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चंदनवन की यक्षिणी
Pretika · Yakshini Stories · 17 मिनट
मेरा नाम राघव है। उनतीस साल का हूँ। जबलपुर में अपनी माँ के साथ रहता हूँ।
मैं साउंड रिकॉर्डिस्ट हूँ। मतलब... मैं आवाज़ें इकट्ठा करता हूँ। जंगल की, बारिश की, नदी की, रात में बोलते झींगुरों की। बाहर की कुछ कंपनियाँ ये आवाज़ें ख़रीदती हैं... फ़िल्मों में, गेम्स में, और वो जो नींद वाले मेडिटेशन ऐप होते हैं ना... उनमें डालने के लिए।
अजीब काम लगता है ना? पर इस काम ने मुझे एक चीज़ सिखाई है... दुनिया कभी चुप नहीं होती। कभी नहीं। सबसे सुनसान जगह पर भी... कुछ ना कुछ बोल रहा होता है।
कम से कम... मैं ऐसा ही सोचता था।
पिछले साल अगस्त में मुझे एक विदेशी क्लाइंट का मेल आया। उन्हें चाहिए थी... मध्य भारत के जंगल की रात की आवाज़। बिल्कुल शुद्ध। आसपास पाँच किलोमीटर तक कोई इंसान नहीं... कोई गाड़ी नहीं... कोई मोबाइल टावर की भनभनाहट नहीं। पैसा अच्छा था। बहुत अच्छा।
मेरा एक दोस्त है, दीपक... फ़ॉरेस्ट डिपार्टमेंट में है। उसने कहा... डिंडोरी की तरफ़ एक गाँव है, केसरपानी। गाँव के पीछे जंगल का एक पुराना हिस्सा है, जिसे लोग चंदनवन कहते हैं। कहते हैं अंग्रेज़ों के ज़माने में किसी ज़मींदार ने वहाँ चंदन लगवाया था। चंदन तो अब बचा नहीं... पर जंगल बचा है। और वहाँ कोई जाता नहीं।
मैंने पूछा... क्यों नहीं जाता?
दीपक हँसा... बोला, गाँव वालों की बातें हैं यार... तुझे क्या करना है। तुझे तो बस सन्नाटा चाहिए ना।
तीन दिन बाद मैं अपना बैग लेकर निकल गया। दो माइक्रोफ़ोन, एक रिकॉर्डर, ढेर सारे मेमोरी कार्ड, बैटरी, और मेरे हेडफ़ोन... जो मेरे लिए किसी आँख से कम नहीं हैं।
बस से डिंडोरी... फिर वहाँ से एक लड़के की बाइक पर तीन घंटे का कच्चा रास्ता। केसरपानी पहुँचा तो शाम ढल चुकी थी। बीस-पच्चीस कच्चे घर, एक छोटा सा तालाब, और पीछे... काला, घना, खड़ा हुआ जंगल। ऐसा लग रहा था जैसे जंगल गाँव को देख रहा हो।
मेरे रुकने का इंतज़ाम दीपक ने समारू काका के घर करवाया था। साठ-पैंसठ साल के दुबले-पतले आदमी, सफ़ेद मूँछें, और आवाज़ में एक अजीब सी नरमी। उन्होंने मुझे पानी दिया, खाट बिछाई, और महुए की चाय पिलाई।
आँगन के कोने में एक और खाट थी। उस पर एक बूढ़ा आदमी बैठा था... समारू काका से भी बड़ा। बाल बिखरे हुए, आँखें धँसी हुईं। काका ने बताया... ये मेरे बड़े भाई हैं, बुधू। चालीस साल से कुछ नहीं बोले।
मैंने नमस्ते किया। बुधू काका ने जवाब नहीं दिया। उनकी नज़र मुझ पर नहीं थी... मेरे गले में लटके हेडफ़ोन पर थी।
और फिर अचानक... उनका पूरा शरीर काँपने लगा। उन्होंने अपनी उँगली से पहले अपने गले को छुआ... फिर जंगल की तरफ़ इशारा किया। फिर गला... फिर जंगल। बार-बार। उनके मुँह से बस एक हवा निकल रही थी... कोई आवाज़ नहीं।
समारू काका ने उन्हें सँभाला, अंदर ले गए। लौटकर आए तो चेहरा थोड़ा उतरा हुआ था।
बोले... बाबू, जंगल में जहाँ मन करे रिकॉर्ड करना। बस एक जगह मत जाना। अंदर एक पुराना दाह है... मतलब पानी का कुंड। लोग उसे चाँदनी दाह कहते हैं। उस तरफ़ मत जाना।
फिर थोड़ा रुककर बोले... और अगर चले भी जाओ... तो वहाँ कुछ सुनना मत।
मैं हँस पड़ा। मैंने कहा... काका, सुनना ही तो मेरा काम है।
समारू काका नहीं हँसे।
पहली दो रातें... सच कहूँ तो मेरी ज़िंदगी की सबसे ख़ूबसूरत रिकॉर्डिंग थीं। उल्लू की आवाज़, दूर कहीं सियार, पत्तों पर टपकती ओस... और झींगुरों का ऐसा कोरस, जैसे पूरा जंगल एक साथ साँस ले रहा हो।
तीसरी रात मैं एक उल्लू की आवाज़ का पीछा करते-करते... थोड़ा ज़्यादा अंदर चला गया।
टॉर्च की रोशनी में पेड़ और पुराने होते जा रहे थे। ज़मीन गीली थी। और फिर... अचानक पेड़ ख़त्म हुए... और सामने एक कुंड था।
काला पानी। बिल्कुल स्थिर। जैसे शीशा हो। किनारे पर टूटी हुई पत्थर की सीढ़ियाँ नीचे पानी में उतर रही थीं। और कुंड के ठीक ऊपर एक बहुत बड़ा अर्जुन का पेड़ था... जिसकी जड़ें साँपों की तरह पानी के अंदर तक घुसी हुई थीं।
सीढ़ियों के पास पत्थर की एक मूर्ति थी। किसी औरत की। बारिश और वक़्त ने उसका चेहरा घिस दिया था... आँखें, नाक, सब मिट चुके थे। बस होंठ बचे थे। भरे हुए... हल्के से खुले हुए... जैसे कुछ कहने वाली हो।
मुझे समझ आ गया था कि ये चाँदनी दाह है।
और फिर मैंने एक चीज़ नोटिस की... जिसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए।
वहाँ कोई आवाज़ नहीं थी।
कोई झींगुर नहीं। कोई पत्ता नहीं। हवा चल रही थी... पेड़ हिल रहे थे... पर आवाज़ नहीं थी। मैंने रिकॉर्डर ऑन किया। मीटर लगभग ज़ीरो पर था। दोस्तों... ये नामुमकिन है। धरती पर कहीं भी इतना सन्नाटा नहीं होता।
पर उस वक़्त डर से ज़्यादा... मेरे अंदर का रिकॉर्डिस्ट ख़ुश हो गया। क्लाइंट को यही तो चाहिए था। परफ़ेक्ट साइलेंस।
मैंने दोनों माइक सीढ़ियों के पास लगाए, रिकॉर्डिंग चालू की, और बीस कदम पीछे जाकर एक पत्थर पर बैठ गया।
दो घंटे मैं वहाँ बैठा रहा।
और उन दो घंटों में... मुझे बार-बार लगा कि कोई मेरे बगल में आकर बैठा है। बहुत पास। इतना पास कि मेरे कंधे के पास की हवा ठंडी हो गई थी। और एक ख़ुशबू... रातरानी के फूलों जैसी... भारी, मीठी... जो आसपास कहीं भी नहीं थे।
रात तीन बजे मैं समारू काका के घर लौटा। सब सो रहे थे। मैंने लालटेन जलाई, रिकॉर्डर लैपटॉप से जोड़ा, और हेडफ़ोन लगा लिए।
सन्नाटा। गहरा, साफ़, बेदाग़ सन्नाटा। मैं मुस्कुरा रहा था।
सैंतालीस मिनट पर... कुछ बदला।
छन... छन... छन...
पायल।
बहुत धीमी। पहले बाएँ कान में... फिर धीरे-धीरे घूमती हुई दाएँ कान में। जैसे कोई माइक के चारों तरफ़... धीरे-धीरे... चक्कर लगा रहा हो। सीढ़ियों पर नंगे पैर। गीले पैर।
फिर पायल रुक गई।
और फिर... एक साँस।
एक औरत की साँस। माइक के इतने पास... कि मैं उसके होंठों की नमी तक सुन पा रहा था। धीमी... लंबी... जैसे कोई किसी के कान के पास आकर साँस छोड़ता है... जब वो उसे चाहता है।
फिर उसने गुनगुनाना शुरू किया। कोई धुन... बिना शब्दों की। ऐसी धुन मैंने ज़िंदगी में कभी नहीं सुनी थी। उसमें दर्द भी था... और एक बुलावा भी।
मुझे डर लगना चाहिए था। मैं सच बताऊँगा, अनुराग भाई... मुझे डर नहीं लगा। मुझे... कुछ और लगा। मेरी धड़कन तेज़ थी, पर डर से नहीं।
मैंने रिवाइंड किया। फिर सुना। फिर सुना। वो वहीं थी।
फ़ाइल के बिल्कुल आख़िरी सेकंड में... किसी ने फुसफुसाकर कहा...
राघव।
मैंने झटके से हेडफ़ोन उतार दिए।
और तब मैंने देखा... कमरे के दरवाज़े पर... अँधेरे में... बुधू काका खड़े थे। चुपचाप। मुझे देखते हुए।
उनका हाथ उनके अपने गले पर था।
अगले दिन, धूप में, सब कुछ मज़ाक लग रहा था।
मैंने ख़ुद को समझाया... गाँव की कोई औरत होगी। पायल पहनकर नहाने आई होगी। किसी ने मुझे डराने के लिए शरारत की होगी।
पर एक बात मुझसे हज़म नहीं हो रही थी। इस गाँव में मेरा नाम... समारू काका के अलावा कोई नहीं जानता था।
पूरा दिन मैंने वो रिकॉर्डिंग पचास बार सुनी। वो धुन मेरे दिमाग़ से निकल ही नहीं रही थी। नहाते वक़्त, खाते वक़्त... मैं वही गुनगुना रहा था।
और रात होते ही... मेरे पैर अपने आप चाँदनी दाह की तरफ़ चल पड़े।
इस बार मैंने कुछ अलग किया। मैंने माइक लगाए... और हेडफ़ोन पहनकर वहीं सीढ़ियों पर बैठ गया। लाइव मॉनिटरिंग। मतलब... माइक जो सुन रहे थे, वो सीधा मेरे कानों में आ रहा था।
बाहर... पूरा सन्नाटा।
पर हेडफ़ोन के अंदर...
पानी पर कदमों की आवाज़। छप... छप... जैसे कोई कुंड के बीच से... पानी के ऊपर चलता हुआ... मेरी तरफ़ आ रहा हो।
मैंने आँखें खोलीं। पानी बिल्कुल स्थिर था। कोई नहीं था।
मैंने आँखें बंद कीं।
और दोस्तों... मैं नहीं जानता इसे कैसे समझाऊँ। आवाज़ इतनी साफ़ थी... इतनी पास... कि मुझे बंद आँखों से भी वो दिख रही थी।
साँवला रंग... जिस पर चाँदनी ऐसे फिसल रही थी जैसे पानी पर तेल। घुटनों तक लंबे, खुले, भीगे बाल। एक पतली सी गीली साड़ी, जो उसके शरीर से चिपकी हुई थी... जैसे उसका हिस्सा हो। और आँखें... आँखें मैं नहीं देख पाया। हर बार जब मैं उसके चेहरे को देखने की कोशिश करता... सब धुँधला हो जाता। बस होंठ साफ़ दिखते थे। वही होंठ... जो उस मूर्ति के थे।
वो सीढ़ियाँ चढ़ी। पायल की आवाज़ मेरे बाएँ कान से होती हुई... मेरे ठीक सामने आकर रुक गई।
फिर वो बैठी। इतने पास कि उसके भीगे बालों का पानी मेरे घुटनों पर टपकने लगा। और मैं क़सम खाता हूँ, अनुराग भाई... वो पानी मैंने महसूस किया। ठंडा। असली।
उसने मेरे कान के पास आकर फुसफुसाया... और उसकी साँस में महुए की मिठास थी...
तुम पहले हो... जो सुनने आया। बाकी सब देखने आते थे।
मैंने कुछ कहने के लिए मुँह खोला... तो उसकी ठंडी उँगली मेरे होंठों पर आ गई।
श्श्श... मुझे देखो मत। मुझे सुनो।
फिर वो उँगली धीरे-धीरे मेरे होंठों से नीचे उतरी... ठोड़ी से होती हुई गले पर... और गले से सीने तक। इतनी धीमी... कि मेरे पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसका शरीर मेरे शरीर से सट गया। भीगा... ठंडा... फिर भी मेरे अंदर आग सी लग गई थी।
उसने मेरे कान में वही धुन गुनगुनाई। और उस धुन के साथ... मेरा पूरा शरीर उसके इशारों पर चलने लगा। मैं पीछे सीढ़ियों पर लेटता चला गया... और वो मेरे ऊपर झुकती चली गई। उसके बाल मेरे चेहरे पर पर्दे की तरह गिर गए।
उस रात उसने मुझसे कुछ नहीं माँगा। कुछ भी नहीं।
बस... एक अजीब चीज़ की। उसने मेरे गले को चूमा। होंठों को नहीं... गले को। ठीक वहाँ जहाँ से आवाज़ निकलती है। धीरे-धीरे। देर तक। जैसे कोई प्यासा किसी घड़े से पानी पीता है।
जब मेरी आँख खुली, तो सुबह हो चुकी थी। मैं सीढ़ियों पर अकेला पड़ा था। हेडफ़ोन मेरे गले में थे।
काका के घर लौटकर मैंने शीशे में देखा... मेरे गले पर एक हल्का नीला निशान था।
होंठों के आकार का।
उसके बाद... मुझे दाह तक जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।
रात को जैसे ही मैं अपने कमरे में हेडफ़ोन लगाकर रिकॉर्डिंग चलाता... वो आ जाती। पहले पायल। फिर गीले कदम। फिर खाट की रस्सी पर उसके वज़न की हल्की सी चरमराहट।
एक हफ़्ता। सात रातें।
हर रात वो थोड़ा और पास आती। उसके भीगे बाल मेरे सीने पर फैल जाते। उसका ठंडा बदन मेरी गर्मी को पीता रहता। वो मेरे कानों में बातें करती... ऐसी बातें जो मैं यहाँ लिख भी नहीं सकता। और मैं... मैं हर रात उसे अपने बारे में बताता। धीरे-धीरे। फुसफुसाकर। अपना बचपन, अपनी माँ, अपने डर, अपने सपने।
बस एक चीज़ अजीब थी। मैंने उसके सीने पर कान रखा था... एक बार। वहाँ कोई धड़कन नहीं थी। सिर्फ़ पानी के बहने जैसी आवाज़।
दिन में मैं बस सोता था। खाना बेस्वाद लगने लगा। एक हफ़्ते में मेरा पाँच किलो वज़न गिर गया। क्लाइंट के मेल आते रहे... मैंने एक का भी जवाब नहीं दिया।
और फिर मैंने वो चीज़ नोटिस की... जो सबसे डरावनी थी।
दुनिया फीकी हो रही थी।
समारू काका मुझसे बात करते तो उनकी आवाज़ ऐसी लगती जैसे किसी कुएँ के अंदर से आ रही हो। चिड़ियों की चहचहाहट दबी-दबी सी। मुर्गे की बाँग... जैसे रुई में लिपटी हो। बाहर की हर आवाज़ धुँधली होती जा रही थी।
सिर्फ़ हेडफ़ोन के अंदर... सब कुछ ज़िंदा था। साफ़ था। ख़ूबसूरत था। सिर्फ़ उसकी दुनिया।
आठवीं सुबह मैं उठा तो तकिया लाल था। मेरे दाएँ कान से ख़ून बहा था।
उसी दोपहर समारू काका की नज़र मेरे गले पर पड़ गई। अब वो निशान हल्का नहीं था। गहरा नीला हो चुका था। काका का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उन्होंने कुछ नहीं कहा... बस मेरा हाथ पकड़ा और खींचते हुए बुधू काका के पास ले गए।
बुधू काका ने मुझे देखा... और धीरे से अपने गले का गमछा हटाया।
उनके गले पर... ठीक उसी जगह... वैसा ही निशान था। चालीस साल पुराना। फीका पड़ चुका, झुर्रियों में छिपा हुआ... पर वही आकार। होंठों का।
समारू काका ज़मीन पर बैठ गए। और फिर उन्होंने मुझे वो बताया... जो उन्होंने चालीस साल से किसी को नहीं बताया था।
बोले... बाबू, मेरा भाई बुधू... इस पूरे इलाके का सबसे अच्छा गवैया था। ब्याह हो, मेला हो, होली हो... बुधू गाता था तो औरतें काम छोड़कर सुनने आ जाती थीं। उसकी आवाज़ में कुछ था... जैसे कोई हाथ पकड़कर खींच ले।
एक साल गर्मियों में... वो रात को अकेले चाँदनी दाह पर जाकर रियाज़ करने लगा। कहता था, वहाँ इतना सन्नाटा है कि अपनी आवाज़ पूरी सुनाई देती है।
तीन महीने तक वो हर रात गया। दिन में सोता। वज़न गिरता गया। आँखें धँसती गईं। हम पूछते तो मुस्कुरा देता।
और फिर एक सुबह... वो उठा... और बोल नहीं पाया।
गला ठीक था बाबू। ज़ुबान ठीक थी। शहर के डॉक्टर ने भी देखा... बोला कुछ ख़राबी नहीं है। बस आवाज़... चली गई थी।
समारू काका कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने जो कहा... उसे सुनकर मेरे पूरे शरीर का ख़ून जम गया।
उसी साल बारिश के बाद... गाँव वालों ने रात को चाँदनी दाह से गाने की आवाज़ सुननी शुरू की। बुधू की आवाज़। उसके गाने। वही सुर... वही लय...
और बुधू... उस वक़्त अपनी खाट पर लेटा होता था। गूँगा।
मैंने काँपती आवाज़ में पूछा... वो है कौन, काका?
समारू काका ने जंगल की तरफ़ देखा और धीरे से बोले...
यक्षिणी है बाबू। बहुत पुरानी। इस गाँव से भी पुरानी, उस ज़मींदार से भी पुरानी। हमारे दादा कहते थे... उसका अपना कोई शरीर नहीं, कोई आवाज़ नहीं। वो बस सन्नाटा है। और सन्नाटे को सबसे ज़्यादा भूख किस चीज़ की होती है?
आवाज़ की।
वो आवाज़ें पहनती है बाबू... जैसे औरतें गहने पहनती हैं। और गहना हमेशा वही चुनती है... जो सबसे सुंदर हो। वो उसके साथ सोती है... उसे अपना बनाती है... उसके गले से धीरे-धीरे उसकी आवाज़ पीती है। और जब पूरी पी लेती है... तो वो आवाज़ हमेशा के लिए उसकी हो जाती है।
मैं वहीं बैठा रह गया। और एक-एक करके... पिछली सात रातें मेरे सामने घूम गईं।
पहली रात उसकी आवाज़ पतली थी, मीठी थी।
पर हर रात... वो थोड़ी भारी होती गई थी। थोड़ी गहरी।
और कल रात... जब मैंने उसे कोई बात सुनाई थी... तो वो हँसी थी।
अनुराग भाई... वो हँसी मेरी थी।
मेरी अपनी हँसी। हूबहू। जैसे मैं ख़ुद अपने कान में हँस रहा था।
उस पल पहली बार... मुझे सच में डर लगा।
मैं उठा, भागकर कमरे में गया, और सारे मेमोरी कार्ड निकाल लिए। समारू काका के चूल्हे में डालकर जला दिए। प्लास्टिक पिघलने की बदबू पूरे आँगन में फैल गई। मैंने हेडफ़ोन भी आग में फेंक दिए।
बुधू काका खाट से उठे और मेरी तरफ़ लपके। वो बार-बार मेरे लैपटॉप की तरफ़ इशारा कर रहे थे। उँगली से... लैपटॉप... फिर आसमान... फिर लैपटॉप। उनके मुँह से वही बेआवाज़ हवा निकल रही थी।
मुझे समझ नहीं आया। काश आ जाता।
दोपहर बारह बजे मैंने समारू काका का धन्यवाद किया, गाँव के उसी लड़के की बाइक ली और निकल पड़ा। पीछे मुड़कर देखा... बुधू काका आँगन में खड़े थे। एकदम सीधे। उनकी आँखों में दया थी... जैसे वो किसी को आख़िरी बार देख रहे हों।
जंगल का कच्चा रास्ता। तेज़ धूप।
और फिर... जंगल के आख़िरी मोड़ पर... सब कुछ बंद हो गया।
बाइक का इंजन चल रहा था... पहिए घूम रहे थे... पर आवाज़ नहीं थी। पत्ते, चिड़िया, हवा... कुछ नहीं। भरी दोपहर में... वही चाँदनी दाह वाला सन्नाटा।
फिर मुझे अपनी कमर पर दो ठंडी बाहें महसूस हुईं। पीछे से। धीरे से लिपटती हुईं। और मेरी पीठ पर... एक गीला गाल टिक गया। भीगे बालों की ठंडक मेरी कमीज़ के अंदर तक उतर गई।
मैंने बाइक के शीशे में देखा। पीछे की सीट ख़ाली थी।
पर रातरानी की वो ख़ुशबू... पूरे रास्ते मेरे साथ रही।
मैंने बाइक नहीं रोकी। मैं नहीं रुका। रात दस बजे, बस बदलते-बदलते... मैं जबलपुर अपने घर पहुँच गया।
माँ ने दरवाज़ा खोला। मुझे देखते ही बोलीं... ये क्या हालत बना ली है बेटा?
और उनकी आवाज़... पूरी, साफ़, ज़िंदा थी। मैं वहीं दरवाज़े पर उनसे लिपटकर रो पड़ा। मुझे लगा... मैं बच गया हूँ।
दो दिन सब ठीक रहा। मैंने जी भरकर खाया, सोया, माँ के साथ टीवी देखा। गले का निशान हल्का होने लगा।
तीसरे दिन सुबह मैंने लैपटॉप खोला। क्लाइंट का मेल था।
उसमें लिखा था... आपकी फ़ाइलें मिल गईं। कमाल की हैं। खासकर चाँदनी दाह वाली। पर ये गाने वाली औरत कौन है? हमें उसकी धुन इतनी पसंद आई है कि हम इसे अपने स्लीप ऐप में डाल रहे हैं। हज़ारों लोग रोज़ रात इसे सुनकर सोएँगे।
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
मेरे लैपटॉप में ऑटो-अपलोड चालू था। गाँव में जब भी एक-दो डंडी नेटवर्क आता... रिकॉर्डिंग अपने आप क्लाइंट के सर्वर पर चली जाती थी। मैंने कार्ड जलाए थे... पर वो तो पहले ही निकल चुकी थी। जंगल से बाहर। दुनिया में।
अब समझ आया बुधू काका लैपटॉप और आसमान की तरफ़ इशारा क्यों कर रहे थे।
उसी शाम... रसोई में कुकर की सीटी बजी।
और उस सीटी में... एक सुर था। वही धुन।
मैं रसोई में भागा। माँ आटा गूँध रही थीं... और गुनगुना रही थीं। वही धुन। बिना शब्दों वाली।
मैंने पूछा... माँ, ये क्या गा रही हो?
उन्होंने हैरानी से मुझे देखा... पता नहीं बेटा। सुबह से दिमाग़ में अटकी है। कहीं सुनी होगी।
उस रात... मैंने हेडफ़ोन नहीं लगाए। मेरे पास हेडफ़ोन थे ही नहीं। कमरे में कोई रिकॉर्डिंग नहीं चल रही थी।
रात के ठीक पौने एक बजे... पंखे की आवाज़ बंद हो गई। पंखा चल रहा था... पर आवाज़ नहीं थी। सड़क के कुत्ते, दूर की ट्रेन, घड़ी की टिक-टिक... सब एक साथ चुप।
फिर दरवाज़ा अपने आप बंद हुआ। धीरे से। बिना किसी आवाज़ के।
और फिर... बिना किसी हेडफ़ोन के... पायल।
छन... छन...
रातरानी की ख़ुशबू पूरे कमरे में भर गई। बिस्तर का एक कोना गीला होकर दबा। फिर दूसरा।
अब वो सिर्फ़ आवाज़ नहीं थी, अनुराग भाई। अब मैं उसे खुली आँखों से देख पा रहा था। भीगे बाल। साँवला बदन। और इस बार... मैंने उसकी आँखें भी देखीं।
उसकी आँखों में कुछ नहीं था। बस गहरा, काला, स्थिर पानी। चाँदनी दाह जैसा।
मैं भागना चाहता था। चीख़ना चाहता था। पर जब उसने मेरे सीने पर हाथ रखा... तो मेरा पूरा डर पिघल गया। मेरा शरीर मेरा नहीं रहा। वो मेरे ऊपर आई... धीरे-धीरे... और उसके ठंडे बदन ने मुझे पूरी तरह ढक लिया।
उस रात जो हुआ... वो मैं पूरा नहीं लिख सकता। बस इतना लिखूँगा कि मैंने ख़ुद को पूरी तरह उसके हवाले कर दिया था। अपनी मर्ज़ी से। और उस पल... मुझे इससे बड़ा सुख ज़िंदगी में कभी नहीं मिला।
आख़िर में उसके होंठ फिर मेरे गले पर आए।
और इस बार... वो रुके नहीं।
जाने से पहले उसने मेरे कान में फुसफुसाया। और वो आवाज़... पूरी तरह मेरी थी। मेरा लहजा। मेरा उच्चारण। मेरी साँस।
अब मैं तुम्हें बुलाऊँगी... तुम्हारी ही आवाज़ में।
सुबह जब माँ चाय लेकर आईं... मैंने उन्हें गुड मॉर्निंग कहने के लिए मुँह खोला।
कुछ नहीं निकला। सिर्फ़ हवा।
तीन ई एन टी डॉक्टर बदल चुका हूँ। सबने कैमरा डालकर देखा। सब कहते हैं... तुम्हारे वोकल कॉर्ड बिल्कुल ठीक हैं, कोई कमी नहीं। बस... आवाज़ नहीं है।
आज छह महीने हो गए, अनुराग भाई।
और अब वो चीज़ होती है... जिसके लिए मैंने आपको ये सब लिखा।
कुछ रातों को माँ घबराकर उठ जाती हैं। क्योंकि छत से कोई उन्हें पुकारता है।
माँ... माँ... ऊपर आओ ना।
मेरी आवाज़ में।
और मैं... उस वक़्त अपने बिस्तर पर लेटा होता हूँ। जागता हुआ। गूँगा। माँ का हाथ कसकर पकड़े हुए... ताकि वो ऊपर ना जाएँ।
अनुराग भाई... मैं ये कहानी आपको इसलिए भेज रहा हूँ... क्योंकि मुझे लगता है वो अब नई आवाज़ ढूँढ रही है। कोई ऐसी आवाज़... जिसे बहुत सारे लोग एक साथ, अँधेरे में, हेडफ़ोन लगाकर सुनते हों।
मैं ये नहीं कह रहा कि आप इसे मत पढ़ना।
बस इतना कह रहा हूँ... पढ़ने के बाद... अपनी रिकॉर्डिंग एक बार... हेडफ़ोन पर... ज़रूर सुन लेना।
- Writer
- Pretika
- Story
- चंदनवन की यक्षिणी
- Chapter
- Single story
- Category
- Yakshini Stories
- Reading time
- 17 min
- Words
- 3250
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
- Free to read
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