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भाग 8 : सुरंग का सच और आर्यन का असली चेहरा
Piyashi Atma · Psychological Horror · 17 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- तेरहवीं अमावस
- Chapter
- 8 of 23
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3234
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
तेरहवीं अमावस
भाग 8 : सुरंग का सच और आर्यन का असली चेहरा
सुरंग के अंदर
सुरंग की छत बहुत नीची थी। आरोही को झुककर चलना पड़ रहा था। दीवारें पत्थर की। नमी से भरी। कहीं-कहीं पत्थरों पर काई जमी थी। और कहीं कुछ और भी था — जो काई नहीं था। कुछ नीला। कुछ चमकीला। जैसे अंदर की तरफ़ किसी ने रंग लगाया हो।
आरोही ने ग़ौर से देखा। वे धारियाँ नहीं थीं। वे लिखावट थीं। संस्कृत की। बहुत पुरानी। एक पंक्ति यह लिख रही थी —
"जो सत्य के साथ आएगा, वह लौट सकेगा। जो झूठ लेकर आएगा, वह यहीं दफ़्न हो जाएगा।"
आरोही ने आर्यन की तरफ़ देखा।
आर्यन उसके पीछे था। लेकिन अजीब बात — उसके क़दमों की आवाज़ नहीं आ रही थी। जैसे वह हवा में तैर रहा हो। आरोही की टॉर्च की रोशनी में उसकी परछाईं अजीब सी थी। कभी थी। कभी नहीं।
आरोही ने कुछ नहीं कहा। बस चलती रही।
बाहर भगवती देवी बैठ गई थीं। रुद्राक्ष की माला हाथ में लिए। मंत्र जपते हुए। उनकी आवाज़ धीरे-धीरे पीछे रह गई।
पंद्रह मीटर अंदर चलने के बाद सुरंग थोड़ी चौड़ी हुई। एक छोटा सा कमरा। पत्थर का। छत ऊँची।
आरोही ने टॉर्च चारों तरफ़ घुमाई।
कमरे के बीच में एक पुरानी मूर्ति थी। लेकिन यह देवी की नहीं थी। यह एक तांत्रिक की थी। बैठा हुआ। ध्यान की मुद्रा में। लेकिन उसकी आँखें खुली थीं। और उन आँखों में असली रत्न जड़े थे। दो लाल पत्थर।
देवीदास की मूर्ति।
आरोही ने ग़ौर से देखा। मूर्ति के हाथों में एक अंगूठी थी। तांबे की। लाल पत्थर वाली।
वही अंगूठी जिसकी बात रुक्मिणी ने की थी।
आरोही ने आर्यन की तरफ़ देखा। "आर्यन, वह अंगूठी..."
"आरोही जी, यह मूर्ति नहीं छुइए। इसे छूने से देवीदास को पता चल जाएगा कि हम अंदर हैं।"
आरोही ने सिर हिलाया। पर उसका दिमाग़ चल रहा था। अगर मूर्ति के हाथ में अंगूठी है, तो यह मूर्ति साधारण मूर्ति नहीं है।
मूर्ति के पास एक छोटी सी अलमारी थी। पत्थर की। दरवाज़ा बंद।
"आर्यन, यह क्या है?"
"मुझे नहीं पता। मैंने बचपन में यहाँ नहीं देखा।"
आरोही ने अलमारी के पास जाकर देखा। दरवाज़े पर संस्कृत में कुछ लिखा था।
"जो यहाँ रखा है, वह सिर्फ़ रुक्मिणी के ख़ून का व्यक्ति ले सकता है।"
आरोही ने अलमारी को छुआ। दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
अंदर एक छोटी सी लकड़ी की डिबिया थी। आरोही ने खोली।
अंदर एक लाल चूड़ी। बहुत पुरानी। एक जोड़ी की एक। दूसरी शायद कहीं और थी।
नाम-पत्र पर लिखा था — "रुक्मिणी। 1870।"
आरोही की छाती में एक अजीब सी हलचल हुई।
लेकिन तभी...
आरोही की माँ का उपहार — मीरा की रुद्राक्ष की माला — छाती पर एकदम गरम हुई। लाल पत्थर वाला मनका चमकने लगा।
आरोही ने आर्यन की तरफ़ देखा।
"आर्यन..."
आर्यन खड़ा था। उसके पीछे मीरा दिख रही थी। पूरी। शादी के लाल जोड़े में। लेकिन आर्यन को नहीं दिख रही थी।
मीरा ने अपना हाथ आर्यन की तरफ़ बढ़ाया।
फिर मीरा की आवाज़ आरोही के कान में — बहुत साफ़, बहुत तेज़ —
"दीदी, आर्यन असली नहीं है। यह देवीदास है।"
आरोही की साँसें रुक गईं।
आर्यन ने पूछा, "आरोही जी, चूड़ी मिली?"
आरोही ने अपने आपको सँभाला। "हाँ।"
"तो जल्दी। बाहर चलते हैं। पिताजी की पूजा जल्दी ख़त्म हो सकती है।"
आरोही ने चूड़ी अपनी जेब में डाली। बैग से भगवती देवी की छुरी निकाली। ताबीज़ को हाथ में लिया।
फिर पलटी।
"आर्यन।"
"जी?"
"तुम असली आर्यन नहीं हो, है ना?"
आर्यन की मुस्कान ग़ायब हुई।
पल भर के लिए।
फिर वापस आ गई।
"आरोही जी, क्या बात कर रही हैं?"
आरोही ने ताबीज़ को आर्यन की तरफ़ किया।
ताबीज़ जलने लगा।
आर्यन ने पीछे हटने की कोशिश की। पर अब सुरंग का मुँह पीछे था।
"आरोही जी, ऐसा मत कीजिए।"
"तुम कौन हो?"
आर्यन ने एक क्षण के लिए सिर झुकाया। फिर धीरे-धीरे उसका चेहरा बदलने लगा। जवान से बूढ़ा। बूढ़ा से जवान। एक चेहरा नहीं। कई चेहरे। हर एक की एक तस्वीर आरोही ने पहले देखी थी।
देवीदास। विक्रम। देवदत्त। और अब आर्यन।
चार शरीर।
आरोही चीखी नहीं। बस पीछे हटी।
"तूने असली आर्यन को कहाँ रखा है?"
देवीदास हँसा। एक ठंडी हँसी।
"बेटी, आर्यन तेरा प्यारा बच्चा दो साल पहले मर चुका है। जब उसे पहली बार वह जला हुआ निशान बना था। पिछले दो साल से मैं ही आर्यन के शरीर में हूँ। पंडित राधेश्याम को भी यही लगता है कि उसका बेटा ज़िंदा है। पर वह मर चुका है।"
आरोही की आँखों में आँसू आ गए।
आर्यन। बेचारा आर्यन। जो अपनी माँ के लिए रो रहा था। जो अपने पिताजी को मारना चाहता था। वह इंसान अब नहीं था। वह दो साल से मर चुका था।
"तूने असली आर्यन को क्या किया?"
"उसकी आत्मा को मैंने अपने तीसरे कमरे में क़ैद कर रखा है। बारह लड़कियों के साथ। वह भी अब मेरी सेवा में है।"
आरोही की छाती में एक तेज़ दर्द उठा।
"और उसकी माँ? कुसुम?"
देवीदास हँसा। "कुसुम को मैंने पंद्रह साल पहले पकड़ लिया था। जब उसने भागने की कोशिश की। उसका पैर मैंने ही कटवाया — पंडित से। ताकि वह कहीं और भागने की सोच भी न सके। और पंडित ने मेरी बात मानी क्योंकि मैंने उसे अमरता का लालच दिया।"
आरोही की मुट्ठियाँ बँधीं।
"तूने पूरे परिवार को तबाह कर दिया।"
"बेटी, मैंने कई परिवार तबाह किए हैं। तू क्या समझती है — पंडित का परिवार अकेला है? इस गाँव के आधे परिवार मेरी सेवा में हैं। किसी न किसी रूप से।"
आरोही ने देखा। छुरी उसके हाथ में थी। ताबीज़ गले में।
"तूने मुझे यहाँ धोखे से लाया।"
देवीदास ने कहा, "हाँ। और अब तू यहीं मरेगी। इस सुरंग में। इसी तहख़ाने में।"
देवीदास ने हाथ बढ़ाया। सुरंग का पिछला हिस्सा — जहाँ से आरोही आई थी — बंद हो गया। एक पत्थर की दीवार ने रास्ता बंद कर दिया।
बाहर भगवती देवी की चीख़ आई।
"बेटी! आरोही!"
पर आवाज़ धीमी। बहुत धीमी। जैसे बहुत दूर से। जैसे पत्थर की दीवार ने सिर्फ़ रास्ता नहीं, आवाज़ भी बाँध ली हो।
आरोही अकेली रह गई। देवीदास के साथ।
देवीदास का सच
आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ा। छुरी को हवा में लहराया।
"अगर तू असली भूत है, तो यह छुरी तुझे नुक़सान पहुँचाएगी।"
देवीदास हँसा।
"बेटी, मैं भूत नहीं हूँ। मैं ज़िंदा तांत्रिक हूँ। बस मेरा शरीर बदलता रहता है। और छुरी मुझे नुक़सान नहीं कर सकती। क्योंकि मैंने अपने असली शरीर को कहीं और रखा है। जो शरीर तेरे सामने है, यह सिर्फ़ एक खोल है।"
आरोही की आँखें फैलीं।
"तो तू सच में विक्रम भी नहीं है?"
"नहीं। विक्रम भी एक खोल था। मेरा असली शरीर — 1857 का — कहीं और है। और उसकी रक्षा के लिए मैंने बारह लड़कियों की बलि दी है।"
"कहाँ?"
देवीदास मुस्कुराया।
"बेटी, मैं तुझे बताऊँगा। क्योंकि अब तू बाहर नहीं जाएगी। मेरा असली शरीर तहख़ाने के सबसे नीचे है। एक तीसरे कमरे में। जिसे तूने नहीं देखा। जिसे कोई नहीं देखता। बारह लड़कियों की आत्माएँ मेरे शरीर की रक्षा करती हैं। और अब तेरहवीं भी उनमें मिल जाएगी।"
आरोही ने चूड़ी अपनी जेब से निकाली।
"रुक्मिणी की चूड़ी मेरे हाथ में है।"
"वह भी नक़ली है।"
आरोही ने चौंककर देखा।
"क्या?"
"बेटी, तुझे नक़ली आर्यन ने नक़ली रास्ता दिखाया। और नक़ली चूड़ी दी। असली चूड़ी उस अलमारी में नहीं थी। असली चूड़ी सिर्फ़ मेरे शरीर के पास है। मेरे तीसरे कमरे में।"
आरोही ने चूड़ी को देखा। लाल। पुरानी। पर देवीदास सच बोल रहा था या झूठ?
तभी...
मीरा की आवाज़ फिर से आई। बहुत साफ़।
"दीदी, चूड़ी असली है। देवीदास झूठ बोल रहा है। मैं जानती हूँ। मैंने रुक्मिणी की आवाज़ इस चूड़ी से सुनी। यह सच है।"
आरोही ने मीरा की माला के लाल पत्थर को छुआ।
पत्थर गरम था।
तो शायद चूड़ी असली थी।
आरोही ने कहा, "देवीदास, अगर मैं बाहर नहीं जा सकती, तो मैं तेरे तीसरे कमरे में भी नहीं जाऊँगी। मैं यहीं मरूँगी। और तेरी अंगूठी भी नहीं टूटेगी।"
देवीदास ने कहा, "बेटी, तेरहवीं अमावस को अगर तेरहवीं का बलिदान नहीं हुआ, तो मैं भी मर जाऊँगा। मेरी साधना ख़त्म हो जाएगी।"
आरोही की आँखें चमकीं।
"तो अगर मैं मर गई, तेरा भी अंत होगा?"
"मर तो तू यहीं जाएगी। पर तेरा बलिदान मुझे नई ज़िंदगी देगा। अगले तेरह साल के लिए।"
आरोही ने कुछ सोचा।
फिर बोली, "देवीदास, एक बात बता।"
"क्या?"
"अगर तेरहवीं अपनी मर्ज़ी से बलिदान न दे, तो क्या होगा?"
देवीदास एक क्षण के लिए चुप हो गया।
"अगर मर्ज़ी से नहीं, तो मैं जबरन ले लूँगा।"
"कैसे?"
"तेरा गला घोंट दूँगा।"
आरोही मुस्कुराई।
"तो तू ख़ुद अपनी मौत लिख रहा है।"
देवीदास चौंका।
"क्या मतलब?"
"क्योंकि साधना की एक शर्त है। तेरहवीं की बलि उसकी मर्ज़ी से होनी चाहिए। जबरदस्ती की बलि साधना को तोड़ती नहीं, कमज़ोर करती है। और मैंने अभी अपनी मर्ज़ी नहीं दी। मैं बलि नहीं देना चाहती।"
देवीदास का चेहरा पहली बार बदला। घबराहट दिखी।
"बेटी, तुझे किसने बताया?"
आरोही ने कहा, "मेरी नानी। जो अभी भी मेरे साथ हैं।"
देवीदास ने एक क्षण के लिए आँखें बंद कीं। जैसे कुछ सोच रहा हो। जैसे अपनी योजना बदल रहा हो।
फिर उसने आरोही की तरफ़ देखा।
"बेटी, तू सच बोल रही है। पर एक बात याद रख। अगर तेरहवीं अमावस को तू मेरे पास नहीं आई मर्ज़ी से, तो मैं तुझे नुक़सान नहीं पहुँचाऊँगा। पर मैं तेरी माँ को पहुँचाऊँगा। और तेरी नानी की डिबिया चुरा लूँगा। और तेरे परिवार का हर सदस्य एक-एक करके मरेगा।"
आरोही की आँखों में आँसू आए।
"तू इतना नीच है?"
"बेटी, मैं तांत्रिक हूँ। नीच-ऊँच मेरे लिए मायने नहीं रखता। बस साधना पूरी होनी चाहिए।"
आरोही ने कहा, "तो तेरहवीं की रात मैं आऊँगी।"
"मर्ज़ी से?"
आरोही ने कहा, "हाँ। पर एक शर्त पर।"
"क्या?"
"मेरी माँ को पहले सुरक्षित रत्नपुर लाया जाए। तेरे बंधन के बाहर।"
देवीदास ने कुछ पल सोचा।
फिर मुस्कुराया।
"मंज़ूर। कल शाम तक तेरी माँ रत्नपुर पहुँच जाएगी। और उसके बाद तू तेरहवीं की रात मेरे पास आना होगा।"
आरोही ने कहा, "मंज़ूर।"
लेकिन उसके मन में एक और योजना बन रही थी। जो देवीदास को नहीं पता चलनी थी।
आरोही ने मीरा की माला उतारी। हाथ में ली।
"अगर तूने मुझे मार डाला, तो सब कुछ बर्बाद हो जाएगा। तू भी मर जाएगा। मैं भी मर जाऊँगी। पर श्राप ख़त्म हो जाएगा।"
आरोही ने माला ज़मीन पर पटकी। मीरा के परदादा का लाल पत्थर टूटा। एक तेज़ नीली रोशनी निकली।
देवीदास ने अपनी आँखें ढँकीं। "यह क्या है?"
आरोही ने कहा, "यह मीरा के परदादा का पत्थर था। जिसमें एक क़ैद आत्मा थी। तूने ही उसे क़ैद किया था बरसों पहले। अब वह मुक्त हो गई।"
पत्थर की तेज़ रोशनी में एक साया उभरा। एक बूढ़े आदमी का। जो बहुत साल से क़ैद था। उसने देवीदास की तरफ़ देखा और चीखा।
"देवीदास! तूने मेरी जान ली थी 1948 में। अब मैं तेरा बदला लूँगा।"
देवीदास पीछे हटा। लेकिन साया उसकी तरफ़ बढ़ा।
आरोही ने इसी मौक़े का फ़ायदा उठाया। ताबीज़ को दीवार पर लगाया — जिस दीवार ने रास्ता बंद किया था। ताबीज़ जलने लगा। और दीवार धीरे-धीरे पिघली। जैसे मोम।
आरोही एक तरफ़ भागी। सुरंग के मुँह की तरफ़।
पीछे देवीदास और वह साया आपस में लड़ रहे थे। साये ने देवीदास को पकड़ रखा था। लेकिन देवीदास ज़्यादा शक्तिशाली था। साये की चीख़ कमरे में गूँज रही थी।
आरोही ने भागते-भागते पीछे मुड़कर देखा। साये का शरीर धीरे-धीरे धुँआ हो रहा था। लेकिन जाते-जाते साये ने आरोही की तरफ़ देखा और चीख़ा —
"आरोही, तेरहवीं के दिन तू फिर आना यहाँ! रुक्मिणी की असली चूड़ी उसी मूर्ति के हाथ में है! अंगूठी के साथ! एक ही जगह! एक ही समय पर तोड़ना!"
फिर साया ग़ायब हो गया।
आरोही सुरंग के मुँह पर पहुँची। भगवती देवी वहीं थीं। रो रही थीं।
"बेटी! तू ठीक है?"
"दादी, भागो!"
दोनों जंगल की तरफ़ भागीं।
देवीदास ने पीछे से आवाज़ लगाई। लेकिन वह सुरंग से बाहर नहीं आया। शायद उसकी शक्ति सुरंग तक ही थी।
या शायद वह उन्हें जाने दे रहा था।
क्योंकि उसे पता था — वे बिना असली चूड़ी के कुछ नहीं कर सकतीं।
भारी क़ीमत
गाँव पहुँचते-पहुँचते आरोही की साँसें फूल रही थीं। भगवती देवी उसके पीछे थीं। लगभग रोते हुए।
घर पहुँचकर आरोही ने दरवाज़ा बंद किया। पीठ दरवाज़े पर टिकाई। बैठ गई। साँस ली।
रुक्मिणी की चूड़ी उसकी जेब में थी।
भगवती देवी ने पूछा, "बेटी, चूड़ी मिली?"
आरोही ने चूड़ी निकाली।
लेकिन जब उसने चूड़ी को हाथ में उठाया, तो एक अजीब सी बात हुई।
चूड़ी काली पड़ने लगी। लाल से काली। धीरे-धीरे। जैसे उसकी रंगत ग़ायब हो रही हो।
आरोही ने चौंककर देखा।
"दादी, यह क्या हो रहा है?"
तभी उसने मीरा की माला के बारे में सोचा। माला अब नहीं थी। तहख़ाने में छूट गई थी। लाल पत्थर टूट चुका था।
क्या मीरा की माला की उपस्थिति में ही चूड़ी असली दिख रही थी?
आरोही ने चूड़ी को छुरी से खरोंचा।
चूड़ी में से नक़ली रंग निकला।
अंदर से एक साधारण मिट्टी की चूड़ी थी। रंगी हुई।
नक़ली।
आरोही की आँखों में आँसू आ गए।
देवीदास सच बोल रहा था।
चूड़ी नक़ली थी।
और आरोही ने अपने पास एक और चीज़ खोई थी।
मीरा की माला — जो शायद इस पूरे संघर्ष में उसकी सबसे बड़ी शक्ति थी।
लेकिन साये की आवाज़ आरोही के कान में गूँज रही थी।
"रुक्मिणी की असली चूड़ी उसी मूर्ति के हाथ में है! अंगूठी के साथ! एक ही जगह!"
अगर यह सच था, तो देवीदास की मूर्ति और उसकी अंगूठी — दोनों में असली चूड़ी थी।
आरोही ने भगवती देवी की तरफ़ देखा।
"दादी, मैंने ग़लती की। पर एक नई जानकारी भी मिली।"
भगवती देवी ने आरोही को गले लगाया।
"बेटी, ग़लती नहीं। तूने अपनी जान बचाई। यही अभी सबसे बड़ी बात है।"
आरोही ने कहा, "पर अब क्या करूँ? असली चूड़ी उस मूर्ति के हाथ में है। और उस मूर्ति को छूने से देवीदास को पता चलेगा।"
भगवती देवी ने कहा, "बेटी, अब तो एक ही रास्ता है।"
"क्या?"
"बाबा।"
आरोही ने आँखें बंद कीं। हाँ। एक ही रास्ता बचा था।
बाबा को मारना।
या नहीं मारना।
तीसरा रास्ता — जो नानी ने कहा था — क्या था? कहाँ था?
तभी दरवाज़े पर एक खटखटाहट हुई।
आरोही और भगवती देवी दोनों घबराए।
आरोही ने खिड़की से देखा।
बाहर देवराज बाबा खड़े थे।
पहली बार। अपनी झोपड़ी से बाहर। गाँव में।
आरोही की साँसें रुक गईं। बाबा को गाँव में आते हुए किसी ने आज तक नहीं देखा था। भगवती देवी ने कहा था कि बाबा 113 साल से जंगल में हैं। और आज पहली बार बाहर।
क्यों?
क्या हुआ था?
बाबा ने कहा, "बेटी, खोल। मुझे तेरे साथ बात करनी है।"
आरोही ने दरवाज़ा खोला।
बाबा अंदर आए। उनकी आँखों में एक अजीब सी बात थी। कुछ नई थी। कुछ जो पहले नहीं थी।
बाबा ने बैठकर आरोही की तरफ़ देखा।
"बेटी, आज रात मुझे एक सपना आया। तेरी नानी का।"
आरोही चौंकी।
"नानी का?"
"हाँ। जानकी। उन्होंने मुझसे कहा — 'बाबा, मेरी पोती को मार मत बनाना। तीसरा रास्ता है। और वह मैं ख़ुद उसे दिखाऊँगी। तुम्हारी बलि की ज़रूरत नहीं।'"
आरोही की आँखों में आँसू आ गए।
बाबा ने आगे कहा, "बेटी, मैं तेरी नानी से पहले भी मिला हूँ। बहुत साल पहले। जब वे तेरहवीं की डर से पहाड़ आई थीं। तेरी माँ के जन्म से पहले। हमने बात की थी। मैंने उन्हें कुछ सिखाया था। शायद इसीलिए वे तुझे संदेश भेज पा रही हैं।"
आरोही ने कहा, "बाबा, तो तीसरा रास्ता क्या है?"
बाबा ने कहा, "बेटी, मुझे पूरा नहीं पता। लेकिन तेरी नानी कह रही थीं कि उन्होंने मरने से पहले एक चीज़ छिपाई थी। दिल्ली में। तेरे परिवार के पुराने घर में। जो शायद असली चूड़ी है।"
आरोही की आँखें फैलीं।
"नानी के पास असली चूड़ी थी?"
"हाँ बेटी। पर उन्होंने कभी नहीं बताया। शायद इसलिए ताकि कोई तुझ पर मजबूर न करे।"
आरोही ने कहा, "पर बाबा, दिल्ली से यह चूड़ी यहाँ कैसे आएगी? गाँव सील है।"
बाबा ने कहा, "यह मुझे नहीं पता। पर तेरी नानी ने कहा — 'माँ लाएगी।'"
आरोही की छाती में एक हलचल हुई।
माँ। दिल्ली से रत्नपुर। पर गाँव तो सील था।
फिर भी...
अगर नानी सच कह रही थीं, तो माँ किसी न किसी तरह पहुँच सकती थीं।
आरोही ने बाबा से पूछा, "बाबा, कितने दिन बचे हैं?"
"सात।"
आरोही ने भगवती देवी की तरफ़ देखा।
"दादी, मुझे माँ से बात करनी है।"
भगवती देवी ने अपना पुराना लैंडलाइन दिखाया — जो कोने में धूल जमी लगी थी। कई सालों से चला नहीं था।
"पर यह काम नहीं करता।"
आरोही ने कहा, "आज करेगा।"
उसने ताबीज़ को रिसीवर से लगाया।
धीरे-धीरे लाइन चालू हुई।
एक धीमी सी घंटी बजी।
फिर एक आवाज़।
"बेटी?"
माँ की आवाज़। स्पष्ट। जैसे बगल में हों।
आरोही की आँखों में आँसू आए।
"माँ! सुन सकती हैं?"
"हाँ बेटी। बहुत साफ़। तू कैसे कर रही है यह?"
"माँ, बात लंबी है। अभी नहीं। एक ज़रूरी काम है। नानी के पुराने सामान में एक लाल चूड़ी है। बहुत पुरानी। शायद 1870 की। क्या आपने कभी देखी है?"
फ़ोन के दूसरी तरफ़ कुछ पल की चुप्पी।
"बेटी, नानी की एक चांदी की डिबिया है। जो उन्होंने मुझे मरने से पहले दी थी। उसमें एक लाल चूड़ी है। मैंने कभी नहीं खोली। नानी ने कहा था — 'जब सुधा की बेटी बुलाए, तब खोलना।'"
आरोही की छाती में एक धड़कन तेज़ हुई।
"माँ, वह चूड़ी लेकर आइए। जल्दी।"
"कैसे बेटी? रास्ते बंद हैं।"
"माँ, बाबा को नानी का सपना आया। उन्होंने कहा — 'माँ लाएगी।' यानी आप ला सकती हैं। किसी न किसी तरह।"
माँ ने कुछ पल सोचा।
"बेटी, मैं आज ही निकलती हूँ। पर एक बात। रास्ते में जो भी हो, मैं रुकूँगी नहीं। अगर मैं तुझ तक नहीं पहुँच पाई..."
"माँ, आप पहुँचेंगी। मुझे पता है।"
"बेटी, एक बात और।"
"क्या?"
"अगर मुझे कुछ हो जाए, तो नानी की डिबिया मेरे पर्स में होगी। मेरे साथ। किसी को भी दे देना — कोई भी उसे रत्नपुर पहुँचा देगा।"
आरोही ने आँखें बंद कीं।
"माँ, आपको कुछ नहीं होगा।"
"बेटी, वादा कर एक बात का।"
"क्या?"
"अगर मैं न पहुँच सकूँ, और तेरहवीं अमावस की रात आ जाए — तू ख़ुद फ़ैसला लेना। नानी की बात मानना। बाबा की नहीं। न किसी और की। सिर्फ़ नानी की।"
आरोही ने कहा, "वादा।"
फ़ोन कट गया।
आरोही ने रिसीवर रखा। बाबा की तरफ़ देखा।
बाबा मुस्कुरा रहे थे।
"बेटी, अच्छा किया। अब हमें बस माँ का इंतज़ार करना है।"
आरोही ने पूछा, "बाबा, अगर माँ नहीं पहुँच सकीं?"
बाबा ने कहा, "तो मैं तेरहवीं की रात मंदिर में आऊँगा। अकेले। तू मुझे मार देना। मेरी शक्ति तेरे पास आ जाएगी। और तू असली चूड़ी को दूर से भी तोड़ सकेगी।"
आरोही ने कहा, "बाबा, मैं आपको नहीं मारूँगी। नानी ने कहा है।"
बाबा ने कहा, "बेटी, अगर माँ न पहुँचीं, तो मारना ही पड़ेगा। कोई और रास्ता नहीं।"
आरोही ने कुछ नहीं कहा।
बाबा उठ खड़े हुए।
"बेटी, मैं जा रहा हूँ। बहुत साल बाद गाँव आया हूँ। अब जल्दी लौटना होगा। नहीं तो देवीदास मुझे पहचान लेगा।"
बाबा दरवाज़े की तरफ़ बढ़े।
लेकिन जाते-जाते एक बात कही।
"बेटी, आज रात सोना नहीं। देवीदास बहुत गुस्से में है। तूने उसे अंदर से देखा है। अब वह तुझे और तेज़ी से आज़माएगा।"
बाबा चले गए।
भगवती देवी ने आरोही की तरफ़ देखा।
"बेटी, तू ठीक तो है ना?"
आरोही ने अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर बैठी। थकान से बदन टूट रहा था। लेकिन नींद नहीं आ रही थी।
खिड़की के बाहर पहली बार एक अजीब सी हलचल थी।
पूरे गाँव में कुत्ते भौंक रहे थे। एक साथ। सुर में। जैसे कोई गीत गा रहे हों।
आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ा।
आज की रात लंबी होगी।
बहुत लंबी।
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