PretikaPsychological Horrorतेरहवीं अमावस

भाग 6 : बाबा की शर्त और जंगल का सच सील किया हुआ गाँव

Piyashi Atma · Psychological Horror · 17 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
6 of 23
Category
Psychological Horror
Reading time
17 min
Words
3374
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

तेरहवीं अमावस
भाग 6 : बाबा की शर्त और जंगल का सच
सील किया हुआ गाँव
घर पहुँचते ही आरोही अपने कमरे में गई। खिड़की खोली। बाहर देखा।
गाँव के छोर पर, जहाँ जंगल शुरू होता था, वहाँ अब भी वही धुंधली रेखा दिख रही थी। बल्कि अब वह पहले से ज़्यादा साफ़ थी। जैसे किसी ने हवा में एक पर्दा टाँग दिया हो, जो दूर से पारदर्शी लगता था, लेकिन क़रीब से घना।
आरोही ने अपना फ़ोन उठाया। सिग्नल नहीं था। कल तक जो एक कोने में मिल जाता था, वह भी आज ग़ायब। बिजली अभी थी, पर पंखा भी धीरे-धीरे धीमा हो रहा था। जैसे कुछ अदृश्य रूप से गाँव की ऊर्जा को खींच रहा हो।
भगवती देवी नीचे से चिल्लाईं, "बेटी, नाश्ता कर लो।"
आरोही नीचे उतरी। लेकिन खाया नहीं गया। बस एक कप चाय।
"दादी, मैं देवराज बाबा के पास जाऊँगी। अभी।"
"अकेली?"
"हाँ।"
"बेटी, जंगल का रास्ता आज सुरक्षित नहीं।"
"मुझे पता है। पर उनके बिना काम नहीं होगा।"
भगवती देवी ने कुछ नहीं कहा। बस अलमारी से एक छोटा सा लाल कपड़ा निकाला। उसमें एक चीज़ बँधी थी।
"यह ले।"
आरोही ने खोला। अंदर एक छोटी सी लोहे की छुरी थी। बहुत पुरानी। हैंडल पर संस्कृत में कुछ खुदा था।
"यह मेरी माँ ने मुझे दी थी। मैंने मीरा को नहीं दी। शायद इसीलिए... खैर। तू ले जा। जंगल में यह तेरे काम आ सकती है।"
आरोही ने छुरी अपने बैग में डाली। ताबीज़ पहना। और निकल पड़ी।
रास्ते में गाँव के बाहर पहुँचने से पहले, उसने एक और अजीब चीज़ देखी। पगडंडी के दोनों तरफ़ की झाड़ियाँ काली पड़ रही थीं। हरी नहीं। पूरी काली। जैसे किसी ने उन्हें जला दिया हो। और आग की गंध भी नहीं थी।
आरोही ने ताबीज़ को हाथ में लेकर पगडंडी पर क़दम रखा। एक झटका लगा। जैसे उसने किसी अदृश्य चीज़ को धकेला हो। लेकिन ताबीज़ जलने लगा। और वह पार हो गई।
देवीदास का बंधन उसे रोक नहीं पाया। ताबीज़ की वजह से।
लेकिन जब वह जंगल में क़दम रखा, तो एक अजीब सी बात हुई। जंगल के पेड़ — जो कल तक हरे थे — अब पीले पड़ गए थे। पत्ते ज़मीन पर गिर रहे थे। पूरे जंगल में मौत की गंध थी।
आरोही ने ऊपर देखा। आसमान भी पीला था। जैसे बादलों में कोई जहर घुल गया हो।
तभी उसने एक और चीज़ देखी। पगडंडी पर उसके अपने क़दमों के अलावा किसी और के क़दमों के निशान थे। ताज़े। नंगे पैर के। जो उसके साथ-साथ चल रहे थे। लेकिन कोई पास नहीं था।
आरोही ने रुककर पीछे देखा।
पीछे कोई नहीं था।
फिर से चली। निशान फिर से बगल में बनते गए।
आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ लिया। ज़ोर से बोली, "जो भी हो, दूर हट।"
एक क्षण के लिए हवा रुक गई। पेड़ हिलना बंद हो गए। फिर एक बच्ची की हँसी। बहुत दूर से।
"दीदी, मैं तेरी दोस्त हूँ। तुलसी। मैं तुझे बचाना चाहती हूँ।"
आरोही ने कुछ नहीं कहा। बस चलती रही।
तुलसी की आवाज़ पीछे रह गई।
बाबा की शर्त
देवराज बाबा की झोपड़ी में सन्नाटा था। आरोही ने दरवाज़ा खटखटाया।
"आ जा।"
आरोही अंदर गई। बाबा उसी जगह बैठे थे। आग जल रही थी।
"बाबा।"
"बैठ।"
आरोही बैठ गई।
"बाबा, मैं जान गई हूँ कि श्राप कैसे टूटेगा।"
"बता।"
आरोही ने सब बताया। तहख़ाने में रुक्मिणी की मूर्तियों का बोलना। पंडित जी का सच। रुक्मिणी की चूड़ी की बात। पंडित जी की उँगली कटना।
बाबा ने ध्यान से सुना। कुछ नहीं बोले।
"बाबा, मुझे रुक्मिणी की चूड़ी चाहिए। तहख़ाने से। बिना ख़ून बहाए। क्या आप बता सकते हैं यह कैसे होगा?"
बाबा ने आँखें बंद कीं। बहुत देर तक चुप रहे। आग की लपटें उनके चेहरे पर परछाइयाँ बना रही थीं। एक क्षण के लिए आरोही को लगा कि बाबा के चेहरे पर दो चेहरे हैं। एक बूढ़ा। दूसरा जवान। दोनों एक साथ। जैसे दो लोग एक ही खोल में हों।
फिर धीरे से बोले, "बेटी, बता सकता हूँ। लेकिन एक शर्त है।"
आरोही ने कहा, "बताइए।"
बाबा ने अपनी आँखें खोलीं। उनकी आँखों में एक अजीब सी उदासी थी। लेकिन उसके पीछे कुछ और भी था। कोई इंतज़ार। जो 113 साल से बना हुआ था।
"बेटी, मेरी उम्र 133 साल है। मैं थक चुका हूँ। लेकिन मैं मरता नहीं। मैंने 1913 में एक साधना की थी। जिसमें मैंने अपनी मृत्यु को रोका था। मैं सोचता था कि जब तक मैं रुक्मिणी को मुक्त नहीं कर लूँगा, तब तक नहीं मरूँगा।"
आरोही ने चुपचाप सुनी।
"वो रात मुझे आज भी याद है। कौशल्या की शादी की एक रात पहले। मेरे गुरु ने मुझसे कहा था — 'बेटा, अभी तेरी उम्र नहीं है। तू यह साधना मत कर।' पर मैं जिद्दी था। बीस साल का था। मैंने सोचा — गुरु बूढ़े हैं, डरते हैं, मैं युवा हूँ, मैं जीत सकता हूँ।"
बाबा की आँखों में आँसू आ गए।
"मैंने साधना की। रुक्मिणी की आत्मा को बुलाया। मैंने सोचा उससे बात करूँगा। पर आई देवीदास। रुक्मिणी के रूप में। उसने मुझे धोखा दिया। मुझसे मेरी शक्ति ले ली। और मेरी जगह पर मेरी अपनी आत्मा को बाँध दिया। इसीलिए मैं मरता नहीं।"
आरोही ने पूछा, "तो आप — आप एक तरह से क़ैद हैं?"
"हाँ बेटी। मेरा अपना शरीर मेरा जेल है। और उस रात कौशल्या भी नहीं बची। मेरी ग़लती से।"
बाबा ने एक लंबी साँस ली। धुएँ की तरह उनकी साँस निकली।
"लेकिन मेरी साधना ने मुझे धोखा दिया। मैंने अपनी मृत्यु रोक दी। पर उसके साथ मैंने अपनी शक्ति भी बाँध दी। मैं तंत्र-मंत्र तो जानता हूँ, पर पूरा नहीं कर सकता। हर बार जब मैं देवीदास के ख़िलाफ़ कुछ करने की कोशिश करता हूँ, मेरी शक्ति टूट जाती है। क्योंकि मेरी अपनी साधना मुझे रोकती है।"
"तो क्या करना होगा?"
बाबा ने आरोही की तरफ़ देखा।
"बेटी, तेरहवीं अमावस से पहले, तुझे एक काम करना होगा। मेरी साधना तोड़नी होगी। तभी मैं तुझे तहख़ाने में चूड़ी निकालने में मदद कर सकूँगा।"
"आपकी साधना कैसे टूटेगी?"
बाबा ने कहा, "मुझे मुक्ति चाहिए। मौत। तू मुझे मौत दे। अपने हाथ से।"
आरोही ने चौंककर उन्हें देखा।
"बाबा... मैं आपको कैसे मार सकती हूँ?"
"बेटी, मैं 133 साल से जी रहा हूँ। मैंने अपनी सारी संतान, पत्नी, माँ-बाप, गुरु, दोस्त — सब मरते देखे हैं। अकेला रहा हूँ। कोई मेरी जगह मरने नहीं आता। मुझे मौत चाहिए। एक ईमानदार मौत। तेरहवीं के हाथ से। ताकि मेरी साधना टूटे, और मेरी आत्मा मुक्त हो।"
आरोही की आँखों में आँसू आ गए।
"बाबा, यह ग़लत है।"
"बेटी, कुछ भी ग़लत नहीं। यह मेरी अंतिम इच्छा है। और यह तेरा पहला बलिदान होगा। तुझे कई बार ऐसे फ़ैसले लेने होंगे जो ग़लत लगेंगे। लेकिन यही सही होंगे।"
आरोही ने कहा, "अगर मैं आपको ना मारूँ, तो श्राप नहीं टूटेगा?"
"टूट सकता है। बिना मेरे। लेकिन तब तुझे बहुत बड़ी क़ीमत चुकानी होगी।"
"क्या?"
"तेरी अपनी जान।"
आरोही चुप हो गई।
बाबा ने आगे कहा, "बेटी, दो रास्ते हैं। पहला — तू मुझे मार दे। मैं मुक्त हो जाऊँ। मेरी शक्ति तेरे पास आ जाए। तू तहख़ाने से चूड़ी निकाल। तेरहवीं अमावस को अंगूठी तोड़। मंत्र पढ़। सब मुक्त हों। तू ज़िंदा रहे।
"दूसरा — तू मुझे न मार। मेरी साधना बंधी रहे। तू ख़ुद तहख़ाने से चूड़ी निकाल। लेकिन उसकी क़ीमत तेरी अपनी उँगली या हाथ या पैर होगा। जैसे पंडित की उँगली गई। और अंत में जब तू अंगूठी तोड़ेगी, तो तेरी अपनी जान जाएगी। बलिदान तुझे देना पड़ेगा।"
आरोही ने पूछा, "तीसरा रास्ता नहीं है?"
बाबा ने सिर हिलाया, "नहीं। और यह भी याद रख — अगर तू पंडित पर विश्वास कर, जिसके पास वह मंत्र है जो तेरी जान बचा सकता है, तो पंडित तेरहवीं अमावस की रात तुझे धोखा दे सकता है। क्योंकि उसके परिवार का बंधन बहुत गहरा है। देवीदास उसे मजबूर कर सकता है।"
आरोही की उँगलियाँ काँप रही थीं।
"बाबा, मुझे सोचने का वक़्त चाहिए।"
"तेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं है, बेटी। नौ दिन। मैं यहीं हूँ। जब तेरा फ़ैसला हो जाए, तब आना।"
आरोही उठ खड़ी हुई।
"बाबा, एक और सवाल।"
"पूछ।"
"जंगल में एक औरत मिली थी। कहती है कि वह चंद्रा देवी है। मेरी नानी की बहन। लेकिन भगवती दादी कहती हैं कि चंद्रा देवी 1979 में मर चुकीं। वह कौन है?"
बाबा ने आँखें बंद कीं। कुछ देर सोचा।
"बेटी, मुझे उसकी बात पहली बार सुनी। जा और मिल। लेकिन एक चीज़ ले जा।"
बाबा ने एक कोने से एक छोटी सी शीशी निकाली। उसमें एक लाल पानी था।
"यह सिंदूर की पिघली हुई शक्ति है। मंत्र से बंधी। अगर वह असली इंसान होगी, तो कुछ नहीं होगा। अगर वह भूत होगी, तो जल जाएगी।"
आरोही ने शीशी ली।
"बाबा, अगर वह भूत निकली, तो क्या करूँ?"
"भाग जा। वापस मत आना। और उससे कुछ मत सीख।"
जंगल में
आरोही बाबा की झोपड़ी से निकली। चंद्रा देवी ने कहा था कि उनकी कुटिया एक कोस दूर है। एक कोस — यानी लगभग तीन किलोमीटर।
रास्ते में जंगल घना होता गया। पेड़ ऊँचे। धूप कम। हवा ठंडी। लेकिन आज हवा में एक और चीज़ थी।
गंध।
फूलों की। लेकिन अजीब सी। जैसे कब्रिस्तान के फूलों की।
आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ा। शीशी दूसरे हाथ में।
एक जगह जंगल थोड़ा साफ़ हुआ। एक छोटी सी झोपड़ी दिखी। मिट्टी की। बिल्कुल बाबा की झोपड़ी जैसी। लेकिन बाहर एक छोटा सा बग़ीचा था। तुलसी के पौधे। गेंदे के फूल। एक सफ़ेद कुत्ता बरामदे में सो रहा था।
आरोही झोपड़ी के पास गई। कुत्ता आँख खोलकर उसकी तरफ़ देखा। लेकिन भौंका नहीं। बस पूँछ हिलाई। लेकिन आरोही ने ग़ौर किया — कुत्ते की आँखें पीली थीं। सामान्य कुत्तों की आँखें ऐसी नहीं होतीं।
"चंद्रा दादी?"
अंदर से आवाज़ आई। "आ जा बेटी।"
आरोही अंदर गई।
अंदर एक साधारण कमरा था। बीच में एक चारपाई। चंद्रा देवी उस पर बैठी थीं। वही सफ़ेद साड़ी। वही लाठी। वही मुस्कान। कमरे में तुलसी के धुएँ की गंध थी। लेकिन धुएँ के पीछे एक और गंध थी। मिट्टी की। गीली मिट्टी। कब्र वाली मिट्टी।
"बेटी, तू आ गई।"
आरोही ने ग़ौर से देखा।
चंद्रा देवी की परछाईं ज़मीन पर थी। कुत्ता उन्हें देख रहा था — शांति से। तुलसी के पौधे हरे थे।
लेकिन एक बात थी।
चंद्रा देवी की आँखें आज थोड़ी अलग थीं। कल भूरी थीं। आज हरी।
आरोही ने कल की मुलाक़ात याद की। कल चंद्रा देवी की आवाज़ में एक हल्की सी कँपकँपी थी। आज कोई कँपकँपी नहीं। आवाज़ स्थिर। लगभग बहुत ज़्यादा स्थिर। किसी बूढ़ी औरत की आवाज़ नहीं। किसी युवा की आवाज़।
आरोही ने अपने हाथ में शीशी को हल्के से हिलाया। एक बूँद ज़मीन पर गिरा दी। हल्के से।
कमरे में कोई आवाज़ नहीं हुई।
चंद्रा देवी हँसीं। "बेटी, तूने पानी क्यों गिराया?"
आरोही चौंकी। तो चंद्रा देवी असली थीं?
पर आँखें? पर आवाज़?
आरोही ने दूसरी बूँद गिराई। इस बार चंद्रा देवी के पैर के पास।
कुछ हुआ।
चंद्रा देवी के पैर से नीचे — जहाँ बूँद गिरी थी — वहाँ धुआँ उठने लगा। जलने की गंध। बहुत तेज़। जैसे कोई शरीर जल रहा हो।
चंद्रा देवी की मुस्कान ग़ायब हुई।
उन्होंने आरोही की तरफ़ देखा।
"तू बहुत होशियार है, बेटी।"
फिर उनका चेहरा बदलने लगा। सफ़ेद बाल काले हुए। झुर्रियाँ हटीं। उम्र कम हुई। अस्सी की जगह अठारह। सफ़ेद साड़ी लाल जोड़े में बदली। हाथों में मेहँदी। मेहँदी ताज़ी थी। जैसे अभी लगाई हो।
रुक्मिणी।
चंद्रा देवी नहीं थीं। रुक्मिणी थी। सारा वक़्त।
आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ा। ताबीज़ अब बहुत गरम था। हाथ जल रहा था। लेकिन उसने नहीं छोड़ा।
रुक्मिणी उठ खड़ी हुई। अठारह साल की एक सुंदर लड़की। लेकिन उसकी आँखें पूरी काली थीं। बिना पुतली की। जैसे किसी ने आँखों की जगह दो काले पत्थर जड़ दिए हों।
आरोही ने पीछे हटने की कोशिश की। लेकिन झोपड़ी का दरवाज़ा ग़ायब हो चुका था। जिस दरवाज़े से वह अंदर आई थी, वहाँ अब एक दीवार थी। पत्थर की।
"दीदी, मैं मजबूर हूँ। मुझे तुझसे मिलना ही था। लेकिन जिस रूप में मैं आती, तू डर जाती। इसीलिए मैंने चंद्रा नानी का रूप लिया।"
आरोही ने पूछा, "तुम इतनी बार झूठ क्यों बोल रही हो?"
रुक्मिणी की आँखों में आँसू आए। असली आँसू। जो गालों पर बहते नहीं। जो बस चमकते हैं।
"क्योंकि दीदी, अगर मैं सच बोलूँ, तो तू मुझे नहीं मानेगी।"
"क्या सच?"
रुक्मिणी ने कहा, "मैं ख़ुद देवीदास हूँ।"
देवीदास का असली रूप
आरोही की आँखें फैलीं। ताबीज़ की जलन बढ़ गई।
"क्या?"
रुक्मिणी की आवाज़ बदली। मीठी लड़की की आवाज़ अब गहरी, पुरुष की हो गई।
"मैं रुक्मिणी नहीं हूँ, बेटी। मैं देवीदास हूँ। 1857 से रुक्मिणी का रूप धरे हूँ। मैंने रुक्मिणी को नहीं मारा। मैं ख़ुद रुक्मिणी बन गया।"
आरोही ने पीछे हटने की कोशिश की। लेकिन उसके पैर जम गए थे। जैसे किसी ने ज़मीन में कील ठोंक दी हो।
"मैं दो शरीरों में रहता हूँ, बेटी। एक — रुक्मिणी के रूप में तहख़ाने में। दूसरा — विक्रम, देवदत्त, या जो भी नाम मैं उस समय के लिए रखता हूँ। दो शरीर। एक ही आत्मा।"
आरोही ने काँपते हुए पूछा, "तो बारह लड़कियाँ?"
"वे सब मेरी दुल्हनें हैं। हर तेरह साल पर मुझे एक नई ताज़ी दुल्हन चाहिए। ताकि मेरी शक्ति बनी रहे। और अब तेरहवीं की बारी है।"
"तो अंगूठी वाली बात?"
"झूठ थी। मुझे कोई अंगूठी नहीं बाँधती। मैं आज़ाद हूँ। और तू — तू आज मेरी दुल्हन बनने वाली है।"
रुक्मिणी — यानी देवीदास — ने आरोही की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
लेकिन ताबीज़ ने ज़ोर से एक ज्वाला निकाली। एक चीख़ गूँजी। रुक्मिणी पीछे हटी।
"तू ताबीज़ को हमेशा नहीं पहनेगी, बेटी। एक दिन तू सो जाएगी।"
आरोही ने अपने बैग से भगवती देवी की छुरी निकाली। हवा में लहराई।
"अगर तुम असली देवीदास हो, तो मैं तुम्हें अभी मार सकती हूँ।"
रुक्मिणी हँसी। बच्चों जैसी हँसी। लेकिन इस हँसी में अब कुछ बदल गया था। पहले वह कोमल थी। अब जहरीली।
"बेटी, मैं भूत हूँ। मुझे छुरी से नहीं मार सकती।"
लेकिन आरोही ने छुरी नीचे नहीं की। उसने ताबीज़ को छुरी के हैंडल पर रगड़ा। तांबे का ताबीज़ लोहे की छुरी पर लगा। एक अजीब सी नीली रोशनी निकली।
रुक्मिणी की आँखें फैलीं। पहली बार उसमें डर दिखा।
"तू यह कहाँ से जान गई?"
आरोही ने कुछ नहीं कहा। बस छुरी को हवा में लहराया।
"अगर तू सचमुच देवीदास है, तो यह मंत्र-बद्ध छुरी तुझे कुछ न कुछ तो नुक़सान पहुँचाएगी।"
आरोही ने छुरी को रुक्मिणी की तरफ़ फेंका।
छुरी हवा में उड़ी। रुक्मिणी के कंधे को छूती हुई निकल गई। लेकिन जब वह छुई, तो रुक्मिणी की चीख़ पूरे जंगल में गूँज गई। उसके कंधे से एक धुँआ निकला। जैसे किसी ने वहाँ तेज़ाब डाला हो।
रुक्मिणी हवा में घुल गई। धुएँ की तरह। पर जाते-जाते एक बात कही —
"तू ग़लती कर रही है, दीदी। मैं देवीदास नहीं थी। मैंने बस यह इसलिए बोला ताकि तू मुझ पर विश्वास न करे। ताकि तू ख़ुद फ़ैसला ले। अब तेरा फ़ैसला हो गया। तूने पंडित पर विश्वास कर लिया।
"पर याद रख — पंडित का बेटा जल्दी ही अपने पिता की जगह लेगा। और वह देवीदास से भी ख़तरनाक होगा।"
आरोही अकेली रह गई।
लेकिन जब उसने अपने आस-पास देखा, तो झोपड़ी भी नहीं थी। कोई कुत्ता नहीं। कोई तुलसी नहीं। बस एक खुला हुआ जंगल का हिस्सा। और एक पुरानी टूटी हुई क़ब्र। जिस पर एक नाम खुदा था।
चंद्रा देवी। 1926-1979।
आरोही ने ठंडी हवा में एक साँस ली।
छुरी ज़मीन पर पड़ी थी। उसने उठाई। पोंछी। बैग में डाली।
अब उसे नहीं पता था कि सच क्या है। रुक्मिणी अभी कह रही थी — 'मैं देवीदास हूँ।' पर जाते-जाते बोली — 'नहीं थी।'
तीन झूठ में एक सच। और वह सच तेरहवीं अमावस को ही पता चलेगा।
आरोही जंगल से बाहर निकली। लेकिन जब वह गाँव के छोर पर पहुँची, तो एक और आदमी उसका इंतज़ार कर रहा था। एक जवान लड़का। शायद 28-29 साल का। पंडित जी के नक़्श जैसे। लेकिन आँखें बहुत उदास।
"आरोही जी?"
आरोही रुकी। "जी?"
"मैं आर्यन शर्मा हूँ। पंडित राधेश्याम का बेटा। आप मुझसे बात कर सकती हैं?"
आरोही ने उसे ग़ौर से देखा। आर्यन बहुत साधारण कपड़ों में था। एक नीली कमीज़, एक जींस। शहर का लगता था। लेकिन उसके चेहरे पर एक ऐसी थकान थी जो 28-29 साल के आदमी में नहीं होनी चाहिए। जैसे वह जीवन भर बीमार रहा हो।
"आपने मुझे कैसे पहचाना?"
"मेरे पिताजी ने आज सुबह बताया। मैं जानता था कि आप बाबा के पास गई थीं। मैं जंगल के बाहर आपका इंतज़ार कर रहा था।"
"क्यों?"
आर्यन ने आस-पास देखा। कोई नहीं था। लेकिन उसकी आँखों में डर था।
"आरोही जी, यहाँ बात करने की जगह नहीं। पर मैं आपको कुछ बताना चाहता हूँ। जो मेरे पिताजी नहीं बता सके।"
"क्या?"
"आपको लगता है पिताजी मजबूर हैं। बंधन में हैं। यह पूरा सच नहीं है। बंधन तो है। लेकिन पिताजी ख़ुद भी देवीदास की सेवा में हैं। अपनी मर्ज़ी से। पिछले चालीस साल से।"
आरोही चौंकी। "क्या?"
"मैंने ख़ुद देखा है। आठ साल पहले, जब मैं बीस साल का था। पिताजी ने रात में एक साधना की थी। देवीदास के लिए। मैंने खिड़की से देखा। और आज तक चुप रहा।"
"तुम्हारे पिताजी क्यों करेंगे यह?"
आर्यन ने नीचे देखा।
"क्योंकि पिताजी को अमरता चाहिए। श्राप उनका बंधन नहीं है। वह उनका सौदा है।"
आरोही की सारी दुनिया हिल गई।
पंडित जी भी झूठ बोल रहे थे।
"और मैं?" आर्यन ने कहा। "मैं मरने वाला हूँ। जल्दी। इसीलिए मैं आपको सच बता रहा हूँ। ताकि मरने से पहले एक अच्छा काम कर लूँ।"
आरोही ने पूछा, "तुम्हें कैसे पता कि तुम मरने वाले हो?"
आर्यन ने अपनी कमीज़ की बाईं आस्तीन ऊपर की। कंधे तक। वहाँ एक निशान था। एक जला हुआ निशान। बिल्कुल वही त्रिकोण जिसमें एक आँख। जो आज सुबह गाँव के हर दरवाज़े पर बना था।
"यह निशान पिछले हफ़्ते ख़ुद बन गया। पहले एक बिंदी थी। फिर त्रिकोण। कल आँख आ गई। मुझे पिताजी ने बताया कि जब यह निशान पूरा हो जाता है, तब हमारे परिवार के बड़े बेटे की मौत हो जाती है।"
आरोही की आँखों में आँसू आ गए।
"पर तुम्हारे पिताजी ने तो कहा उनके पास कुछ महीने हैं।"
"पिताजी ने झूठ बोला। सच यह है कि वह शायद कभी नहीं मरने वाले। क्योंकि उन्होंने देवीदास से अपनी अमरता का सौदा किया है। मरना मैं हूँ। सिर्फ़ मैं।"
आर्यन ने अपनी कमीज़ नीचे की।
"आरोही जी, मेरे पास एक चीज़ है। जो शायद आपके काम आ जाए।"
उसने अपनी जेब से एक छोटी सी लाल पोटली निकाली। धीरे से खोली।
अंदर एक टूटी हुई चूड़ी थी। लाल। बहुत पुरानी।
आरोही ने चौंककर देखा।
"यह... क्या यह रुक्मिणी की?"
"नहीं। लेकिन उससे जुड़ी है। यह उस बहन की चूड़ी है जिसने मेरे पिताजी के साथ सौदा तोड़ने की कोशिश की थी। तुलसी। 1883 की तुलसी। मेरी परदादी ने इसे बरसों तक अपने कमरे में छिपाकर रखा था। मरने से पहले उन्होंने मुझे दी थी। कहा था — 'जब कोई तेरहवीं आए, तो उसे देना।'"
आरोही ने चूड़ी अपने हाथ में ली। अचानक उसके हाथ में एक झनझनाहट हुई। जैसे बिजली दौड़ी। और चूड़ी उसकी हथेली में गरम हो गई।
आर्यन ने कहा, "आरोही जी, कल रात मुझे एक सपना आया। तुलसी आई थी। बोली — 'चूड़ी तेरहवीं को दे। और उसे बताना — रुक्मिणी और देवीदास एक ही आत्मा नहीं हैं। वे दो अलग आत्माएँ हैं। पर एक ही शरीर में क़ैद हैं। जिसे तेरहवीं तोड़ेगी।'"
आरोही की आँखें फैलीं।
एक शरीर में दो आत्माएँ?
अब तो और उलझन हो गई।
"मुझे तुम्हारे साथ चलना होगा," आरोही ने कहा। "तुम्हारी पूरी बात सुननी होगी।"
आर्यन ने कहा, "अभी नहीं। पिताजी को शक हो जाएगा। कल दोपहर मैं गाँव के बाहर वाले टीले पर आऊँगा। वहीं मिलना।"
आर्यन जाने के लिए मुड़ा।
"आर्यन," आरोही ने पीछे से आवाज़ दी।
"जी?"
"तुम अपनी माँ के बारे में बताना कल। तुम्हारी माँ का एक पैर नहीं है। यह भी देवीदास ने किया?"
आर्यन एक क्षण के लिए रुका। उसकी आँखों में एक अजीब सी उदासी आई।
"नहीं आरोही जी। यह मेरे पिताजी ने किया। बहुत साल पहले। ताकि माँ कभी उन्हें छोड़कर न जा सकें।"
वह चला गया।
आरोही एक क्षण के लिए वहीं खड़ी रह गई।
पंडित जी अपनी पत्नी का पैर भी काट सकते हैं। तो वह और क्या-क्या कर सकते हैं?
आरोही ने अपने हाथ में तुलसी की चूड़ी देखी।
अब वह जानती थी — कोई भी पूरा सच नहीं बोल रहा। हर एक अपने-अपने फ़ायदे की बात कर रहा है।
पर एक बात साफ़ थी।
रुक्मिणी और देवीदास एक साथ हैं। कहीं। किसी शरीर में।
और उस शरीर को उसे ढूँढ़ना होगा।
नौ दिनों में।

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