PretikaPsychological Horrorतेरहवीं अमावस

भाग 1 : पुरानी डायरी की चीख़

Piyashi Atma · Psychological Horror · 18 मिनट

Writer
Piyashi Atma
Story
तेरहवीं अमावस
Chapter
1 of 23
Category
Psychological Horror
Reading time
18 min
Words
3492
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

तेरहवीं अमावस
भाग 1 : पुरानी डायरी की चीख़

24 अक्टूबर, 1870 — रत्नपुर, कुमाऊँ की पहाड़ियाँ
रात के बारह बज चुके थे। कार्तिक की अमावस अपने पूरे अंधकार के साथ पहाड़ों पर उतर आई थी। ऐसा लगता था जैसे आसमान ने अपनी आँखें बंद कर ली हों। न चाँद, न तारे, न जुगनू। बस एक गहरा काला परदा जो पूरी घाटी को अपने आँचल में समेटे हुए था।
रत्नपुर गाँव की एक छोटी सी हवेली की खिड़की से रुक्मिणी बाहर झाँक रही थी। उसकी उम्र मुश्किल से अठारह साल की थी। कल सुबह उसकी शादी थी। मेहँदी का रंग अभी भी उसके हाथों पर ताज़ा था, गहरा लाल, जैसे किसी ने ख़ून के छींटे मार दिए हों। लेकिन उसका दिल एक अनजाने डर से भारी था। पिछले तीन दिनों से उसे लग रहा था कि कोई उसे देख रहा है। कोई जो साँस नहीं लेता। कोई जिसके क़दमों की आहट नहीं आती।
"रुक्मिणी..."
एक फुसफुसाहट। बहुत धीमी। जैसे कोई हवा के भीतर बोल रहा हो।
उसने चौंककर पलटकर देखा। कमरे में कोई नहीं था। दीये की बत्ती काँप रही थी। तेल लगभग ख़त्म हो चुका था। दीवार पर उसकी अपनी परछाईं इस तरह हिल रही थी जैसे वह उसकी नहीं, किसी और की हो।
"रुक्मिणी... बाहर आ जा बेटी।"
इस बार आवाज़ खिड़की के बाहर से आई थी। एक बूढ़ी औरत की आवाज़। मीठी। इतनी मीठी कि सुनकर रोंगटे खड़े हो जाएँ। रुक्मिणी ने काँपते हाथों से खिड़की के जालीदार परदे को हटाया।
बाहर घुप्प अँधेरा था। लेकिन उस अँधेरे में उसे कुछ दिखा। एक साया, जो पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा था। धीरे-धीरे अपना हाथ उसकी ओर बढ़ा रहा था। उँगलियाँ लंबी थीं, बहुत लंबी। नाख़ून पीले।
"मत डर बेटी... मैं तुझे लेने आई हूँ। तेरी नई ज़िंदगी शुरू होने वाली है।"
रुक्मिणी की आँखों में आँसू भर आए। उसका शरीर हिलने से इनकार कर रहा था। लेकिन उसके पैर, जैसे किसी और के नियंत्रण में हों, दरवाज़े की ओर बढ़ने लगे। वह चाहती थी कि रुक जाए। वह चाहती थी कि चीख़े। लेकिन उसके होंठ आपस में सिल गए थे।
"रुक्मिणी! बेटी, कहाँ जा रही है इस वक़्त?"
उसकी माँ की आवाज़ बगल के कमरे से आई। लेकिन रुक्मिणी ने पलटकर नहीं देखा। वह चल रही थी। जैसे कोई कठपुतली अपनी डोर पर नाच रही हो।
बरामदे में पहुँचकर उसने अपनी लाल चूड़ियाँ उतारीं और एक-एक करके फ़र्श पर रख दीं। उसकी आँखें सामने खड़े साये पर टिकी थीं। साये की आँखें अब साफ़ दिख रही थीं — दो अंगारे, जो अँधेरे में जल रहे थे।
"आ जा..."
रुक्मिणी घर से बाहर निकल गई। नंगे पैर। खुले बाल। रात के अँधेरे में। पीछे उसकी माँ चीख़ रही थी। पिता दौड़ रहे थे। पूरा गाँव धीरे-धीरे जागने लगा था।
लेकिन जब वे बरामदे तक पहुँचे, रुक्मिणी वहाँ नहीं थी।
बस उसकी लाल चूड़ियाँ पड़ी थीं। एक टूटी हुई। और उनके पास ज़मीन पर एक भीगा हुआ निशान — किसी नंगे पैर का। मानो वह पानी से निकलकर आया हो। लेकिन गाँव में उस रात बारिश नहीं हुई थी। कोई नदी भी पास नहीं थी।
रुक्मिणी को उस रात के बाद किसी ने नहीं देखा।
पंडित जी ने बहुत खोज करवाई। पुलिस उन दिनों गाँवों तक नहीं पहुँचती थी। तांत्रिकों को बुलाया गया। सयाने बुलाए गए। लेकिन कोई नहीं बता सका कि रुक्मिणी कहाँ गई।
छह महीने बाद उसकी माँ पागल होकर मर गई। पिता ने हवेली को छोड़ दिया। रत्नपुर गाँव के इतिहास में रुक्मिणी का नाम एक फुसफुसाहट बनकर रह गया।
लेकिन ठीक तेरह साल बाद, कार्तिक की एक और अमावस पर, गाँव की एक और लड़की — नाम था तुलसी — अपनी शादी से एक रात पहले इसी तरह गायब हो गई।
और फिर तेरह साल बाद तीसरी।
फिर चौथी।
फिर पाँचवीं।
आज तक बारह लड़कियाँ जा चुकी हैं।
तेरहवीं की बारी आ चुकी है।
156 साल बाद — 3 अक्टूबर, 2026 — दिल्ली
आरोही शर्मा अपने लैपटॉप की स्क्रीन पर आँखें गड़ाए बैठी थी। रात के दो बज चुके थे। उसके कमरे में सिर्फ़ लैपटॉप की नीली रोशनी थी। मेज़ पर बिखरी हुई कई पुरानी किताबें, धूल भरी फ़ाइलें, और एक पीली पड़ चुकी डायरी जो उसने पिछले हफ़्ते अपनी दादी के पुराने संदूक से निकाली थी।
आरोही की उम्र छब्बीस साल थी। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से भारतीय लोककथाओं पर पीएचडी कर रही थी। उसका शोध विषय था — "उत्तराखंड के पर्वतीय गाँवों में स्त्री-केंद्रित मृत्यु-मिथक।" पिछले छह महीनों से वह एक ही विषय पर उलझी हुई थी — रत्नपुर गाँव की गुमशुदा लड़कियाँ।
बात यूँ शुरू हुई थी कि मार्च के महीने में वह देहरादून के एक पुराने संग्रहालय गई थी। वहाँ 1870 से 1970 तक के अख़बारों का संग्रह था। एक शाम, धूल भरे पन्ने पलटते हुए उसकी नज़र एक ख़बर पर पड़ी थी।
"रत्नपुर गाँव में एक और लड़की गायब — शाप का सिलसिला जारी।"
तारीख़ थी 26 अक्टूबर, 1922। ख़बर छोटी थी। बस इतना लिखा था कि बलदेव सिंह की बेटी शारदा, जिसकी शादी अगले दिन होनी थी, आधी रात को घर से गायब हो गई। तलाश जारी है। गाँव वाले कहते हैं कि यह "उस" श्राप का हिस्सा है।
"उस" श्राप का क्या मतलब है? आरोही सोचती रह गई।
उसने दिल्ली लौटकर खोजना शुरू किया। और जितना खोजा, उतना ही चौंकती गई।
रत्नपुर गाँव में पिछले 156 सालों में हर तेरह साल पर कार्तिक की अमावस को एक लड़की गायब हुई थी। हमेशा वह लड़की कुँआरी होती थी। हमेशा उसकी शादी अगले एक-दो दिनों में होने वाली होती थी। कभी उसकी लाश नहीं मिली। कभी उसका कोई सुराग नहीं मिला।
पहली लड़की थी रुक्मिणी — 1870। फिर तुलसी — 1883। फिर लक्ष्मी — 1896। और यह सिलसिला चलता रहा। आख़िरी लड़की गायब हुई थी 2013 में — नाम था मीरा।
तेरह साल पूरे होने वाले थे। यानी इस अक्टूबर की अमावस को अगली लड़की गायब होगी।
आरोही की उँगलियाँ लैपटॉप की-बोर्ड पर काँपने लगीं। यह उसका पीएचडी का विषय था। यह उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा शोध हो सकता था। लेकिन कुछ और भी था जो उसे बेचैन कर रहा था।
पिछले हफ़्ते, जब वह अपनी माँ के घर गई थी, तो दादी के पुराने संदूक से एक पीली डायरी मिली थी। उसकी परदादी की परदादी की। नाम लिखा था — कमला देवी।
आरोही ने डायरी पलटी। हाथ से लिखे पन्ने। स्याही जगह-जगह फीकी। लेकिन एक पन्ने पर उसकी नज़र जम गई।
"आज मेरी बड़ी बहन रुक्मिणी की शादी थी। कल रात वह घर से चली गई। कहाँ गई, कोई नहीं जानता। माँ पागल हो गई है। पिताजी कहते हैं कि हमें यह गाँव छोड़ देना चाहिए। रत्नपुर पर श्राप है। मैं डरी हुई हूँ। बहुत डरी हुई।"
आरोही का दिल एक क्षण के लिए रुक गया।
रुक्मिणी।
पहली गुमशुदा लड़की।
उसकी अपनी परदादी की परदादी की बड़ी बहन।
उसका अपना ख़ून।
रत्नपुर से जुड़ाव
अगले तीन दिनों तक आरोही सो नहीं सकी। हर रात वह डायरी पढ़ती। कमला देवी ने डायरी में लिखा था कि जब उसके परिवार ने गाँव छोड़ा, तब वह छह साल की थी। परिवार दिल्ली आ गया। रत्नपुर की बात हमेशा के लिए दबा दी गई। किसी को नहीं बताया गया।
लेकिन खून का रिश्ता कभी भूलता नहीं।
आरोही ने अपने प्रोफ़ेसर डॉक्टर मल्होत्रा से मुलाक़ात की। एक बुज़ुर्ग विद्वान, जो लोककथाओं के क्षेत्र में तीस साल से काम कर रहे थे। उन्होंने आरोही की बात ध्यान से सुनी।
"आरोही, यह विषय बहुत दिलचस्प है," उन्होंने कहा। "लेकिन एक बात याद रखना। लोककथाएँ सिर्फ़ कहानियाँ नहीं होतीं। कभी-कभी वे चेतावनियाँ होती हैं।"
आरोही मुस्कुराई। "सर, आप एक विद्वान होकर ऐसी बातें कर रहे हैं?"
डॉक्टर मल्होत्रा ने चश्मा उतारा। उनकी आँखों में एक अजीब सी गंभीरता थी। "बेटी, तीस साल इस क्षेत्र में काम करके मैंने एक बात सीखी है। जो चीज़ें विज्ञान नहीं समझा सकता, ज़रूरी नहीं कि वे झूठ हों। तुम रत्नपुर जा रही हो?"
"हाँ, सर। अगले हफ़्ते।"
"अकेली?"
"हाँ।"
डॉक्टर मल्होत्रा कुछ पल के लिए चुप रहे। फिर बोले, "एक बात याद रखना। वहाँ किसी भी अजनबी से रात में बात मत करना। और कार्तिक की अमावस से पहले लौट आना।"
आरोही हँसी। "सर, मैं वैज्ञानिक अध्ययन के लिए जा रही हूँ, कोई भूत की कहानी में हिस्सा लेने नहीं।"
लेकिन डॉक्टर मल्होत्रा नहीं मुस्कुराए। उन्होंने बस इतना कहा, "बस मेरी बात याद रखना।"
10 अक्टूबर, 2026 — दिल्ली से रत्नपुर की यात्रा
सुबह पाँच बजे की गाड़ी थी। आरोही ने अपना बैग तैयार किया था — कपड़े, लैपटॉप, कैमरा, नोटबुक, वॉइस रिकॉर्डर, टॉर्च, और सबसे ज़रूरी — कमला देवी की डायरी।
दिल्ली से हल्द्वानी तक ट्रेन। फिर हल्द्वानी से अल्मोड़ा तक बस। अल्मोड़ा से रत्नपुर के लिए कोई सीधी सवारी नहीं थी। एक शेयर की जीप मिलती थी जो हफ़्ते में सिर्फ़ तीन दिन चलती थी।
जीप के ड्राइवर का नाम था जगदीश। पचास साल का पहाड़ी आदमी। जब आरोही ने कहा कि उसे रत्नपुर जाना है, तो उसने एक अजीब नज़र से देखा।
"बेटी, वहाँ क्या काम है?"
"पढ़ाई के लिए। शोध करना है।"
"किस चीज़ पर?"
"गाँव की पुरानी कहानियाँ।"
जगदीश ने सिगरेट सुलगाई। धुआँ छोड़ते हुए बोला, "कहानियाँ पूछोगी तो कोई नहीं बताएगा। रत्नपुर वाले चुप रहते हैं।"
"क्यों?"
"क्योंकि उन्हें डर है। और ठीक ही डर है।"
आरोही जीप में बैठ गई। रास्ते में उसके अलावा दो और सवारियाँ थीं — एक बुज़ुर्ग आदमी और एक बच्चा। दोनों गाँव के ही थे। दोनों चुप बैठे थे।
पहाड़ी सड़क टेढ़ी-मेढ़ी थी। एक तरफ़ ऊँची चट्टानें, दूसरी तरफ़ गहरी खाई। दोपहर तक सूरज तेज़ था। लेकिन ज्यों-ज्यों वे रत्नपुर की ओर बढ़ते गए, आसमान पर बादल घने होते गए। हवा में एक अजीब सी ठंड घुल गई। आरोही ने अपना स्वेटर पहन लिया।
रास्ते में एक जगह जीप रुकी। जगदीश ने कहा कि पानी भरना है। सामने एक छोटा सा झरना था। आरोही उतरी। पैर सीधे करने के लिए थोड़ा चली। बुज़ुर्ग सवारी अपनी जगह पर बैठा रहा, आँखें बंद किए। लेकिन बच्चा उतर आया था। वह आरोही के पास आया।
"दीदी, तुम रत्नपुर जा रही हो?"
"हाँ।"
"क्यों?"
"पढ़ाई के लिए।"
बच्चे ने अपनी नन्ही आँखों से आरोही को देखा। फिर धीरे से बोला, "मेरी बड़ी बहन भी वहीं गई थी।"
आरोही ने पूछा, "फिर?"
बच्चा कुछ पल के लिए चुप रहा। फिर बोला, "फिर वो नहीं लौटी।"
आरोही के रोंगटे खड़े हो गए। उसने पूछना चाहा — कब? कैसे? लेकिन बच्चे की माँ ने उसे पीछे से खींच लिया। "बकवास मत कर। जीप में बैठ।"
बच्चा चला गया। लेकिन जाते-जाते उसने पलटकर आरोही की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी नमी थी।
आरोही जीप में वापस आई। जगदीश ने कहा, "बेटी, रास्ते के लोगों की बातों पर ज़्यादा ध्यान मत देना।"
"वो बच्चा क्या कह रहा था?"
"जो भी कह रहा था, भूल जा। पहाड़ों में बच्चे भी बूढ़े होते हैं।"
आरोही ने खिड़की से बाहर देखा। पहाड़ों की चोटियाँ अब बादलों में छिपती जा रही थीं। कहीं-कहीं पर बर्फ़ के छोटे टुकड़े दिख रहे थे। सड़क के दोनों तरफ़ चीड़ के ऊँचे पेड़ थे। उनकी शाखाओं से एक अजीब सा फुसफुसाहट का शोर आ रहा था। जैसे पेड़ आपस में बातें कर रहे हों।
चार बजे के आसपास जीप एक मोड़ पर रुकी। जगदीश ने पीछे मुड़कर कहा, "बेटी, यहाँ से पैदल चलना होगा। जीप अंदर नहीं जाती।"
आरोही उतरी। सामने एक तंग पगडंडी थी जो घने चीड़ के जंगल में जा रही थी।
"कितना दूर है गाँव?"
"बस बीस मिनट।"
आरोही ने बैग उठाया। जगदीश ने एक बार फिर उसे देखा।
"बेटी, एक बात कहूँ?"
"हाँ।"
"जल्दी लौट आना।"
आरोही मुस्कुराई। लेकिन जगदीश की आँखों में जो गंभीरता थी, उसने आरोही की मुस्कान को धीरे-धीरे फीका कर दिया।
रत्नपुर में प्रवेश
पगडंडी पर चलते हुए आरोही ने पहली बार एक अजीब सी ख़ामोशी महसूस की। जंगल में पक्षियों की आवाज़ें नहीं थीं। हवा में पत्ते नहीं हिल रहे थे। सिर्फ़ उसके अपने क़दमों की आवाज़ थी — कुरकुर, कुरकुर। सूखे पत्तों पर।
बीस मिनट बाद जंगल छटा और सामने एक घाटी खुली। घाटी में बसा हुआ था छोटा सा गाँव — रत्नपुर। शायद पचास-साठ घर। पत्थर की छतें। लकड़ी की दीवारें। बीच में एक पुराना मंदिर, जिसकी छत टूटी हुई थी।
गाँव में एक अजीब सी उदासी थी। जैसे किसी घर में किसी की मौत हो गई हो। न बच्चे खेल रहे थे। न कोई घर के बाहर बैठा था। दूर एक कुत्ता भौंक रहा था — लेकिन उसकी भौं भी अजीब थी, जैसे वह किसी को देखकर डर रहा हो।
आरोही ने अपना ठिकाना पूछा था — भगवती देवी का घर। एक विधवा बुज़ुर्ग महिला, जो कमरा किराए पर देती थीं। जगदीश ने उनका नाम बताया था।
आरोही एक बच्चे से रास्ता पूछने लगी। बच्चा उसे देखकर भागा। उसकी माँ, जो पास ही थी, ने आरोही को घूरकर देखा।
"तू कौन है? यहाँ क्या करने आई है?"
"मैं दिल्ली से आई हूँ। शोध करने।"
औरत ने कुछ कहा नहीं। बस अपने बच्चे को अंदर ले गई। दरवाज़ा बंद हो गया।
आरोही आगे बढ़ी। एक बुज़ुर्ग आदमी हुक्का पी रहा था। उसने आरोही से पूछा, "भगवती देवी का घर?"
"गाँव के आख़िरी छोर पर। कुएँ के पास।"
"धन्यवाद।"
आदमी ने कुछ नहीं कहा। बस अपना हुक्का पीता रहा। लेकिन जब आरोही आगे बढ़ी, तो उसने पीछे से एक बात कही — इतनी धीरे कि आरोही को ठीक से समझ नहीं आया।
"तेरहवीं आ गई।"
आरोही ठिठकी। "क्या कहा आपने?"
बुज़ुर्ग आदमी ने आँखें उठाईं। "कुछ नहीं बेटी। जा। अँधेरा होने से पहले पहुँच जा।"
भगवती देवी
भगवती देवी का घर वाकई गाँव के आख़िरी छोर पर था। एक पुराना दो-मंज़िला मकान, पत्थरों का बना हुआ। छत पर हरी काई जमी थी। बरामदे में एक तुलसी का पौधा था — मुरझाया हुआ।
आरोही ने दरवाज़ा खटखटाया।
कोई जवाब नहीं।
फिर से खटखटाया।
अंदर से एक धीमी आवाज़ आई। "कौन है?"
"नमस्ते। मैं आरोही शर्मा। दिल्ली से आई हूँ। मैंने पहले फ़ोन पर बात की थी।"
दरवाज़ा धीरे से खुला। सामने खड़ी थीं भगवती देवी। शायद सत्तर साल की। सफ़ेद बाल जूड़े में बँधे। सफ़ेद साड़ी। चेहरे पर झुर्रियाँ। लेकिन आँखें — तेज़, चमकदार, जैसे किसी युवा की।
"तू ही है वो लड़की?"
"जी।"
"अंदर आ।"
आरोही अंदर आई। कमरा साफ़ था। दीवार पर एक पुरानी तस्वीर टँगी थी — भगवती देवी की जवानी की, अपने पति के साथ। बगल में एक और तस्वीर थी — एक जवान लड़की की। लेकिन उसका चेहरा धुंधला था, जैसे किसी ने उसे जान-बूझकर मिटा दिया हो।
"चाय पीएगी?"
"जी। धन्यवाद।"
भगवती देवी रसोई में चली गईं। आरोही ने अपना बैग रखा और तस्वीर के पास गई। उसने ध्यान से देखा। तस्वीर की लड़की की पोशाक शादी की थी। लाल जोड़ा। मेहँदी लगे हाथ। लेकिन चेहरा... चेहरा गायब था।
"वह मेरी बेटी थी।"
आरोही चौंककर पलटी। भगवती देवी चाय की तश्तरी लिए खड़ी थीं।
"आपकी बेटी?"
"मीरा। 2013 में गई थी। अपनी शादी से एक रात पहले।"
आरोही का दिल एक क्षण के लिए रुक गया।
मीरा। बारहवीं गुमशुदा लड़की।
आरोही की आँखों में आँसू भर आए। "मुझे नहीं पता था... मुझे माफ़ी..."
"बैठ जा।" भगवती देवी की आवाज़ शांत थी। "तू पूछने ही आई है, तो पूछ। मैं जवाब दूँगी।"
आरोही बैठ गई। भगवती देवी ने चाय दी। आरोही ने कप हाथ में लिया। हाथ काँप रहे थे।
"आपको... आपको कैसे पता कि मैं यह पूछने आई हूँ?"
भगवती देवी ने चाय की चुस्की ली। धीरे से बोलीं, "क्योंकि तू सही समय पर आई है। तेरहवीं की तेरह दिन पहले।"
आरोही ने कैलेंडर मन में गिना। कार्तिक की अमावस थी 23 अक्टूबर को। आज तारीख़ थी 10 अक्टूबर। यानी ठीक तेरह दिन।
"मुझे बताइए... सब कुछ। आप जो जानती हैं।"
भगवती देवी ने आरोही को ध्यान से देखा। जैसे कुछ जाँच रही हों।
"तेरा नाम आरोही शर्मा है, सही?"
"जी।"
"तेरी माँ का नाम?"
"सुधा शर्मा।"
"नानी का?"
"जानकी देवी।"
"परनानी?"
आरोही ने कुछ सोचा। "शायद... कमला देवी।"
भगवती देवी का चेहरा एक क्षण के लिए पत्थर बन गया। फिर उन्होंने चाय का कप रखा। उनके हाथ काँप रहे थे।
"बेटी, तुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था।"
पहली रात
रात हो चुकी थी। बिजली गाँव में सिर्फ़ शाम सात से रात दस बजे तक आती थी। दस बजे के बाद बस दीया और लालटेन।
आरोही अपने कमरे में लेटी थी। ऊपर की मंज़िल पर। एक छोटा सा कमरा। खिड़की से बाहर घाटी दिख रही थी। लेकिन अभी बाहर कुछ नहीं दिख रहा था। बस काला अँधेरा।
भगवती देवी ने रात को खाना खाते हुए ज़्यादा नहीं बताया था। बस इतना कहा था, "कल सुबह बात करेंगे। आज आराम कर।"
लेकिन आरोही को नींद नहीं आ रही थी। उसका दिमाग़ चल रहा था। कमला देवी — रुक्मिणी की छोटी बहन। यानी रुक्मिणी उसकी पूर्वज थी। पहली गुमशुदा लड़की। और अब वह इसी गाँव में थी।
क्या भगवती देवी को यह जानकर डर लगा था? क्या यह कोई संकेत था कि आरोही को भी कुछ हो सकता है?
नहीं। आरोही ने ख़ुद को समझाया। ये सिर्फ़ लोककथाएँ थीं। संयोग। शोध का विषय।
तभी...
खिड़की के बाहर से एक आवाज़ आई।
"आरोही..."
आरोही का दिल एक क्षण के लिए रुक गया।
उसने ध्यान से सुना। कुछ नहीं। बस हवा की सरसराहट। पहाड़ों में हवा ऐसे बहती है जैसे कोई कान में फुसफुसा रहा हो। यही होगा।
उसने अपनी आँखें बंद कीं।
"आरोही... खिड़की खोल।"
अब आरोही सीधी बैठ गई। यह हवा नहीं थी। यह एक औरत की आवाज़ थी।
लेकिन उसका कमरा दूसरी मंज़िल पर था। बाहर बरामदा नहीं था। नीचे सिर्फ़ ज़मीन थी। पंद्रह फुट की ऊँचाई से कोई कैसे उसकी खिड़की पर हो सकता है?
उसने टॉर्च उठाई। धीरे से बिस्तर से उतरी। खिड़की की ओर बढ़ी। उसका हाथ काँप रहा था। लेकिन शोधकर्ता का दिमाग़ बोल रहा था — देखो, तर्क से देखो, कोई तार्किक स्पष्टीकरण होगा।
उसने परदा हटाया।
खिड़की के बाहर एक चेहरा था।
एक औरत का चेहरा। सफ़ेद। बहुत सफ़ेद। जैसे किसी ने उस पर चूना पोत दिया हो। बाल लंबे, काले, गीले। आँखें... आँखें बंद थीं।
आरोही ने चीख़ने के लिए मुँह खोला। लेकिन आवाज़ नहीं निकली।
और फिर उस औरत ने आँखें खोलीं।
आँखें नहीं थीं वहाँ। बस दो काले गड्ढे। और उन गड्ढों से एक धीमी सी हँसी आई।
"तू आ गई... आख़िरकार तू आ गई।"
आरोही पीछे हटी। ठोकर लगी। वह ज़मीन पर गिर गई। टॉर्च छूट गई। रोशनी दीवार पर काँप रही थी।
लेकिन जो चीज़ उसे सबसे ज़्यादा डरा रही थी, वह यह थी — खिड़की के बाहर वाली औरत के होंठ हिल रहे थे, लेकिन आवाज़ बाहर से नहीं, आरोही के सिर के अंदर से आ रही थी। जैसे वह आवाज़ हवा के रास्ते नहीं, ख़ून के रास्ते आ रही हो।
खिड़की के बाहर से अब आवाज़ों में गिनती हो रही थी। लेकिन ग़ौर से सुनने पर आरोही को पता चला कि वह गिनती एक आवाज़ नहीं थी। बारह अलग-अलग आवाज़ें थीं। छोटी बच्चियों की, जवान लड़कियों की, हर उम्र की। सब मिलकर गिन रही थीं।
"एक... दो... तीन... चार..."
आरोही ने आँखें बंद कर लीं। हाथ जोड़ लिए।
"...बारह... और अब... तेरह।"
एक ज़ोरदार आवाज़ हुई। जैसे खिड़की का काँच फटा हो।
आरोही ने आँखें खोलीं।
खिड़की बंद थी। काँच सलामत था। बाहर कुछ नहीं था। बस अँधेरा।
लेकिन उसकी खिड़की के काँच पर, अंदर की तरफ़, नमी की एक परत जम गई थी। और उस नमी में किसी ने उँगली से लिखा था — साफ़, गीले हस्ताक्षर में —
"तेरहवीं तू है।"
आरोही की चीख़ पूरे घर में गूँज गई।
नीचे भगवती देवी की खटिया चरमराई। उनके क़दमों की आवाज़ आई। सीढ़ियाँ चढ़ती हुई।
लेकिन जब वह कमरे में पहुँचीं, तब तक खिड़की के काँच पर लिखा शब्द ग़ायब हो चुका था।
बस आरोही थी। फ़र्श पर बैठी। काँपती हुई। और उसके हाथ में डायरी थी — कमला देवी की डायरी। जो उसने रात को मेज़ पर रखी थी।
वह डायरी अब खुली हुई थी।
एक ऐसे पन्ने पर, जिस पर पहले कुछ नहीं लिखा था। आरोही को यह पूरी तरह से याद था। उसने इस डायरी का हर पन्ना पिछले हफ़्ते तीन-तीन बार पढ़ा था। यह पन्ना कोरा था।
लेकिन अब उस पन्ने पर एक नई पंक्ति लिखी हुई थी। ताज़ी स्याही में। इतनी ताज़ी कि जब आरोही ने उँगली से छुआ, तो स्याही उसकी उँगली पर लग गई।
"तेरह दिन बचे हैं, बहन। मैं तेरा इंतज़ार कर रही हूँ।"
नीचे हस्ताक्षर था।
रुक्मिणी।
भगवती देवी कमरे में आईं। उन्होंने आरोही को फ़र्श पर बैठा देखा। डायरी उनके हाथ में ली। पन्ना पढ़ा। और फिर उन्होंने कुछ ऐसा किया जिसकी आरोही को उम्मीद नहीं थी।
उन्होंने डायरी को अपनी छाती से लगा लिया। और धीरे से रोने लगीं।
"मैंने कहा था तुझे... मैंने कहा था कि तू सही समय पर आई है," वे रोते हुए बोलीं। "लेकिन बेटी, सही समय हमेशा हमारे लिए सही नहीं होता। कभी-कभी सही समय उनके लिए होता है जो हमारा इंतज़ार करते हैं।"
आरोही ने काँपती आवाज़ में पूछा, "भगवती दादी... आप... आप जानती हैं क्या हो रहा है?"
भगवती देवी ने उसकी ओर देखा। उनकी आँखें आँसुओं से भरी थीं। लेकिन उन आँसुओं के पीछे एक अजीब सी शांति थी। जैसे किसी ने बहुत लंबा इंतज़ार पूरा किया हो।
"मैं तेरह साल से जानती हूँ, बेटी। जिस दिन मीरा गई, उस दिन से मैं जानती हूँ कि तेरहवीं कौन होगी।"
"कौन?"
भगवती देवी ने आरोही के माथे पर हाथ रखा। हाथ बहुत ठंडा था।
"रुक्मिणी की बहन का ख़ून। जो भी पहले रत्नपुर लौटेगा। और तू लौट आई है।"

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