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भाग 7 : आर्यन की गवाही और तहख़ाने की योजना
Piyashi Atma · Psychological Horror · 17 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- तेरहवीं अमावस
- Chapter
- 7 of 23
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3383
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
तेरहवीं अमावस
भाग 7 : आर्यन की गवाही और तहख़ाने की योजना
चौथी रात
आरोही घर पहुँची। शाम के छह बज चुके थे। भगवती देवी बरामदे में बैठी थीं। तुलसी की चूड़ी आरोही की जेब में थी।
आरोही ने घर के अंदर आते ही पहले भगवती देवी को सब बताया। तहख़ाने से लेकर जंगल तक। रुक्मिणी का असली रूप। बाबा की शर्त। आर्यन की मुलाक़ात। तुलसी की चूड़ी।
भगवती देवी ने सब सुना। बहुत देर तक कुछ नहीं बोलीं। फिर धीरे से बोलीं।
"बेटी, यह बहुत बड़ा राज़ है। आर्यन ने तुझसे जो कहा, अगर वह सच है, तो पंडित राधेश्याम इस गाँव के सबसे बड़े दुश्मन हैं। मेरी मीरा को उसने ही मरवाया। और अब वह तुझे भी मरवाना चाहेगा।"
"पर आर्यन?"
"आर्यन बचपन से बीमार है। सोलह साल की उम्र से उसे कई बीमारियाँ हुई हैं। दिल की कमज़ोरी। हड्डियों की। मुझे लगता था कि यह बस बीमारी है। पर शायद यह श्राप है।"
आरोही ने पूछा, "क्या आपने कभी आर्यन की माँ से बात की?"
भगवती देवी की आँखों में आँसू आए।
"आर्यन की माँ, कुसुम — वह मेरी सहेली थी। पचास साल से। हम बचपन से साथ खेले। पर उसकी शादी पंडित राधेश्याम से होने के बाद वह बदल गई। पहले हँसमुख। बाद में चुप। बहुत चुप। हम मिलते तो थे, पर वह ज़्यादा बात नहीं करती।"
"और उनका पैर?"
"पंद्रह साल पहले वह एक रात मेरे पास आई थी। रात के बारह बजे। दरवाज़ा खटखटा रही थी। जब मैंने खोला, तो वह दहशत में थी। बोली — 'भगवती, मुझे यहाँ छिपा। मैं भागकर आई हूँ। राधेश्याम पागल हो गया है। वह... वह...' उसने पूरा नहीं बताया। मैंने उसे अंदर लिया। अगली सुबह पंडित राधेश्याम आए। कुसुम को घसीटकर ले गए। मैंने रोका। पर पंडित जी ने मुझे धमकाया।"
"फिर?"
"तीन दिन बाद पता चला कि कुसुम का एक पैर 'दुर्घटना' में जा चुका है। पंडित जी ने कहा — 'सीढ़ियों से गिर गई।' पर मैं जानती थी। कुसुम को उन्होंने ख़ुद ऐसा किया। ताकि वह कभी भाग न सके।"
आरोही ने सिर हिलाया।
"दादी, आज रात मुझे कुछ करना होगा।"
"क्या?"
"सोना नहीं। जागते रहना। कुछ लिखना। सारी घटनाओं को लिखना। ताकि अगर मुझे कुछ हो जाए, तो कोई पीछे से पढ़ सके।"
भगवती देवी ने कहा, "बेटी, तुझे कुछ नहीं होगा।"
आरोही मुस्कुराई। लेकिन उसकी मुस्कान में कोई ख़ुशी नहीं थी।
रात के आठ बजे उसने खाना खाया। बहुत कम। फिर अपने कमरे में गई। नोटबुक खोली। हर बात लिखी। दो घंटे तक।
रात के दस बजे अचानक बिजली चली गई। पूरे गाँव में। लालटेन जलानी पड़ी। आरोही ने ताबीज़ पहना। भगवती देवी की छुरी बैग में डाली।
तभी बाहर से हवा की आवाज़ आई। बहुत तेज़। जैसे कोई तूफ़ान आ रहा हो।
लेकिन तूफ़ान की आवाज़ में एक और आवाज़ थी। सुरीली। किसी बाँसुरी की।
आरोही ने खिड़की के पास जाकर बाहर देखा।
गाँव के मंदिर की तरफ़ एक जुलूस दिख रहा था। कोई नहीं था। बस मशालें। हवा में तैरती हुई। धीरे-धीरे मंदिर की तरफ़ बढ़ रही थीं। और उनके साथ एक बाँसुरी की आवाज़।
आरोही की रगों में ठंडक दौड़ गई।
तभी दरवाज़े पर एक खटखटाहट। नरम। बच्ची की।
"दीदी, खोल न। मैं तुलसी हूँ। मेरी चूड़ी वापस दे। वह मेरी है।"
आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ा।
"दीदी, अगर चूड़ी दे दे, तो सब ठीक हो जाएगा। मैं तेरी बहन हूँ।"
आरोही ने कुछ नहीं कहा।
फिर दूसरी आवाज़। कौशल्या की। "दीदी, तुलसी झूठ बोल रही है। चूड़ी अपने पास रख। पर मुझसे मिलने आ।"
फिर तीसरी। लक्ष्मी की।
बारह आवाज़ें। सब एक साथ।
आरोही ने अपना कान बंद किया।
फिर अचानक एक और आवाज़ आई। नई। जो पहले नहीं सुनी थी। एक जवान लड़के की।
"आरोही, मैं आर्यन हूँ। मैं मर गया हूँ। दरवाज़ा खोल। मुझे तुझे एक बात बतानी है।"
आरोही की छाती में एक तेज़ दर्द उठा।
आर्यन?
पर वह अभी दो घंटे पहले तो ज़िंदा था।
"आर्यन?"
"हाँ आरोही। पिताजी ने मुझे मार डाला। जब मैंने तुम्हें चूड़ी दी थी, तब से वह देख रहे थे। मैंने रात को उनसे झगड़ा किया। उन्होंने मुझ पर एक मंत्र फेंका। मैं मर गया। अब मेरी आत्मा तुझसे मिलने आई है।"
आरोही ने खिड़की के पास जाकर बाहर देखा।
बाहर सचमुच कोई खड़ा था। आर्यन जैसा। लेकिन उसकी परछाईं ज़मीन पर नहीं थी। और उसके पैर हवा में तैर रहे थे।
आरोही ने दरवाज़ा नहीं खोला।
"आर्यन, अगर तुम सच में मर गए हो, तो मुझे कुछ ऐसा बताओ जो सिर्फ़ तुम्हें और मुझे पता हो।"
बाहर से चुप्पी।
फिर आर्यन की आवाज़, "आरोही, यह तुम मुझ पर विश्वास नहीं कर रहीं?"
"बताओ।"
"मैंने... मैंने कहा था कि रुक्मिणी और देवीदास एक ही शरीर में हैं।"
आरोही ने कहा, "यह तुम्हारे पिताजी को भी पता है। और शायद विक्रम को भी। यह सिर्फ़ हमारे बीच की बात नहीं।"
बाहर से चीख़ आई। ज़ोरदार।
फिर वह हवा में घुल गया। बाहर कुछ नहीं रह गया।
आरोही ने ताबीज़ को छाती से लगाया।
पूरी रात ऐसी ही आवाज़ें आती रहीं। एक-एक करके सब जाने-पहचाने चेहरे बुला रहे थे — माँ, पिताजी, नानी, दोस्त, प्रोफ़ेसर मल्होत्रा — सब। पर आरोही ने कोई भी नहीं माना।
एक बार तो कमरे की छत से कुछ टपकने लगा। आरोही ने ऊपर देखा। छत से लाल बूँदें गिर रही थीं। ख़ून। धीरे-धीरे। एक-एक करके। बिस्तर पर। फ़र्श पर। उसके बाल पर।
आरोही ने ताबीज़ को छत की तरफ़ किया। ताबीज़ जलने लगा। ख़ून की बूँदें भाप बनकर उड़ गईं। जैसे कभी थीं ही नहीं।
फिर बिस्तर के नीचे से एक हाथ निकला।
एक बच्ची का हाथ। नन्हा। सफ़ेद।
"दीदी, मुझे बाहर निकाल। मैं यहाँ बंद हूँ।"
आरोही ने बिस्तर से क़दम नहीं हटाए। बस अपनी टाँगें और ऊपर उठा लीं।
हाथ धीरे-धीरे और आगे बढ़ा। कोहनी तक। कंधे तक। फिर बिस्तर के नीचे से एक पूरा सिर निकलने लगा।
आरोही ने आँखें बंद कर लीं।
"दीदी, देख न मुझे। मैं तेरी बहन हूँ। मीरा हूँ। तेरी पिछली बहन।"
आरोही की छाती में एक हूक उठी। मीरा। भगवती देवी की बेटी।
पर वह जानती थी कि यह छल है।
उसने अपने कान बंद किए। ताबीज़ को कसकर पकड़ा। मन में हनुमान चालीसा दोहराई।
फिर एक चीख़। बहुत ज़ोरदार। जैसे किसी को जला दिया गया हो।
आरोही ने आँखें खोलीं।
बिस्तर के नीचे कुछ नहीं था। छत साफ़ थी। कमरा सामान्य।
आरोही ने अपने पैर बिस्तर से नीचे रखे। लेकिन एक क्षण के लिए ठिठक गई। फ़र्श पर एक छोटी सी लाल चूड़ी पड़ी थी। नन्ही। बच्चों वाली।
आरोही ने उठाई। नाम-पत्र पर लिखा था — "मीरा। 2013।"
तहख़ाने की टोकरी वाली।
आरोही ने चूड़ी अपनी जेब में डाली। अगर वह असली थी, तो शायद बाद में काम आए। अगर नहीं, तो एक और सबूत।
सुबह चार बजे तक वह जागती रही।
फिर एक अंतिम आवाज़ आई।
खिड़की के बाहर से। रुक्मिणी की। लेकिन इस बार सचमुच अलग।
"दीदी, मैं पहली बार तेरी मदद करने आई हूँ। मेरी बात सुन।"
आरोही ने कुछ नहीं कहा।
"जो कल तुझसे मिली, वह देवीदास थी। जो मेरा रूप धरे थी। मैं नहीं आ सकती तेरे पास। मैं तहख़ाने में क़ैद हूँ। लेकिन तुझे एक बात बतानी है।"
आरोही ने कहा, "बता।"
"आज सुबह आर्यन से मत मिलना। जिस टीले पर वह बुला रहा है, वहाँ पंडित राधेश्याम एक जाल बिछा रहा है। आर्यन भी शायद उसकी तरफ़ है।"
आरोही ने कहा, "पर आर्यन ने तो मुझे चूड़ी दी।"
"चूड़ी असली नहीं है। तुलसी की चूड़ी अभी भी तहख़ाने में है। वह चूड़ी झूठी है। पंडित ने बनवाई है। ताकि तेरहवीं अमावस को तू ग़लत मंत्र पढ़े।"
आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ा।
"तुम फिर से झूठ बोल रही हो?"
"मैं झूठ नहीं बोल रही, दीदी। इस बार सच बोल रही हूँ। और तुझे विश्वास दिलाने के लिए एक और बात बताती हूँ।"
"क्या?"
"तेरे बैग में जो नोटबुक है, उसे खोल। पन्ना 24 पर देख।"
आरोही ने नोटबुक निकाली। पन्ना 24 खोला।
वहाँ एक नई पंक्ति लिखी थी। ताज़ी स्याही में। रुक्मिणी की हस्तलिपि नहीं। किसी और की।
बहुत साफ़, महिला की हस्तलिपि।
"बेटी, मैं तेरी नानी हूँ। जानकी। मैं मर चुकी हूँ पर अब तुझसे बात कर रही हूँ। रुक्मिणी सच बोल रही है। कल टीले पर मत जाना। और बाबा को मत मारना। तीसरा रास्ता है। पर वह तुझे ख़ुद ढूँढ़ना होगा।"
आरोही की आँखों में आँसू आ गए।
क्या यह उसकी नानी थी? या फिर एक और धोखा?
रुक्मिणी की आवाज़ फिर आई। "दीदी, नानी की हस्तलिपि तूने बचपन में देखी है। तेरी माँ के लिए वह चिट्ठियाँ लिखती थीं। मिला। अगर मिलती है, तो विश्वास कर।"
आरोही ने अपने बैग से माँ की भेजी हुई पुरानी चिट्ठियों का बंडल निकाला — जो उसने रत्नपुर आते वक़्त साथ रखा था। नानी की एक चिट्ठी थी। जो नानी ने आरोही के जन्म पर उसकी माँ को लिखी थी।
आरोही ने दोनों हस्तलिपियाँ मिलाईं।
एक जैसी थी। बिल्कुल एक जैसी।
आरोही की छाती में एक अजीब सी हलचल हुई।
अगर यह सच में उसकी नानी थीं, तो शायद रुक्मिणी सच बोल रही थी।
और आर्यन झूठ बोल रहा था।
आर्यन का असली रूप
सुबह आठ बजे आरोही ने भगवती देवी को सब बताया। नानी की चिट्ठी दिखाई।
भगवती देवी ने पहचान लिया।
"बेटी, यह तेरी नानी की ही हस्तलिपि है। मैं जानकी को थोड़ा जानती हूँ। वह मीरा की शादी में आई थीं। मुझे उन्होंने कुछ चिट्ठियाँ भेजी थीं।"
आरोही ने कहा, "दादी, तो मैं आज टीले पर नहीं जाऊँगी।"
"पर आर्यन ने कहा था कि वह तुझे मदद करेगा।"
"आर्यन शायद सच में मरा भी नहीं है। शायद उसकी मौत का नाटक था। ताकि मुझे टीले पर बुलाया जा सके। ताकि पंडित मुझे वहाँ मार सके।"
भगवती देवी ने आँखें बड़ी कीं।
"बेटी, तू ठीक कह रही है। पंडित पर विश्वास नहीं करना चाहिए।"
आरोही ने कहा, "पर एक और बात है दादी। जो तुलसी की चूड़ी आर्यन ने दी, वह झूठी है। तो सच वाली अभी भी तहख़ाने में है।"
"तो अब क्या करेंगे?"
"मुझे तहख़ाने में जाना होगा। लेकिन इस बार बिना ताबीज़ या मंत्र के नहीं। मुझे बाबा की मदद चाहिए।"
"बेटी, बाबा तुझसे उनकी जान माँगेंगे।"
"मुझे पता है दादी।" आरोही ने कहा। "पर अगर नानी सही कहती हैं कि तीसरा रास्ता है, तो मुझे वह ढूँढ़ना होगा। बिना बाबा को मारे।"
भगवती देवी ने कुछ नहीं कहा।
तभी दरवाज़े पर खटखटाहट हुई।
आरोही ने अपना ताबीज़ पकड़ा। भगवती देवी दरवाज़े की तरफ़ गईं।
बाहर आर्यन शर्मा खड़ा था।
ज़िंदा।
बिल्कुल स्वस्थ।
आरोही ने चौंककर देखा।
आर्यन ने कहा, "आरोही जी, नमस्ते। मैं यहाँ इसलिए आया हूँ क्योंकि मुझे लगा कि आप टीले पर आ रही होंगी। पर आप नहीं आईं। तो मैं ख़ुद आ गया।"
आरोही ने ग़ौर से देखा। आर्यन की परछाईं ज़मीन पर थी। उसके कपड़े ठीक थे। आँखें सामान्य।
"आर्यन, क्या तुम्हें रात को कुछ हुआ था?"
"नहीं, आरोही जी। मैं सारी रात अपने कमरे में सोया।"
आरोही ने कहा, "रात को कोई चीज़ मेरी खिड़की पर आई थी। तुम्हारे रूप में। बोली कि तुम मर गए हो।"
आर्यन के चेहरे पर डर आया।
"क्या? पर मैं तो..."
फिर उसकी आँखों में समझ आई।
"आरोही जी, वह देवीदास था। मेरा रूप धरकर। शायद उसे पता चल गया कि मैंने आपको चूड़ी दी।"
आरोही ने कहा, "आर्यन, वह चूड़ी झूठी है। असली चूड़ी अभी भी तहख़ाने में है।"
आर्यन की आँखें बड़ी हुईं।
"क्या? पर मेरी परदादी ने कहा था..."
"तुम्हारी परदादी शायद देवीदास के प्रभाव में थीं।"
आर्यन कुछ पल के लिए चुप हो गया। फिर धीरे से बोला, "तो अब क्या करना है?"
आरोही ने कहा, "मुझे तहख़ाने में जाना होगा। और असली चूड़ी लानी होगी।"
"मैं आपके साथ चलूँगा।"
"नहीं आर्यन। तुम मत आना।"
"क्यों?"
आरोही ने कहा, "क्योंकि तुम्हारे पिताजी को तुम पर शक होगा। और अगर तुम मेरे साथ पकड़े गए, तो पिताजी तुम्हें सचमुच मार डालेंगे।"
आर्यन ने कुछ पल सोचा। फिर सिर हिलाया।
"आप सही कह रही हैं। पर मैं आपको कुछ और मदद कर सकता हूँ।"
"क्या?"
"मंदिर का एक पिछला रास्ता है। जो पिताजी नहीं जानते। मैं बचपन में मंदिर के पीछे खेलता था। वहाँ एक टूटी हुई सुरंग है। जो सीधे तहख़ाने के पिछले हिस्से में जाती है। बिना मंदिर की देवी की मूर्ति के दरवाज़े से।"
आरोही की आँखें चमकीं।
"क्या तुम मुझे वह रास्ता दिखा सकते हो?"
"हाँ। पर अभी नहीं। दिन में मंदिर के पीछे कोई नहीं जाता, पर पिताजी की नज़र रहती है। रात को। आधी रात के बाद।"
आरोही ने सिर हिलाया।
"आज रात। बारह बजे।"
आर्यन ने कहा, "मैं गाँव के बाहर वाले पेड़ के नीचे मिलूँगा। जहाँ पगडंडी शुरू होती है। वहाँ से हम मंदिर की तरफ़ जाएँगे।"
आर्यन जाने लगा।
आरोही ने पूछा, "आर्यन, एक और सवाल।"
"जी?"
"तुम्हारी माँ का पैर..."
आर्यन एक क्षण के लिए रुका।
"वह मेरे पिताजी ने ही किया। पर उन्होंने मुझे कहा था कि यह देवीदास ने किया। मुझे बचपन से यही बताया गया। पर तीन साल पहले मैंने ख़ुद अपने पिताजी के कमरे में एक चिट्ठी देखी। जो उन्होंने अपने भाई को लिखी थी। उसमें पिताजी ने ख़ुद माना था कि उन्होंने माँ का पैर काटा। ताकि वह भाग न सकें।"
आर्यन की आँखों में आँसू आए।
"मैं अपने पिताजी को मारना चाहता हूँ, आरोही जी। लेकिन मुझमें हिम्मत नहीं है। शायद आप मेरी माँ का बदला भी लेंगी।"
आरोही ने कहा, "आर्यन, एक और बात। जो चूड़ी तुमने मुझे दी, अगर वह झूठी है, तो शायद तुम्हारी परदादी ने असली छिपा रखी होगी कहीं और।"
आर्यन ने सोचा।
"मेरी परदादी के कमरे में एक पुरानी अलमारी है। जो पचास साल से बंद है। किसी ने नहीं खोली। पिताजी उसे खोलने नहीं देते। कहते हैं वह पवित्र है।"
"क्या तुम उसकी चाबी ले आ सकते हो?"
"पिताजी की जेब में हमेशा एक गुच्छा रहता है। लेकिन मुख्य चाबी वे अपने गले में पहनते हैं। नहीं ले सकता।"
आरोही ने कहा, "तो हमें दूसरा रास्ता ढूँढ़ना होगा। शायद तहख़ाने से चूड़ी लाने के बाद।"
आर्यन ने कहा, "आरोही जी, आज रात मैं आपको एक और चीज़ दूँगा। मेरे परदादा की मृत्यु से पहले उन्होंने एक ताबीज़ बनाया था। तांबे का। मंत्र-बद्ध। जो सिर्फ़ पंडित परिवार के सदस्य को काम आता है। पर उन्होंने कहा था — 'जब तेरहवीं आए, तो इसे उसे दे देना। यह मंदिर के अंदर छिपे राज़ों को दिखाएगा।'"
आर्यन ने आगे कहा, "आरोही जी, आज रात आप अकेली मत आइए। भगवती दादी को साथ लाइए। तहख़ाने में जाने के लिए दो लोगों की ज़रूरत है। एक जो अंदर जाए, एक जो बाहर मंत्र पढ़े।"
"पर दादी बहुत बूढ़ी हैं।"
"उनका मीरा से रिश्ता है। मीरा तहख़ाने में बंदी है। दादी की उपस्थिति मीरा को शक्ति देगी। और मीरा हमें मदद कर सकती है।"
आरोही ने सिर हिलाया।
"ठीक है।"
वह चला गया।
आरोही ने भगवती देवी की तरफ़ देखा।
"दादी, आज रात मैं तहख़ाने जाऊँगी।"
भगवती देवी ने कहा, "बेटी, मैं भी आऊँगी।"
"नहीं दादी। आप यहीं रहिए। अगर मुझे कुछ हो, तो आप ही मेरी माँ को बतानी होंगी।"
माँ का फ़ोन
दोपहर के दो बजे। अचानक फ़ोन में सिग्नल आया। दो पल के लिए। आरोही ने माँ को फ़ोन मिलाया।
तुरंत उठा। "आरोही, बेटी! तू कहाँ है? मैं दो घंटे से कोशिश कर रही हूँ।"
"माँ, मैं ठीक हूँ। रत्नपुर में हूँ। यहाँ का सिग्नल बहुत कम है।"
"बेटी, मैं गाड़ी लेकर आ रही हूँ। पर एक अजीब बात हो रही है। रास्ते में। हर पचास किलोमीटर पर गाड़ी रुक जाती है। इंजन बंद। कुछ मिनट बाद फिर चालू। यह चौथी बार हुआ है। और एक जगह — सुबह — गाड़ी के आगे एक औरत आ गई। सफ़ेद साड़ी में। ड्राइवर ने ज़ोर से ब्रेक लगाई। जब हम उतरे, कोई नहीं था। सिर्फ़ सड़क पर एक लाल चूड़ी पड़ी थी।"
आरोही की छाती में एक दर्द उठा।
"माँ, वह रुक्मिणी है। वह आपको रोक रही है।"
"बेटी, मुझे तेरे पास आना है।"
"माँ, अगर आप ज़बरदस्ती आईं, तो कुछ बुरा हो सकता है। मुझ पर भरोसा कीजिए। मैं इसे संभाल लूँगी।"
माँ रो रही थीं। आरोही सुन सकती थी उनकी साँसें।
"आरोही, मुझे तेरी नानी की एक बात याद आ रही है। उन्होंने कहा था — 'अगर कभी वह वहाँ चली गई, तो एक चीज़ याद रखना। सिर्फ़ नानी उसे बचा सकती हैं।' मुझे समझ नहीं आया कब से। पर अब लगता है — शायद..."
आरोही ने कहा, "माँ, मुझे कल रात नानी का संदेश मिला। नोटबुक में। उन्होंने भी कुछ कहा।"
"क्या?"
"कि तीसरा रास्ता है। और बाबा को मारने की ज़रूरत नहीं।"
माँ चुप हो गईं। फिर बोलीं, "बेटी, तेरी नानी हमेशा तेरे साथ हैं। मैं जानती हूँ। तू सुरक्षित रहेगी।"
"माँ, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"नानी की मौत कैसे हुई थी? मुझे पूरा कभी नहीं बताया।"
माँ ने एक लंबी साँस ली।
"बेटी, नानी नींद में गईं। एक शांत मौत। पर मरने से पहले उन्होंने एक अजीब बात कही थी। उन्होंने कहा था — 'सुधा, मैं आरोही की रक्षा के लिए जाती हूँ। एक दिन वह मुझे बुलाएगी। तब मैं जाऊँगी।'"
"नानी ने ऐसा कहा?"
"हाँ बेटी। और अब मैं समझ रही हूँ। शायद उन्होंने अपनी मृत्यु को कहीं बचाकर रखा था। तेरी रक्षा के लिए।"
आरोही की आँखों में आँसू आए।
फ़ोन कट गया। सिग्नल गया।
आरोही ने फ़ोन नीचे रखा।
आठ दिन बचे थे।
और आज रात वह तहख़ाने में जाने वाली थी।
आर्यन के साथ।
अगर आर्यन असली आर्यन था।
अगर नहीं...
तैयारी
शाम को आरोही ने अपने बैग को तैयार किया। भगवती देवी की छुरी। ताबीज़। शीशी में बचा हुआ सिंदूर पानी। नोटबुक। टॉर्च। मीरा की पीतल की पेटी में से चाँदी की पायल — जो मीरा की शादी की थी। भगवती देवी ने कहा था — 'यह पवित्र है। तेरे काम आ सकती है।'
आठ बजे भगवती देवी ने खाना बनाया। आरोही ने खाने की कोशिश की। पर कुछ हलक से नीचे नहीं गया। बस एक कटोरा दूध पिया। और थोड़ा सा गुड़ खाया।
भगवती देवी ने कहा, "बेटी, मैं तैयार हूँ। पर एक चीज़ मुझे बतानी है।"
"क्या दादी?"
भगवती देवी ने अपने कमरे से एक पुरानी माला निकाली। रुद्राक्ष की। लेकिन उसमें एक मनका अलग था। लाल पत्थर वाला।
"यह माला मीरा की थी। मैंने उसकी शादी की सुबह उसे दी थी। पर मीरा उस रात ग़ायब हो गई। यह माला उसके तकिये के नीचे रह गई। मैंने इसे तब से नहीं छुआ। लेकिन आज मुझे लगा कि यह तेरे काम आ सकती है।"
आरोही ने माला ली। बहुत भारी लगी। जैसे उसमें कोई ऊर्जा हो।
"दादी, यह लाल पत्थर..."
"यह मीरा के परदादा का था। बहुत पुराना। बताते हैं कि इसमें एक शक्ति है। जो किसी क़ैद की गई आत्मा को पहचान सकती है।"
आरोही ने माला पहनी।
रात के ग्यारह बजे। भगवती देवी और आरोही घर से निकलीं। घुप्प अँधेरा। बादलों में चाँद छिपा। रास्ते में कोई नहीं। लेकिन गाँव की गलियाँ आज बहुत जीवित लग रही थीं। जैसे हर दीवार साँस ले रही हो। हर दरवाज़ा देख रहा हो।
आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ा। मीरा की पायल पैर में पहनी थी। हल्की छनक हो रही थी। लेकिन आवाज़ धीमी। जैसे कोई सुनने न पाए।
गाँव के बाहर वाले पेड़ के पास पहुँचीं।
आर्यन वहाँ खड़ा था। हाथ में एक झोला।
"आरोही जी, दादी। आ गईं।"
आरोही ने पूछा, "क्या तुम्हारे पिताजी को कुछ पता चला?"
"नहीं। वे पूजा कर रहे हैं। रात भर करेंगे। यह उनका हर हफ़्ते का काम है। मुझे नहीं देखेंगे।"
आर्यन ने अपने झोले से एक छोटा सा ताबीज़ निकाला। तांबे का। पर आकार अलग था। एक त्रिकोण।
"आरोही जी, यह मेरे परदादा का ताबीज़ है। जब आप तहख़ाने में जाएँगी, तो इसे अपने माथे पर लगाना। यह आपको छिपी हुई चीज़ें दिखाएगा।"
आरोही ने ताबीज़ लिया।
तीनों मंदिर की तरफ़ चले।
मंदिर के पीछे एक घनी झाड़ियाँ थीं। आर्यन ने उन्हें हटाया। पीछे एक पुरानी सुरंग का मुँह था। पत्थरों से बंद। लेकिन एक पत्थर ढीला था।
आर्यन ने उसे धकेला।
अंदर एक अँधेरा गड्ढा।
"आरोही जी, यह सुरंग सीधे तहख़ाने के पिछले हिस्से में जाती है। बीच में एक कमरा है। जहाँ शायद रुक्मिणी की असली चूड़ी होगी।"
आरोही ने टॉर्च जलाई।
"आर्यन, तुम बाहर मंत्र पढ़ोगे?"
"नहीं। मैं आपके साथ अंदर जाऊँगा। दादी बाहर होंगी।"
भगवती देवी ने कहा, "आर्यन, तू क्या मंत्र पढ़ेगा?"
"दादी, मुझे बाबा ने सिखाया है। एक साल पहले। जब मैंने कहा था कि मैं तेरहवीं की मदद करूँगा।"
आरोही ने रुककर पूछा, "तुम बाबा से मिलते हो?"
आर्यन ने कहा, "हाँ। पिछले तीन साल से। पिताजी को नहीं पता। बाबा मेरे असली गुरु हैं।"
आरोही ने आर्यन की आँखों में देखा।
क्या यह सच था?
पर अब वक़्त नहीं था सोचने का।
"चलो।"
तीनों सुरंग के मुँह पर पहुँचे।
आरोही ने पहला क़दम अंदर रखा।
अँधेरा उसे निगल गया।
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