PretikaPsychological Horrorतेरहवीं अमावस

भाग 5 : पंडित का सच और मीरा की छिपी पेटी

Piyashi Atma · Psychological Horror · 17 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
5 of 23
Category
Psychological Horror
Reading time
17 min
Words
3330
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

तेरहवीं अमावस
भाग 5 : पंडित का सच और मीरा की छिपी पेटी
तीसरी रात
आरोही उस रात कमरे में गई तो बदन थका हुआ था। हथेली की जलन बढ़ती जा रही थी। छाला पीले पानी से भर गया था। लेकिन उसकी नींद उड़ी हुई थी।
डायरी उसके सामने खुली थी। तीन हस्तलिपियाँ। तीन आवाज़ें। हर एक कह रही थी कि बाक़ी झूठ बोल रहे हैं।
आरोही ने अपने नोटबुक में एक तालिका बनाई।
पहला कॉलम — व्यक्ति। दूसरा कॉलम — दावा। तीसरा कॉलम — शक की वजह।
रुक्मिणी: दावा कि वह ख़ुद क़ैद है, अंगूठी तोड़ो तो सब मुक्त। शक की वजह — 156 साल से बारह लड़कियों को अपनी तरफ़ खींच रही है।
चंद्रा (जो दिखी वह): दावा कि रुक्मिणी झूठ बोल रही है, अंगूठी तोड़ने वाली भी मरेगी। शक की वजह — असली चंद्रा 1979 में मर चुकीं।
देवराज बाबा: दावा कि दोनों झूठ बोल रही हैं, बिना बलिदान के श्राप टूटेगा। शक की वजह — 113 साल से नाकाम, कौशल्या को नहीं बचा पाए।
विक्रम त्रिपाठी: नाम भी असली नहीं, चेहरा भी नहीं। पर आया क्यों?
आरोही ने पेन नीचे रखा।
एक बात साफ़ थी। हर एक अपनी तरफ़ से कुछ न कुछ चाहता था। और कोई भी पूरा सच नहीं बता रहा था।
लेकिन इनमें से एक बात सबसे संदिग्ध थी। "चंद्रा" कहती है — रुक्मिणी झूठ बोल रही है। पर तब भी वह आरोही से यह नहीं कहती कि श्राप कैसे तोड़ें। बस इतना कहती है कि "अंगूठी मत तोड़ो, नहीं तो मर जाओगी।" तो फिर बचने का रास्ता क्या है? वह क्यों नहीं बताती?
क्योंकि शायद उसे नहीं बचाना है। शायद उसे सिर्फ़ आरोही को भ्रम में डालना है। ताकि तेरहवीं अमावस की रात आरोही कुछ न कर सके। और चुपचाप देवीदास के हाथ लग जाए।
आरोही ने अपनी माँ को SMS किया — "माँ, चंद्रा नानी की एक बेटी थी क्या? कमला त्रिपाठी नाम?"
फ़ोन एक मिनट तक चुप रहा। फिर जवाब आया।
"हाँ बेटी। लेकिन तू कैसे जानती है?"
आरोही ने जवाब नहीं दिया। बस फ़ोन नीचे रखा।
तो चंद्रा की बेटी सचमुच थी। भगवती देवी सही कह रही थीं।
रात के ग्यारह बज गए। खिड़की के बाहर से हवा की आवाज़ आ रही थी। लेकिन आज वह हवा शांत थी। मानो कोई आज सोने दे रहा हो।
आरोही ने ताबीज़ हाथ में लेकर आँखें बंद कीं।
पर नींद कहाँ आती। शरीर थका था, लेकिन दिमाग़ चल रहा था।
तभी उसने एक अजीब सी बात महसूस की। कमरे का तापमान गिर गया था। पहले हल्की ठंड थी। अब अचानक बहुत ज़्यादा ठंड। जैसे किसी ने बर्फ़ के टुकड़े कमरे में बिखेर दिए हों।
आरोही ने आँखें खोलीं।
दीये की लौ अब बहुत छोटी थी। जल तो रही थी, लेकिन एक अजीब सी नीली रोशनी। जैसी नीली रोशनी शमशान में जलती लाश की आग की होती है।
कमरे के कोने में कुछ खड़ा था।
एक बच्ची।
शायद आठ-नौ साल की। सफ़ेद फ़्रॉक। लंबे बाल। चेहरा दीवार की तरफ़।
आरोही ने ताबीज़ को कसकर पकड़ा।
बच्ची धीरे से पलटी।
उसका चेहरा नहीं था। बस एक सपाट सतह। जैसे किसी ने चेहरा मिटा दिया हो। लेकिन उस सपाट सतह पर एक मुँह खुला था। बहुत बड़ा। और उस मुँह से एक ही आवाज़ आ रही थी।
"मैं तुलसी हूँ। 1883 की तुलसी। मैंने भी तेरे जैसा शक किया था। दीदी, शक मत कर। रुक्मिणी सच बोल रही है।"
आरोही ने आँखें बंद कर लीं।
लेकिन अगले पल एक और आवाज़ आई। कमरे के दूसरे कोने से।
"मैं लक्ष्मी हूँ। 1896 की। रुक्मिणी झूठ बोल रही है। उसकी बात मत मान।"
फिर तीसरी।
"मैं कौशल्या हूँ। 1913 की। देवराज बाबा ने मुझे बचाने की कोशिश की थी। बाबा पर विश्वास कर।"
फिर चौथी। पाँचवीं। छठी।
बारह आवाज़ें। सब एक साथ। हर एक कुछ अलग कह रही थी।
आरोही ने अपना मुँह बंद रखा। कान बंद किए। लेकिन आवाज़ें कान से नहीं, सीधे उसके दिमाग़ में आ रही थीं।
फिर एक तेरहवीं आवाज़। सब से ऊँची। सब पर हावी।
"चुप हो जाओ सब। दीदी को मैं ख़ुद समझाऊँगी।"
रुक्मिणी।
बाक़ी सब आवाज़ें एक साथ रुक गईं। जैसे किसी ने रेडियो बंद कर दिया हो।
फिर रुक्मिणी की आवाज़, बहुत धीमी, कान के पास।
"दीदी, इन सबकी बात मत सुन। ये बहनें मेरी क़ैद में हैं। इनसे उसने ये बुलवाया है। असल में ये कुछ नहीं जानतीं। बस मैं जानती हूँ। और तू। कल पंडित के पास मत जा। पंडित हमारा दुश्मन है।"
आरोही ने आँखें नहीं खोलीं।
धीरे-धीरे कमरे का तापमान वापस सामान्य हुआ। नीली रोशनी पीली हुई। कमरा फिर से सामान्य।
लेकिन आरोही की पीठ पर पसीना बह रहा था। एक बात साफ़ हो गई थी।
रुक्मिणी नहीं चाहती थी कि वह पंडित जी से मिले।
तो पंडित जी के पास कुछ है। जो रुक्मिणी को नुक़सान पहुँचा सकता है।
आरोही ने फ़ैसला किया। कल सुबह वह पंडित जी के पास ज़रूर जाएगी।
लेकिन तभी नीचे भगवती देवी की आवाज़ आई।
"बेटी, नीचे आ। एक चीज़ दिखानी है।"
मीरा की पेटी
आरोही नीचे उतरी। भगवती देवी अपने कमरे में बैठी थीं। सामने एक पुरानी लकड़ी की पेटी थी। पीतल के पल्ले। छोटी। शायद जूते के डिब्बे जितनी।
"यह क्या है दादी?"
"मीरा की। उसने अपनी शादी की तैयारी में यह छिपाकर रखी थी। मुझे नहीं बताया था। मीरा के गुम होने के बाद, तीन महीने बाद, यह मुझे उसकी अलमारी के पीछे मिली। मैंने कभी नहीं खोली।"
"क्यों?"
"डर था। लेकिन आज तूने पूछा — मीरा का विक्रम कौन था। और मुझे लगा कि इसका जवाब शायद इसी में हो।"
भगवती देवी ने पेटी आरोही की तरफ़ बढ़ाई।
"तू खोल। मुझसे नहीं होगा।"
आरोही ने पेटी अपनी गोद में ली। पीतल के पल्ले पर एक छोटा सा ताला था। लेकिन ताला खुला हुआ था। शायद मीरा ने कभी बंद ही नहीं किया था।
पेटी खोली।
अंदर कुछ चीज़ें थीं। एक पुरानी शादी की फ़ोटो — मीरा और उसके होने वाले पति की। एक चाँदी की पायल — शादी की। एक छोटी सी डायरी। और एक लिफ़ाफ़ा।
आरोही ने पहले डायरी उठाई। खोली। मीरा की हस्तलिपि।
डायरी के अंत में एक ही पन्ना लिखा था। ताज़ी स्याही में। शायद मीरा ने अपनी शादी की रात यह लिखा था।
"आज पहली बार मुझे यह गाँव अजनबी लग रहा है। कल शादी है। सब ख़ुश हैं। माँ ख़ुश हैं। लेकिन कल रात से एक अजीब सी बात हो रही है। एक औरत मेरे सपनों में आती है। कहती है कि मेरी असली माँ वो है। और वो मुझे लेने आ रही है।
आज दोपहर पंडित राधेश्याम जी के घर एक आदमी आया। नया आदमी। ना जाने कहाँ का। पंडित जी ने बताया कि यह उनका दूर का रिश्तेदार है। नाम है — देवदत्त। मुझे उसकी आँखें बहुत अजीब लगीं। जैसे उन्होंने बहुत कुछ देखा हो। जैसे उनमें बहुत पुरानी उम्र हो।
पंडित जी ने कल शाम माँ को एक बात कही। मैं सुन ली। पंडित जी ने कहा — 'बहनजी, आपकी बेटी की शादी को मैं शायद अपने हाथ से नहीं करा पाऊँगा। मुझसे एक ग़लती हो गई है।' माँ ने पूछा क्या ग़लती। पंडित जी बोले — 'मैंने एक ऐसी चीज़ को घर में जगह दी है जो मुझे नहीं देनी चाहिए थी।'
माँ ने ज़्यादा नहीं पूछा। पर मुझे लगा कि पंडित जी उसी देवदत्त की बात कर रहे थे।
कल शादी है। लेकिन मुझे लग रहा है कि मैं शायद कल नहीं जीऊँगी।"
आरोही ने डायरी बंद कर दी।
देवदत्त। एक और नाम। लेकिन बात एक ही थी। हर तेरह साल पर देवीदास एक नए नाम के साथ इसी गाँव में आता है। पंडित के घर रुकता है। और शादी से एक रात पहले अपनी शिकार को उठा लेता है।
अब समझ आया। पंडित राधेश्याम शर्मा। हर बार वह उसे अपने घर जगह देता है।
क्यों?
आरोही ने लिफ़ाफ़ा उठाया। खोला।
अंदर एक चिट्ठी थी। मीरा की हस्तलिपि में।
"अगर मुझे कुछ हो जाए, तो मेरी माँ को यह चिट्ठी दिखाना।
माँ, मुझे माफ़ करना। मुझे लग रहा है कि पंडित राधेश्याम कुछ छिपा रहे हैं। मैंने उन्हें एक रात अपनी दुकान में देवदत्त के साथ मंत्र बोलते सुना। पंडित जी की आवाज़ काँप रही थी। जैसे वे मजबूर हों। जैसे कोई उन्हें कुछ करने पर मजबूर कर रहा हो।
मेरी शादी के बाद, अगर मैं मर गई या गुम हो गई, तो पंडित जी से पूछना — क्या उन्होंने मुझे बचाने की कोशिश की? क्या उनके परिवार पर भी कोई श्राप है?
मैं जो देख रही हूँ, अगर सच है, तो पंडित जी हमारे परिवार के दुश्मन नहीं हैं। लेकिन वे मजबूर हैं। किसी बहुत पुरानी बात से। कोई ग़ुलामी। कोई क़र्ज़।
माँ, इस चिट्ठी को पंडित जी को दिखाना। उन्हें बताना कि मीरा जानती थी। और उन्हें मुक्त करना।"
आरोही ने चिट्ठी नीचे रखी।
भगवती देवी ने पूछा, "क्या लिखा है?"
आरोही ने चिट्ठी उन्हें पढ़ाई। भगवती देवी की आँखों से आँसू बह रहे थे।
"मैंने पंडित जी से कभी नहीं पूछा। मुझे उन पर गुस्सा था। मीरा की शादी उन्होंने ही अटकाई थी शायद। लेकिन... लेकिन अगर मीरा सच कह रही थी..."
"दादी, कल सुबह हम पंडित जी के पास चलेंगे।"
"बेटी, विक्रम भी वहीं है।"
"मुझे पता है। लेकिन शायद इसी वजह से हमें जाना होगा। पंडित जी शायद हमें बहुत कुछ बता सकते हैं।"
पंडित राधेश्याम
सुबह आठ बजे आरोही और भगवती देवी पंडित राधेश्याम के घर पहुँचीं। घर गाँव के बीच में था। एक बड़ा दो-मंज़िला मकान। बरामदे में तुलसी के चार पौधे। लेकिन उन में से दो सूख चुके थे। बाक़ी दो पीले पड़ गए थे।
पंडित जी बरामदे में बैठे थे। एक बूढ़े आदमी। शायद सत्तर साल के। सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद धोती। माथे पर तिलक। लेकिन आँखें थकी हुई। जैसे कई रातों से नहीं सोए।
आरोही ने प्रणाम किया।
"पंडित जी, मुझे आपसे कुछ पूछना है।"
पंडित जी ने ऊपर देखा। आरोही को पहचानने की कोशिश की। लेकिन जब उनकी नज़र भगवती देवी पर पड़ी, तो उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"भगवती... तू... तू क्यों आई है?"
"राधेश्याम, यह लड़की तेरहवीं है। और इसे तेरा जवाब चाहिए।"
पंडित जी ने अपना सिर झुका लिया। बहुत देर तक चुप रहे।
फिर बोले, "अंदर आओ। सामने के कमरे में। विक्रम अभी नहीं है। वो जंगल गया है।"
तीनों अंदर गए। एक बैठक के कमरे में। पुराने दरवाज़े। धूल भरी शेल्फ़। एक कोने में एक पुरानी लकड़ी की मूर्ति। शायद किसी देवी की। लेकिन उसका चेहरा भी टूटा हुआ था। बिल्कुल मंदिर की मूर्ति की तरह।
पंडित जी ने आरोही की तरफ़ देखा।
"बेटी, तू क्या जानती है?"
आरोही ने मीरा की चिट्ठी उन्हें दी।
पंडित जी ने चिट्ठी पढ़ी। और उनके हाथ काँपने लगे। आँखों में आँसू आ गए।
"बेटी, मीरा को मैं बचा नहीं सका। और अब तुझे भी शायद नहीं बचा पाऊँगा। लेकिन मैं तुझे सच बताऊँगा।"
"बताइए।"
पंडित जी ने एक लंबी साँस ली।
"मेरा परिवार 1857 से देवीदास की सेवा में है। मेरे परदादा के परदादा रुक्मिणी की शादी के पुजारी थे। जिस रात रुक्मिणी की शादी होनी थी, उस रात देवीदास ने मेरे पूर्वज को धमकाया। कहा कि अगर वे रुक्मिणी को छिपाकर नहीं ले आए, तो उनके पूरे परिवार को मार डालेगा।"
आरोही ने चुपचाप सुनी।
"मेरे पूर्वज मजबूर थे। उन्होंने रुक्मिणी को ले जाकर देवीदास को सौंप दिया। उसी तहख़ाने में। जहाँ उसने रुक्मिणी की हत्या की।"
पंडित जी की आँखों में आँसू लगातार बह रहे थे।
"रुक्मिणी की चूड़ियाँ मैंने ख़ुद देखी हैं। एक बार। बचपन में। मेरे पिताजी मुझे मंदिर के तहख़ाने में ले गए थे। मुझे दिखाया था। कहा था — 'बेटा, हमारा परिवार इन चूड़ियों की रक्षा करता है। ताकि कोई इन्हें न ले जा सके।' मैंने पूछा — 'क्यों?' पिताजी ने कहा — 'क्योंकि अगर पहली चूड़ी किसी कुँआरी के हाथ लग गई, तो श्राप टूट जाएगा। और हम सब मुक्त हो जाएँगे।'"
आरोही ने सिर हिलाया।
"लेकिन पिताजी ने ऐसा क्यों कहा? आपको तो श्राप से मुक्ति चाहिए थी।"
"बेटी, यहीं तो चालाकी है। पिताजी को नहीं पता था। पिताजी को ऐसा बताया गया था कि हम मंदिर की रक्षा कर रहे हैं। हमें बताया गया कि रुक्मिणी की चूड़ी अगर बाहर गई, तो पूरा गाँव नष्ट हो जाएगा।"
"किसने बताया?"
"देवीदास ने। हर पीढ़ी में। हर बार जब वह नए शरीर में आता है, वह हमारे पंडित परिवार को भ्रम में डालता है। हमें रक्षक बनाता है। ताकि हम ख़ुद ही उसकी सुरक्षा करते रहें। और श्राप टूटे नहीं।"
पंडित जी की आवाज़ काँप रही थी।
"मुझे यह सब बहुत बाद में समझ आया। लगभग बीस साल पहले। तब से मैं देवीदास से नफ़रत करता आया हूँ। लेकिन मेरे परिवार का बंधन तोड़ना मेरे हाथ में नहीं था।"
आरोही ने पूछा, "तो आपने रुक्मिणी की चूड़ी अभी तक क्यों नहीं तोड़ी?"
"बेटी, मैंने कोशिश की। एक रात, चालीस साल पहले, मैं तहख़ाने में गया। मैंने चूड़ी उठाई। बाहर लाने की कोशिश की।"
"फिर?"
पंडित जी ने अपनी बायीं हाथ की उँगली उठाई। उँगली नहीं थी। सिर्फ़ ठूंठ।
"तहख़ाने से चूड़ी तो निकल आई। लेकिन जैसे ही मैं मंदिर से बाहर निकला, मेरी उँगली अपने आप कट गई। ख़ून की एक बूँद ज़मीन पर गिरी। उसी क्षण चूड़ी मेरे हाथ से ग़ायब हो गई। वापस तहख़ाने में। और मेरे बेटे को उसी रात हृदयाघात हुआ। तब उसकी उम्र सिर्फ़ छह साल थी।"
आरोही की साँसें रुक गईं।
"तो इसीलिए आपने फिर कोशिश नहीं की।"
"हाँ। लेकिन अब हालात अलग हैं। तेरहवीं आ चुकी है। और मेरा बेटा 28 साल का है। अगले महीने वह 29 का हो जाएगा। मेरा पिता 32 में गया था। मेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं है।"
पंडित जी ने आरोही की तरफ़ देखा।
"बेटी, अगर मेरा बेटा भी उसी उम्र में मरा, तो हमारा वंश ख़त्म हो जाएगा। मेरा एक ही बेटा है। और मेरे भाई की कोई औलाद नहीं है। हमारा पंडित परिवार ख़त्म हो जाएगा। लेकिन शायद यह अच्छा हो। शायद देवीदास का पंडित-बंधन भी ख़त्म हो जाएगा।"
"नहीं पंडित जी। मैं आपके परिवार को बचाऊँगी। और अपने आप को भी।"
"रुक्मिणी ने मरने से पहले सिर्फ़ देवीदास को श्राप नहीं दिया। मेरे पूर्वज को भी दिया। उसने कहा — 'तेरे परिवार का हर पुजारी हमेशा देवीदास की सेवा में रहेगा। जब तक तेरहवीं आकर मुक्त न करे। तब तक तेरे परिवार का हर बड़ा बेटा जवानी में मरेगा।'"
आरोही ने पूछा, "यह श्राप सच है?"
पंडित जी ने सिर हिलाया।
"मेरे पिताजी 32 साल की उम्र में मर गए। दादाजी 28 में। परदादा 30 में। मेरा बेटा — शायद उसे नहीं पता — लेकिन वह भी 28 साल का है। मेरे पास ज़्यादा वक़्त नहीं है। मैं शायद अगले कुछ महीनों में मर जाऊँगा।"
"तो आपने आज तक इसे तोड़ने की कोशिश नहीं की?"
"क्यों नहीं की। बहुत की। लेकिन देवीदास ने मेरे परिवार को एक बंधन में बाँधा है। जिस दिन मैं उसके ख़िलाफ़ काम करता हूँ, उस दिन मेरे परिवार का कोई सदस्य बीमार पड़ जाता है। मेरे बेटे को छह बार अस्पताल ले जाना पड़ा है। मेरी पत्नी की एक टाँग नहीं है। सब उसी की सज़ा है।"
आरोही की आँखों में भी आँसू आ गए।
"पंडित जी, मैं आपकी सहायता कैसे करूँ?"
पंडित जी ने आरोही की तरफ़ देखा।
"बेटी, तुझसे सहायता माँगना मेरी बेशर्मी होगी। लेकिन एक बात सच है। तुझ पर हम सबकी उम्मीद है। अगर तू सफल हुई, तो सिर्फ़ रुक्मिणी और वे बारह लड़कियाँ मुक्त नहीं होंगी। मेरे परिवार का श्राप भी टूटेगा।"
"मुझे क्या करना होगा?"
"तेरहवीं अमावस की रात, जब देवीदास अपने पुराने शरीर को छोड़कर नए में जा रहा होगा, उस वक़्त उसकी अंगूठी तोड़नी होगी। लेकिन एक और चीज़ है जो मैं तुझे बताऊँगा जो शायद रुक्मिणी और देवराज बाबा तुझे नहीं बताएँगे।"
"क्या?"
"अंगूठी तोड़ने से पहले, तुझे एक मंत्र पढ़ना होगा। जिसे पढ़ने से रुक्मिणी की आत्मा उसी क्षण मुक्त होगी। और वह तेरी बलि नहीं लेगी।"
आरोही ने चौंककर देखा।
"मतलब मुझे मरना नहीं पड़ेगा?"
पंडित जी ने कहा, "बेटी, एक शर्त है। मंत्र पढ़ने के लिए एक चीज़ चाहिए। रुक्मिणी की अपनी लाल चूड़ी। जो 1870 से गायब है। शायद कहीं है। शायद कहीं दफ़्न है।"
आरोही ने कल तहख़ाने में देखी टोकरी को याद किया। सौ से ज़्यादा चूड़ियों की जोड़ियाँ। हर एक पर नाम।
पहली — रुक्मिणी की।
"पंडित जी, मुझे लगता है कि मुझे पता है कि रुक्मिणी की चूड़ी कहाँ है।"
पंडित जी ने आरोही को ग़ौर से देखा।
"कहाँ?"
"मंदिर के तहख़ाने में।"
पंडित जी का चेहरा फिर से पीला पड़ा।
"बेटी, वहाँ से चूड़ी निकालना आसान नहीं। तहख़ाना देवीदास का ख़ुद का ठिकाना है। वहाँ से कोई चीज़ बिना उसकी मर्ज़ी के नहीं जा सकती।"
"तो क्या करूँ?"
"तुझे एक और आदमी की मदद लेनी होगी।"
"कौन?"
"देवराज बाबा। बस वही जानते हैं कि तहख़ाने से चीज़ कैसे निकाली जाती है।"
विक्रम की वापसी
बात यहीं तक हुई थी कि बाहर से पदचाप की आवाज़ आई। पंडित जी ने घबराकर आरोही और भगवती देवी को अंदर के कमरे में धकेला।
"जल्दी। पीछे के दरवाज़े से निकलो। विक्रम आ रहा है।"
आरोही और भगवती देवी पीछे के दरवाज़े की तरफ़ भागीं। लेकिन आरोही ने एक क्षण के लिए रुककर देखा।
विक्रम बरामदे में आ चुका था। उसका चेहरा गीला था। बालों से पानी टपक रहा था। कपड़ों पर मिट्टी। जैसे वह किसी दलदल में गिरकर आया हो।
लेकिन बाहर बारिश तो सुबह से नहीं हुई थी।
पंडित जी ने विक्रम को देखते हुए धीरे से कहा, "आ गया देवदत्त? नाश्ता तैयार है।"
आरोही चौंकी।
पंडित जी ने आज उसे विक्रम नहीं, "देवदत्त" कहकर बुलाया था।
वही नाम जो मीरा की डायरी में था।
देवीदास। देवदत्त। विक्रम।
एक ही आदमी। तीन नाम। तीन शरीर।
आरोही और भगवती देवी पीछे के दरवाज़े से भागीं। जब वे कुछ दूर पहुँचीं, तब आरोही ने पीछे देखा।
पंडित जी के घर की खिड़की से विक्रम बाहर देख रहा था।
उसकी आँखें आरोही पर टिकी थीं।
और वह मुस्कुरा रहा था।
लेकिन उसकी मुस्कान असामान्य थी। बहुत लंबी। बहुत चौड़ी। मानो उसका मुँह इंसानी नहीं था। मानो कोई और चीज़ उसके चेहरे के अंदर बैठकर मुस्कुरा रही थी।
फिर उसने अपने होंठ हिलाए। कोई शब्द नहीं बोला। लेकिन आरोही को उसका इशारा साफ़ समझ आया।
'नौ दिन।'
आरोही ने पीठ फेरी। भगवती देवी के साथ तेज़ चलने लगी।
रास्ते में एक और चीज़ हुई जिसने आरोही को झकझोर दिया।
गाँव की गलियों में हर घर के दरवाज़े पर आज सुबह एक ही निशान बनाया गया था। सफ़ेद चूने से। एक त्रिकोण, जिसके अंदर एक आँख। बहुत पुराने प्रतीक की तरह।
आरोही ने भगवती देवी से पूछा, "दादी, यह क्या है?"
भगवती देवी ने ग़ौर से देखा। उनका चेहरा पीला पड़ा।
"बेटी, यह पहले नहीं था। यह किसी ने रात को बनाया है।"
"किसने?"
"मुझे नहीं पता। लेकिन इस निशान का मतलब मैं जानती हूँ। यह पुराना तांत्रिक निशान है। जब कोई तांत्रिक अपनी शक्ति से पूरे गाँव को अपने बंधन में बाँधता है, तब वह यह निशान बनाता है। ताकि उस गाँव से कोई बाहर न निकल सके। और बाहर से भी कोई अंदर न आ सके।"
आरोही रुक गई। उसने आस-पास देखा।
गाँव के सारे रास्तों के छोरों पर एक धुंधली रेखा दिख रही थी। जैसे कोई अदृश्य दीवार खींची गई हो। बाहर की तरफ़ जो पगडंडी थी — जिससे वह पहले दिन गाँव में आई थी — वह अब उतनी साफ़ नहीं दिख रही थी। मानो किसी ने उस पर एक हल्का पर्दा डाल दिया हो।
"दादी, अब हम गाँव से बाहर नहीं निकल सकते?"
भगवती देवी ने काँपते हुए कहा, "नहीं बेटी। जब तक वह निशान नहीं मिटेगा, कोई बाहर नहीं जा सकता। यह देवीदास ने किया है।"
"वह क्यों करेगा? हम अभी बाहर जाना नहीं चाहते।"
"बेटी, यह इसलिए ताकि तू भाग न सके। तेरी माँ ने जो गाड़ी भेजी थी — याद है? — वह गाँव नहीं पहुँच सकेगी। और अगर तूने कोशिश की भाग जाने की, तो तेरे साथ कुछ बुरा होगा।"
आरोही ने अपने बैग को कसकर पकड़ा।
"तो अब जो करना है, यहीं करना होगा।"
भगवती देवी ने सिर हिलाया।
"और नौ दिनों में करना होगा।"
(भाग 5 समाप्त। भाग 6 में जारी...)
अगले भाग में:
आरोही देवराज बाबा के पास जाएगी और तहख़ाने से रुक्मिणी की चूड़ी निकालने का तरीक़ा पूछेगी। लेकिन बाबा एक ऐसी शर्त रखेंगे जो आरोही को हैरान कर देगी। और जंगल में एक नई मुलाक़ात — "चंद्रा देवी" वाली महिला फिर से मिलेगी, लेकिन इस बार वह अपना असली चेहरा दिखाएगी।

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