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बहुरूपिया
Pretika · Creepypasta · 14 मिनट
मेरे पापा ने मेरी आंखों के सामने, मुझे बचाने के लिए खुद को दांव पर लगा दिया था। लेकिन अगली सुबह… वो आंगन में बैठे चाय पी रहे थे। अगले पच्चीस साल वो उसी घर में रहे। बस एक बात थी… वो मेरे पापा नहीं थे।
नमस्कार दोस्तों, मैं हूं अनुराग, और आप सुन रहे हैं अनुराग की वाणी। आज की कहानी हमें विकास ने भेजी है। विकास इंदौर में रहते हैं, और उनका गांव राजस्थान और मध्य प्रदेश के बॉर्डर पर, झालावाड़ के पास है। गांव का नाम उन्होंने बताने से मना किया है… कहानी सुनकर आप खुद समझ जाएंगे क्यों।
और हां, इस कहानी के बाद उसी नंबर से हमें एक और मैसेज आया था। वो मैं आपको बिल्कुल आखिर में बताऊंगा। तो चलिए, सुनते हैं… विकास की ज़ुबानी।
बात उन्नीस सौ सत्तानवे की है। मैं ग्यारह साल का था। दशहरे से ठीक एक हफ्ता पहले, गांव के चौराहे पर अचानक शोर मचा — पुलिस आई है!
खाकी वर्दी, मोटी मूंछें, हाथ में डंडा। एक दरोगा सरपंच जी का कॉलर पकड़कर चिल्ला रहा था, “बिजली चोरी करते हो? चलो थाने!” सरपंच जी का चेहरा सफेद पड़ गया। तभी दरोगा ने अपनी मूंछ खींचकर उतार दी और ठहाका लगाया। पूरा गांव हंसी से लोटपोट हो गया।
वो बहुरूपिया था।
जो नहीं जानते, उन्हें बता दूं, राजस्थान में बहुरूपिये आज भी आते हैं। रोज़ एक नया भेस। हफ्ता भर गांव को हंसाते हैं, और आखिरी दिन अपना असली चेहरा दिखाकर इनाम मांगते हैं।
ये वाला लंबा था, बेहद दुबला। एक पुराना लोहे का बक्सा लेकर मंदिर के पास वाली टूटी धर्मशाला में रुका था। गांव में किसी ने उसे कभी खाना खाते नहीं देखा। ना किसी ने उसका नाम पूछा, ना उसने बताया।
दूसरे दिन वो साधु बना, तीसरे दिन डाकिया। हम बच्चों के लिए तो जैसे रोज़ मेला लग रहा था।
फिर तीसरे दिन की शाम, मैंने कुछ ऐसा देखा जो आज तक नहीं भूला।
सूरज ढल रहा था। बहुरूपिया धर्मशाला की दीवार की तरफ पीठ करके खड़ा था। लंबा-चौड़ा आदमी… पर दीवार पर उसकी परछाईं छोटी थी। किसी ग्यारह-बारह साल के लड़के जितनी। मैंने आंखें मलीं। तभी उस परछाईं ने धीरे से अपना सिर घुमाया… और मेरी तरफ देखा।
जबकि बहुरूपिया अपनी जगह से हिला तक नहीं था।
शुरुआत
मेरे पापा ने मेरी आंखों के सामने, मुझे बचाने के लिए खुद को दांव पर लगा दिया था। लेकिन अगली सुबह… वो आंगन में बैठे चाय पी रहे थे। अगले पच्चीस साल वो उसी घर में रहे। बस एक बात थी… वो मेरे पापा नहीं थे।
नमस्कार दोस्तों, मैं हूं अनुराग, और आप सुन रहे हैं अनुराग की वाणी। आज की कहानी हमें विकास ने भेजी है। विकास इंदौर में रहते हैं, और उनका गांव राजस्थान और मध्य प्रदेश के बॉर्डर पर, झालावाड़ के पास है। गांव का नाम उन्होंने बताने से मना किया है… कहानी सुनकर आप खुद समझ जाएंगे क्यों।
और हां, इस कहानी के बाद उसी नंबर से हमें एक और मैसेज आया था। वो मैं आपको बिल्कुल आखिर में बताऊंगा। तो चलिए, सुनते हैं… विकास की ज़ुबानी।
भाग 1 — बहुरूपिया
बात उन्नीस सौ सत्तानवे की है। मैं ग्यारह साल का था। दशहरे से ठीक एक हफ्ता पहले, गांव के चौराहे पर अचानक शोर मचा — पुलिस आई है!
खाकी वर्दी, मोटी मूंछें, हाथ में डंडा। एक दरोगा सरपंच जी का कॉलर पकड़कर चिल्ला रहा था, “बिजली चोरी करते हो? चलो थाने!” सरपंच जी का चेहरा सफेद पड़ गया। तभी दरोगा ने अपनी मूंछ खींचकर उतार दी और ठहाका लगाया। पूरा गांव हंसी से लोटपोट हो गया।
वो बहुरूपिया था।
जो नहीं जानते, उन्हें बता दूं, राजस्थान में बहुरूपिये आज भी आते हैं। रोज़ एक नया भेस। हफ्ता भर गांव को हंसाते हैं, और आखिरी दिन अपना असली चेहरा दिखाकर इनाम मांगते हैं।
ये वाला लंबा था, बेहद दुबला। एक पुराना लोहे का बक्सा लेकर मंदिर के पास वाली टूटी धर्मशाला में रुका था। गांव में किसी ने उसे कभी खाना खाते नहीं देखा। ना किसी ने उसका नाम पूछा, ना उसने बताया।
दूसरे दिन वो साधु बना, तीसरे दिन डाकिया। हम बच्चों के लिए तो जैसे रोज़ मेला लग रहा था।
फिर तीसरे दिन की शाम, मैंने कुछ ऐसा देखा जो आज तक नहीं भूला।
सूरज ढल रहा था। बहुरूपिया धर्मशाला की दीवार की तरफ पीठ करके खड़ा था। लंबा-चौड़ा आदमी… पर दीवार पर उसकी परछाईं छोटी थी। किसी ग्यारह-बारह साल के लड़के जितनी। मैंने आंखें मलीं। तभी उस परछाईं ने धीरे से अपना सिर घुमाया… और मेरी तरफ देखा।
जबकि बहुरूपिया अपनी जगह से हिला तक नहीं था।
भाग 2 — रूप उतारना
चौथे दिन से खेल बदल गया। अब वो भेस नहीं बना रहा था। अब वो लोगों का रूप उतार रहा था।
सुबह रामप्रसाद हलवाई की दुकान पर दो रामप्रसाद खड़े थे। वही गंजा सिर, गाल पर वही मस्सा, आवाज़ में वही खराश। रामप्रसाद का अपना कुत्ता कालू, पूंछ हिलाता हुआ बहुरूपिये के पैरों में जा बैठा… और अपने असली मालिक पर गुर्राने लगा। लोग हंसे तो, पर इस बार हंसी में घबराहट मिली हुई थी।
पांचवें दिन मैं स्कूल से लौटा। अम्मा रसोई में रोटियां सेंक रही थीं। तभी पीछे आंगन से आवाज़ आई, “विकास, हाथ धो ले, खाना लग गया है।”
वो भी अम्मा की आवाज़ थी।
रसोई में अम्मा। आंगन में अम्मा। वही हरी साड़ी, नाक में वही लौंग, दाहिने हाथ में वही चटकी हुई चूड़ी। दोनों मुझे देखकर मुस्कुरा रही थीं, और मैं तय नहीं कर पा रहा था कि भागूं तो किसकी तरफ। फिर आंगन वाली अम्मा ने पल्लू हटाया और ठहाका मारकर हंस पड़ी।
सब हंसे। बस दादी नहीं हंसीं। उनकी माला हाथ से छूटकर ज़मीन पर बिखर गई।
दादी के कमरे में एक बारह साल के लड़के की पुरानी फोटो टंगी रहती थी, जिस पर हमेशा माला चढ़ी होती थी। मुझे बस इतना पता था कि वो मेरे ताऊ थे, जो बचपन में दशहरे के मेले में खो गए थे। घर में उनका नाम कोई नहीं लेता था। उस रात दादी देर तक उसी फोटो के सामने बैठी रहीं, और सोते वक्त मेरे कान में बोलीं, “वो कुछ भी मांगे, मत देना। और उसके सामने कभी अकेला मत जाना।”
पापा भी बदल गए थे। खेत जाना छोड़ दिया था। रात भर छत पर बैठकर धर्मशाला की तरफ घूरते रहते। एक बार मैंने मज़ाक में बहुरूपिये की नकल उतारी, तो पापा ने ज़िंदगी में पहली बार मुझ पर हाथ उठा दिया।
छठी रात भी पापा ने रोज़ की तरह मेरे माथे पर अपना अंगूठा रखा और कहा, “सो जा, शेर।” ये उनकी आदत थी। जब तक वो ऐसा ना करें, मुझे नींद ही नहीं आती थी।
रात करीब दो बजे मेरी आंख खुली। लालटेन धीमी जल रही थी। मेरी चारपाई के पैताने बहुरूपिया बैठा था। अपनी ठंडी उंगलियों से मेरा चेहरा छू रहा था। माथा, नाक, ठुड्डी… जैसे दर्ज़ी कपड़ा काटने से पहले नाप लेता है। मैं चीखना चाहता था, पर आवाज़ गले में ही अटक गई। और वो धीमे-धीमे एक लोरी गुनगुना रहा था।
वही लोरी, जो दादी मुझे सुनाया करती थीं।
सुबह पापा कुल्हाड़ी लेकर धर्मशाला भागे। वहां कोई नहीं था। बस वो लोहे का बक्सा पड़ा था। पापा ने उसे खोला… और वहीं ज़मीन पर बैठकर फूट-फूटकर रोने लगे।
बक्से में मेकअप का कोई सामान नहीं था। उसमें बच्चे की एक जोड़ी घिसी हुई चप्पलें थीं, और लकड़ी की एक पुरानी स्लेट। स्लेट पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था — शंकर।
उस वक्त ये नाम मेरे लिए कुछ नहीं था।
भाग 3 — इनाम का दिन
सातवां दिन दशहरा था। शाम को पूरा गांव चौपाल पर जमा था। रावण का पुतला खड़ा था, पर किसी की नज़र उस पर नहीं थी। पापा ने मेरा हाथ इतनी ज़ोर से पकड़ रखा था कि उंगलियां सुन्न पड़ गई थीं।
फिर भीड़ चीरता हुआ वो आया… और मैंने खुद को अपनी तरफ आते देखा।
वही धारीदार कमीज़, जिसकी जेब फटी थी। घुटने पर वही निशान, जो साइकिल से गिरकर लगा था। बस वो मुझसे थोड़ा लंबा था। इस बार कोई नहीं हंसा। इतना सन्नाटा था कि मशालों के चटकने की आवाज़ तक सुनाई दे रही थी।
वो पापा के सामने रुका और मेरी आवाज़ में बोला, “पापा… इनाम दो।”
फिर रिवाज के मुताबिक उसने गीले कपड़े से अपना चेहरा पोंछ दिया।
रंग उतरा, और औरतें चीख पड़ीं। एक लंबे-चौड़े आदमी के बदन पर… एक बारह साल के बच्चे का चेहरा लगा था। गोल गाल, मासूम आंखें, नाक पर कटे का हल्का-सा निशान। वो चेहरा मैं हज़ार बार देख चुका था। दादी के कमरे की दीवार पर। माला के पीछे।
दादी भीड़ को धकेलती हुई आगे आईं और चीखीं, “शंकर!”
पापा घुटनों के बल गिर पड़े। मुंह से बस एक शब्द निकला, “भैया…”
उस बच्चे वाले चेहरे से एक भारी, बूढ़ी आवाज़ निकली, “उनतीस साल हो गए, रघु। उस दशहरे पर बहुरूपिया तेरा रूप लेकर आया था। तू मेरे पीछे छिपकर रो रहा था, कह रहा था, मुझे नहीं, भैया को ले जाओ। मैंने तेरा रोता हुआ चेहरा देखा, और खुद कहा… ठीक है, मैं चलता हूं। आज मुझे घर लौटना है। और मेरा इनाम…”
उसकी लंबी, सूखी उंगली मेरी तरफ उठी।
पापा खड़े हुए। मुझे अपने पीछे खींचा, और कांपती आवाज़ में बोले, “उस दिन मेरी जगह तू गया था, भैया। आज मेरे बेटे की जगह मैं जाऊंगा। इनाम में मुझे ले जा।”
बहुरूपिया मुस्कुराया। उसने पापा के चेहरे पर ऐसे हाथ फेरा, जैसे कोई आईने से धूल पोंछता है। उसी पल ऐसी हवा चली कि सारी मशालें एक साथ बुझ गईं। मेरे सिर में तेज़ दर्द उठा, और मैं वहीं बेहोश हो गया।
भाग 4 — जो लौटा
आंख खुली तो सुबह हो चुकी थी। आंगन से चाय की खुशबू आ रही थी। मैं डरते-डरते बाहर निकला… पापा चारपाई पर बैठे चाय पी रहे थे।
मैं दौड़कर उनसे लिपट गया। गांव वालों ने बताया, बहुरूपिया रात में ही अपना बक्सा उठाकर चला गया। जाते-जाते वो बार-बार मुड़कर हमारे घर की तरफ देख रहा था। मुझे लगा, पापा ने किसी तरह उसे भगा दिया। दादी उस दिन पापा से लिपटकर इतना रोईं, जितना मैंने उन्हें कभी रोते नहीं देखा था। बार-बार बस यही कहतीं, “मेरा बच्चा लौट आया।”
फिर छोटी-छोटी चीज़ें दिखने लगीं।
उस पहली रात मैं देर तक जागता रहा। पापा आए, दरवाज़े पर रुके, और बस इतना बोले, “सो जाओ, बेटा।” ना माथे पर अंगूठा, ना शेर। मैंने तकिये में मुंह छिपाकर रोया और खुद को समझाया कि पापा थक गए हैं। उसके बाद पच्चीस साल… उन्होंने मुझे एक बार भी शेर नहीं कहा।
पापा दादी को हमेशा माँ कहते थे। अब अम्मा कहने लगे। बीस साल से चलाया हुआ स्कूटर स्टार्ट करना भूल गए, और हंसकर बात टाल दी। मुझसे प्यार तो बहुत करते थे, पर थोड़ा झिझककर… जैसे कोई अपने भतीजे से करता है।
सोलह साल का था, जब स्कूल में लड़ाई करके लौटा। पापा ने गुस्से में बस इतना कहा, “तेरे पापा होते तो…” और बीच में ही रुक गए। फिर चुपचाप बात बदल दी। मुझे लगा, मैंने गलत सुना है।
और अम्मा ने उस दशहरे के बाद कभी अपनी मांग में सिंदूर नहीं भरा। पापा सामने बैठे होते, ज़िंदा, सही-सलामत, और अम्मा सूनी मांग के साथ उन्हें खाना परोसतीं। गांव में किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वजह पूछे। पापा फिर कभी अम्मा के कमरे में नहीं गए। पच्चीस साल वो बरामदे में सोए।
सब कुछ साफ हुआ दो हज़ार बाईस में। पापा आखिरी सांसें गिन रहे थे। उन्होंने सबको बाहर भेजा, मेरा हाथ पकड़ा और बोले, “विकास… मैं तेरा पापा नहीं हूं। मैं शंकर हूं।”
फिर उन्होंने वो बताया, जो हमारे खानदान में कोई नहीं जानता था।
“सुन, इस खेल के तीन नियम हैं। पहला, बहुरूपिया आखिरी दिन जिसका रूप लेकर आता है, वही उसका इनाम होता है। उन्नीस सौ अड़सठ में वो रघु का रूप लेकर आया था। उन्नीस सौ सत्तानवे में, मैं तेरा।”
“दूसरा, इनाम बदला जा सकता है… अगर उसी खून का कोई अपनी मर्ज़ी से आगे आ जाए। रघु की जगह मैं आगे आया था। तेरी जगह रघु।”
“तीसरा, जो जाता है, वो बहुरूपिया बन जाता है। उसका अपना चेहरा उसी उम्र पर रुक जाता है, और वो गांव-गांव दूसरों के चेहरे पहनकर भटकता है। उनतीस साल बाद वो अपना इनाम लेने घर लौटता है। इनाम मिलते ही उसकी छुट्टी।”
“मुझसे पहले हमारे दादा के छोटे भाई गए थे, उन्नीस सौ उनतालीस में। जिस रात मैं गया, शमशान के पास एक बूढ़े अजनबी की लाश मिली थी। छुट्टी के बाद दो ही रास्ते होते हैं, विकास। या तो मिट्टी में मिल जाओ… या जो गया, उसका रूप पहनकर उसकी जगह जी लो। उन्होंने मिट्टी चुनी।”
“मैं भी चला जाता, विकास। पर तेरी अम्मा की आंखें देखीं, तुझे देखा… और रघु का रूप पहन लिया। सोचा, जिस भाई के लिए मैं गया था, कम से कम उसका घर तो संभाल लूं।”
“उस रात बक्सा उठाकर जो गांव से निकला, वो मैं नहीं था। वो रघु था। मेरी जगह अब वही बहुरूपिया है, उसका चेहरा अड़तीस की उम्र पर रुक चुका है। और अगली सुबह आंगन में बैठकर जो चाय पी रहा था… वो रघु का चेहरा पहने मैं था।”
फिर उन्होंने मेरी कलाई कसकर पकड़ ली। “एक बात याद रखना। बहुरूपिया बनकर आदमी में आदमी कम बचता है। उस रात मैं तुझे ही लेने आया था। तेरे पापा भी अब सड़कों पर हैं… और उनके उनतीस साल भी पूरे होंगे।”
आखिर में उन्होंने अपना कांपता हुआ अंगूठा मेरे माथे पर रखा। “रघु तुझे ऐसे ही सुलाता था ना? पच्चीस साल मैंने ये कभी नहीं किया। ये उसका हक था… मेरा नहीं।”
उसी रात उनकी सांस थम गई।
भाग 5 — उनतीसवां साल
उनकी तेरहवीं के बाद मैंने बैठकर हिसाब लगाया। उन्नीस सौ उनतालीस। उन्नीस सौ अड़सठ। उन्नीस सौ सत्तानवे। हर बार ठीक उनतीस साल का फासला। और अगला… दो हज़ार छब्बीस।
यानी यही साल।
मैं अब इंदौर में रहता हूं। मेरा बेटा आरव ग्यारह साल का है। ठीक उतना, जितना मैं उस दशहरे पर था। मैंने सोचा था, शहर में क्या होगा। फ्लैट है, सोसाइटी है, गेट पर गार्ड है। इस बार तो मैं गांव भी नहीं गया।
पिछले हफ्ते आरव स्कूल से लौटा तो चहक रहा था। “पापा, आज गेट पर एक बहुरूपिया आया था! पता है किसका रूप लेकर? आपका! वही चश्मा, वही नीला ऑफिस बैग। और उसने मुझसे पूछा… तुम अपने पापा से बहुत प्यार करते हो ना?”
उस रात करीब ढाई बजे नीचे सड़क से एक लोरी सुनाई दी। दादी वाली लोरी। मैंने बालकनी से झांका। स्ट्रीट लाइट के नीचे एक आदमी खड़ा था, बिल्कुल मेरे जैसे कपड़ों में, चेहरा ऊपर मेरी तरफ उठाए। चेहरा तो साफ नहीं दिखा। पर उसकी परछाईं दिखी। एक हाथ कमर पर टिका हुआ, सिर हल्का-सा बाईं ओर झुका।
पापा बिल्कुल ऐसे ही खड़े होते थे।
अनुराग भाई, परसों दशहरा है। उसने मेरा रूप लिया है, यानी इस बार इनाम मैं हूं। अगर मैं खुद आगे ना गया… तो आरव आगे आ जाएगा। ठीक वैसे, जैसे शंकर ताऊ पापा के लिए आए थे। और आरव मुझसे बहुत प्यार करता है। तो सवाल बस इतना है… मैं, या आरव।
मुझे पता है, अगर मैं गया तो क्या होगा। मैं बहुरूपिया बन जाऊंगा। मेरा चेहरा चालीस की उम्र पर रुक जाएगा, और मैं किसी अनजान सड़क पर किसी और का चेहरा पहनकर भटकूंगा। और पापा को छुट्टी मिल जाएगी। फिर वो या तो मिट्टी चुनेंगे… या मेरा रूप पहनकर मेरे घर में रहेंगे। ठीक वैसे, जैसे शंकर ताऊ रहे।
ये सब आपको इसलिए भेज रहा हूं, ताकि कोई तो जाने। दशहरे के बाद अगर इस नंबर से कोई मैसेज आए… तो उसे गौर से पढ़ना। देखना, वो मेरे जैसा लिखा है… या पापा जैसा।
आखिर में
दोस्तों, विकास का ये मैसेज हमें दशहरे से दो दिन पहले मिला था। दशहरा बीत गया। फिर कल रात, उसी नंबर से एक और मैसेज आया। उसमें लिखा था —
“अनुराग भाई, आरव अभी-अभी सो गया। आज उनतीस साल बाद किसी के माथे पर अंगूठा रखकर कहा… सो जा, शेर।”
और सबसे नीचे बस एक लाइन — “सब ठीक है। मैं घर लौट आया हूं।”
विकास तो कभी घर से गए ही नहीं थे।
घर लौटने वाला तो एक ही हो सकता था। उनतीस साल सड़कों पर भटकने के बाद… रघु। विकास ने अपना फैसला कर लिया था। वो अब कहीं किसी अनजान सड़क पर है, किसी और का चेहरा पहने, और उसका अपना चेहरा हमेशा के लिए चालीस साल पर रुक चुका है।
और दो हज़ार पचपन में… उनतीस साल फिर पूरे होंगे।
आज का सवाल — अगर आप विकास की जगह होते, तो क्या अपने बच्चे के लिए खुद चले जाते? हाँ या ना, कमेंट में ज़रूर लिखिए।
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- Pretika
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- Creepypasta
- Reading time
- 14 min
- Words
- 2708
- Language
- Hindi (हिंदी)
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