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Ep 5

Ballyansh · Jinn & Spirits · 5 मिनट

Writer
Ballyansh
Story
वेद्रान — एक इश्क़, एक श्राप
Chapter
5 of 5
Category
Jinn & Spirits
Reading time
5 min
Words
956
Language
Hindi (हिंदी)
Price
Free to read

अध्याय 5

उनकी नजर एक बेहद खूबसूरत इंसानी लड़की पर पड़ी, जो उन फूलों के बीच बैठी झील के पानी से खेल रही थी।

वो कोई अप्सरा लग रही थी। उसने हल्के नीले और सफेद रंग के अप्सराओं जैसे कपड़े पहने थे। हीरों से जड़े गहने उस पर खूब जच रहे थे। वे सब उसकी दैवी, अलौकिक सुंदरता देखकर स्तब्ध रह गए थे। उनके पैर मानो किनारे पर ही जम गए थे।

दीपक: यार! ये क्या देख रहा हूँ मैं? ये तो कोई परी है।

वीर: सही कहा। परियाँ सच में होती हैं। ये आज पता चला।

महेश: क्या तुम लोगों को इस अप्सरा के अलावा ये दिख रहा है कि झील के बीचों-बीच पेड़ कैसे उग आया? अभी 15 मिनट पहले यहाँ कुछ नहीं था।

पंकज: क्या तुझे वो परी दिखाई नहीं दे रही? जो पेड़ को देखे जा रहा है?

ये सुनकर सब हँस पड़े।

तैराक वीर: तुम लोग यहाँ गप्पें हाँको। और मैं ज़रा उसे करीब से देखता हूँ।

कहकर वो उसकी तरफ तैर गया।

पंकज: मैं भी चलूँगा।

दीपक भी चला गया। मेरे पूर्वज दादा जी महेश के पाँचों दोस्त उसी तरफ चले गए।

महेश: नहीं। पागलपन छोड़ो। वापस आओ। हम उसे नहीं जानते। वापस आओ। वो क्या बला है, हमें नहीं पता। नासमझी मत करो।

किसी ने उनकी नहीं सुनी।

वो किनारे पर ही खड़े रहे। वे पाँचों उस पेड़ के करीब पहुँच गए।

वो लड़की अपनी धुन में फूल चुनते हुए गुनगुना रही थी। उसकी आवाज़ बेहद मनमोहक थी।

वीर: तुम्हारी आवाज़ भी तुम्हारी तरह सम्मोहित कर देती है।

वो लड़की चौंक गई और खड़ी हो गई। उसने अपने चारों तरफ उन पाँचों को देखा।

शरण: डरो मत, अप्सरा! हम बुरे नहीं हैं। बस तुमसे दोस्ती करने आए हैं।

अप्सरा: चले जाओ। वरना मारे जाओगे।

दीपक: अकेले जाने के लिए थोड़ी आए हैं। हम तो अपनी अप्सरा को साथ लेकर जाएँगे।

पाँचों हँसने लगे।

अप्सरा ने उन्हें बहुत कहा, पर उनकी आँखों पर और अक्ल पर पर्दा पड़ गया था। वो उस अप्सरा की तरफ बढ़ रहे थे।

वो उनसे बचने के लिए पानी में कूदने लगी, पर तभी दीपक ने उसका हाथ पकड़ लिया।

वो इतनी ज़ोर से चीखी कि उस जंगल के सारे पंछी अपनी-अपनी डाल छोड़कर उड़ गए।

महेश की हालत खराब थी। वो किनारे पर खड़ा तमाशा देख रहा था।

महेश: ये चीख साधारण लड़की की नहीं है। क्या कर रहे हो, बेवकूफों! वापस आओ।

पर उन पाँचों पर तो शैतान सवार था।

वो उस असहाय लड़की को परेशान कर रहे थे। वो खुद को बचाने की हर मुमकिन कोशिश कर रही थी।

वो बेहद नाजुक थी। कसकर हाथ पकड़ने या जबरदस्ती रोकने की वजह से जहाँ भी हाथ या बाँह पर वो लोग उसे छूते, वो जगह नीली पड़ रही थी।

महेश: छोड़ दो उस बेचारी को। वापस आओ। वरना मैं… वरना…

कहते हुए उसने अपने पास आत्मरक्षा के लिए रखी गन तान ली।

महेश: मैं गोली चला दूँगा। आखिरी बार कह रहा हूँ। छोड़ो उसे।

उन पाँचों ने उसे छोड़ा नहीं, पर उनका ध्यान महेश पर चला गया।

मौके का फायदा उठाते हुए अप्सरा भागने लगी, तो पंकज ने उसे पकड़ लिया।

तभी जोश में आकर महेश ने गोली चला दी।

दुर्भाग्य से गोली अप्सरा के पेट में लग गई।

वो जमीन पर गिर गई। महेश के हाथों से गन छूट गई। वो पाँचों एक तरफ हट गए।

अप्सरा की साँस उखड़ रही थी। वो उन सबको देख रही थी।

महेश को ठीक से तैरना नहीं आता था, पर वो फिर भी हिम्मत जुटाकर पानी में कूद गया।

अंगद ने उसकी मदद की। वो पेड़ के पास आ गया।

महेश: मुझे माफ कर दो। मैं सिर्फ अपने दोस्तों को रोकना चाहता था, ताकि वो तुम्हें छोड़ दें।

उन पाँचों के भी होश उड़ गए थे। वो घबरा गए।

पाँचों: हमें माफ कर दो। हमसे गलती हो गई।

अप्सरा: मेरा नाम देविका है। मैं जादुई दुनिया की परी हूँ। आज मेरी शादी जादुई तिलिस्मी दुनिया के राजा से होनी थी।

अप्सरा: और मुझे मेरी शक्तियाँ हासिल हो जातीं। लेकिन तुम लालची दरिंदों ने मेरा जीवन नष्ट कर दिया। तुम इंसानों ने मुझे हाथ लगाकर मेरा दैविक रूप खंडित कर दिया। इसी वजह से अब मेरी मौत हो जाएगी।

महेश: नहीं। हम तुम्हें बचा लेंगे। तुम्हारा इलाज हो जाएगा।

कहकर महेश उसके पास आने लगा।

देविका: अब कुछ नहीं हो सकता। अब सजा का वक्त है। मौत तुम सबके सिर पर खड़ी है।

उसकी आवाज़ में दर्द और आँखों में आँसू थे।

महेश और वो पाँचों हाथ जोड़े घुटनों के बल बैठे थे। वो दुखी थे और उदासी के आँसू बहा रहे थे।

देविका: मेरी मौत का, मेरी बर्बादी का अंजाम तुम सबको भुगतना पड़ेगा। वो तुम्हें नहीं छोड़ेगा।

दीपक: कौन? किसकी बात कर रही हो?

देविका भारी साँसें ले रही थी।

देविका: वेद्रान किसी को नहीं बख्शेगा। कोई नहीं बचेगा। ये मेरा श्राप है।

महेश: नहीं। नहीं। ऐसा मत करो। मैंने तुम्हें बुरी नजर से नहीं देखा था। मेरी बात सुनो। बहन! माफ कर दो। जो कहोगी, हम करेंगे। अपने गुनाह का प्रायश्चित करेंगे।

देविका एक पल चुप रही।

देविका: कीमत चुकानी होगी। हमारे सम्राट को उसकी रानी देनी होगी। ये श्राप तुम भुगतोगे। दुआ करना, तुम्हारे घर बेटी न हो।

कहते हुए वो खाँसने लगी। वो आखिरी साँसें ले रही थी।

महेश: नहीं। ये श्राप वापस ले लो। बख्श दो। मेरा संसार तो अभी बसा भी नहीं। बख्श दो मुझे।

देविका: एक ही रास्ता है। सामना करो। हिम्मत! सिर्फ हिम्मत!

कहते हुए उसकी साँस टूट गई। उसने दम तोड़ दिया।

वो लोग उसे पुकारते रहे, पर वो अब शांत हो चुकी थी।

महेश: देविका! बहन! आँखें खोलो।

दीपक: उसने क्या नाम लिया था? वेद्रान! कौन हो सकता है वो?

अचानक आँधी चलने लगी।

उस जादुई, फूलों से लदे पेड़ से एकाएक सारे फूल झड़कर हवा में उड़ने लगे।

दिन के वक्त अंधेरा छाने लगा।

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