कि नाना पंडित परिवार से थे।
माँ ने सुना। बहुत देर तक चुप रहीं।
फिर बोलीं, "बेटी, मेरे पिता ने मरने से पहले एक बात कही थी। मुझसे। उन्होंने कहा था — 'सुधा, अगर तेरी बेटी ने कभी रत्नपुर जाने का सोचा, तो उसे रोकना। मेरी वजह से हमारा परिवार दो श्राप में बँधा है।'"
"तो नाना जानते थे?"
"हाँ। पर उन्होंने मुझे पूरा नहीं बताया। बस चेतावनी दी।"
आरोही ने कहा, "माँ, हमें पंडित के पास जाना होगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि पंडित नाना के भाई हैं। शायद वे भी इस लड़ाई में हमारी मदद कर सकते हैं।"
भगवती देवी ने कहा, "बेटी, पंडित पर विश्वास नहीं करना चाहिए। वह देवीदास की सेवा में है।"
आरोही ने कहा, "दादी, पंडित की पत्नी कुसुम — वह हमारी मदद कर सकती हैं। वे पंडित के जुल्म से बचना चाहती हैं।"
माँ ने कहा, "बेटी, अगर पंडित सचमुच तेरे नाना का भाई है, तो शायद बहुत साल पहले जब नाना ने घर छोड़ा, तब पंडित भी अलग हुआ था। पर पंडित ने ग़लत रास्ता चुना।"
आरोही ने कहा, "शायद यही उनका बदला हो — जो वे नाना पर लेते हैं। नाना ने पंडित को अकेला छोड़ा। पंडित ने देवीदास का साथ दिया।"
दोपहर तीन बजे। आरोही, माँ, और भगवती देवी पंडित राधेश्याम के घर पहुँचीं।
बरामदे में पंडित बैठे थे। उनकी आँखों में डर था। शायद उन्हें पता चल गया था कि आरोही तहख़ाने से बचकर आई।
माँ ने कहा, "राधेश्याम।"
पंडित ने ऊपर देखा। माँ को देखा। और फिर चौंक गए।
"तू... तू कमलेश की बेटी?"
माँ ने कहा, "हाँ। सुधा। तेरी भतीजी।"
पंडित की आँखों में आँसू आए। उनका शरीर काँप रहा था। मानो किसी ने उन्हें बहुत ज़ोर से झकझोर दिया हो।
"मेरे भाई... कमलेश। कैसे हैं?"
"नहीं हैं। पंद्रह साल पहले चले गए।"
पंडित ने अपना सिर झुका लिया।
"मैंने कमलेश को कभी माफ़ नहीं किया। पर उसने सही किया। घर छोड़ने में। मैंने ग़लती की। यहीं रहा।"
आरोही ने कहा, "पंडित जी, अब हमें आपकी मदद चाहिए।"
पंडित ने कहा, "बेटी, मैं क्या मदद कर सकता हूँ? मैं तो देवीदास का दास हूँ।"
आरोही ने कहा, "पंडित जी, क्या आपकी पत्नी कुसुम से हम मिल सकते हैं?"
पंडित के चेहरे पर एक अजीब सी उदासी आई।
"बेटी, कुसुम अब बात नहीं करती। पंद्रह साल से चुप है।"
"फिर भी।"
पंडित उठे। तीनों को अंदर ले गए।
अंदर एक कमरे में कुसुम बैठी थीं। बहुत दुबली। सफ़ेद बाल। एक टाँग नहीं थी। सफ़ेद साड़ी में। खिड़की से बाहर देख रही थीं।
पंडित ने कहा, "कुसुम, यह देख। हमारी भतीजी सुधा। कमलेश की बेटी।"
कुसुम ने पलटकर देखा।
पहली बार पंद्रह साल में उनके होंठ हिले।
"सुधा?"
माँ ने कहा, "हाँ चाची। सुधा।"
कुसुम ने अपने हाथ बढ़ाए। माँ ने उनके हाथ पकड़े।
फिर कुसुम ने आरोही की तरफ़ देखा।
"तू तेरहवीं है?"
आरोही ने सिर हिलाया।
कुसुम की आँखों में एक चमक आई।
"बेटी, मेरे पास तेरे लिए एक चीज़ है।"
कुसुम ने अपने तकिये के नीचे से एक छोटा सा कपड़ा निकाला। खोला।
अंदर एक कुंजी थी। एक बहुत पुरानी। लोहे की।
"बेटी, यह मेरी सास की परदादी की अलमारी की कुंजी है। जिसे पंडित परिवार में कोई नहीं खोलता। पंडित के पिताजी ने कहा था कि इसे कोई खोलेगा तो पूरा परिवार नष्ट हो जाएगा। पर मुझे लगता है — यह झूठ है। और उस अलमारी में कुछ है जो देवीदास के ख़िलाफ़ काम आ सकता है।"
आरोही ने कुंजी ली।
पंडित ने कहा, "कुसुम, तू यह कुंजी कहाँ से लाई?"
कुसुम ने कहा, "पंद्रह साल से मेरे तकिये के नीचे है। जिस दिन तूने मेरा पैर काटा, उसी दिन मैंने चुरा ली थी। मैंने सोचा था — एक दिन कोई आएगा जो इसे इस्तेमाल करेगा।"
पंडित के चेहरे पर एक अजीब सा भाव आया। शर्म। पछतावा।
"कुसुम, मुझे माफ़ कर।"
कुसुम ने कहा, "पंडित, तू मेरा पति नहीं है अब। तू देवीदास का दास है। जब यह श्राप टूटेगा, तब हम बात करेंगे। तब तक तू मुझसे बात मत कर।"
पंडित का सिर झुक गया।
आरोही ने कहा, "चाची, वह अलमारी कहाँ है?"
कुसुम ने कहा, "पंडित की परदादी के कमरे में। ऊपर। तीसरे कमरे में। जो हमेशा बंद रहता है।"
आरोही ने कहा, "मैं जाऊँ?"
कुसुम ने कहा, "हाँ बेटी। जा। और जो मिले, वह लेकर आ जा।"
आरोही ऊपर गई।
तीसरा कमरा एक कोने में था। दरवाज़ा बहुत पुराना। लकड़ी सूख चुकी। ऊपर मकड़ी के जाले।
आरोही ने दरवाज़ा धकेला। खुल गया।
अंदर धूल। पुरानी चीज़ें। एक चारपाई। एक कोने में एक बड़ी अलमारी। लकड़ी की। ऊपर पीतल के फूल जड़े।
आरोही ने कुंजी ताला में डाली। घुमाई।
ताला खुला।
अलमारी के दरवाज़े खुले।
अंदर बहुत सी चीज़ें थीं। पुरानी किताबें। कपड़े। एक तांबे का कलश। और सबसे नीचे — एक छोटी सी लकड़ी की डिबिया।
आरोही ने डिबिया निकाली। खोली।
अंदर एक चूड़ी थी। लाल। पुरानी। लेकिन इस पर एक नाम-पत्र नहीं था।
क्या यह असली रुक्मिणी की चूड़ी थी?
तभी आरोही ने डिबिया के नीचे एक कागज़ देखा। पीला पड़ चुका। बहुत पुराना।
उसने कागज़ खोला।
लिखावट संस्कृत में थी। लेकिन एक जगह देवनागरी हिंदी में लिखा था।
"यह चूड़ी नक़ली है। असली चूड़ी 1870 में मेरे भाई ने अपनी भाभी रुक्मिणी के लिए बनवाई थी। पर देवीदास ने उसकी हत्या से पहले असली चूड़ी अपने पास रख ली। और मेरे भाई को नक़ली दी। पंडित परिवार ने बरसों तक इसकी रक्षा की — यह सोचकर कि यह असली है। पर यह झूठ है।
असली चूड़ी अभी भी देवीदास के पास है।
यह लिखता हूँ ताकि आने वाली पीढ़ियाँ धोखा न खाएँ। — शिवनाथ शर्मा, 1870।"
आरोही की आँखें फैलीं।
तो पंडित परिवार ने बरसों तक एक नक़ली चूड़ी की रक्षा की। और असली चूड़ी अभी भी देवीदास के पास थी।
पर अगर नानी की डिबिया में भी असली नहीं थी, तो...
आरोही की छाती में एक धड़कन तेज़ हुई।
क्या नानी की डिबिया भी एक और परीक्षा थी?
क्या तेरहवीं अमावस की रात, जब आरोही डिबिया खोलेगी, तो वह भी नक़ली निकलेगी?
नहीं। नानी झूठ नहीं बोलेंगी। नानी उसकी अपनी थीं।
आरोही ने चूड़ी को अपने बैग में डाला। कागज़ भी।
नीचे उतरी।
माँ और भगवती देवी उसका इंतज़ार कर रही थीं। कुसुम भी। पंडित एक कोने में बैठे थे।
आरोही ने कहा, "अब हमें बाबा के पास जाना होगा। जल्दी।"
पंडित ने कहा, "बेटी, एक बात कहना चाहूँगा।"
आरोही रुकी। "जी?"
"मैं तुम्हारे साथ आना चाहता हूँ। बाबा के पास। मैं जानता हूँ कि मैंने बहुत ग़लतियाँ की हैं। पर अगर मेरे भाई की पोती को बचाने में मैं कुछ कर सकूँ, तो मैं करना चाहूँगा।"
आरोही ने कुसुम की तरफ़ देखा।
कुसुम ने सिर हिलाया। "बेटी, इसे साथ ले जा। अगर यह पछता रहा है, तो शायद कुछ अच्छा कर पाएगा। पर एक बात याद रख — देवीदास को पता चलेगा कि पंडित अब हमारे साथ है। और वह पंडित को मारेगा। जल्दी।"
पंडित ने कहा, "कुसुम, मुझे मरने से डर नहीं। मैं तो बहुत साल पहले ही मर चुका था। बस इस बार सही मौत मरना चाहता हूँ।"
आरोही ने कहा, "पंडित जी, चलिए।"
रास्ते में आरोही ने पंडित से पूछा, "पंडित जी, आर्यन कब मरा था?"
पंडित का चेहरा पीला पड़ा।
"क्या?"
"आर्यन। दो साल पहले।"
पंडित रुक गए। रास्ते में। हाथ काँपने लगे।
"बेटी, तू क्या कह रही है? आर्यन तो कल भी मुझसे बात कर रहा था।"
आरोही ने कहा, "पंडित जी, आर्यन दो साल पहले मर गया था। जिस दिन उसे पहला जला हुआ निशान बना था। उसके बाद से देवीदास ही आर्यन के शरीर में रह रहा है। कल जो मुझे तहख़ाने में मिला, वह देवीदास था। असली आर्यन की आत्मा तहख़ाने के तीसरे कमरे में क़ैद है।"
पंडित के पैर लड़खड़ाए। भगवती देवी ने उन्हें सँभाला।
"बेटी... मेरा बेटा... मेरा एक ही बेटा..."
पंडित रोने लगे। रास्ते में ही। ज़मीन पर बैठ गए।
आरोही ने कहा, "पंडित जी, अगर हम श्राप तोड़ पाए, तो आर्यन की आत्मा भी मुक्त हो जाएगी। शायद हम उसे शांति दे सकें।"
पंडित ने अपनी आँखें पोंछीं।
"बेटी, चलो। अब मुझे और भी ज़्यादा हिम्मत है। मेरे बेटे के लिए।"
चारों देवराज बाबा की झोपड़ी की तरफ़ चले।
बाबा की झोपड़ी पहुँची। बाबा दरवाज़े पर खड़े थे। जैसे इंतज़ार कर रहे हों। सफ़ेद बाल हवा में उड़ रहे थे। सफ़ेद दाढ़ी छाती पर।
पर उनकी आँखें आज नई थीं। पहली बार आरोही ने बाबा की आँखों में उम्मीद देखी। बहुत साल से जो चीज़ नहीं थी, वह आज थी।
"आ जाओ। मुझे पता था तुम आओगे।"
चारों अंदर गए। बाबा ने आग जलाई। पर आज आग की लपटें अलग थीं। नीली नहीं। साफ़ पीली। जैसे किसी अच्छे तंत्र का संकेत।
बाबा ने पंडित को देखा। बहुत देर तक। फिर धीरे से बोले —
"राधेश्याम, तूने आख़िर सच का साथ चुना। अच्छा किया।"
पंडित ने बाबा के पैर छुए।
"बाबा, मुझे माफ़ कर दो।"
बाबा ने कहा, "बेटा, माफ़ी माँगने की उम्र चली गई। अब बस काम करने की उम्र है।"
बाबा ने आरोही की तरफ़ देखा।
"बेटी, तुझे कुछ मिला?"
आरोही ने पंडित की परदादी की डिबिया दिखाई। और वह कागज़ भी।
बाबा ने कागज़ पढ़ा।
"शिवनाथ शर्मा। मैं इनसे मिला हूँ। बहुत साल पहले। 1913 में। वे मरने से पहले। तब वे बहुत बूढ़े थे। उन्होंने मुझसे यही कहा था कि असली चूड़ी देवीदास के पास है। पर तब मैंने विश्वास नहीं किया। मैं समझा कि वे भ्रम में हैं। मैंने उनकी बात नहीं मानी। और उसी रात कौशल्या को नहीं बचा सका।"
आरोही ने पूछा, "बाबा, तो अब क्या करना है?"
बाबा ने कहा, "बेटी, अब तेरे पास एक चीज़ है जो पहले किसी के पास नहीं थी।"
"क्या?"
"तेरी नानी की डिबिया।"
"पर बाबा, अगर वह भी नक़ली है?"
बाबा ने कहा, "बेटी, तेरी नानी नक़ली नहीं थीं। और उन्होंने जो छिपाया है, वह ज़रूर सच होगा। मुझे तेरी नानी पर विश्वास है। मैंने उनसे बात की थी। बहुत साल पहले। जब वे यहाँ आई थीं।"
आरोही ने कहा, "बाबा, तो हम तेरहवीं की रात का इंतज़ार करेंगे?"
बाबा ने कहा, "हाँ। पर उससे पहले एक काम करना होगा।"
"क्या?"
"तेरे नाना के भाई को — पंडित को — अपनी बंधन तोड़ना होगा। पंडित परिवार का देवीदास से जो सौदा है, वह तेरे नाना ने बहुत साल पहले तोड़ा था। पर वह अधूरा रह गया। पंडित ने बीच में ही रोक दिया। अब पूरा करना होगा।"
पंडित ने कहा, "बाबा, मुझे बताइए क्या करना है।"
बाबा ने कहा, "बेटा, तुझे अपने पिता की समाधि पर जाना होगा। और वहाँ एक मंत्र पढ़ना होगा। जो मैं तुझे सिखाऊँगा। इससे पंडित परिवार का बंधन कमज़ोर होगा। और तेरहवीं अमावस को देवीदास के पास पंडित परिवार की शक्ति नहीं होगी।"
पंडित ने कहा, "मंज़ूर।"
बाबा ने कहा, "पर एक चेतावनी। जिस दिन तू यह मंत्र पढ़ेगा, उसी दिन देवीदास तुझे मार डालेगा। तुझे यह पता होना चाहिए।"
पंडित मुस्कुराए।
"बाबा, मैं तो पहले से ही मरा हुआ हूँ। बस अब अच्छी मौत मरूँगा।"
बाबा ने कहा, "अच्छा। कल शाम को समाधि पर जाना। अकेले। मैं तुझे मंत्र लिखकर दूँगा।"
पंडित ने सिर हिलाया।
रात हो गई। आरोही, माँ, और भगवती देवी घर लौटीं। पंडित अपने घर गए। कुसुम के पास।
घर पहुँचकर आरोही ने माँ के साथ खाना खाया। पहली बार तीन दिन में उसने ठीक से खाया।
माँ ने कहा, "बेटी, तू कमज़ोर हो गई है। आँखें अंदर धँस गई हैं। हाथ ठंडे हैं।"
आरोही ने कहा, "माँ, लड़ाई अभी बाक़ी है।"
माँ ने आरोही के हाथ पकड़े।
"बेटी, मुझे एक बात कहनी है। मैंने तुझसे नहीं कही आज तक। जब तू पैदा हुई थी, तेरी नानी ने एक अजीब बात कही थी।"
"क्या माँ?"
"उन्होंने कहा था — 'सुधा, यह बच्ची दो जीवन जियेगी।' मैंने पूछा — 'क्या मतलब?' नानी ने कहा — 'एक बार यह लगभग मरेगी। पर फिर लौटेगी। दूसरा जीवन उसे किसी और की मदद से मिलेगा।'"
आरोही चौंकी।
"नानी ने ऐसा कहा?"
"हाँ बेटी। तब मैं नहीं समझी। पर अब लगता है — शायद तेरहवीं अमावस को तू लगभग मरेगी। और नानी तुझे बचाएँगी। शायद वे तेरा दूसरा जीवन बन जाएँगी।"
आरोही की आँखों में आँसू आए।
"माँ, नानी अपनी मृत्यु से बचकर मेरी रक्षा के लिए रुकी थीं?"
"हाँ बेटी। शायद इसीलिए।"
तीनों बहुत देर तक चुप बैठी रहीं। एक अजीब सी शांति थी। जैसे कोई बड़ी लड़ाई से पहले की चुप्पी।
आरोही ने माँ से पूछा, "माँ, नानी की डिबिया आपको कब मिली थी?"
माँ ने कहा, "जिस दिन नानी गुज़र गईं। उन्होंने अपने हाथ से मुझे दी थी। कहा था — 'सुधा, इसे संभालकर रखना। जब आरोही की तेरहवीं आए, तब उसे दे देना।' मैं तब समझी नहीं। मैंने पूछा — 'तेरहवीं क्या माँ?' नानी ने कहा — 'तुम्हारी बेटी बड़ी होगी। समझ जाएगी।'"
आरोही ने कहा, "तो नानी जानती थीं कि मैं यहाँ आऊँगी।"
"हाँ बेटी। शायद तुझसे भी पहले वे जानती थीं।"
भगवती देवी ने कहा, "बेटी, यही तो शक्ति है। जो दादी-नानी में होती है। वे अपनी नज़र से आगे देख लेती हैं।"
तीनों फिर चुप हो गईं।
रात गहरी हो रही थी।
रात के दस बजे। बिजली चली गई। पूरे गाँव में। एक साथ। जैसे किसी ने एक बड़ा स्विच खींच दिया हो।
आरोही ने लालटेन जलाई। छाया दीवार पर काँप रही थी।
बाहर से एक आवाज़ आई।
आर्यन की।
"आरोही जी, दरवाज़ा खोलिए। मुझे बात करनी है।"
आरोही ने कहा, "जा, देवीदास। मैं तुझे पहचान गई हूँ।"
बाहर से हँसी।
"बेटी, तूने पंडित को अपने साथ ले लिया। अच्छा किया। पर एक बात याद रख — पंडित कल शाम तक ज़िंदा नहीं रहेगा। और उसकी मौत तेरी वजह से होगी।"
आरोही ने कहा, "पंडित की मौत तेरी वजह से होगी। मैं तो सिर्फ़ मदद कर रही हूँ।"
बाहर से एक क्षण की चुप्पी।
फिर आवाज़, "बेटी, छह दिन बचे हैं। हर दिन कोई मरेगा। कल पंडित। परसों कोई और।"
आरोही ने कहा, "जो होगा, देखा जाएगा। पर मैं झुकूँगी नहीं।"
बाहर से हवा की आवाज़ आई। बहुत तेज़। जैसे तूफ़ान।
फिर सब कुछ शांत।
आरोही ने माँ की तरफ़ देखा।
माँ की आँखों में डर था। पर हिम्मत भी।
आरोही ने कहा, "माँ, अब लंबी रात शुरू हुई है।"
और कहानियाँ · More stories
- देवभूमि का साया: गढ़वाल की शापित घाटी और डाक-बंगले का रहस्य · Piyashi Atma
- यक्षिणी: कदंब का श्राप · Piyashi Atma
- कोटला के साये: जिन्नात और भटकती रूहें · Piyashi Atma
- भूत, प्रेत और रहस्य, काले कुंए का श्राप · Yogesh Kumar Maurya