PretikaPsychological Horrorतेरहवीं अमावस

भाग 4 : फ़ोटो वाली बुढ़िया और चंद्रा का सच

Piyashi Atma · Psychological Horror · 18 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
4 of 23
Category
Psychological Horror
Reading time
18 min
Words
3485
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

तेरहवीं अमावस
भाग 4 : फ़ोटो वाली बुढ़िया और चंद्रा का सच
तहख़ाने का सच
बारह मूर्तियों की खुली हुई आँखें आरोही की तरफ़ ताक रही थीं। हर एक जोड़ी आँख अलग रंग की थी। किसी की भूरी, किसी की काली, किसी की हरी, किसी की स्लेटी। जैसे हर मूर्ति ने असली लड़की की आँखें अपने में समा ली हों। और उन आँखों के पीछे — बहुत गहरे — कुछ और था। एक दर्द। एक इंतज़ार। एक चीख़ जो सौ साल से दबी हुई थी।
तहख़ाने की हवा और भारी हो गई। दीवारों से पानी टपकने लगा। छोटी-छोटी बूँदें। लेकिन पानी साफ़ नहीं था। लाल था। जैसे दीवारें ख़ुद ख़ून बहा रही हों।
टॉर्च की रोशनी भी अजीब हो गई। पीली से नीली, और नीली से लाल। जैसे रोशनी को भी कुछ पकड़ रहा हो।
"स्वागत है दीदी। हम बहुत दिनों से तेरा इंतज़ार कर रही थीं।"
आवाज़ बच्चों जैसी थी। लेकिन उन शब्दों के पीछे कुछ बहुत बूढ़ा था। कुछ थका हुआ। कुछ ऐसा जो पीढ़ियों से एक ही जगह अटका हुआ था।
आरोही पीछे हटी। उसकी पीठ दीवार से टकराई। ताबीज़ उसके गले में गरम हो रहा था। जलन बढ़ रही थी। लेकिन उसने उसे नहीं छोड़ा। हथेली की जलन ही उसे यहाँ बाँधे रख रही थी। नहीं तो अब तक वह बेहोश हो गई होती।
"तुम... तुम कौन हो?"
एक मूर्ति के होंठ हिले। सबसे बीच वाली की। "मैं रुक्मिणी हूँ, दीदी। तेरी अपनी बहन।"
"मैं तेरी बहन नहीं हूँ।"
"तू है। हम दोनों एक ही ख़ून की हैं। कमला मेरी छोटी बहन थी। कमला की बहू, बहू की बेटी, बेटी की बेटी... इस तरह तू मेरी वंश-बहन है।"
रुक्मिणी की मूर्ति की आँखें अब आँसू छोड़ रही थीं। छोटी-छोटी पत्थर की बूँदें उसकी गालों पर लुढ़क रही थीं।
"दीदी, मत डर मुझसे। मैं तुझे कोई नुक़सान नहीं पहुँचाऊँगी। मैं तुझे बचाना चाहती हूँ।"
आरोही ने काँपती आवाज़ में कहा, "तुम कुछ भी कहो, मैं तुम्हारी बात कैसे मान लूँ? तुमने बारह लड़कियों को क़ैद कर रखा है।"
"मैंने क़ैद नहीं किया, दीदी। मुझे क़ैद किया गया है। और इन बहनों को मेरे साथ बाँधा गया है। यह देवीदास का काम है।"
"देवीदास?"
"वही जिसने विक्रम का रूप धरा है। उसने 1857 में मुझसे शादी करने की कोशिश की थी। मैंने इंकार किया था। मेरा मंगेतर कोई और था। तब उसने मेरी शादी से एक रात पहले, कार्तिक की अमावस को, मुझे उठा लिया। यहीं इस तहख़ाने में। यहीं मेरी हत्या की। मेरा ख़ून इस पत्थर की मेज़ पर बहा। और मेरी आत्मा को उसने अपनी साधना के बंधन में बाँध दिया।"
रुक्मिणी की मूर्ति की आँखें बंद हो गईं। एक क्षण के लिए।
फिर खुलीं।
"हर तेरह साल पर उसे एक नई दुल्हन चाहिए। ताज़ी। कुँआरी। और मेरे ख़ून की। मेरे ख़ून की क्यों? क्योंकि मेरा ख़ून ही उसकी साधना की चाबी है। मेरा परिवार, मेरा वंश, मेरी बहन का ख़ून — यही उसकी शक्ति है।"
आरोही ने रुँधे गले से पूछा, "तो हर तेरह साल पर एक लड़की क्यों?"
"क्योंकि उसकी साधना की एक शर्त है। हर तेरह साल पर एक नया शरीर। एक नई जान। मेरे वंश की एक कुँआरी। जो लड़की मेरी परनानी की परनानी की पोती हो, और उसी अमावस पर पैदा हो। और मैं — मुझसे उसने वादा करवाया है कि मैं ही उन्हें ले आऊँ। हर बार। क्योंकि मेरी आत्मा को उसने अपनी अंगूठी में बाँध रखा है। जब भी वह अंगूठी हिलाता है, मुझे उसकी बात माननी पड़ती है।"
"अंगूठी?"
"तांबे की। लाल पत्थर वाली। उसकी दाहिने हाथ की अंगुली में।"
आरोही ने कल शाम विक्रम को याद किया। उसकी दाहिनी अंगुली में एक तांबे की अंगूठी थी। लाल पत्थर वाली। उसने ग़ौर से नहीं देखा था। अब वह याद आ रहा था।
"अगर अंगूठी टूट जाए?"
"तो मैं मुक्त हो जाऊँगी। यह बारह बहनें मुक्त हो जाएँगी। और देवीदास... देवीदास भी मर जाएगा। हमेशा के लिए।"
आरोही ने पूछा, "तो मुझे क्या करना है?"
"अंगूठी तोड़नी है। लेकिन एक शर्त है — उसे केवल मेरे वंश की एक कुँआरी लड़की तोड़ सकती है। अपने ख़ून से। और यह तेरहवीं अमावस की रात करना होगा। जिस दिन देवीदास सबसे कमज़ोर होता है। जिस दिन वह अपना पुराना शरीर छोड़कर नए में जाने की तैयारी करता है।"
आरोही की आँखें फैलीं।
"तो जिस रात वह मुझे लेने आएगा..."
"उसी रात तुझे उसे मारना होगा। दीदी, यह आसान नहीं है। अगर तू असफल हुई, तो तू भी हमारी तेरहवीं बहन बन जाएगी। लेकिन अगर सफल हुई, तो हम सब मुक्त हो जाएँगे।"
रुक्मिणी की मूर्ति ने आख़िरी बात कही।
"लेकिन दीदी, एक बात याद रख। देवराज बाबा तुझे कुछ और बताएँगे। वह भी सच बता रहा है। लेकिन पूरा नहीं। उसे भी एक चीज़ चाहिए। मुझे और उसे। दोनों को कुछ चाहिए तुझसे। जिस दिन तू यह समझ जाएगी, उस दिन तू फ़ैसला करना।"
फिर बारह मूर्तियों की आँखें बंद हो गईं। एक साथ। और तहख़ाना फिर से एक साधारण पुरानी जगह बन गया। दीवारों से टपकता लाल पानी भी रुक गया। बस उसके निशान रह गए। जो अगले कुछ सेकंडों में सूख भी गए। जैसे कुछ हुआ ही न हो।
आरोही ने ताबीज़ अभी भी हाथ में पकड़ रखा था। हथेली पर छाला उठ आया था। लेकिन जलन की परवाह नहीं थी।
वह वापस सीढ़ियों की तरफ़ दौड़ी।
लेकिन जब वह ऊपर पहुँची, तो पत्थर का दरवाज़ा बंद था। जिस दरवाज़े को उसने ताबीज़ की मदद से खोला था, वह अब भारी हो चुका था। जैसे किसी ने बाहर से बंद कर दिया हो।
आरोही ने दरवाज़े को धकेला। नहीं हिला।
एक क्षण के लिए उसे लगा कि वह हमेशा के लिए यहाँ बंद हो गई है। बारह मूर्तियों के साथ। तेरहवीं जगह उसका इंतज़ार कर रही थी।
लेकिन तभी उसने ताबीज़ को फिर से दरवाज़े के पास रखा। ताबीज़ जलने लगा। और दरवाज़ा फिर से खुल गया।
आरोही तेज़ी से बाहर निकली। मंदिर के प्रांगण में आई। सीढ़ियों की तरफ़ भागी।
लेकिन एक पल के लिए रुकी। कुछ देखने के लिए।
देवी की मूर्ति का चेहरा, जो सुबह टूटा हुआ था, अब बदल गया था। टूटे हुए हिस्सों की जगह पर एक नया चेहरा उभर आया था। एक जानी-पहचानी शक्ल।
आरोही ने ग़ौर से देखा।
वह चेहरा — रुक्मिणी का था।
लेकिन उसकी आँखें बंद थीं। और उसके होंठ पर एक हल्की सी मुस्कान।
जैसे वह जानती थी कि आरोही अब कहीं नहीं जा सकती।
आरोही सीढ़ियाँ उतरने लगी।
फ़ोटो वाली बुढ़िया
मंदिर से बाहर निकलते ही आरोही ने ताज़ी हवा की एक लंबी साँस ली। बादल छँट गए थे। सूरज की धीमी रोशनी सीढ़ियों पर पड़ रही थी।
लेकिन सीढ़ियों के सबसे नीचे कोई बैठा था।
एक बुज़ुर्ग औरत।
आरोही ने रुककर देखा। औरत की उम्र शायद अस्सी-नब्बे साल की थी। सफ़ेद बाल एक जूड़े में बँधे। सफ़ेद साड़ी। हाथ में एक लकड़ी की लाठी। लेकिन उसकी पीठ सीधी थी, जैसे किसी जवान की।
और उसका चेहरा...
आरोही की साँसें रुक गईं।
यह चेहरा वह बचपन से जानती थी।
अपनी माँ के पुराने फ़ोटो एल्बम में। एक पुरानी काली-सफ़ेद तस्वीर में। उसकी माँ की गोद वाली तस्वीर में। एक बुज़ुर्ग औरत माँ के पीछे खड़ी थीं। उनकी उम्र उस वक़्त शायद पचास-साठ की थी। आरोही ने कई बार पूछा था — "माँ, ये कौन हैं?" माँ ने हमेशा टाल दिया था। एक बार सिर्फ़ इतना कहा था — "एक पुरानी रिश्तेदार। अब नहीं रहीं।"
लेकिन यहाँ, आज, वह रिश्तेदार सामने ज़िंदा बैठी थीं।
आरोही धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरी।
"आप... आप कौन हैं?"
बुज़ुर्ग औरत ने ऊपर देखा। मुस्कुराई। उसकी आँखें भूरी थीं। जैसी आरोही की माँ की।
"बेटी, तूने मुझे पहचान लिया?"
"आपकी तस्वीर... मेरी माँ के एल्बम में..."
"हाँ। वह तस्वीर सन 2001 की है। तेरे पहले जन्मदिन की। मैं तेरे लिए एक चाँदी की पायल लेकर आई थी। तेरी माँ ने वह पायल तेरे बड़े होने पर देने के लिए संभालकर रखी थी।"
आरोही को अचानक याद आया। उसकी सोलहवीं सालगिरह पर माँ ने एक पुरानी चाँदी की पायल दी थी। कहा था — "यह किसी बुज़ुर्ग रिश्तेदार ने भेजी थी। बहुत पहले।"
"आप... आप कौन हैं?"
बुज़ुर्ग औरत ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई। उठ खड़ी हुईं। धीरे से बोलीं।
"मेरा नाम चंद्रा है। तेरी नानी की बड़ी बहन।"
आरोही के पैर लड़खड़ा गए।
"लेकिन... माँ ने कहा कि आप मर गई थीं। सालों पहले।"
"तेरी माँ को यही बताया गया था, बेटी। मैंने ख़ुद अपनी मौत का समाचार करवाया था। ताकि मुझे कोई ढूँढ़ न सके।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे एक काम पूरा करना था। जो अधूरा था। जो अब तेरी वजह से पूरा हो सकता है।"
चंद्रा का सफ़र
चंद्रा देवी आरोही को एक तरफ़ ले गईं। मंदिर से थोड़ी दूर एक बड़ी चट्टान थी। उसके नीचे बैठ गईं।
"बेटी, मेरी बात ध्यान से सुन। बहुत कम वक़्त है।"
आरोही उनके पास बैठ गई।
"मैं 1926 में इसी गाँव में पैदा हुई थी। कार्तिक अमावस को। जब मैं पाँच साल की थी, मेरे पिताजी दिल्ली चले गए। मेरी शादी बहुत जल्दी हो गई — तेरह साल की उम्र में। मेरा पति एक अच्छा आदमी था। हमने बयालीस साल एक साथ बिताए।"
"फिर?"
"जब मैं पचास साल की हुई, मेरे सपने बदलने लगे। रुक्मिणी आती थी। हर रात। पूछती थी — 'तू क्यों बच गई? तूने मुझे धोखा दिया। तेरे बदले किसकी बलि जाएगी?' मैं पागल होने लगी। मेरी बहन — तेरी नानी — मुझे संभालती रही। लेकिन एक रात मैंने एक फ़ैसला किया। मैं इस श्राप के मूल तक जाऊँगी। इसे तोड़ूँगी। नहीं तो हमारे परिवार की हर लड़की एक-एक करके इसकी शिकार बनती जाएगी।"
"आप वापस रत्नपुर आईं?"
"हाँ। 1978 में। मेरे पति गुज़र चुके थे। कोई औलाद नहीं थी। मैंने अपनी मौत का समाचार अपनी बहन को भेजा। और चुपके से इसी गाँव में आ गई। यहाँ मैंने देवराज बाबा से मुलाक़ात की। तब वे 85 साल के थे। मैंने उनसे सब सीखा। सब समझा।"
"आपने बाबा के साथ कितने साल बिताए?"
"तीन साल। 1978 से 1981 तक। उन्होंने मुझे तंत्र-मंत्र नहीं सिखाया। लेकिन उन्होंने मुझे रुक्मिणी की असली कहानी सुनाई। जो सब गाँव वाले नहीं जानते। जो बस उन्हें और कुछ बहुत बूढ़ों को पता है।"
"क्या कहानी?"
"रुक्मिणी की शादी जिस लड़के से होने वाली थी, वह देवीदास का दोस्त था। दोनों साथ पढ़ते थे। देवीदास ने अपने दोस्त को धोखा दिया। रुक्मिणी को छीना। लेकिन रुक्मिणी ने उसे कभी स्वीकार नहीं किया। शादी की रात, जब वह उसे तहख़ाने में लाया, तब भी रुक्मिणी ने विरोध किया। देवीदास ने उसे मार डाला। लेकिन मरने से पहले रुक्मिणी ने एक श्राप दिया। उसने कहा — 'तेरा तंत्र मेरे ख़ून पर टिका है। तो मेरे ख़ून की एक न एक लड़की तुझे मुक्त करेगी। एक दिन।'"
"तो रुक्मिणी ने ख़ुद कहा कि उसके परिवार की एक लड़की देवीदास को मारेगी?"
"हाँ बेटी। और उस पल से देवीदास डर गया। उसने रुक्मिणी की आत्मा को बाँधा। हर तेरह साल पर उसके परिवार की एक लड़की को उठाना शुरू किया। ताकि श्राप का मौक़ा ही न आए। ताकि रुक्मिणी की भविष्यवाणी सच न हो।"
"तो आप जानती हैं यह श्राप कैसे टूटेगा?"
चंद्रा देवी ने आँखें बंद कीं। बहुत देर तक कुछ नहीं बोलीं।
"बेटी, यह श्राप टूटेगा। लेकिन इसकी क़ीमत है।"
"क्या?"
"रुक्मिणी ने तुझसे क्या कहा?"
आरोही ने सब बताया। अंगूठी की बात। तेरहवीं अमावस की रात की बात। ख़ून की बात।
चंद्रा देवी ने सिर हिलाया।
"सच है। लेकिन पूरा नहीं। रुक्मिणी ने एक बात नहीं बताई।"
"क्या?"
"जो लड़की देवीदास की अंगूठी तोड़ेगी, उसकी अपनी जान भी उसी रात जाएगी। यह एक बलिदान की साधना है। एक जान के बदले तेरह मुक्त होंगी। लेकिन वह एक जान — तेरहवीं की जान — देनी होगी।"
आरोही की आँखें फैलीं।
"मैं... मैं मरूँगी?"
"अगर तू अंगूठी तोड़ेगी, हाँ। लेकिन अगर तू नहीं तोड़ेगी, तो देवीदास तुझे ले जाएगा। एक तरह से भी मौत। दूसरी तरह से भी। बस फ़र्क़ इतना है — पहली में तू बहनों को बचाएगी। दूसरी में तू ख़ुद तेरहवीं बहन बनकर उस अँधेरे में क़ैद हो जाएगी।"
आरोही की आँखों में आँसू आ गए।
"तो देवराज बाबा को क्यों नहीं बताया? वे मुझे क्यों नहीं बताते?"
"क्योंकि देवराज बाबा तुझे बचाने का दूसरा रास्ता ढूँढ़ रहे हैं। वे 133 साल से इस श्राप को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। 1913 में जब वे नाकाम रहे, तब से उन्होंने एक ही सपना देखा है — बिना बलिदान के इसे तोड़ना। लेकिन बेटी, हर साधना की अपनी शर्त होती है। कुछ चीज़ों की क़ीमत होती है। बाबा को यह मंज़ूर नहीं। लेकिन तुझे मंज़ूर करना होगा।"
आरोही ने चुपचाप सुनी।
"बेटी, मैंने तुझसे कहा — बहुत कम वक़्त है। अगले ग्यारह दिनों में तुझे यह फ़ैसला करना होगा। और अगर तू फ़ैसला ले, तो मुझे बताना। मैं तेरे साथ हूँ। मैं आख़िरी रात तेरे साथ रहूँगी।"
आरोही ने पूछा, "आप कहाँ रहती हैं?"
"जंगल में। बाबा की झोपड़ी से एक कोस दूर। मेरी अपनी कुटिया है। कल सुबह आना। मैं तुझे कुछ और सिखाऊँगी।"
चंद्रा देवी उठ खड़ी हुईं।
"और बेटी..."
"जी?"
"विक्रम से दूर रहना। और भगवती देवी से एक बात पूछना।"
"क्या?"
"पूछना कि मीरा की शादी किसके साथ होने वाली थी।"
आरोही चौंकी। "क्यों?"
चंद्रा देवी मुस्कुराईं। लेकिन उनकी मुस्कान में कुछ ठंडा था।
"पूछ। जवाब सुनकर तू ख़ुद समझ जाएगी।"
वे चली गईं। लाठी टेकते हुए। धीरे-धीरे कोहरे में गुम हो गईं।
आरोही कुछ देर वहीं बैठी रही। हवा में अभी भी उनकी उपस्थिति महसूस हो रही थी। जैसे उन्होंने पीछे कुछ छोड़ दिया हो। एक साँस। एक याद। एक ज़िम्मेदारी।
आरोही ने अपने बैग में हाथ डाला। कमला देवी की डायरी टटोली। पन्ने पलटे। एक कोरे पन्ने पर, आज सुबह से पहले जो पन्ना कोरा था, वहाँ अब कुछ लिखा था। लेकिन यह लिखावट न रुक्मिणी की थी, न चंद्रा की।
यह लिखावट देवराज बाबा जैसी लगती थी। तंत्रिक शैली में।
"बेटी, जो भी तू सुन रही है, अपने दिमाग़ से सोच। तेरी सबसे बड़ी ताक़त तेरा शक है। शक करना। हर बात पर। मुझ पर भी।"
आरोही ने डायरी बंद कर दी। बैग में डाली।
गाँव की तरफ़ क़दम बढ़ाए।
रास्ते में एक बात ने उसे रोका। जिस पेड़ पर कल ख़ून से लिखा था — "बारह दिन नहीं, ग्यारह" — उसी पेड़ के तने पर आज एक नई पंक्ति उकेरी थी। लेकिन इस बार ख़ून से नहीं। किसी नुकीली चीज़ से — जैसे किसी ने चाकू से खरोंचा हो।
"दस।"
बस एक शब्द।
आरोही की पीठ पर पसीना बहने लगा।
क्या बाबा का हिसाब ग़लत था? बाबा ने कहा था — बारह दिन। रुक्मिणी ने कहा — ग्यारह। और अब कोई और कह रहा है — दस। क्या श्राप का समय हर पल कम होता जा रहा था?
या फिर हर एक अपना समय अपने हिसाब से बता रहा था?
आरोही ने गहरी साँस ली। तेज़ चलने लगी।
भगवती देवी का दूसरा राज़
आरोही जब घर लौटी, तो दोपहर के दो बज चुके थे। भगवती देवी बरामदे में बैठी थीं। एक पीली साड़ी में। हाथ में तुलसी की माला। मंत्र जाप कर रही थीं।
आरोही उनके पास बैठी।
"दादी।"
"हाँ बेटी।"
"मुझे एक बात पूछनी है।"
भगवती देवी ने माला रोक दी। ऊपर देखा।
"पूछ।"
"मीरा की शादी किसके साथ होने वाली थी?"
भगवती देवी का चेहरा एक क्षण के लिए पत्थर बना। फिर उन्होंने आँखें फेर लीं।
"बेटी, यह बहुत पुरानी बात है।"
"दादी, बताइए।"
भगवती देवी ने एक लंबी साँस ली।
"उसका नाम विक्रम था। विक्रम त्रिपाठी। अल्मोड़ा का था। सरकारी नौकरी में।"
आरोही की साँसें रुक गईं।
"वही विक्रम?"
"नहीं, बेटी। कल जो आया था, वह विक्रम त्रिपाठी नहीं हो सकता। मेरी मीरा का विक्रम तो..."
"तो क्या?"
"तो मीरा के गुम होने के तीन दिन बाद मर गया था। एक बस दुर्घटना में। हमने उसकी लाश देखी थी। जलाई थी। उसके परिवार ने मुझे बताया था।"
आरोही की आँखें फैलीं।
"तो कल जो आदमी आया..."
"मुझे नहीं पता वह कौन है। लेकिन मीरा का जो विक्रम था, वह मर चुका है। तेरह साल पहले।"
आरोही ने अपने बैग से फ़ोन निकाला। सिग्नल कम था। लेकिन धीरे-धीरे उसने अल्मोड़ा में विक्रम त्रिपाठी नाम के लोगों को खोजा। एक सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल मिली। पुरानी। पिछले तेरह साल से कोई पोस्ट नहीं। लेकिन तस्वीरें थीं।
एक फ़ोटो थी। पुरानी शादी की तैयारी की। जिसमें विक्रम त्रिपाठी और मीरा — दोनों ख़ुश थे। तस्वीर 2013 की थी। शादी से बीस दिन पहले की।
चेहरा साफ़ था। लंबे बाल, गोल चश्मा, हल्की दाढ़ी। हँसते हुए। मीरा उसके कंधे पर सिर रखे थी।
वह चेहरा कल आए विक्रम से बिल्कुल अलग था।
आरोही ने फ़ोन में एक और प्रोफ़ाइल भी देखी। एक न्यूज़ आर्टिकल था। पुराना। अल्मोड़ा टाइम्स का।
"बस दुर्घटना में तीन की मौत। विक्रम त्रिपाठी (25), राकेश जोशी (22), और हरीश नेगी (30) की मौक़े पर ही मौत। अल्मोड़ा-नैनीताल हाईवे पर हादसा।"
तारीख़ थी 27 अक्टूबर 2013।
मीरा के गुम होने के तीन दिन बाद।
आरोही ने फ़ोन नीचे रख दिया।
"दादी, तो कल का विक्रम कोई और है।"
"हाँ बेटी। और उसने मीरा के होने वाले पति का नाम इसीलिए चुना क्योंकि..."
"क्योंकि?"
"क्योंकि वह चाहता था कि मैं उसे अंदर आने दूँ। जिस दिन तू आई, उस रात मुझे एक सपना आया था। मीरा आई थी। बोली थी — 'माँ, एक आदमी आएगा। उसे अंदर मत आने देना। वह मुझे मारने वाला था। मेरे विक्रम का चोर।'"
"तो आपने मुझे क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि जब वह कल दरवाज़े पर आया, तो उसने मुझे अपनी आँखों में देखा। और उन आँखों में मुझे मीरा दिखी।"
भगवती देवी की आँखों से आँसू बहने लगे।
"मुझे लगा कि शायद मीरा मुझसे मिलने आई है। किसी और के रूप में। मैं... मैंने अपनी ग़लती से उसे अंदर आने दिया।"
आरोही ने भगवती देवी का हाथ पकड़ा।
"दादी, कोई बात नहीं। लेकिन आज से हम सावधान रहेंगे। मैंने एक और आदमी को देखा है। जो शायद मदद कर सके।"
"कौन?"
"चंद्रा देवी।"
भगवती देवी का चेहरा एक क्षण के लिए धुँधला हो गया।
"चंद्रा देवी? यहाँ रत्नपुर में?"
"आप उन्हें जानती हैं?"
"बेटी, चंद्रा देवी 1978 में गाँव आई थीं। कुछ साल रहीं। फिर एक रात जंगल में गईं। कभी वापस नहीं आईं। हमने सोचा कि उन्हें भी वही ले गया।"
"नहीं, दादी। वे ज़िंदा हैं। जंगल में उनकी कुटिया है।"
भगवती देवी ने आरोही को ग़ौर से देखा।
"बेटी, तूने उन्हें कहाँ देखा?"
"मंदिर के बाहर। सीढ़ियों पर बैठी थीं।"
भगवती देवी उठ खड़ी हुईं। बहुत तेज़ी से। एकदम। जैसे किसी ने उन्हें बिजली का झटका दिया हो।
"आरोही..."
"जी?"
"चंद्रा देवी की लाश 1979 में मिली थी। जंगल में। एक चट्टान के नीचे। हमने ख़ुद संस्कार किया था। और मैं ख़ुद उनकी बेटी के पास जाकर ख़बर दे आई थी।"
"उनकी बेटी?" आरोही चौंकी। "चंद्रा देवी की तो कोई औलाद नहीं थी। उन्होंने ख़ुद बताया।"
भगवती देवी ने आँखें बड़ी कीं।
"बेटी, चंद्रा देवी की एक बेटी थी। नाम था कमला। कमला त्रिपाठी। हाँ, त्रिपाठी। क्योंकि चंद्रा देवी की शादी एक त्रिपाठी परिवार में हुई थी।"
आरोही की सारी हड्डियाँ जैसे ठंडी पड़ गईं।
"त्रिपाठी?"
"हाँ। और उस कमला त्रिपाठी की एक ही औलाद थी। एक बेटा। जिसका जन्म 1996 में हुआ था।"
"नाम?"
"मुझे नहीं पता। मैं कमला के घर बस दो-तीन बार गई थी। लेकिन बेटी..."
"क्या?"
"अगर वह लड़का आज ज़िंदा है, तो उसकी उम्र तीस साल की होगी। और वह त्रिपाठी है।"
आरोही ने कल शाम विक्रम को याद किया। उसकी उम्र। उसका उपनाम। सब मिल गया।
तो विक्रम त्रिपाठी — या जो भी वह असल में था — शायद चंद्रा देवी का पोता था। या फिर उसने किसी ऐसे परिवार का रूप धरा था जो उसके काम आ जाए।
लेकिन तो फिर चंद्रा देवी कौन थीं जो उससे मिलीं?
आरोही ने अंधाधुंध बैग खोला। कमला देवी की डायरी निकाली। पन्ने पलटे।
एक पन्ना खुद ब खुद खुल गया। हवा में कोई हलचल नहीं थी। लेकिन पन्ने अपने आप पलटे। जैसे किसी अदृश्य उँगली ने पलट दिए हों।
उस पन्ने पर एक नई पंक्ति लिखी हुई थी। बहुत ताज़ी। स्याही अभी गीली थी।
"तूने सच सुना। रुक्मिणी झूठ बोल रही है। मैं तुझे सचमुच बचाऊँगी। कल जंगल आना।"
नीचे हस्ताक्षर था — चंद्रा।
और उसके नीचे, एक और पंक्ति। अलग हस्तलिपि में। तेज़, गुस्से भरी।
"वह भी झूठ बोल रही है, दीदी। कल जंगल मत जाना।"
नीचे — रुक्मिणी।
और उसके नीचे, तीसरी पंक्ति। इस बार सबसे नीचे। बहुत छोटे अक्षरों में। जैसे किसी ने काँपते हाथों से लिखी हो।
"दोनों झूठ बोल रही हैं, बेटी। पंडित के पास आ। मैं वहीं हूँ।"
नीचे कोई नाम नहीं था। बस एक हस्ताक्षर — एक त्रिकोण, जिसके अंदर एक बिंदी।
देवराज बाबा का हस्ताक्षर।
आरोही ने डायरी बंद कर दी।
अब वह किस पर विश्वास करे?
रुक्मिणी पर? चंद्रा पर? देवराज बाबा पर? विक्रम पर?
चारों कह रहे थे कि बाक़ी तीन झूठ बोल रहे हैं।
और वह — तेरहवीं — दस दिनों के अंदर एक ग़लत फ़ैसला करती, तो जान गँवा देती।
(भाग 4 समाप्त। भाग 5 में जारी...)
अगले भाग में:
आरोही किसका विश्वास करेगी? क्या वह कल जंगल जाएगी या नहीं? भगवती देवी उसे एक पुरानी चीज़ देंगी जो मीरा ने अपनी शादी की रात एक कोने में छिपा दी थी। और गाँव के पंडित राधेश्याम शर्मा, जिनके घर विक्रम रुका है, आरोही से एक ऐसी बात कहेंगे जो पिछले 156 साल में गाँव के किसी सदस्य ने ज़ोर से नहीं कही थी।

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