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भाग 2 : भगवती देवी का सच और बूढ़े तांत्रिक की चेतावनी
Piyashi Atma · Psychological Horror · 19 मिनट
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- तेरहवीं अमावस
- Chapter
- 2 of 23
- Category
- Psychological Horror
- Reading time
- 19 min
- Words
- 3631
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
तेरहवीं अमावस
भाग 2 : भगवती देवी का सच और बूढ़े तांत्रिक की चेतावनी
उस रात के बाद
आरोही उस रात सो नहीं सकी। भगवती देवी ने उसके कमरे में एक दीया जलाकर रखा और तुलसी की माला उसके तकिये के नीचे रख दी। "यह रात कट जाएगी बेटी," उन्होंने कहा। "कल सुबह बात करेंगे।"
लेकिन कल सुबह की बात करना और उस रात को कटना — दोनों बहुत अलग चीज़ें थीं।
आरोही अपने बिस्तर पर बैठी रही। पीठ दीवार से टिकी थी। आँखें खिड़की पर टिकी थीं। हर आवाज़ पर वह चौंकती। हवा में पेड़ों की सरसराहट, कहीं दूर कुत्ते का भौंकना, छत पर किसी चूहे के दौड़ने की आवाज़ — हर आवाज़ अब उसे किसी बड़े ख़तरे का संकेत लग रही थी।
दीये की लौ काँप रही थी। कमरे की दीवारों पर परछाइयाँ नाच रही थीं। एक बार आरोही को लगा कि उसकी अपनी परछाईं दीवार पर उसके साथ हिलना बंद कर देती है, जैसे उसकी अपनी कोई मर्ज़ी हो। लेकिन जब उसने ग़ौर से देखा, सब सामान्य था। शायद उसका दिमाग़ थका हुआ था। शायद डर से मन ऐसी चीज़ें दिखाने लगता है जो हैं ही नहीं।
लगभग चार बजे, जब बाहर हल्की सी सफ़ेदी दिखनी शुरू हुई, आरोही की आँख लगी। नींद में उसने एक सपना देखा।
वह एक पुरानी हवेली के बरामदे में खड़ी थी। उसके पैरों में लाल चूड़ियाँ बिखरी थीं। कुछ टूटी हुई थीं। उनके नुकीले टुकड़ों पर ख़ून लगा था — ताज़ा, अभी बहा हुआ। आरोही ने अपने पैर देखे। उसके पैर भी लहूलुहान थे। लेकिन दर्द नहीं हो रहा था। जैसे उसके पैर उसके अपने नहीं थे।
सामने एक कुआँ था। पुराना, पत्थर का। उसके ऊपर एक टूटी हुई घिरनी लटक रही थी। घिरनी पर एक रस्सी थी। रस्सी कुएँ के अंदर जा रही थी। लेकिन रस्सी हिल रही थी, जैसे नीचे कोई उसे खींच रहा हो।
कुएँ के अंदर से पानी की आवाज़ आ रही थी। लेकिन पानी की आवाज़ अजीब थी — जैसे कोई पानी में साँस ले रहा हो। धीमी साँसें। बारह लोगों की एक साथ। ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे।
आरोही कुएँ के पास गई। उसका बदन काँप रहा था। लेकिन उसके पैर आगे बढ़ते जा रहे थे, जैसे किसी और के हुक्म पर। झुककर देखा।
पानी नहीं था कुएँ में।
बस बारह लड़कियाँ थीं। एक के ऊपर एक। सब गीली। सब सफ़ेद। सब आँखें बंद किए। और सबसे नीचे वाली की गोद में एक जगह ख़ाली थी। जैसे किसी की जगह बचाकर रखी गई हो।
तेरहवीं जगह।
सबसे ऊपर वाली लड़की ने अपनी आँखें खोलीं। आँखें आरोही जैसी थीं। बिल्कुल आरोही जैसी।
"आ जा दीदी," वह बोली। "हम सब तेरा इंतज़ार कर रही हैं।"
आरोही की आँख खुली। बाहर सुबह हो चुकी थी।
लेकिन उसका तकिया गीला था। जैसे उस पर पानी गिरा हो। और तकिये के नीचे रखी तुलसी की माला के सारे मनके काले पड़ चुके थे। जैसे किसी ने उन्हें आग में जला दिया हो।
भगवती देवी का सच
सुबह नौ बजे आरोही नीचे आई। भगवती देवी रसोई में थीं। चूल्हे पर चाय उबल रही थी। जब आरोही अंदर आई, उन्होंने पलटकर देखा। उनकी आँखों के नीचे भी काले घेरे थे। वे भी रात भर नहीं सोई थीं।
"बैठ जा।"
आरोही बैठ गई। भगवती देवी ने चाय दी। एक थाली में गरम रोटी और आलू की सब्ज़ी परोसी। लेकिन आरोही से खाया नहीं जा रहा था।
"दादी, अब मुझे सब बताइए। शुरू से।"
भगवती देवी ने अपनी चाय की चुस्की ली। कुछ देर चुप रहीं। फिर धीरे से बोलीं।
"मीरा मेरी इकलौती बेटी थी। मैंने उसे बहुत मुश्किल से पाया था। शादी के दस साल बाद वह मेरी गोद में आई थी। मैं उसे पलकों पर बिठाकर रखती थी। जब वह अठारह साल की हुई, तो हमने उसका रिश्ता तय किया। लड़का अल्मोड़ा का था। पढ़ा-लिखा। सरकारी नौकरी में। हम बहुत ख़ुश थे।"
भगवती देवी ने चाय का कप रखा। उनके हाथ काँप रहे थे।
"शादी की तारीख़ थी 24 अक्टूबर, 2013। कार्तिक की अमावस के अगले दिन। हमें उस वक़्त इस श्राप के बारे में कोई कहानी सुनी थी, लेकिन हमने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। पंडित जी ने भी कहा था कि यह लग्न सबसे शुभ है। हम इंकार नहीं कर पाए।"
"फिर?"
"शादी से एक रात पहले, यानी अमावस की रात, मीरा ने अपने कमरे में शादी का जोड़ा पहना और आईने के सामने खड़ी हो गई। मैं नीचे थी, रिश्तेदारों के साथ। तभी ऊपर से मीरा की आवाज़ आई। वह किसी से बात कर रही थी।"
भगवती देवी की आवाज़ भर्रा गई।
"मैं ऊपर गई। कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था। मैंने खटखटाया। मीरा ने खोला नहीं। मैंने कान लगाकर सुना। वह किसी से बहस कर रही थी। एक औरत की आवाज़ आ रही थी अंदर से। लेकिन कमरे में कोई नहीं होना चाहिए था। खिड़की बंद थी। दरवाज़ा बंद था।"
"आपने क्या सुना?"
"वह औरत मीरा से कह रही थी — 'तू तो मेरी बेटी है। मेरी सबसे प्यारी बेटी। चल मेरे साथ। तेरी असली दुनिया वहाँ है।' और मीरा उसे कह रही थी — 'नहीं माँ, नहीं। मेरी माँ नीचे है। मुझे मत ले जाओ।' फिर औरत ने कहा — 'तेरी असली माँ मैं हूँ। तेरी नक़ली माँ ने तुझे चुराया था।' और मीरा रोने लगी।"
आरोही ने आँखें बड़ी की। "यह... यह कैसे हो सकता है?"
"मैंने दरवाज़ा तोड़ा। जब मैं अंदर पहुँची, कमरे में कोई नहीं था। बस मीरा थी। ज़मीन पर बैठी। शादी का जोड़ा फटा हुआ। बाल बिखरे। आँखों में आँसू। लेकिन जब मैंने उसे छुआ, उसने मुझे धक्का दिया। बोली — 'तुम मेरी माँ नहीं हो।' और भागी।"
"कहाँ?"
"मंदिर की तरफ़। पुराने मंदिर। जो गाँव के छोर पर है। जिसकी छत टूटी हुई है। हम सब पीछे भागे। लेकिन जब हम मंदिर तक पहुँचे, मीरा वहाँ नहीं थी।"
भगवती देवी ने अपना आँचल आँखों पर रखा।
"बस उसका शादी का जोड़ा पड़ा था। मंदिर के प्रांगण में। और मंदिर के पिछले हिस्से में — जहाँ पुराना कुआँ है — वहाँ की मिट्टी गीली थी। जैसे किसी ने वहाँ पानी बहाया हो। लेकिन कुआँ तो पचास साल से सूखा पड़ा है।"
भगवती देवी की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
"मीरा के जोड़े में एक चिट्ठी थी। उसकी अपनी हस्तलिपि में। लेकिन शब्द अजीब थे। जैसे किसी ने उसका हाथ पकड़कर लिखवाया हो।"
"क्या लिखा था?"
"'माँ, मुझे माफ़ करना। मैं जा रही हूँ जहाँ मुझे जाना है। तुम मेरी सगी माँ नहीं हो। मेरी असली माँ रुक्मिणी है। वह मुझे बुला रही है। बहन के इंतज़ार में। बहन जब आएगी, तब हम सब एक होंगी।' और चिट्ठी के आख़िर में उसका नाम था। लेकिन वह मीरा नहीं लिखा था। उसने अपने आप को कोई और नाम दिया था।"
"क्या नाम?"
भगवती देवी ने आरोही की आँखों में देखा। "उसने लिखा था — 'तेरहवीं की बड़ी बहन।'"
आरोही की साँसें रुक गईं। पिछली रात के सपने में सबसे ऊपर वाली लड़की ने उसे 'दीदी' कहा था। लेकिन अब आरोही समझी। वह 'दीदी' नहीं थी। वह 'बहन' थी। तेरहवीं की तक़दीर से बँधी हुई।
आरोही का दिल एक बार फिर काँप गया। सपने में उसने भी एक कुआँ देखा था। बारह लड़कियाँ थीं उसमें।
"दादी," आरोही ने काँपती आवाज़ में पूछा, "क्या... क्या उस मंदिर का कोई राज़ है?"
भगवती देवी ने सिर हिलाया। "पूरा गाँव जानता है कि उस मंदिर में कुछ है। लेकिन कोई बात नहीं करता। पंडित जी भी नहीं। लेकिन इस गाँव में एक आदमी है जो सब जानता है।"
"कौन?"
"देवराज बाबा।"
देवराज बाबा
"देवराज बाबा कौन हैं?"
भगवती देवी ने कहा, "वह इस गाँव के सबसे बूढ़े आदमी हैं। कहते हैं कि उनकी उम्र सौ साल से ज़्यादा है। जवानी में वे तांत्रिक थे। 1913 में जब तीसरी लड़की गायब हुई थी — कौशल्या नाम था उसका — तब देवराज बाबा उसे बचाने की कोशिश में लगे थे। उनकी उम्र तब बीस-बाईस साल थी। वे नाकाम रहे। कौशल्या भी गायब हो गई। लेकिन उस रात कुछ ऐसा हुआ जिसके बाद देवराज बाबा हमेशा के लिए बदल गए।"
"क्या हुआ?"
"मुझे पूरा नहीं पता। लेकिन गाँव वाले कहते हैं कि उस रात उन्होंने कुछ देखा था। कुछ ऐसा जो कोई इंसान देख नहीं सकता। उस दिन के बाद उन्होंने तंत्र-मंत्र छोड़ दिया। घर छोड़ दिया। शादी नहीं की। एक झोपड़ी बना ली गाँव के बाहर जंगल में। बस वहीं रहते हैं।"
"क्या वह मुझसे मिलेंगे?"
"मुझे नहीं पता। कोई नहीं जानता। कई बार लोग उनके पास मदद के लिए जाते हैं। कभी वे मिलते हैं, कभी नहीं। पिछली बार जब मैं गई थी..."
भगवती देवी रुक गईं।
"आप कब गई थीं?"
"जब मीरा गई थी। मैं उनसे पूछने गई थी कि मेरी बेटी को कैसे वापस लाऊँ। लेकिन उन्होंने मुझसे मिलने से इंकार कर दिया। बस झोपड़ी के अंदर से एक ही बात कही — 'तेरी बेटी अब उस दुनिया में है जहाँ से कोई नहीं लौटता। लेकिन अगर तू एक काम कर सके, तो शायद अगली को बचा सके।'"
"क्या काम?"
"मुझे नहीं बताया। बस इतना कहा — 'तेरहवीं आएगी जब जाएगी वह अपने आप जान जाएगी।' और मुझे भगा दिया।"
आरोही ने खिड़की से बाहर देखा। बादल फिर घने हो रहे थे। मंदिर की टूटी छत गाँव के छोर पर दिख रही थी।
"दादी, आप मुझे उनके पास ले चलेंगी?"
भगवती देवी ने कुछ पल आरोही को देखा। फिर धीरे से सिर हिलाया।
"चल।"
जंगल की झोपड़ी
देवराज बाबा की झोपड़ी गाँव से दो किलोमीटर दूर थी। रास्ता चीड़ के घने जंगल से गुज़रता था। दोपहर के बारह बजे थे, लेकिन जंगल के अंदर ऐसा अँधेरा था जैसे शाम हो गई हो। पेड़ इतने ऊँचे थे कि सूरज की रोशनी नीचे तक नहीं पहुँच रही थी।
रास्ते में आरोही ने भगवती देवी से एक और सवाल पूछा।
"दादी, आपको कैसे पता चला कि तेरहवीं मेरे परिवार से होगी?"
भगवती देवी चलते-चलते रुक गईं। उन्होंने आरोही की ओर देखा।
"जिस रात मीरा गई, उस रात उसकी अंतिम आवाज़ मैंने सुनी थी। जब वह भागते-भागते मंदिर की ओर जा रही थी। वह एक बात बार-बार कह रही थी।"
"क्या?"
"'रुक्मिणी की बहन का ख़ून लौटेगा। रुक्मिणी की बहन का ख़ून लौटेगा।' मैंने तब नहीं समझा। लेकिन बाद में जब मैंने गाँव के पुराने रजिस्टर देखे, तो पता चला कि रुक्मिणी के परिवार में एक छोटी बहन थी। कमला। जो 1876 में गाँव छोड़कर चली गई थी। उसके बाद उस परिवार का कोई सदस्य कभी रत्नपुर नहीं लौटा।"
"1876 से 2026 तक... 150 साल।"
"हाँ। और तू लौट आई। कमला की परनानी की पोती।"
आरोही ने कुछ नहीं कहा। बस चलती रही।
आगे एक साफ़ जगह आई। बीच में एक छोटी सी झोपड़ी थी। मिट्टी की। छत पर सूखी घास। दरवाज़ा लकड़ी का। बाहर एक धूनी जल रही थी — दिन में भी। धुएँ की खुशबू अजीब थी। कड़वी और मीठी दोनों।
"यहीं रहते हैं देवराज बाबा।"
आरोही ने दरवाज़े की ओर क़दम बढ़ाया। लेकिन तभी अंदर से एक आवाज़ आई।
"रुक।"
आरोही ठिठकी।
"अकेली आ। बुढ़िया वापस जाए।"
भगवती देवी ने आरोही की ओर देखा। "बेटी, तू जा। मैं यहीं बाहर हूँ।"
आरोही ने गहरी साँस ली। दरवाज़े को धकेला। अंदर आई।
देवराज बाबा से मुलाक़ात
झोपड़ी के अंदर बहुत अँधेरा था। बस बीच में एक छोटी सी आग जल रही थी। आग के उस पार एक बूढ़ा आदमी बैठा था। इतना बूढ़ा कि उसका शरीर हड्डियों का ढाँचा लगता था। सफ़ेद बाल कमर तक। सफ़ेद दाढ़ी छाती तक। बदन पर बस एक गेरुआ चादर। लेकिन उसकी आँखें — उसकी आँखें जवान थीं। तेज़, चमकदार, जैसे किसी बीस साल के आदमी की।
"बैठ।"
आरोही आग के दूसरी तरफ़ बैठ गई।
देवराज बाबा ने उसे कुछ देर तक देखा। बहुत ग़ौर से। जैसे उसके चेहरे में कुछ पढ़ रहे हों।
"तेरा नाम आरोही है।"
"जी।"
"तेरी माँ का नाम सुधा। नानी जानकी। परनानी कमला। और परनानी की बहन..."
"रुक्मिणी।"
देवराज बाबा ने आँखें बंद कीं। कुछ देर के लिए। फिर धीरे से बोले, "मैं 113 साल से इस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ, बेटी।"
आरोही चौंकी। "113 साल?"
"मेरी उम्र 133 साल है। 1893 में पैदा हुआ था। 1913 में मैंने पहली बार यह श्राप देखा। तब मैं बीस साल का था। मेरे गुरु मुझे सिखा रहे थे तंत्र। मैंने सोचा था कि मैं कौशल्या को बचा सकता हूँ। लेकिन मैंने ग़लती की। और मेरी ग़लती की सज़ा कौशल्या ने भोगी।"
"क्या हुआ था उस रात?"
बाबा ने आग को कुरेदा। अंगारे चमके। उनके चेहरे पर परछाइयाँ नाची।
"मैंने सोचा था कि यह श्राप कोई साधारण भूत का काम है। मैंने एक रक्षा-चक्र बनाया कौशल्या के घर के चारों तरफ़। मंत्रों से बांधा। मैंने सोचा था कि कोई बुरी आत्मा उस चक्र को पार नहीं कर सकती। लेकिन आधी रात को कौशल्या ख़ुद घर से बाहर आई। रक्षा-चक्र को पार करके। क्यों?"
आरोही ने कुछ नहीं कहा।
"क्योंकि जिसने उसे बुलाया था, वह बाहर से नहीं आया था। वह उसके अंदर था।"
"कैसे?"
"बेटी, तूने कभी सोचा है कि इन बारह लड़कियों में क्या समानता है? सब कुँआरी थीं। सब सुंदर थीं। लेकिन उससे भी बड़ी एक चीज़ थी। सबका जन्म एक ख़ास दिन हुआ था।"
"कौन सा दिन?"
"कार्तिक की अमावस। जिस दिन रुक्मिणी गई थी 1870 में, उसी दिन तेरह साल बाद तुलसी पैदा हुई थी। तुलसी जब गई, तेरह साल बाद लक्ष्मी पैदा हुई। और ऐसे ही यह चक्र चलता रहा। हर तेरह साल एक नई लड़की पैदा होती है — उसी अमावस को। और तेरह साल बाद वह अपनी शादी की रात से एक रात पहले गायब हो जाती है।"
आरोही की साँसें रुक गईं।
"बाबा... मेरा जन्म..."
"तेरा जन्म कब हुआ था, बेटी?"
आरोही ने बहुत मुश्किल से कहा, "26 अक्टूबर, 2000।"
बाबा ने आँखें बंद कीं। धीरे से बोले, "2000 की कार्तिक अमावस थी 26 अक्टूबर को। तू उसी रात पैदा हुई थी। तेरह साल बाद 2013 में मीरा गई। और तेरह साल बाद, यानी इस साल, तेरी बारी है।"
आरोही की आँखों के सामने कमरा घूम गया।
"लेकिन बाबा... मेरी शादी नहीं हो रही। मैंने अभी शादी करने का सोचा भी नहीं।"
"बेटी, शादी होना ज़रूरी नहीं। शादी की तैयारी होना ज़रूरी है। जिस लड़की के मन में शादी का ख़याल आया है, जिसका रिश्ता बात-चीत में है, जिसके परिवार वालों ने कोई लड़का देखा है — वही शिकार है।"
आरोही की गर्दन झुक गई।
पिछले महीने ही उसकी माँ ने एक रिश्ते की बात की थी। एक इंजीनियर लड़का। मुंबई में। आरोही ने अभी हाँ नहीं की थी। लेकिन बात चल रही थी। घर में उसकी शादी का ज़िक्र हो रहा था।
"बाबा... क्या मुझे बचाया जा सकता है?"
देवराज बाबा ने कुछ देर आग की तरफ़ देखा। फिर धीरे से बोले, "बेटी, एक ही तरीक़ा है। लेकिन वह इतना ख़तरनाक है कि मैं तुझे नहीं बताऊँगा। पहले तुझे कुछ चीज़ें जाननी होंगी।"
"क्या?"
"रुक्मिणी कोई शैतान नहीं है। रुक्मिणी एक शिकार है। जो असली शैतान है, वह किसी और के अंदर छिपा है। रुक्मिणी सिर्फ़ इस श्राप का हथियार है। तुझे उस असली शैतान तक पहुँचना होगा।"
आरोही ने पूछा, "बाबा, अगर रुक्मिणी शिकार है, तो वह हमें क्यों बुला रही है? क्यों वह हर तेरह साल पर एक लड़की को ले जाती है?"
बाबा ने एक लंबी साँस ली। धुएँ की तरह उनकी साँस निकली।
"क्योंकि उसे बंधन में रखा गया है, बेटी। और बंधन की एक शर्त है। हर तेरह साल पर एक ताज़ा ख़ून। एक ताज़ी साँस। एक ताज़ी दुल्हन। जो देवता नहीं दे सकते, वह श्राप देता है। रुक्मिणी अपनी मर्ज़ी से नहीं बुला रही। उसे मजबूर किया जा रहा है। हर लड़की को वह अपनी बहन बनाकर लेती है। लेकिन असल में वह उन्हें उसी अँधेरे में क़ैद कर रही है जिसमें वह ख़ुद क़ैद है।"
"तो अगर हम असली शैतान को मार दें..."
"तो रुक्मिणी और वे बारह लड़कियाँ मुक्त हो जाएँगी। और यह चक्र टूट जाएगा। हमेशा के लिए।"
आरोही ने पूछा, "बाबा, वह असली शैतान कौन है? कोई इंसान? कोई आत्मा?"
बाबा ने आँखें बंद कीं। "यह मुझे पूरा नहीं पता। लेकिन इतना जानता हूँ — वह इंसान के रूप में इस गाँव में घूमता है। पीढ़ी दर पीढ़ी। कभी बूढ़ा, कभी जवान, कभी बच्चा। एक शरीर छोड़कर दूसरा पकड़ लेता है। जब भी एक लड़की मरती है, उसे नया शरीर मिलता है।"
"तो अभी वह किसमें है?"
"मुझे शक है, लेकिन यक़ीन नहीं। मैंने पिछले तेरह सालों में गाँव में बहुत लोगों को देखा है। कुछ नए लोग आए। कुछ पुराने गए। लेकिन असली शैतान अपने आप को छिपाना जानता है।"
"वह कौन है?"
बाबा ने आँखें आरोही पर टिकाईं। बहुत गंभीरता से बोले।
"वह इसी गाँव में रहता है। और मुझे शक है कि तेरे आने की ख़बर उसे कल रात ही मिल गई थी।"
झोपड़ी से बाहर
आरोही झोपड़ी से बाहर निकली। बाहर भगवती देवी बैठी थीं। दोपहर तीन बज चुके थे। बादल अब पूरे आसमान पर छा गए थे।
"क्या कहा उन्होंने?"
आरोही ने कुछ नहीं कहा। बस उनके साथ चलने लगी। रास्ते में एक बार पीछे पलटकर देखा। झोपड़ी के दरवाज़े पर देवराज बाबा खड़े थे। उनका चेहरा दूर से भी साफ़ दिख रहा था।
उनके होंठ हिले।
आरोही को उनकी आवाज़ इतनी दूर से भी सुनाई दी। जैसे वह उसके कान में बोल रहे हों।
"बेटी, आज रात दरवाज़ा मत खोलना। कोई भी आवाज़ आए, आँख भी मत खोलना। और कल सुबह सूरज उगते ही मेरे पास आना। तेरे पास बस बारह दिन हैं।"
आरोही ने सिर हिलाया।
वह और भगवती देवी वापस गाँव की तरफ़ चलने लगीं। लेकिन जब वे जंगल के आख़िरी मोड़ पर पहुँचीं, तब आरोही ने एक बात देखी जिसने उसकी सारी हिम्मत तोड़ दी।
रास्ते के किनारे एक पेड़ के तने पर कुछ लिखा था। ताज़े ख़ून से। जो अभी सूखा नहीं था।
"बारह दिन नहीं, आरोही। ग्यारह।"
नीचे उसी हस्ताक्षर में — रुक्मिणी।
आरोही ने भगवती देवी की तरफ़ देखा।
"दादी..."
लेकिन भगवती देवी ने पेड़ की ओर देखा नहीं। वे बस चलती रहीं। जैसे उन्हें कुछ दिखा ही न हो।
"दादी, वह लिखा हुआ..."
भगवती देवी ने बिना पीछे मुड़े कहा, "बेटी, कुछ चीज़ें तुझे ही दिखेंगी। मुझे नहीं। बस तू और वो जो तुझे बुला रही है।"
आरोही ने एक बार फिर पेड़ की तरफ़ देखा।
पेड़ पर अब कुछ भी नहीं लिखा था। तना साफ़ था।
शाम की बात
गाँव वापस पहुँचकर आरोही ने खाना नहीं खाया। वह अपने कमरे में गई। कैमरा उठाया। बैग खोला। कुछ काग़ज़ निकाले।
फिर वह डायरी उठाई। कमला देवी की डायरी।
रात वाली नई पंक्ति अभी भी वहाँ थी। लेकिन उसके नीचे एक और पंक्ति जुड़ गई थी। जो सुबह नहीं थी।
"बहन, तू बाबा से मिली न? वह झूठ बोल रहा है। तुझे उसकी बात नहीं माननी चाहिए।"
आरोही ने डायरी बंद कर दी।
खिड़की के बाहर बादल गड़गड़ा रहे थे। बिजली चमक रही थी। बारिश शुरू होने वाली थी।
तभी नीचे भगवती देवी की आवाज़ आई।
"आरोही, बेटी, कोई तुझसे मिलने आया है।"
आरोही चौंकी। इस गाँव में उसे कौन जानता था?
वह नीचे उतरी।
दरवाज़े पर एक जवान आदमी खड़ा था। शायद तीस साल का। लंबा। दुबला। साफ़-सुथरे कपड़े। शहरी लगता था। हाथ में एक फ़ाइल थी।
"नमस्ते, आरोही जी।"
आरोही ने उसे ग़ौर से देखा। "आप कौन हैं?"
"मेरा नाम विक्रम है। विक्रम त्रिपाठी। मैं भी आपकी तरह एक शोधकर्ता हूँ। नैनीताल विश्वविद्यालय से। रत्नपुर पर मेरा भी शोध चल रहा है। मुझे कल रात पता चला कि आप यहाँ आई हैं। सोचा मिल लूँ।"
आरोही ने कुछ पल विक्रम को देखा। उसका चेहरा साफ़ था। मुस्कान अच्छी थी। आँखें भूरी।
लेकिन उसकी आँखों के पीछे कुछ था। कुछ जो आरोही पहचान नहीं पा रही थी।
तभी उसे देवराज बाबा की एक बात याद आई।
"वह इसी गाँव में रहता है। और मुझे शक है कि तेरे आने की ख़बर उसे कल रात ही मिल गई थी।"
आरोही ने अपने आपको सँभाला। मुस्कुराई।
"आइए, विक्रम जी। अंदर आइए। चाय पीएँगे?"
विक्रम अंदर आया। जब वह आरोही के बगल से गुज़रा, तो आरोही ने एक अजीब सी चीज़ महसूस की।
उसके शरीर से गीली मिट्टी की गंध आ रही थी।
जैसे वह अभी-अभी किसी कुएँ से निकलकर आया हो।
लेकिन बाहर बारिश तो अभी शुरू ही हुई थी। और विक्रम के कपड़े बिल्कुल सूखे थे। बाल तक सूखे। जूते साफ़। तो यह गंध कहाँ से आ रही थी?
विक्रम बैठा। आरोही ने चाय बनाई। लेकिन उसके हाथ काँप रहे थे।
"आपका शोध किस विषय पर है?" आरोही ने पूछा।
विक्रम मुस्कुराया। उसकी मुस्कान बहुत मीठी थी। लेकिन उसकी आँखें नहीं मुस्कुरा रही थीं।
"वही जो आपका है, आरोही जी। रत्नपुर की गुमशुदा लड़कियाँ। मैं पिछले पाँच साल से इस विषय पर काम कर रहा हूँ। बहुत कुछ जमा किया है। शायद हम मिलकर काम कर सकें।"
आरोही ने चाय का कप उसकी ओर बढ़ाया। "मिलकर काम... कैसे?"
"मेरे पास एक चीज़ है जो शायद आपके काम आ जाए। एक पुरानी सूची। 1870 से लेकर आज तक, हर गायब हुई लड़की का पूरा ब्यौरा। उनकी तस्वीरें। उनके परिवारों के नाम। और सबसे ज़रूरी — उनके जन्म के दिन।"
आरोही चौंकी। "जन्म के दिन?"
विक्रम ने चाय की चुस्की ली। "हाँ। एक अजीब बात है, आरोही जी। सब बारह लड़कियों का जन्म एक ही दिन हुआ था। कार्तिक की अमावस। और अगली लड़की — यानी तेरहवीं — भी उसी दिन पैदा हुई होगी। शायद 2000 के आसपास।"
आरोही के हाथ से चाय का कप छूट गया। फ़र्श पर गिरकर टूट गया।
विक्रम ने कप की तरफ़ देखा। फिर आरोही की तरफ़। उसकी आँखों में अब मुस्कान नहीं थी। बस एक ठंडी सी चमक।
"आपका जन्म कब हुआ था, आरोही जी?"
बाहर बिजली कड़की। कमरे में एक क्षण के लिए सब कुछ सफ़ेद हो गया।
और उस सफ़ेद रोशनी में, आरोही ने देखा — विक्रम की परछाईं दीवार पर नहीं थी।
(भाग 2 समाप्त। भाग 3 में जारी...)
अगले भाग में:
विक्रम त्रिपाठी की असली पहचान क्या है? क्या वह देवराज बाबा का बताया हुआ "असली शैतान" है, या कोई और मदद करने वाला? कमला देवी की डायरी में कौन झूठ बोल रहा है — रुक्मिणी या देवराज बाबा? और गाँव के पुराने मंदिर का वो राज़ जो 156 साल से दबा हुआ है — क्या वह आरोही को उसकी अपनी माँ की एक ऐसी बात दिखाएगा जो उसने आज तक छिपाई थी?
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