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डूबे गाँव की जनगणना
Pretika · Village Horror · 16 मिनट
सरकारी रिकॉर्ड कहता है कि केसला खुर्द नाम के गाँव में पिछले उनतीस साल से एक भी इंसान नहीं रहता।
लेकिन उस दोपहर, जब मैं वहाँ पहुँचा... तो इकतीस लोग लाइन लगाकर खड़े थे।
अपना नाम लिखवाने के लिए।
नमस्कार दोस्तों, मैं अनुराग, और आप सुन रहे हैं अनुराग की वाणी।
आज की कहानी हमें भेजी है मध्य प्रदेश के दीपक तिवारी जी ने। दीपक जी एक सरकारी स्कूल में मास्टर हैं। अपने मैसेज में उन्होंने लिखा था, कि ये बात उन्होंने आज तक अपनी पत्नी को भी पूरी नहीं बताई।
तो लाइट धीमी कर लीजिए, हेडफ़ोन लगा लीजिए... और सुनिए दीपक जी की ज़ुबानी, एक ऐसी गिनती की कहानी, जो आज तक पूरी नहीं हुई।
भाग एक: ड्यूटी
मेरा नाम दीपक है। उम्र छत्तीस साल। नर्मदा किनारे के एक छोटे से कस्बे में, सरकारी प्राइमरी स्कूल में बच्चों को पढ़ाता हूँ।
घर में हम चार लोग थे। मैं, मेरी पत्नी, सात साल का बेटा, और पिताजी। पिताजी अपने ज़माने में तहसील के पटवारी थे। बचपन में उन्होंने ही मेरी पहली स्लेट पर, मेरा हाथ पकड़कर, मुझे मेरा नाम लिखना सिखाया था। और हर बार एक ही बात कहते थे, "बेटा, जिसका नाम सही लिखा गया, उसका हक़ कोई नहीं मार सकता।"
उस वक़्त वो इकहत्तर साल के थे। कई महीनों से बिस्तर पर थे, किसी से ज़्यादा बोलते नहीं थे। रोज़ स्कूल जाने से पहले मैं उन्हें अपने हाथ से दलिया खिलाता था, और इतवार को उनकी दाढ़ी बनाता था। वो कुछ कहते नहीं थे, बस मेरा हाथ अपने हाथ में ले लेते थे। मेरे लिए इतना ही बहुत था।
अब आप तो जानते ही हैं, अपने देश में मास्टर सिर्फ़ बच्चों को नहीं पढ़ाता। चुनाव आए तो ड्यूटी मास्टर की। पोलियो की दवा पिलानी हो, तो भी मास्टर। और जनगणना हो... तब तो पूछिए ही मत।
उस साल मई की गर्मी में मुझे मकानों की गिनती का काम मिला। हाथ में एक सरकारी टैबलेट, उसमें एक ऐप, और एक नक्शा, जिसमें मेरे हिस्से के गाँव लाल लकीर से घिरे थे।
मेरे सुपरवाइज़र थे वर्मा जी। मुँह में हर वक़्त पान, और हर सवाल का एक ही जवाब... "हो जाएगा मास्साब, सब हो जाएगा।"
पहले ही दिन उन्होंने नक्शे पर एक जगह उँगली रखी। वहाँ सब नीला था, यानी पानी। और उस नीले रंग के बीचों-बीच, बहुत छोटे अक्षरों में लिखा था... केसला खुर्द।
वर्मा जी बोले, "ये गाँव सत्तानवे में बाँध में डूब गया था। रिकॉर्ड में ज़ीरो मकान, ज़ीरो आदमी। बस वहाँ जाकर लोकेशन डाल देना, ऐप में विज़िट चढ़ जाएगी। पाँच मिनट का काम है।"
मैंने हँसकर पूछा, "वर्मा जी, डूबे हुए गाँव में विज़िट कैसे करूँ? नाव लेकर जाऊँ?"
उन्होंने खिड़की से बाहर पीक थूकी और बोले, "इस बार सूखा पड़ा है मास्साब। पानी दो किलोमीटर पीछे हट गया है। पुराना गाँव बाहर निकल आया है। अख़बार में फ़ोटो छपी थी, कीचड़ में से मंदिर का शिखर झाँक रहा है।"
बात सच थी। हमारे इलाक़े में जब किसी साल बारिश कम होती है, तो बाँध का पानी उतर जाता है। और नीचे दबे पुराने गाँव ऐसे ऊपर आते हैं, जैसे नदी में डूबी कोई लाश कुछ दिन बाद अपने आप सतह पर आ जाती है।
डूब वाले लोगों को सरकार ने पहाड़ी पर एक नई बस्ती में बसाया था। अगली सुबह मैं वहीं पहुँचा। सड़क किनारे एक बूढ़ी अम्मा चाय की टपरी चला रही थीं। मैंने पुराने केसला का रास्ता पूछा।
अम्मा के हाथ से कप छूटते-छूटते बचा। उन्होंने पहले मेरे टैबलेट को देखा, फिर मेरे चेहरे को।
"गिनती करने जा रहे हो?"
"हाँ अम्मा, सरकारी काम है।"
उन्होंने आवाज़ इतनी धीमी कर ली, जैसे कोई सुन न ले। "बेटा, जब पानी उतरता है ना... तो केसला जाग जाता है। जाना है तो जाओ। पर दो बातें याद रखना। सूरज ढलने से पहले, पेड़ों पर बनी सफ़ेद लकीर के इस पार लौट आना। और वहाँ कोई कुछ पिलाए... तो मत पीना।"
मैंने हाँ में सिर हिलाया, और मन ही मन हँस दिया। गाँव की अम्मा थीं, ऐसी बातें तो हर गाँव में मिल जाती हैं।
उस वक़्त मुझे नहीं पता था, कि उन दो बातों में से एक... मैं उसी दिन तोड़ने वाला हूँ।
भाग दो: केसला खुर्द
दोपहर का एक बजा था। पारा पैंतालीस के पार। मैं बाइक पहाड़ी पर छोड़कर पैदल नीचे उतरा।
जहाँ कभी पानी था, वहाँ अब ज़मीन ऐसे फटी पड़ी थी, जैसे किसी ने सूखे पापड़ को मुट्ठी में भींच दिया हो। दरारों में मरी हुई मछलियाँ चिपकी थीं। एक जगह जंग खाई साइकिल का पहिया आधा मिट्टी में धँसा था, और उसकी तीलियों में अब भी किसी की लाल चूड़ी फँसी थी।
रास्ते के पेड़ सूखे और नंगे खड़े थे। हर पेड़ के तने पर, एक ही ऊँचाई पर, एक सफ़ेद सी लकीर थी। वो पानी का पुराना निशान था। अम्मा वाली लकीर।
मैंने वो लकीर पार की... और अचानक हवा बदल गई।
गर्मी जैसे किसी ने बटन दबाकर बंद कर दी हो। एक ठंडी, गीली सी हवा चलने लगी, जैसी बरसात की रात नदी किनारे चलती है। उसमें गीली मिट्टी की, सड़ी हुई सिवार की, और चूल्हे के धुएँ की मिली-जुली गंध थी।
थोड़ा आगे गया, तो पहले टूटे-फूटे मकान दिखे। बिना छत की दीवारें, जिन पर काई की हरी परत जमी थी। फिर एक इमारत दिखी, जिस पर पीले रंग की टूटी पट्टी लटकी थी... शासकीय प्राथमिक शाला, केसला खुर्द। मेरे जैसे ही किसी मास्टर का स्कूल। अंदर ब्लैकबोर्ड पर चॉक से लिखा था, आज की तारीख़... चौदह जुलाई।
और फिर मैं उस गली में मुड़ा।
उस मोड़ के बाद जो दिखा, उसे मैं आज भी आँखें बंद करके हूबहू देख सकता हूँ।
वहाँ बारह-पंद्रह कच्चे मकान थे, और एक भी टूटा हुआ नहीं था। गोबर से लिपे आँगन। दरवाज़ों पर आम के पत्तों की बंदनवार। एक तुलसी चौरे पर दीया जल रहा था, वो भी भरी दोपहर में। दो बच्चे गिल्ली-डंडा खेल रहे थे, और एक औरत चूल्हे पर रोटियाँ सेंक रही थी।
और सब के सब... मेरी तरफ़ देख रहे थे। जैसे बरसों से मेरा ही इंतज़ार हो।
धोती-कुर्ता पहने एक आदमी आगे आए। उम्र साठ के आसपास, माथे पर चंदन का टीका। हाथ जोड़कर बोले, "आइए मास्साब। बड़ी देर कर दी। हम तो कब से राह देख रहे थे। मैं रामधार, इस गाँव का मुखिया।"
मेरा दिमाग़ तेज़ी से दौड़ने लगा। ज़रूर ये वो लोग होंगे, जिन्होंने पानी उतरते ही अपनी पुरानी ज़मीन पर फिर से डेरा डाल दिया है। ग़ैरक़ानूनी कब्ज़ा। गाँवों में ऐसा होता रहता है। मैंने ख़ुद को यही समझाया।
रामधार ने एक औरत को इशारा किया। वो पीतल का लोटा लेकर आई। "पानी पी लीजिए मास्साब, इतनी धूप में आए हो।"
मेरा गला सूखकर काँटा हो चुका था। सुबह से एक घूँट नहीं पिया था। अम्मा की बात दिमाग़ में आई... और उसी पल, प्यास ने उसे धक्का देकर बाहर कर दिया।
मैंने लोटा मुँह से लगा लिया।
पानी बर्फ़ जैसा ठंडा था। उसमें मिट्टी और लोहे जैसा कसैला स्वाद था। आख़िरी घूँट के साथ मेरे होंठ पर कुछ चिपक गया। उँगली से हटाया, तो वो हरी सिवार का एक पतला सा धागा था।
रामधार के चेहरे पर संतोष आ गया। "अब आप हमारे हो गए मास्साब। अब लिखिए। हर एक का नाम लिखिए। सरकार ने तो हमें बहुत पहले भुला दिया।"
भाग तीन: गिनती
मैंने ऐप खोला और काम शुरू किया।
पहला मकान मुखिया का था। रामधार, उम्र अट्ठावन। पत्नी सुंदरी। बेटा भोला। बहू गीता, और उसकी गोद में डेढ़ साल की बिटिया, मुनिया।
मैंने प्यार से मुनिया के सिर पर हाथ फेरा। उसके बालों में कुछ चमका। चाँदी जैसा, छोटा सा, गोल। ग़ौर से देखा... तो वो मछली का एक छिलका था।
अंदर दीवार पर एक घड़ी टँगी थी। बंद। सुइयाँ दो बजकर चौदह मिनट पर अटकी हुई। बग़ल में एक कैलेंडर, उन्नीस सौ सत्तानवे का, और उसका पन्ना जुलाई पर पलटा हुआ।
मैं अगले घर गया। फिर उसके अगले। नाम, उम्र, रिश्ता। हर कोई बड़े चाव से अपना नाम बताता, जैसे कोई बरसों बाद अपना खोया हुआ सामान वापस माँग रहा हो। एक बूढ़े बाबा ने तो मेरी कलाई पकड़ ली और रो पड़े। "बेटा, मेरा नाम पूरा लिखना। भगवती प्रसाद। आधा मत छोड़ना।"
फिर ऐप ने मकान की फ़ोटो माँगी। ये ज़रूरी होता है।
मैं एक घर के सामने खड़ा हुआ। दरवाज़े पर सिर पर पल्लू डाले एक औरत खड़ी थी, होंठों पर हल्की सी हँसी। मैंने टैबलेट उठाया और बटन दबा दिया।
स्क्रीन पर जो फ़ोटो आई, उसमें कोई घर नहीं था।
सिर्फ़ एक आधी गिरी दीवार, काई से ढकी हुई। दरवाज़े की जगह एक ख़ाली छेद। और उस छेद के नीचे, कीचड़ में एक सड़ी हुई मछली।
काँपते हाथों से मैंने टैबलेट नीचे किया। सामने वही घर था। वही लिपा हुआ आँगन। और वही औरत, उसी हँसी के साथ। बस फ़र्क़ इतना था, कि अब उसकी पलकें नहीं झपक रही थीं।
मैंने नक्शा खोला। मेरी लोकेशन का बिंदु ठीक वहाँ चमक रहा था, जहाँ नक्शे के हिसाब से चालीस फ़ुट गहरा पानी होना चाहिए था।
फिर मेरी नज़र अपने जूतों पर गई। मैं सूखी, फटी ज़मीन पर चलकर आया था। पर मेरे जूते टखनों तक भीगे हुए थे।
अब मैं समझ चुका था, कि मैं किन लोगों के बीच खड़ा हूँ। पर भागने की हिम्मत नहीं हुई। मैंने जल्दी-जल्दी आख़िरी नाम चढ़ाया और कहा, "हो गया मुखिया जी। इकतीस लोग।"
रामधार ने सिर हिलाया। "बत्तीस।"
"पर मैंने तो इकतीस ही..."
"एक बाक़ी है मास्साब। वो भी आएगा।"
ये बात उन्होंने सीधे मेरी आँखों में देखते हुए कही। मेरी रीढ़ में बर्फ़ सी उतर गई।
फिर उन्होंने पूछा, "आपका पूरा नाम क्या है मास्साब? और बाबूजी का?"
पता नहीं क्यों, मेरे मुँह से सच निकल गया। "दीपक तिवारी। पिताजी, रामेश्वर तिवारी।"
उस पल पूरी गली में सन्नाटा छा गया। गिल्ली हवा में ही रुक गई। चूल्हे की आँच बुझ गई। इकतीस के इकतीस लोग एक साथ मेरी तरफ़ मुड़े।
रामधार ने बहुत आहिस्ता से पूछा, "पटवारी रामेश्वर तिवारी?"
मैंने हाँ में सिर हिलाया। पिताजी सच में पटवारी रह चुके थे। वही पिताजी, जो कहते थे कि जिसका नाम सही लिखा गया, उसका हक़ कोई नहीं मार सकता।
रामधार के चेहरे पर ग़ुस्सा नहीं था। एक अजीब सी राहत थी, जैसे बरसों पुरानी कोई मन्नत पूरी हो गई हो। "भगवान ने आख़िर सुन ली।"
फिर वो मेरे सामने चबूतरे पर बैठ गए, और बोलने लगे। धीमी आवाज़ में, जैसे दादी बच्चों को रात की कहानी सुनाती है। पर जैसे-जैसे वो बोलते गए, वो गली बदलती गई।
"सत्तानवे की बात है मास्साब। बाँध के गेट चौदह जुलाई को बंद होने थे। बाक़ी गाँव मुआवज़ा लेकर चला गया था। बस हम इकतीस लोग रुके थे, अपने पैसे के इंतज़ार में।"
मेरी नज़र सामने वाले घर की दीवार पर गई। नीचे, ज़मीन से सटी जगह पर, एक गीला धब्बा उभर रहा था। गोबर की लिपाई का रंग गहरा होता जा रहा था, जैसे मोटे काग़ज़ पर गिरी स्याही फैलती है। फिर बग़ल वाले घर में भी वही धब्बा। फिर उसके बग़ल में भी।
"तेरह जुलाई की शाम पटवारी साहब आए। बोले, पैसा आ गया है, बस अँगूठा लगा दो, कल शहर चलकर ले लेना। हमने लगा दिया। अनपढ़ थे मास्साब। हमें क्या पता था कि उस काग़ज़ पर लिखा है... सबको भुगतान हो गया, सब चले गए, गाँव ख़ाली।"
अब दीवारों से पानी रिसने लगा था। बूँद-बूँद नहीं, पतली-पतली धारों में। जैसे मिट्टी के घर पसीने में नहा रहे हों। पर गली में किसी ने उस तरफ़ आँख उठाकर भी नहीं देखा।
"पैसा पटवारी की जेब में गया," रामधार बोले। "और उसी रात, दो बजकर चौदह मिनट पर..."
वो रुक गए।
और उसी पल, गली के हर घर के अंदर से एक साथ आवाज़ उठी। गले में पानी भरने की आवाज़। गुड़... गुड़... गुड़... जैसे कोई चीख़ना चाहता हो, पर मुँह खोलते ही पानी अंदर घुस जाए। बच्चों की, औरतों की, बूढ़ों की, सबकी एक साथ। जबकि सारे इकतीस लोग मेरे सामने, गली में खड़े थे। फिर सब कुछ एक झटके में थम गया।
"...पानी आया।"
गीता की गोद में बैठी मुनिया को खाँसी आई। एक बार। फिर उसके नन्हे से मुँह से मटमैला पानी बह निकला, ठुड्डी से होता हुआ माँ की बाँह पर। गीता ने चौंककर नहीं देखा। बस पल्लू से उसका मुँह पोंछ दिया। ऐसे, जैसे उनतीस साल से रोज़ पोंछती आ रही हो।
"हम मरे नहीं मास्साब," रामधार ने कहा। "काग़ज़ में तो हम उस रात से पहले ही गाँव छोड़ चुके थे। जो सरकार के हिसाब से कभी डूबा ही नहीं, उसकी लाश कौन ढूँढे? उसका क्रिया-करम कौन करे? तो हम यहीं अटक गए। गिने जाने के इंतज़ार में।"
मेरे दिमाग़ में तस्वीरें घूमने लगीं। सत्तानवे के आख़िर में पिताजी का अचानक दो मंज़िला पक्का मकान बनवाना। दीदी की धूमधाम वाली शादी। मेरा बी एड का एडमिशन। बचपन से मुझे यही बताया गया था, कि वो सब दादाजी की ज़मीन बिकने से आया था।
अब पता चला, कि ज़मीन किसकी बिकी थी।
रामधार ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी हथेली नदी की तली जैसी ठंडी और चिकनी थी।
"पर अकेले हमारे गिने जाने से हिसाब पूरा नहीं होता मास्साब। जिसने हमें गिनती से मिटाया था, उसका नाम भी इसी गिनती में चढ़ेगा। तभी बत्तीस पूरे होंगे। और जिसका नाम केसला की गिनती में चढ़ जाता है... वो केसला का हो जाता है।"
"पर पिताजी तो यहाँ से कोसों दूर, अपने बिस्तर पर हैं..." मैंने कहना चाहा।
रामधार ने आँगन में पड़े उस ख़ाली पीतल के लोटे की तरफ़ देखा। "उनतीस साल से हमें उनके घर का रास्ता नहीं मिल रहा था। आज वो रास्ता आपने अपने हाथ से पी लिया।"
तभी पैरों के नीचे से छप-छप की आवाज़ आई। दीवारों से रिसता पानी अब गली में भरने लगा था। चुपचाप, बिना किसी लहर के। जबकि बाँध का पानी दो किलोमीटर दूर था। और पश्चिम में सूरज पहाड़ी को छूने वाला था।
मैं भागा। पानी घुटनों तक चढ़ आया। पीछे से रामधार की आवाज़ आई, एकदम शांत, बिना किसी जल्दबाज़ी के...
"डरो मत मास्साब। आपसे कोई बैर नहीं। आज रात हम आपके घर आएँगे... पर आपसे मिलने नहीं।"
सफ़ेद लकीर पार करते ही मैं मुँह के बल गिर पड़ा। मुड़कर देखा, तो पीछे सिर्फ़ फटी हुई सूखी ज़मीन थी। और दूर, कीचड़ में से झाँकता मंदिर का शिखर।
भाग चार: बत्तीसवाँ नाम
लौटते वक़्त मैंने टैबलेट ऑफ़िस में जमा किया, और रात दस बजे घर पहुँचा। पत्नी ने भीगे जूते देखे तो पूछा, "इतनी गर्मी में पानी कहाँ मिल गया?" मैंने कह दिया, नहर किनारे पैर फिसल गया था। बस। उसके आगे कुछ नहीं।
आपको बता दूँ, उन दिनों हमारे मोहल्ले में तीन दिन से नल नहीं आया था। पूरे घर में बस रसोई का एक मटका था, वो भी आधा।
खाना खाकर मैं पिताजी के कमरे में गया, उनके पलंग के पास बैठा। रोज़ की तरह उनके पैर दबाए। ज़ुबान पर एक सवाल आकर बार-बार लौट जाता था... पिताजी, केसला याद है? पर उनका थका हुआ चेहरा देखकर हिम्मत नहीं हुई। उन्होंने हमेशा की तरह मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया। और उस रात, ज़िंदगी में पहली बार, मुझे अपने पिता के हाथ से डर लगा।
आधी रात को एक आवाज़ से मेरी नींद टूटी। टप... टप... टप...
जैसे कहीं नल खुला रह गया हो। मोबाइल में टाइम देखा। दो बजकर दस मिनट।
आवाज़ पिताजी के कमरे से आ रही थी। मैंने दरवाज़ा धकेला।
पिताजी बिस्तर पर सीधे बैठे थे। वो आदमी, जो महीनों से ख़ुद करवट तक नहीं ले पाता था। उनका पूरा कुर्ता तर-बतर था। बालों से बूँदें गिर रही थीं। पलंग के नीचे फ़र्श पर पानी फैला था। और कमरे में वही गंध भरी थी, जो मैं उस गली में छोड़ आया था।
उनकी आँखें एकदम साफ़ थीं। जैसे बरसों बाद पूरे होश में हों।
"वो आए थे दीपक," उन्होंने कहा। "गिनती करवा रहे थे।"
"कौन पिताजी?"
और वो रुक-रुककर नाम लेने लगे। "रामधार। सुंदरी। भोला। गीता। मुनिया..."
वही नाम। उसी क्रम में। जो मैंने उस दोपहर टैबलेट में भरे थे, और जो मैंने किसी को नहीं बताए थे।
इकतीसवें नाम पर वो रुके। फिर उनकी आवाज़ टूट गई। "मैंने लिखा था दीपक... कि वहाँ कोई नहीं है। वो सब वहीं थे। मैंने अपने हाथ से उनके अँगूठे लगवाए थे।"
उन्होंने अपना दाहिना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया। उनका अँगूठा सफ़ेद पड़ चुका था। फूला हुआ, सिकुड़ी हुई खाल वाला, जैसे बरसों पानी में पड़ा रहा हो। और उस पर गीली काली मिट्टी लगी थी। ठीक वैसे, जैसे किसी काग़ज़ पर अभी-अभी अँगूठा लगाकर उठाया गया हो।
"आज उन्होंने मेरा अँगूठा लगवाया," वो बोले। "बत्तीसवाँ... रामेश्वर तिवारी।"
मेरी नज़र अपने आप मोबाइल की स्क्रीन पर चली गई। दो बजकर चौदह मिनट।
"बत्तीस पूरे हुए।"
फिर वो चुपचाप लेट गए।
सुबह वो नहीं उठे।
डॉक्टर ने जाँच की, फिर मुझे एक तरफ़ ले जाकर बोले, "तिवारी जी, अजीब केस है। इनके फेफड़ों में पानी भरा है। बिल्कुल वैसे, जैसे कोई नदी में डूबकर मरा हो।"
डूबकर। उस घर में, जहाँ तीन दिन से नल में एक बूँद नहीं आई थी।
तेरहवीं के अगले दिन वर्मा जी का फ़ोन आया। आवाज़ में पान नहीं, घबराहट थी। "मास्साब, आपके केसला वाले ब्लॉक में बड़ी गड़बड़ है। ज़ीरो की जगह एक मकान और बत्तीस आदमी चढ़ा दिए आपने? और सुनिए, ये एंट्री सिंक हुई है उस रात दो बजकर चौदह मिनट पर। जबकि आपका टैबलेट तो शाम से ऑफ़िस की अलमारी में ताले में बंद था!"
मैं ऑफ़िस भागा। एंट्री खोली। इकतीस नाम, जो मैंने ख़ुद टाइप किए थे। और सबसे नीचे, एक बत्तीसवाँ नाम... जो मैंने कभी नहीं लिखा।
नाम: रामेश्वर तिवारी।
उम्र: इकहत्तर साल।
और मुखिया से रिश्ते वाले ख़ाने में, जहाँ ऐप सिर्फ़ गिने-चुने विकल्प देता है... बेटा, पत्नी, बहू, अन्य... वहाँ किसी ने अपने हाथ से टाइप किया था...
"कर्ज़दार।"
मैं बहुत देर तक उस स्क्रीन को देखता रहा। पिताजी ठीक कहते थे। जिसका नाम सही लिखा जाए, उसका हक़ कोई नहीं मार सकता। उनतीस साल बाद, केसला के इकतीस लोगों के नाम आख़िरकार सही लिखे गए थे। और उनके साथ, बत्तीसवाँ भी।
उस साल अच्छी बारिश हुई। बाँध फिर लबालब भर गया, और केसला खुर्द फिर पानी के नीचे चला गया। सबने कहा, क़िस्सा ख़त्म।
पर दोस्तों, दीपक जी के मैसेज की आख़िरी लाइनें मैं आपको वैसी की वैसी पढ़कर सुनाता हूँ।
"अनुराग भाई, मेरा मकान, मेरी पढ़ाई, मेरी नौकरी, सब उसी पैसे की नींव पर खड़ा है। मुझे लगा था, पिताजी के साथ हिसाब बराबर हो गया। पर परसों रात मेरा सात साल का बेटा नींद में बड़बड़ा रहा था... पापा, ये रामधार बाबा कौन हैं? कह रहे हैं, अगली गर्मी में फिर आएँगे... और इस बार गिनती मैं करूँगा।"
"सुबह मैंने उसका स्कूल बैग खोला। गणित की कॉपी का आख़िरी पन्ना पानी से फूला हुआ था, जैसे रात भर किसी बाल्टी में डूबा रहा हो। उस पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में, एक के नीचे एक, बत्तीस नाम लिखे थे। पहला रामधार... और आख़िरी, रामेश्वर तिवारी। ये नाम मैंने घर में कभी किसी के सामने नहीं लिए थे।"
"और उनके नीचे, उसने गिनती में लिखा था... तैंतीस। आगे की लाइन ख़ाली छोड़ी हुई थी।"
"अनुराग भाई, पिताजी के जाने के बाद, वो मकान जो उस पैसे से बना था... अब मेरे नाम पर चढ़ गया है। और अगली गर्मी आने में... बस सात महीने बचे हैं।"
सरकार भूल जाती है दोस्तों... पर पानी, कुछ नहीं भूलता।
कहानी कैसी लगी, कमेंट में ज़रूर बताइए। मिलते हैं अगली कहानी में। तब तक के लिए, अनुराग को इजाज़त दीजिए।
- Writer
- Pretika
- Story
- डूबे गाँव की जनगणना
- Chapter
- Single story
- Category
- Village Horror
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3156
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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