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भाग 3 : माँ का सच और मंदिर का तहख़ाना
Piyashi Atma · Psychological Horror · 18 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- तेरहवीं अमावस
- Chapter
- 3 of 23
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 18 min
- Words
- 3440
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
तेरहवीं अमावस
भाग 3 : माँ का सच और मंदिर का तहख़ाना
विक्रम की परछाईं
बिजली की चमक बुझ गई। कमरा फिर से अपनी हल्की सी पीली रोशनी में लौट आया। भगवती देवी की एक लालटेन कोने में जल रही थी।
आरोही ने अपनी आँखें विक्रम पर टिकाईं। वह ध्यान से देख रही थी।
अब विक्रम की परछाईं दीवार पर थी। सामान्य। उसके शरीर से मेल खाती हुई। जब वह हिला, परछाईं भी हिली।
क्या उसे पिछली बार ग़लत दिखा था? शायद बिजली की चमक में रोशनी उल्टी दिशा से आई थी। शायद परछाईं दूसरी तरफ़ पड़ी थी। शायद उसका दिमाग़ थका हुआ था।
लेकिन गीली मिट्टी की गंध — वह अभी भी थी। हल्की, लेकिन साफ़।
"आरोही जी, आपने कप गिरा दिया," विक्रम मुस्कुराया। उसने झुककर टूटे हुए टुकड़े उठाने शुरू किए।
"रहने दीजिए। मैं उठा लूँगी।" आरोही ने जल्दी से कहा।
"नहीं, कोई बात नहीं।" विक्रम ने अपने रूमाल में टुकड़े लपेटे। "आप ठीक हैं? अचानक इतनी घबरा गईं?"
आरोही ने अपने आपको सँभाला। एक शोधकर्ता का दिमाग़ बोल रहा था — सामने वाले को अपना डर मत दिखाओ। जितना कम बताओ, उतना बेहतर।
"बिजली की चमक से चौंक गई थी। बस।"
"पहाड़ों की बिजली अलग होती है, है ना?" विक्रम बोला। "मैदानों जैसी नहीं। यहाँ की बिजली जैसे किसी को ढूँढ़ रही हो।"
आरोही ने कुछ नहीं कहा। उसने बात बदलनी चाही।
"आप कब से रत्नपुर पर काम कर रहे हैं?"
"पाँच साल से। असल में, मेरी दादी इसी गाँव की थीं। बचपन में मैंने उनसे बहुत कहानियाँ सुनी थीं इस श्राप की। बड़े होकर सोचा, क्यों न इसी को शोध का विषय बनाऊँ।"
आरोही ने चाय की चुस्की ली। उसने ग़ौर किया कि विक्रम ने अपनी चाय अभी तक नहीं पी थी। कप उसके हाथ में था, लेकिन उसने एक बूँद भी नहीं पी। बस कप को अपनी उँगलियों में घुमा रहा था।
"आप चाय नहीं पीते?"
विक्रम हँसा। "पीता हूँ। लेकिन गरम बहुत पसंद है। थोड़ी ठंडी होने दो।"
आरोही ने अपनी चाय देखी। भाप निकल रही थी। उसकी चाय गरम थी। तो विक्रम की भी होगी। दोनों एक साथ बनाई थीं।
"आप गाँव में कहाँ रुके हैं?"
"पंडित जी के घर पर। उनसे मेरी दादी के परिवार का पुराना रिश्ता है।"
"कौन से पंडित जी?"
"राधेश्याम शर्मा। पुराने पुजारी के बेटे।"
आरोही ने नाम नोट किया। मन ही मन। बाद में देवराज बाबा से पूछेगी।
"आपकी दादी का नाम?"
विक्रम एक क्षण के लिए ठिठका। बहुत छोटा क्षण। लेकिन आरोही ने पकड़ लिया।
"सरस्वती देवी। शायद आप उन्हें नहीं जानतीं। उन्होंने भी बरसों पहले गाँव छोड़ दिया था।"
"ओह।" आरोही ने सिर हिलाया।
विक्रम ने अपनी फ़ाइल खोली। कुछ काग़ज़ निकाले। "यह देखिए। मैंने बारह लड़कियों की एक तालिका बनाई है। उनके जन्म-मृत्यु के दिन। परिवार के नाम। आप देखेंगी तो अपने आप एक pattern समझ आएगा।"
आरोही ने काग़ज़ लिया। उस पर सुंदर हस्तलिपि में एक तालिका बनी थी। हर पंक्ति में एक नाम था। तारीख़ें थीं। लेकिन एक बात ने आरोही को चौंकाया।
आख़िरी पंक्ति में कुछ लिखा था —
13. आरोही शर्मा — जन्म: 26 अक्टूबर 2000 — गुम्शुदा दिन: 23 अक्टूबर 2026 (आगामी)
आरोही ने काग़ज़ नीचे रखा।
"यह... यह आपने कैसे लिखा है? मेरा नाम?"
विक्रम की मुस्कान थोड़ी और गहरी हुई। "क्योंकि मुझे पता था कि आप आएँगी। पिछले दो साल से पता था।"
"कैसे?"
"क्योंकि मैंने सूची बनाई थी। और आपका नाम बरसों पहले उसमें दर्ज हो गया था।"
आरोही की रीढ़ में एक ठंडी लहर दौड़ गई।
"किसने दर्ज किया?"
विक्रम ने आँखें नीची कीं। धीरे से बोला, "उन्होंने।"
"किन्होंने?"
विक्रम कुछ नहीं बोला। लेकिन उसने अपनी उँगली से एक तरफ़ इशारा किया।
आरोही ने उस तरफ़ देखा।
कमरे की दीवार पर एक पुरानी घड़ी लगी थी। भगवती देवी की। लकड़ी की। पेंडुलम वाली। लेकिन घड़ी अब उलटी चल रही थी। सुइयाँ पीछे की तरफ़ जा रही थीं। और पेंडुलम बीच में रुक गया था। जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उसे पकड़ लिया हो।
आरोही ने विक्रम की तरफ़ देखा।
"आपने यह किया?"
"मैंने कुछ नहीं किया, आरोही जी।" विक्रम मुस्कुराया। "यह वे कर रही हैं। वे सब बारह। उन्हें आपका आना पसंद है। इतना पसंद है कि उन्होंने वक़्त को उलटा कर दिया।"
आरोही ने घड़ी की तरफ़ फिर देखा। घड़ी अब सामान्य चल रही थी। पेंडुलम हिल रहा था। मानो कुछ हुआ ही न हो।
विक्रम उठ खड़ा हुआ।
"अभी देर हो गई है। मैं चलता हूँ। कल सुबह फिर आऊँगा। शायद तब हम मिलकर मंदिर देखने चलें। मेरे पास कुछ चाबियाँ हैं जो शायद आपके काम आ जाएँ।"
"चाबियाँ? किसकी?"
विक्रम ने दरवाज़े की ओर बढ़ते हुए कहा, "जो मंदिर के तहख़ाने की हैं। जो पिछले 156 साल से किसी ने नहीं खोला।"
वह चला गया।
आरोही दरवाज़े पर खड़ी रह गई। बाहर बारिश तेज़ हो गई थी। लेकिन विक्रम की पीठ पर एक भी बूँद नहीं गिर रही थी। पानी उसके पास आते-आते जैसे किसी अदृश्य दीवार से टकराकर लौट जाता था।
आरोही ने दरवाज़ा बंद किया। पीठ दरवाज़े पर टिकाई।
भगवती देवी अंदर आईं। उन्होंने आरोही का चेहरा देखा।
"वह आदमी..." आरोही ने कहा, "क्या आप उसे जानती हैं?"
भगवती देवी ने सिर हिलाया। "नहीं। मैंने आज पहली बार देखा। लेकिन बेटी..."
"क्या?"
"जब वह अंदर आया, मेरे तुलसी के पौधे की जड़ें सूख गईं।"
आरोही ने बरामदे की तरफ़ देखा। तुलसी का पौधा, जो सुबह हरा था, अब पूरी तरह से मुरझा गया था। पत्ते काले पड़ चुके थे।
माँ को फ़ोन
रात के आठ बजे थे। बारिश अभी भी गिर रही थी। आरोही अपने कमरे में बैठी थी। उसने अपना फ़ोन उठाया।
सिग्नल एक कोने में मुश्किल से मिल रहा था। खिड़की के पास ले जाकर उसने अपनी माँ को फ़ोन मिलाया।
तीन बार घंटी बजी।
"हाँ बेटी?"
माँ की आवाज़ सुनकर आरोही की आँखों में आँसू आ गए। लेकिन उसने अपने आपको सँभाला।
"माँ, कैसी हो आप?"
"मैं ठीक हूँ। तू कैसी है? पहाड़ों में सब ठीक तो है ना?"
"हाँ माँ।" आरोही रुकी। कैसे पूछे? कहाँ से शुरू करे? "माँ, मुझे कुछ पूछना है।"
"पूछ।"
"हमारे परिवार में... क्या कोई पुराना क़िस्सा है? कोई ऐसी बात जो हमें कभी नहीं बताई गई?"
फ़ोन के दूसरी तरफ़ सन्नाटा।
"माँ?"
"बेटी, तू क्या पूछ रही है?"
"मैं रत्नपुर में हूँ।"
एक तेज़ हवा की तरह आवाज़ आई। जैसे किसी ने साँस अंदर खींची हो।
"तू... तू कहाँ?"
"रत्नपुर, माँ। कुमाऊँ का एक गाँव। मेरे शोध का..."
"वहाँ से अभी लौट आ।"
आरोही चौंकी। "क्या?"
"आरोही, मेरी बात सुन। अभी। तू अभी वहाँ से लौट आ। जो भी शोध है, छोड़ दे। सब छोड़ दे। कल सुबह तक तू दिल्ली में होनी चाहिए।"
"माँ, आप क्या कह रही हैं? मुझे कुछ बताइए।"
फिर वही चुप्पी। इस बार लंबी।
"माँ?"
"बेटी..." माँ की आवाज़ काँप रही थी। "मैंने तुझे कभी नहीं बताया। मैंने सोचा था कि तुझे कभी बताने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन..."
"क्या माँ?"
"जब तू पैदा हुई थी, तेरे पैदा होने से एक रात पहले, तेरी नानी मेरे पास आई थीं। बहुत डरी हुई। उन्होंने मुझसे कहा कि अगर बेटी हुई तो उसे कभी उत्तराखंड मत ले जाना। कभी नहीं। ख़ास तौर पर रत्नपुर। उन्होंने कहा कि हमारे परिवार पर एक पुराना श्राप है। जो लड़की हमारे ख़ून की और कार्तिक अमावस को पैदा होगी, वह उनकी होगी।"
"नानी... उन्हें कैसे पता था?"
"क्योंकि तेरी नानी की बड़ी बहन भी उसी अमावस पर पैदा हुई थी। 1926 में। लेकिन नानी की बहन बच गई थी। कैसे बची, यह किसी को नहीं पता। बचपन में ही परिवार दिल्ली आ गया। वह अस्सी साल की उम्र तक ज़िंदा रहीं। लेकिन आख़िरी दिनों में वे कहती रहती थीं कि उनके सपनों में रुक्मिणी आती है। रुक्मिणी उनसे पूछती है — 'तू क्यों बच गई? तूने मुझे धोखा दिया।' नानी की बहन उन्हीं सपनों की वजह से पागल होकर मरीं।"
आरोही को अपनी दादी की छोटी बहन याद आई। एक धुँधली सी याद। बचपन में उन्होंने उसे गोद में लिया था। और कान में एक ही बात फुसफुसाई थी — "बेटी, कभी उन पहाड़ों में मत जाना।" तब आरोही चार साल की थी। कुछ नहीं समझी थी। लेकिन आज वह याद अचानक जागी।
"माँ, नानी की बहन का नाम क्या था?"
"चंद्रा।"
"1926 की कार्तिक अमावस को पैदा हुईं?"
"हाँ। और 1939 में जब वे तेरह साल की हुईं, तब उनके पिताजी ने जल्दी से जल्दी दिल्ली में रिश्ता तय कर दिया था। शादी हुई। श्राप उन्हें ढूँढ़ नहीं सका। शायद इसीलिए।"
"शादी हुई शादी से पहले? इतनी जल्दी?"
"हाँ। बेटी, हमारे परिवार में जो-जो लड़कियाँ उस दिन पैदा हुईं, सबकी शादी बहुत जल्दी हुई। ताकि उन्हें कोई पकड़ न सके। क्योंकि श्राप कुँआरी को पकड़ता है।"
"तो मेरी शादी भी..."
"बेटी, मैंने कोशिश की थी। लेकिन तू पढ़ाई में लगी थी। मैंने ज़ोर नहीं दिया। मुझे लगा दिल्ली में हम सुरक्षित हैं। मुझे लगा कि श्राप तुझ तक कैसे पहुँचेगा।"
माँ अब खुलकर रो रही थीं।
"आरोही, मैंने ग़लती की। मुझे तुझे बताना चाहिए था। मुझे तेरी शादी करा देनी चाहिए थी।"
"किनकी माँ?"
"उन्होंने पूरा नहीं बताया। बस इतना कहा कि तेरी परनानी की बहन बरसों पहले उसी गाँव से गायब हुई थी। और जब से हमारे परिवार में कोई भी लड़की उस अमावस को पैदा हुई, वह उसे लेने आते हैं। लेकिन जब तू पैदा हुई, हम दिल्ली में थे। इसीलिए बच गई। तुझे अगर उन्होंने ढूँढ़ लिया..."
"माँ, मैं अभी वहाँ हूँ।"
"मुझे पता है। और इसीलिए तू अभी लौट आ। अभी। मैं गाड़ी भेज रही हूँ। सुबह पहुँच जाएगी।"
आरोही ने खिड़की के बाहर देखा। बारिश। अँधेरा। बादलों की गड़गड़ाहट।
"माँ, अगर मैं लौट आऊँ, तो श्राप ख़त्म नहीं होगा। तेरह साल बाद अगली आएगी। शायद मेरी अपनी बेटी। अगर मुझे कभी बेटी हुई। या मेरी बहन की बेटी। या मौसी की। यह चक्र नहीं रुकेगा माँ।"
"बेटी, तू क्या कह रही है?"
"माँ, यहाँ एक बूढ़े बाबा हैं। उन्होंने कहा है कि इस श्राप को तोड़ा जा सकता है। बस मुझे कुछ दिन चाहिए। मैं ख़तरे में नहीं आऊँगी। मैं वादा करती हूँ।"
फ़ोन के दूसरी तरफ़ माँ रो रही थीं।
"आरोही, बेटी... तेरी नानी ने आख़िरी वक़्त पर एक और बात कही थी।"
"क्या माँ?"
"उन्होंने कहा था — 'अगर वह कभी वहाँ चली गई, तो एक चीज़ याद रखना। जो सबसे पहले उसका दोस्त बनने आएगा, वही सबसे बड़ा दुश्मन होगा।'"
आरोही की साँसें थम गईं।
विक्रम त्रिपाठी।
आज शाम को आया। बिना बुलाए। बिना पहचान के। और उसकी मुरझाई तुलसी।
"माँ, मुझे अब जाना होगा।"
"आरोही, बेटी, वादा कर..."
"माँ, मैं आपको सब बता दूँगी। लेकिन अभी नहीं। बस इतना जानिए कि मैं सावधान हूँ।"
आरोही ने फ़ोन रख दिया।
खिड़की के काँच पर बारिश की बूँदें गिर रही थीं। लेकिन उन बूँदों के बीच, अंदर की तरफ़, फिर से नमी की एक परत जमने लगी थी।
आरोही ने ग़ौर से देखा। धीरे-धीरे उस नमी में शब्द बन रहे थे।
"तूने माँ को बता दिया। अच्छा किया। अब तुझे अकेला छोड़ने में मज़ा नहीं आएगा।"
रुक्मिणी
आरोही ने काँपते हाथों से खिड़की के परदे खींच दिए।
दूसरी रात
दूसरी रात पहली से भी बुरी थी। आरोही ने देवराज बाबा की बात याद रखी — दरवाज़ा मत खोलना, आवाज़ें आएँ तो आँख भी मत खोलना।
लेकिन आवाज़ें आईं। और बहुत आईं।
पहले किसी बच्चे की। बरामदे से।
"दीदी, खोलो न। मैं भीग गई हूँ। ठंड लग रही है।"
आरोही ने आँखें बंद रखीं। मन ही मन दुर्गा माँ का नाम लिया।
फिर एक औरत की। मीठी।
"आरोही, मैं तेरी नानी हूँ। तेरी माँ ने मुझे भेजा है। दरवाज़ा खोल।"
आरोही की नानी दस साल पहले गुज़र गई थीं।
फिर एक और आवाज़। इस बार माँ की।
"बेटी, मैं आ गई। मैं दरवाज़े पर हूँ। खोल।"
आरोही जानती थी कि माँ नहीं आ सकतीं। दिल्ली से रत्नपुर बारह घंटे की दूरी थी। लेकिन आवाज़ इतनी असली थी कि उसकी आँखों में आँसू आ गए।
फिर एक और आवाज़। यह उसे झकझोर गई।
अपनी ख़ुद की आवाज़।
"मुझे अंदर आने दो। मैं ठंड में मर जाऊँगी।"
आरोही ने कान बंद कर लिए। पूरी रात वह इसी तरह बैठी रही। आवाज़ें आती रहीं। कभी हँसती, कभी रोतीं, कभी गातीं।
एक बार तो बरामदे में किसी के नाचने की आवाज़ आई। पायल की छनक। लंबी, तेज़, जैसे कोई पूरे बरामदे में गोल-गोल घूम रहा हो। पायल की आवाज़ पहले धीमी थी। फिर तेज़। फिर और तेज़। जैसे कोई पागल हो गया हो और नाच रहा हो।
फिर पायल की आवाज़ सीढ़ियों पर आ गई। धीरे-धीरे ऊपर आती हुई।
छन... छन... छन...
आरोही की साँसें रुक गईं। वह जानती थी कि नीचे भगवती देवी ने दरवाज़े बंद कर रखे हैं। कोई अंदर नहीं आ सकता। लेकिन पायल की आवाज़ अब उसके कमरे के दरवाज़े तक पहुँच चुकी थी।
दरवाज़े की कुंडी खटखटी।
एक बार।
दो बार।
तीन बार।
फिर एक बच्ची की हँसी। बहुत मीठी। लेकिन उसके पीछे कुछ था — कुछ बहुत बूढ़ा। जैसे किसी सौ साल की चीज़ ने बच्ची का रूप धरा हो।
"दीदी, दरवाज़ा खोल न। मैं तेरे लिए एक तोहफ़ा लाई हूँ।"
आरोही ने कुछ नहीं कहा। बस मन में हनुमान चालीसा दोहराती रही।
"मत खोलती है तो मैं ख़ुद आ जाऊँगी। तेरी नींद में। तेरे सपनों में।"
फिर एक अजीब सी आवाज़ आई। जैसे कोई दरवाज़े में से रिस रहा हो। पानी की तरह। आरोही ने आँखें खोलने का लालच रोका। लेकिन बदन से पसीना बह रहा था।
तभी उसे उस ताबीज़ की याद आई जो बाबा ने दिया था। उसने उसे कसकर पकड़ लिया। ताबीज़ गरम हो गया। इतना गरम कि हथेली जलने लगी। लेकिन उसने नहीं छोड़ा।
दरवाज़े के बाहर एक चीख़ गूँजी। एक दर्दनाक चीख़। बच्ची की नहीं। किसी और की। किसी बहुत पुरानी चीज़ की।
फिर सब कुछ चुप।
लेकिन आरोही ने आँखें नहीं खोलीं।
एक और आवाज़ आई। इस बार पूरी अलग। ज़्यादा ठंडी। ज़्यादा असली।
"तूने ताबीज़ पहना है। अच्छा किया। आज बच गई। लेकिन एक दिन तू सो जाएगी। और उस दिन ताबीज़ काम नहीं आएगा।"
आरोही ने आँखें नहीं खोलीं।
सुबह चार बजे के आसपास सब चुप हो गया।
फिर एक अंतिम आवाज़ आई। खिड़की के बाहर से।
"अच्छा, आज नहीं। ग्यारह दिन और हैं। कल तेरी बहन कोशिश करेगी।"
आरोही उसी हालत में सो गई। ताबीज़ उसके हाथ में था। हथेली पर एक जलन का निशान बन गया था। जो कई दिनों तक नहीं मिटा।
सुबह की खोज
आरोही जब सुबह उठी, तो देखा कि उसके कमरे में सब कुछ अपनी जगह पर था। लेकिन उसकी नोटबुक — जो उसने बंद करके तकिये के पास रखी थी — अब खुली पड़ी थी।
एक पन्ने पर, उसकी अपनी हस्तलिपि में, कुछ लिखा था। लेकिन आरोही ने वह नहीं लिखा था।
"मंदिर के पीछे कुआँ। कुएँ के नीचे तहख़ाना। वहाँ जा। लेकिन अकेली। विक्रम के साथ मत जाना। वह मेरा भाई है।"
आरोही ने पन्ना पढ़ा। दोबारा पढ़ा।
रुक्मिणी का भाई?
रुक्मिणी की डायरी में तो सिर्फ़ एक बहन का ज़िक्र था — कमला। कोई भाई नहीं।
तो विक्रम कौन है?
आरोही उठी। मुँह धोया। नीचे उतरी। भगवती देवी चाय बना रही थीं।
"दादी, मुझे मंदिर देखना है।"
भगवती देवी ने काँपती हाथों से चाय दी।
"आज? इस बारिश में?"
"हाँ। अकेली। आप मेरे साथ मत आइए।"
भगवती देवी ने ज़्यादा नहीं पूछा। बस इतना कहा, "बेटी, मंदिर के पिछले हिस्से में मत जाना। वहीं मीरा गई थी। और वहीं से कभी वापस नहीं आई।"
आरोही ने अपना बैग लिया। टॉर्च। कैमरा। और एक चीज़ जो उसने कल रात बाबा से माँगकर मंगवाई थी — भगवती देवी के हाथों से।
एक तांबे का ताबीज़, जिस पर कोई पुरानी लिपि में मंत्र खुदा था। बाबा ने कहा था — "इसे गले में पहनकर मंदिर में जाना। यह तुझे उस तक पहुँचने देगा जहाँ पहले कोई नहीं पहुँच सका।"
आरोही ने ताबीज़ पहना। बाहर निकली।
बारिश हल्की हो गई थी। लेकिन कोहरा घना था। गाँव की गलियों में कोई नहीं था। बस एक कुत्ता कोने में बैठा था — बहुत दुबला, कान झुके, आँखें बीमार सी।
जब आरोही पास से गुज़री, कुत्ते ने सिर उठाकर उसकी तरफ़ देखा। और फिर एक अजीब सी आवाज़ में रोया। इंसानी रोने जैसा।
आरोही तेज़ चलने लगी।
पुराना मंदिर
मंदिर गाँव के पूर्वी छोर पर था। एक ऊँची टीले पर बना हुआ। पत्थर की सीढ़ियाँ ऊपर तक जाती थीं। सीढ़ियाँ बहुत पुरानी थीं। जगह-जगह टूटी हुई। उन पर काई जमी थी।
आरोही ऊपर चढ़ी।
मंदिर का दरवाज़ा खुला था। अंदर घुप्प अँधेरा। छत का एक हिस्सा गिरा हुआ। उस हिस्से से बारिश की बूँदें अंदर आ रही थीं। ज़मीन पर पत्थर की एक मूर्ति थी — देवी की। लेकिन मूर्ति का चेहरा टूटा हुआ था। जैसे किसी ने जान-बूझकर तोड़ दिया हो।
आरोही ने टॉर्च जलाई। अंदर घुसी।
मंदिर के अंदर की हवा भारी थी। पुराने धूप की गंध। और उसके नीचे कुछ और — कुछ मीठा, कुछ सड़ा हुआ, जैसे बहुत पुरानी लाश।
आरोही ने ताबीज़ को अपने हाथ में पकड़ लिया।
देवी की मूर्ति के पीछे एक छोटा सा दरवाज़ा था। पत्थर का। आरोही ने उसे धकेला। दरवाज़ा हिला नहीं।
फिर उसने एक और तरकीब सोची। उसने ताबीज़ को दरवाज़े के पास ले जाकर लगाया।
दरवाज़ा धीरे से खिसका। जैसे किसी ने अंदर से खोल दिया हो।
अंदर एक और कमरा था। छोटा। बहुत पुराना। दीवारों पर कुछ लिखा था — संस्कृत में। आरोही को थोड़ी बहुत संस्कृत आती थी। उसने पढ़ने की कोशिश की।
"बंधन तेरह पर टूटेगा। तेरह जो लौटेगी। लेकिन शर्त एक है — तेरहवीं को अपने ख़ून से बंधन तोड़ना होगा।"
अपने ख़ून से।
आरोही ने आगे पढ़ा।
"जिसने बंधन बनाया, वह भी तेरह बार जन्म ले चुका है। हर तेरह साल एक नया शरीर। तेरहवीं बार वह अपने असली रूप में आएगा। उसे उसी रूप में मारना होगा। नहीं तो चक्र फिर शुरू होगा।"
आरोही की उँगलियाँ काँप रही थीं।
कमरे के बीच में एक छोटी सी सुरंग थी। नीचे जाती हुई। पत्थर की सीढ़ियाँ।
तहख़ाना।
आरोही ने गहरी साँस ली।
टॉर्च को ठीक से पकड़ा। नीचे उतरना शुरू किया।
सीढ़ियाँ पंद्रह-बीस थीं। नीचे पहुँचकर उसने टॉर्च चारों तरफ़ घुमाई।
एक बड़ा कमरा। बीच में एक पत्थर की मेज़। मेज़ पर बारह छोटी-छोटी मूर्तियाँ थीं। हर मूर्ति एक लड़की की। हर एक की आँखें बंद।
रुक्मिणी। तुलसी। लक्ष्मी। कौशल्या... और बाक़ी सब।
बारह मूर्तियों के पास एक ख़ाली जगह थी। तेरहवीं मूर्ति के लिए।
आरोही की मूर्ति के लिए।
लेकिन मेज़ के पीछे — दीवार पर — कुछ था जिसने आरोही की जान निकाल दी।
एक बहुत बड़ा चित्र। पुरानी शैली का। पानी के रंगों से बना। एक आदमी का। उसका चेहरा साफ़ था। बिल्कुल साफ़। जैसे किसी ने कल पेंट किया हो।
वह चेहरा विक्रम त्रिपाठी का था।
बिल्कुल वही आँखें। वही नाक। वही मुस्कान। वही ठोड़ी का तिल।
लेकिन चित्र के नीचे तारीख़ लिखी थी — 1857।
169 साल पहले।
आरोही चित्र के पास गई। हाथ बढ़ाया। छूने की हिम्मत नहीं हुई।
चित्र के नीचे, एक पत्थर की तख़्ती पर संस्कृत में कुछ खुदा था।
"यह देवीदास तांत्रिक हैं। रत्नपुर के मूल संस्थापक। जिन्होंने तेरहवीं शक्ति की साधना की। जो अजर-अमर हुए। हर तेरह साल में एक नया शरीर पकड़ते हैं। जो उनकी साधना को समझेगा, वह मुक्त होगा।"
देवीदास।
आरोही ने यह नाम कहीं पढ़ा था। कमला देवी की डायरी में। एक जगह। लेकिन तब उसे लगा था कि यह कोई पुजारी होगा।
अब वह समझी।
देवीदास एक तांत्रिक था। जिसने कोई काली विद्या साधी थी। जो हर तेरह साल पर एक ताज़ी दुल्हन की बलि लेकर अपनी जान बढ़ाता था। और अब वह विक्रम के रूप में उसके सामने आया था।
आरोही ने चित्र के आस-पास और चीज़ें देखीं। एक कोने में एक पुरानी टोकरी थी। उसमें कुछ रखा था। आरोही ने टॉर्च से देखा।
लाल चूड़ियाँ।
बहुत सारी। शायद सौ से ज़्यादा। हर जोड़ी अलग। हर एक के साथ एक छोटा सा नाम-पत्र लगा था।
आरोही ने पहली उठाई। नाम पढ़ा — "रुक्मिणी। 1870।"
दूसरी। "तुलसी। 1883।"
तीसरी। "कौशल्या। 1896।"
बारहवीं। "मीरा। 2013।"
लेकिन एक और जोड़ी थी। बिल्कुल नई। अभी की। आरोही ने उसे उठाया।
नाम-पत्र पर लिखा था — "आरोही। 2026।"
चूड़ियाँ अभी छनक रही थीं। जैसे किसी ने अभी-अभी उन्हें रखा हो।
आरोही ने चूड़ियाँ नीचे रख दीं। बदन पूरा ठंडा पड़ गया था।
तभी तहख़ाने में एक हल्की सी आवाज़ आई।
पत्थर की मेज़ पर रखी बारह मूर्तियाँ — उन सबकी आँखें एक साथ खुल गईं।
बारह जोड़ी आँखें। जो सीधे आरोही की तरफ़ देख रही थीं।
और फिर उन बारह मूर्तियों ने एक साथ एक ही वाक्य बोला। बच्चों जैसी आवाज़ में। लेकिन शब्द बहुत पुराने।
"स्वागत है दीदी। हम बहुत दिनों से तेरा इंतज़ार कर रही थीं।"
(भाग 3 समाप्त। भाग 4 में जारी...)
अगले भाग में:
1857 में विक्रम त्रिपाठी कौन था? क्या सच में वह हर तेरह साल पर नया शरीर पकड़ता है? रुक्मिणी की डायरी में विक्रम को "भाई" क्यों बताया गया है? और मंदिर के तहख़ाने से बाहर निकलते ही आरोही की मुलाक़ात होगी एक ऐसे किरदार से, जिसे वह अपनी माँ का पुराना फ़ोटो देखते वक़्त कई बार देख चुकी है — लेकिन कभी उसका नाम नहीं जान पाई।
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