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ब्रह्मराक्षस

Pretika · Tantrik & Black Magic · 31 मिनट

मेरा नाम विक्रांत है। उम्र अट्ठाईस साल। झाँसी का रहने वाला हूँ।
मैं कोई भूत-प्रेत मानने वाला आदमी नहीं था। सच कहूँ तो आपके चैनल की कहानियाँ भी मैं टाइमपास के लिए सुनता था। सोचता था... लोग कैसी-कैसी बातें बना लेते हैं।
लेकिन पिछले साल जो मेरे साथ हुआ... उसके बाद मैं रात को अपना फ़ोन भी उल्टा रखकर सोता हूँ। क्यों... ये आपको आख़िर में समझ आएगा।
मेरा काम थोड़ा अलग है। मैं एक प्राइवेट कंपनी में काम करता हूँ... जिसे सरकार से पुरानी पांडुलिपियों को डिजिटल करने का ठेका मिलता है। मतलब... पुराने गाँवों में... मंदिरों में... पुराने पंडितों के घरों में... जो हाथ से लिखी पोथियाँ पड़ी सड़ रही हैं... उन्हें हम स्कैन करते हैं... और सरकारी सर्वर पर अपलोड कर देते हैं। ताकि वो ज्ञान हमेशा के लिए बच जाए।
हमेशा के लिए... ये शब्द याद रखिएगा भाई।
तो पिछले साल सितंबर के आख़िर में... बारिश ख़त्म ही हुई थी... मेरे मैनेजर ने मुझे एक फ़ाइल पकड़ाई। बोला... विक्रांत... ओरछा से आगे बेतवा के किनारे एक गाँव है। वहाँ एक पुरानी हवेली है... पाठक परिवार की। उनके पुरखे बहुत बड़े ज्योतिषी और तांत्रिक हुआ करते थे। उनके घर में करीब दो हज़ार पन्नों की पोथियाँ हैं। इक्कीस दिन का काम है। रहना-खाना वहीं हवेली में होगा। मालकिन ने ख़ुद हाँ कहा है।
मैंने सोचा... चलो... इक्कीस दिन गाँव की हवा खाएँगे। शहर की भागदौड़ से छुट्टी।
मैंने अपना सामान बाँधा। एक बड़ा बुक स्कैनर... जिसमें ऊपर कैमरा लगा होता है और दोनों तरफ़ दो लाइटें। एक लैपटॉप। दो हार्ड ड्राइव। और एक इंटरनेट डोंगल... क्योंकि नियम था कि रोज़ शाम को जितने पन्ने स्कैन हों... वो उसी दिन सर्वर पर अपलोड होने चाहिए।
झाँसी से बस पकड़ी। फिर ओरछा से आगे एक टेम्पो। और आख़िर में... गाँव से तीन किलोमीटर पहले... टेम्पो वाले ने उतार दिया। बोला... भैया... आगे रास्ता कच्चा है... कीचड़ है... आप ट्रैक्टर पकड़ लो।
एक ट्रैक्टर आया। उस पर एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा था... मुँह में गुटखा। मैंने पूछा... पाठक जी की हवेली जाना है।
उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। फिर हल्का सा मुस्कुराया। ऐसी मुस्कान... जैसे कोई गंदा मज़ाक़ याद आ गया हो।
बोला... मालती भौजी के यहाँ? अच्छा है भैया... बड़े भाग वाले हो।
मैंने पूछा... क्यों... क्या बात है?
उसने कुछ नहीं कहा। बस ट्रैक्टर स्टार्ट किया... और पूरे रास्ते... बीच-बीच में... मुझे देखकर अजीब तरह से हँसता रहा।
शाम के करीब पाँच बजे... मैंने पहली बार वो हवेली देखी।
भाई... हवेली क्या थी... जैसे किसी ने एक बूढ़े शेर को बेतवा के किनारे बिठा दिया हो। दो मंज़िला। लाल पत्थर। दीवारों पर काई। ऊपर की खिड़कियों पर लकड़ी की जालियाँ... आधी टूटी हुई। और हवेली के ठीक पीछे... नदी की तरफ़... एक बहुत पुराना... बहुत बड़ा... सूखा हुआ बेल का पेड़।
पत्ते एक भी नहीं थे उस पर। बस काली... टेढ़ी-मेढ़ी शाखाएँ... आसमान की तरफ़ ऐसे उठी हुईं... जैसे किसी ने हाथ फैला रखे हों... कुछ माँगने के लिए।
ट्रैक्टर वाले ने मेरा सामान उतारा। पैसे लिए। और जाते-जाते बोला... भैया... रात को अगर पोथियों वाले कमरे से कोई आवाज़ आए... तो जवाब मत देना।
और वो चला गया।
मैं हँस दिया था उस वक़्त। सोचा... गाँव वाले हैं... डराने का शौक़ है इन्हें।
काश... मैंने उसकी बात पर हँसने की जगह... ध्यान दिया होता।
हवेली का बड़ा लकड़ी का दरवाज़ा खुला था। मैंने आवाज़ लगाई... कोई है?
अंदर से कोई जवाब नहीं आया। बस आँगन में लगे तुलसी के चबूतरे पर एक दिया जल रहा था। और हवा में... अजीब सी ख़ुशबू थी। चंदन की... और उसके नीचे कहीं... किसी पुरानी... सीलन भरी किताब की।
तभी पीछे से एक आवाज़ आई।
आप विक्रांत जी हैं?
मैं मुड़ा।
अनुराग भाई... मैं झूठ नहीं बोलूँगा। उस पल मैं कुछ सेकंड के लिए बोलना भूल गया।
सीढ़ियों पर एक औरत खड़ी थी। उम्र होगी पैंतीस-छत्तीस साल। हल्के हरे रंग की सूती साड़ी... जो शायद अभी-अभी नहाकर पहनी गई थी... क्योंकि बाल खुले थे... गीले थे... और कमर तक आ रहे थे। माथे पर सिंदूर नहीं था। हाथों में चूड़ियाँ नहीं थीं। बस गले में एक पतला सा काला धागा... और कमर में साड़ी के ऊपर बँधा एक पीतल का गुच्छा... चाबियों का।
लेकिन जो चीज़ मैं आज तक नहीं भूल पाया... वो थीं उसकी आँखें। बड़ी-बड़ी... काली... और इतनी थकी हुई... जैसे बरसों से सोई न हो। पर उन थकी आँखों में भी कुछ था... कुछ भूखा सा।
मैंने कहा... जी... मैं ही हूँ।
वो धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरी। मेरे पास आई। इतने पास... कि उसके गीले बालों से एक बूँद मेरी कलाई पर गिरी।
बोली... मैं मालती। मालती पाठक। ये हवेली... और इसमें जो कुछ भी बचा है... सब अब मेरा ही है।
बाद में मुझे पता चला... उसके पति रघुनाथ पाठक पाँच साल पहले गुज़र गए थे। बच्चे नहीं थे। पूरे ख़ानदान में अब सिर्फ़ वही बची थी। और उसके साथ हवेली में रहता था सिर्फ़ एक आदमी... भग्गो काका।
भग्गो काका की उम्र सत्तर से ऊपर रही होगी। दुबला शरीर। सिर मुँडा हुआ। पीछे बस एक लंबी सफ़ेद चोटी। वो बहुत कम बोलते थे। लेकिन जब मैंने उन्हें पहली बार देखा... तो उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं... मेरे बैग की तरफ़ देखा। उस बैग की तरफ़... जिसमें स्कैनर था। और उनके होंठ हिले... जैसे कुछ बुदबुदा रहे हों।
उस रात सोने से पहले... भग्गो काका मुझे सीढ़ियों के नीचे खड़े मिले। उन्होंने फिर मेरे बैग की तरफ़ इशारा किया। और पहली बार... कुछ बोले।
बाबू... पोथी की नकल भी पोथी ही होती है। जो उसे पढ़ेगा... वो उसका हो जाएगा।
मैं उस वक़्त कुछ नहीं समझा। सोचा... बूढ़े आदमी हैं... पुरानी मान्यताएँ हैं।
उस रात मालती ने ख़ुद मुझे खाना परोसा। आँगन में... ज़मीन पर पीढ़ा बिछाकर। लालटेन की रोशनी में। दाल... बाटी... और गुड़।
जब वो रोटी रख रही थी... उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों से छू गईं। ठंडी थीं... बहुत ठंडी। जैसे अभी-अभी कुएँ के पानी से निकाली हों। पर उसने हाथ हटाया नहीं। एक पल... बस एक पल ज़्यादा... वहीं रहने दिया।
फिर उसने पूछा... विक्रांत जी... आपको संस्कृत आती है?
मैंने कहा... थोड़ी बहुत... स्कूल वाली। पढ़ लेता हूँ... समझ नहीं आती।
उसने एक लंबी साँस ली। मुझे समझ नहीं आया कि वो राहत की साँस थी... या निराशा की।
खाने के बाद वो मुझे हवेली के अंदर ले गई। एक लंबा... अँधेरा गलियारा। और गलियारे के आख़िर में एक दरवाज़ा। बाक़ी दरवाज़ों से छोटा। मोटी काली लकड़ी का। और उस पर ताँबे की एक पट्टी जड़ी हुई थी... जिस पर कुछ खुदा हुआ था।
मालती ने कमर से चाबियों का गुच्छा निकाला... और एक बड़ी... पुरानी चाबी से ताला खोला।
अंदर से एक ठंडी हवा का झोंका आया। सितंबर की उमस में... ऐसी ठंडक... जैसे किसी ने फ़्रिज खोल दिया हो।
कमरे में चारों तरफ़ लकड़ी की अलमारियाँ थीं। और उनमें... लाल कपड़ों में लिपटी... सैकड़ों पोथियाँ।
मालती ने कहा... यही है पोथी घर। आपका सारा काम यहीं होगा। लेकिन मेरी तीन बातें मानिएगा।
पहली... काम सिर्फ़ दिन में होगा। सूरज ढलने के बाद ये कमरा बंद।
दूसरी... कोई भी श्लोक... कोई भी पंक्ति... ज़ोर से मत पढ़िएगा। मन में भी नहीं।
और तीसरी... कोई भी पोथी... इस कमरे से बाहर नहीं जाएगी। कभी नहीं।
मैंने हँसते हुए कहा... मालती जी... मैं तो बस फ़ोटो खींचूँगा। पोथी कहीं नहीं जाएगी।
उसने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक। फिर धीरे से बोली...
फ़ोटो भी तो... कहीं जाती ही है न... विक्रांत जी।
अगली सुबह से काम शुरू हुआ।
रोज़ का एक ही रूटीन था। सुबह आठ बजे मालती पोथी घर का ताला खोलती। मैं स्कैनर लगाता। एक-एक पोथी का लाल कपड़ा खोलता... पन्ने को काँच के नीचे दबाता... बटन दबाता... खट्ट... लाइट चमकती... और पन्ना लैपटॉप में।
खट्ट... अगला पन्ना।
खट्ट... अगला।
पहले चार दिन सब ठीक रहा। करीब चार सौ पन्ने हो गए। ज़्यादातर पोथियाँ ज्योतिष की थीं... कुंडलियाँ... ग्रहों के चक्र। कुछ आयुर्वेद की। लेकिन एक बात मैंने नोटिस की। लगभग हर पोथी के हाशिए पर... कोने में... एक छोटी सी तस्वीर बनी होती थी। स्याही से। एक आदमी की। मुंडा हुआ सिर... पीछे लंबी चोटी... और आँखें... आँखें बहुत बड़ी बनाई गई थीं। हर तस्वीर में वो आदमी किसी न किसी तरफ़ देख रहा होता था।
पहले दिन वो बाईं तरफ़ देख रहा था।
चौथे दिन तक... मैंने ग़ौर किया... हर नई पोथी में वो आदमी... सीधा ऊपर देख रहा था।
ऊपर... जहाँ मेरा स्कैनर का कैमरा लगा था।
मैंने सोचा... इत्तेफ़ाक़ है।
पाँचवें दिन दोपहर को... मैं लैपटॉप पर स्कैन चेक कर रहा था। तभी मेरी नज़र एक पन्ने पर रुक गई।
पन्ने के ऊपरी हिस्से पर एक हल्की सी परछाई थी। गोल सी। जैसे किसी का सिर... ठीक कैमरे और पन्ने के बीच में आ गया हो।
अनुराग भाई... स्कैनर का कैमरा सीधा ऊपर से नीचे देखता है। दोनों तरफ़ से तेज़ लाइट आती है। उसमें परछाई पड़ ही नहीं सकती। जब तक कोई... झुककर... पन्ने के ठीक ऊपर अपना सिर न लाए।
और उस वक़्त कमरे में मैं अकेला था।
मैंने लाइटें चेक कीं। कैमरा साफ़ किया। फिर से वही पन्ना स्कैन किया।
खट्ट।
परछाई फिर थी। और इस बार... थोड़ी बड़ी। और उसमें... पीछे की तरफ़... एक पतली सी लकीर लटकती दिख रही थी।
चोटी जैसी।
मैंने लैपटॉप बंद किया और बाहर आँगन में आ गया। हाथ काँप रहे थे। मालती तुलसी के पास बैठी थी। उसने मेरा चेहरा देखा... और पूछा... दिखने लगा न?
मैंने पूछा... क्या?
उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस उठकर चली गई। और जाते-जाते... मुझे लगा... वो मुस्कुरा रही थी।
उस रात... जब मैंने उस दिन के स्कैन सर्वर पर अपलोड किए... तो जैसे ही प्रोग्रेस बार सौ प्रतिशत हुआ... पूरी हवेली में... एक लंबी... गहरी... साँस की आवाज़ गूँजी।
जैसे किसी ने बरसों बाद... पेट भरकर खाना खाया हो।
और वो आवाज़ आई थी... गलियारे के आख़िर से। पोथी घर से। जिसका ताला... मालती ने शाम को ही लगा दिया था।
फिर आया सातवाँ दिन।
उस दिन मैंने एक ऐसी पोथी खोली... जो बाक़ियों से अलग थी। लाल नहीं... काले कपड़े में लिपटी हुई। और उसके सारे पन्ने... कोरे थे। एकदम ख़ाली। कोई अक्षर नहीं। कोई चित्र नहीं।
मैंने सोचा... फिर भी स्कैन कर लेता हूँ... रिकॉर्ड के लिए।
खट्ट।
लैपटॉप की स्क्रीन पर पन्ना आया।
भाई... वो पन्ना कोरा नहीं था।
स्क्रीन पर... पूरे पन्ने पर... बारीक... सुंदर... देवनागरी में... एक ही वाक्य बार-बार लिखा हुआ था। ऊपर से नीचे तक। सैकड़ों बार।
मुझे पढ़ो।
मुझे पढ़ो।
मुझे पढ़ो।
मैंने काँच के नीचे रखे असली पन्ने को देखा। कोरा। फिर स्क्रीन को देखा। लिखा हुआ।
और तभी... मेरी गर्दन के पीछे... किसी की ठंडी साँस लगी।
और एक बहुत भारी... बहुत बूढ़ी आवाज़... मेरे कान के बिल्कुल पास... फुसफुसाई...
पढ़ो... वत्स।
मैं पलटा। पीछे कोई नहीं था।
मैंने लैपटॉप उठाया और भागकर अपने कमरे में आ गया। उसी शाम मैंने मैनेजर को फ़ोन किया। कहा... सर... मैं ये काम नहीं कर पाऊँगा। किसी और को भेज दीजिए।
मैनेजर हँसा। बोला... विक्रांत... गाँव की हवा लग गई क्या? कॉन्ट्रैक्ट साइन है। आधे में छोड़ा तो कंपनी पेनल्टी काटेगी... और तेरी नौकरी भी जाएगी। बस चौदह दिन और हैं। कर ले।
मैंने फ़ोन रख दिया। बाहर अँधेरा हो चुका था। और पीछे की खिड़की से... वो सूखा बेल का पेड़... चाँदनी में और भी काला दिख रहा था।
उस रात करीब बारह बजे... मेरे कमरे के दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई।
ठक... ठक।
मैंने दरवाज़ा खोला।
बाहर मालती खड़ी थी। हाथ में मिट्टी का दिया। और बदन पर... एक पतली... लगभग पारदर्शी... सफ़ेद सूती साड़ी। बिना ब्लाउज़ के... जैसे पुराने ज़माने में गाँव की औरतें पहनती थीं। दिये की लौ में... उस साड़ी के पार... सब कुछ... धुँधला सा दिख रहा था।
उसने धीमी आवाज़ में कहा... नींद नहीं आ रही थी। सोचा... आपसे माफ़ी माँग लूँ। आज आप डर गए थे न?
मैं कुछ बोल नहीं पाया।
वो अंदर आ गई। दिया ताक पर रखा। और मेरे बिस्तर के किनारे बैठ गई।
बोली... पुराने घर हैं विक्रांत जी। यहाँ दीवारें भी बोलती हैं। पाँच साल से... मैं अकेली इन आवाज़ों के साथ रह रही हूँ। पाँच साल से... किसी ने मुझे छुआ तक नहीं।
और ये कहते हुए... उसने मेरा हाथ पकड़ा... और अपने गाल पर रख लिया।
ठंडा था उसका चेहरा। बिल्कुल वैसे ही... जैसे पहली रात उसकी उँगलियाँ थीं।
अनुराग भाई... मैं कोई संत नहीं हूँ। अट्ठाईस साल का अकेला लड़का... आधी रात... एक ख़ूबसूरत औरत... जो ख़ुद पास आ रही हो...
उसने धीरे से अपना सिर मेरे सीने पर रख दिया। उसके गीले बालों की ख़ुशबू... चंदन वाली... मेरी साँसों में भर गई। उसकी उँगलियाँ मेरी कमीज़ के बटनों पर रुकीं... एक-एक करके... बहुत धीरे...
और फिर उसने मुझे चूमा।
पहले होंठ ठंडे थे। बर्फ़ जैसे। लेकिन जैसे-जैसे वो मेरे क़रीब आती गई... उसका बदन गर्म होता गया। इतना गर्म... जैसे अंदर कोई आग सुलग रही हो... जो बरसों से बुझी पड़ी थी... और अब मुझसे हवा पा रही थी।
उस रात... जो हुआ... वो मैं आपको खुलकर नहीं बता सकता भाई। बस इतना कहूँगा... कि मैंने ज़िंदगी में ऐसी रात पहले कभी नहीं गुज़ारी थी।
लेकिन एक चीज़... जो मैं उस वक़्त अनदेखा कर गया...
जब वो मेरे ऊपर झुकी हुई थी... उसके खुले बाल मेरे चेहरे पर बिखरे हुए थे... तब उसके होंठ लगातार कुछ बुदबुदा रहे थे। बहुत धीमे। मुझे लगा... कोई प्यार की बात है।
वो संस्कृत थी।
और ताक पर रखे दिये की रोशनी में... सामने की दीवार पर हम दोनों की परछाई पड़ रही थी।
मेरी परछाई... लेटी हुई।
और मेरे ऊपर झुकी हुई परछाई...
वो किसी औरत की नहीं थी।
वो एक लंबे... बहुत लंबे... दुबले आदमी की परछाई थी। मुंडा हुआ सिर। पीछे लटकती चोटी। और उसके हाथ... मेरी परछाई की गर्दन के पास... धीरे-धीरे... सहला रहे थे।
मैंने आँखें झपकाईं। परछाई फिर से मालती की थी।
मैंने सोचा... दिये की लौ हिली होगी।
अगली सुबह जब मैं नहाने गया... तो बाल्टी के पानी में मैंने अपना सीना देखा। उस पर... हल्की नीली... धुँधली सी... स्याही के निशान थे। जैसे किसी ने उँगली से कुछ लिखा हो। देवनागरी अक्षर। पानी डालते ही वो मिट गए।
और उस दिन... भाई... एक अजीब बात हुई। मुझे काम करने में मज़ा आने लगा। मैंने एक सौ अस्सी पन्ने स्कैन किए। रोज़ से दोगुने। मेरे हाथ रुक ही नहीं रहे थे। जैसे कोई और मेरे हाथ चला रहा हो।
और हर रात... बारह बजे... दरवाज़े पर वही दस्तक।
ठक... ठक।
और हर रात... मैं दरवाज़ा खोल देता।
अनुराग भाई... सबसे डरावनी बात ये नहीं थी कि वो आती थी। डरावनी बात ये थी... कि मुझे पता था।
हर सुबह आईने के सामने मैं ख़ुद से कहता... आज नहीं खोलूँगा। आज कुर्सी दरवाज़े से अड़ा दूँगा। पूरा दिन ये बात मन में दोहराता। और रात को... जैसे ही ठक-ठक होती... मेरा हाथ कुंडी पर पहुँच चुका होता। मुझे याद भी नहीं रहता कि मैं बिस्तर से कब उठा।
जैसे कोई नशा। जिसके बारे में आप जानते हैं कि वो आपको अंदर से खा रहा है... फिर भी उसके बिना रात नहीं कटती।
और तीसरी रात... एक ऐसी बात हुई... जिसका मतलब मुझे बहुत बाद में समझ आया।
भोर होने वाली थी। मालती मेरे पास लेटी थी... आँखें बंद। अचानक उसकी आँखें खुलीं।
और भाई... वो आँखें बदली हुई थीं। उनमें भूख नहीं थी। सिर्फ़ डर था।
उसने मेरी कलाई इतनी ज़ोर से पकड़ी कि नाख़ून गड़ गए। और ठेठ बुंदेली में... एक घुटी हुई... काँपती आवाज़ में बोली...
मशीन बंद कर दो बाबू... भाग जाओ... वो तुम्हें...
और तभी उसकी गर्दन एक झटके से पीछे गई। जैसे किसी ने अंदर से खींच लिया हो।
अगले ही पल... वो फिर मुस्कुरा रही थी। मेरे बालों में उँगलियाँ फेरते हुए धीरे से बोली... बुरा सपना था। सो जाओ।
और मैं सो गया। मैंने ख़ुद को समझा लिया... कि वो सपना ही था।
पाँच रातें। लगातार।
और पाँचवीं रात तक... जब मालती मेरे कान में संस्कृत में कुछ बोलती थी...
मुझे उसका मतलब समझ आने लगा था।
वो कह रही थी... और दे... और दे... अभी भूख बाक़ी है।
बारहवें दिन की सुबह... मैं आईने के सामने दाढ़ी बना रहा था।
और मेरा हाथ रुक गया।
भाई... बारह दिन में मेरा वज़न कम से कम आठ किलो घट गया था। गाल अंदर धँस गए थे। आँखों के नीचे काले घेरे। होंठ फटे हुए। और मेरे सिर के बाल... पीछे की तरफ़... एक जगह से गुच्छों में झड़ रहे थे। ठीक उस जगह... जहाँ लोग चोटी रखते हैं।
और अजीब बात ये थी... कि मुझे कमज़ोरी महसूस नहीं हो रही थी। मुझे बस... भूख लग रही थी। हर वक़्त। पर खाने की नहीं। मुझे पोथी घर में जाना था। मुझे स्कैन करना था। और मुझे रात के बारह बजने का इंतज़ार था।
उसी सुबह... नदी के घाट पर... भग्गो काका मेरे पास आकर बैठ गए। पहली रात के उस एक वाक्य के बाद... आज पहली बार... उन्होंने मुझसे बात की।
बोले... बेटा... आईना देखा आज?
मैं चुप रहा।
उन्होंने नदी की तरफ़ देखते हुए कहना शुरू किया।
दो सौ साल पहले... इस हवेली में आचार्य शिवदत्त पाठक रहते थे। पूरे बुंदेलखंड में उनके जैसा विद्वान कोई नहीं था। राजा-महाराजा उनसे कुंडली बनवाने आते थे। उन्होंने एक सौ आठ पोथियाँ लिखीं। ज्योतिष... तंत्र... आयुर्वेद... मरने के बाद क्या होता है... और मरने से कैसे बचा जाता है।
लेकिन उनकी एक ज़िद थी। वो अपना लिखा किसी को पढ़ने नहीं देते थे। कहते थे... ज्ञान बाँटने से उसकी शक्ति घट जाती है। उनके अपने बेटे तक को पोथी घर में जाने की इजाज़त नहीं थी।
और उनकी दूसरी भूख थी... औरत। उम्र साठ के पार थी... पर रातों को उनका मन... अपने ही छोटे भाई की जवान बहू पर अटका रहता था। कहते हैं... उन्होंने उसे वश में करने के लिए तंत्र किया। और वो बहू... हर रात... नींद में चलती हुई... उनके कमरे तक आने लगी।
जब ये बात घर में खुली... तो परिवार ने उन्हें पोथी घर में बंद कर दिया। खाना-पानी सब बंद। इक्कीस दिन तक वो अंदर से चिल्लाते रहे। और आख़िरी रात... उन्होंने एक श्राप दिया।
भग्गो काका रुके। फिर धीमी आवाज़ में बोले...
उन्होंने कहा था... जब तक मेरा लिखा... कोई पढ़ेगा नहीं... मैं मरूँगा नहीं। और जिस दिन हज़ार अलग-अलग लोग मुझे पढ़ लेंगे... उस दिन मैं इस कमरे से बाहर आऊँगा।
बाईसवें दिन जब दरवाज़ा खोला गया... तो अंदर आचार्य जी की लाश नहीं थी। बस एक नई पोथी पड़ी थी। काले कपड़े में लिपटी। और उसके सारे पन्ने... कोरे।
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैंने कहा... काका... वो काली पोथी... मैंने उसे...
उन्होंने मेरी बात काटी। बोले... आधी स्कैन की है। मुझे पता है। वो पोथी नहीं है बेटा। वो आचार्य जी का शरीर है। वो ख़ुद को उन पन्नों में लिख गए। पढ़ने वाले के बिना वो कुछ नहीं कर सकते थे। इसीलिए पाठक परिवार ने दो सौ साल तक ये दरवाज़ा बंद रखा।
लेकिन ब्रह्मराक्षस भूखा होता है। उसे दो चीज़ें चाहिए... पढ़ा जाना... और जिस्म। पीढ़ी दर पीढ़ी... इस घर की बहुएँ... उसका रास्ता बनती रहीं। रात को वो उनके अंदर उतरता... और इस घर के मर्द... एक-एक करके... जवानी में ही सूखकर मरते रहे।
रघुनाथ भी ऐसे ही गया। पाँच साल पहले।
मैंने काँपती आवाज़ में पूछा... और मालती?
काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें गीली थीं।
बोले... जो मालती तुमने देखी है... वो पाँच साल से मालती नहीं है बेटा। असली मालती उसी शरीर के अंदर कहीं क़ैद है। कभी-कभी... एक पल के लिए... वो ऊपर आती है... लड़ती है... और फिर दबा दी जाती है। जो रोज़ रात तुम्हारे कमरे में आती है... वो मालती का शरीर पहनकर आता है। और तुम्हारी कंपनी को चिट्ठी किसने लिखी थी... पता है? मालती ने। अपनी मर्ज़ी से नहीं।
मुझे वो भोर याद आई। वो डरी हुई आँखें। वो बुंदेली में काँपती आवाज़... मशीन बंद कर दो बाबू।
वो सपना नहीं था।
उसे तुम्हारा स्कैनर चाहिए था। क्योंकि हज़ार आँखें इस गाँव में कभी नहीं आएँगी। लेकिन तुम्हारा सर्वर... वहाँ तो लाखों आँखें हैं।
हर पन्ना जो तुम ऊपर भेजते हो... उसमें वो थोड़ा सा उतर जाता है। और हर रात जो वो तुम्हारे साथ गुज़ारता है... उसमें वो तुमसे ताक़त खींचता है... ताकि दिन में तुम और तेज़ काम करो।
और उसके नियम समझ लो बेटा... क्योंकि यही नियम तुम्हें बचा भी सकते हैं... और मार भी सकते हैं।
पहला... उसकी हर नकल... उसी का शरीर है। चाहे ताम्रपत्र पर हो... कागज़ पर हो... या तुम्हारी उस मशीन में। जहाँ उसकी नकल है... वहाँ वो ख़ुद है। असली पोथी जल भी जाए... तो नकल में वो ज़िंदा रहेगा।
दूसरा... पढ़ना सिर्फ़ आँखों से नहीं होता। जो कोई उसके शब्द अपने मन में उतार ले... चाहे पढ़कर... चाहे किसी के मुँह से सुनकर... वो उसका पाठक है। और हर पाठक... उसे थोड़ी सी जान देता है।
और तीसरा... गिनती सिर्फ़ अलग-अलग इंसानों की होती है। एक आदमी सौ बार पढ़े... तो भी एक ही गिना जाता है। जिस दिन हज़ार अलग-अलग लोग उसे पढ़ लेंगे... उस दिन उसे किसी कमरे... किसी पोथी... किसी शरीर की ज़रूरत नहीं रहेगी।
तुम उसके लिए दरवाज़ा भी हो... और खाना भी।
मैंने पूछा... अब मैं क्या करूँ काका?
उन्होंने कहा... आज रात आख़िरी रात है। तुम्हारे ठेके के इक्कीस दिन से इसका कोई लेना-देना नहीं बेटा। आज सर्वपितृ अमावस्या है। आचार्य जी की बरसी भी आज ही की है। साल में यही एक रात होती है... जब वो अपनी पूरी ताक़त में होते हैं। अगर आज रात उनकी पोथी पूरी नहीं हुई... तो उन्हें एक साल और इंतज़ार करना पड़ेगा। इसीलिए मालती ने तुम्हें ठीक इसी वक़्त बुलवाया। और इसीलिए पिछले दिनों तुम्हारे हाथ रुक नहीं रहे थे। उसकी काली पोथी के बस इक्कीस पन्ने बचे हैं। अगर वो पूरी स्कैन होकर ऊपर चली गई... तो वो पूरा बाहर आ जाएगा।
आज रात वो तुमसे एक सवाल पूछेगा। ब्रह्मराक्षस हमेशा पूछता है। सही जवाब दिया... तो वो तुम्हें जाने देगा। ग़लत दिया... तो तुम उसकी एक सौ नौवीं पोथी बन जाओगे।
और अगर मौक़ा मिले... तो वो काली पोथी... बेल के पेड़ के नीचे... जला देना।
इतना कहकर काका उठे... और चले गए।
उस दिन के बाद... अनुराग भाई... मैंने भग्गो काका को फिर कभी नहीं देखा।
उस दिन मैंने पोथी घर में क़दम नहीं रखा। पूरा दिन अपने कमरे में बैठा रहा। सामान बाँध लिया। सोचा... सुबह होते ही... पहला ट्रैक्टर पकड़कर निकल जाऊँगा। नौकरी जाए तो जाए।
शाम को मालती खाना लेकर आई। बिना कुछ बोले थाली रखी। और जाते-जाते दरवाज़े पर रुकी।
बोली... आज बारह बजे का इंतज़ार मत करना विक्रांत। आज मैं नहीं आऊँगी।
आज... तुम आओगे।
मैंने तय किया था कि सोऊँगा नहीं। लाइट जलाकर बैठा रहा। हनुमान चालीसा याद करने की कोशिश की... पर भाई... आधी चौपाई के बाद आगे के शब्द याद ही नहीं आ रहे थे। जैसे किसी ने दिमाग़ से मिटा दिए हों। उनकी जगह... मेरे मन में... संस्कृत के श्लोक घूम रहे थे। वो श्लोक... जो मैंने कभी पढ़े भी नहीं थे।
फिर... मुझे नहीं पता कब... मेरी आँख लग गई।
जब आँख खुली... तो मैं अपने कमरे में नहीं था।
मैं गलियारे में खड़ा था। नंगे पैर। और मेरे सामने... पोथी घर का दरवाज़ा... खुला हुआ था।
अंदर से पीली रोशनी आ रही थी।
मैं अंदर गया। या शायद... मेरे पैर मुझे अंदर ले गए।
पूरे कमरे में... सैकड़ों दिये जल रहे थे। अलमारियों पर। फ़र्श पर। और बीच में... मेरा स्कैनर लगा था। चालू। उसकी दोनों लाइटें जल रही थीं। और काँच के नीचे... वो काली पोथी खुली रखी थी।
और स्कैनर की मेज़ के किनारे... मालती बैठी थी।
लाल साड़ी में। वही लाल... जो पोथियों के कपड़े का था। बाल खुले। होंठों पर गहरा रंग। और आँखें... आज वो थकी हुई नहीं थीं। आज उनमें चमक थी। भूख की चमक।
उसने अपनी उँगली से मुझे पास बुलाया।
बोली... बस इक्कीस पन्ने विक्रांत। इक्कीस। फिर मैं तुम्हारी। हमेशा के लिए। न रात का इंतज़ार... न सुबह का डर।
वो उठी। मेरे पास आई। उसने मेरा हाथ पकड़ा... और स्कैनर के बटन पर रख दिया। फिर पीछे से मुझसे लिपट गई। उसकी साड़ी का पल्लू... कंधे से सरककर... फ़र्श पर गिरा। उसके होंठ मेरी गर्दन पर थे। गर्म... बहुत गर्म।
फुसफुसाई... दबाओ।
मैंने बटन दबाया।
खट्ट।
और उस पल... भाई... स्कैनर की लाइट एक सेकंड के लिए तेज़ चमकी।
और उस एक सेकंड की सफ़ेद रोशनी में... मैंने देखा... कि मुझसे कौन लिपटा हुआ है।
वो मालती नहीं थी।
राख जैसी स्लेटी चमड़ी। हड्डियों पर चिपकी हुई। सात फ़ुट से लंबा शरीर... जो मेरे ऊपर झुका हुआ था। सिर पर एक भी बाल नहीं... सिवाय पीछे की एक लंबी... सफ़ेद... ज़मीन तक लटकती चोटी के। गले में मैला जनेऊ। और उसकी उँगलियाँ... लंबी... काली स्याही में डूबे नाख़ून... मेरे सीने पर... अक्षर लिख रहे थे।
फिर लाइट बुझी। और दियों की रोशनी में... फिर से मालती थी। मुस्कुराती हुई। सुंदर।
दबाओ... विक्रांत।
खट्ट। चमक। वो चेहरा।
अँधेरा। मालती।
खट्ट। चमक। वो चेहरा... और इस बार... उसकी आँखें मेरी आँखों में।
भाई... मुझे पता था कि मुझे रुकना है। लेकिन मेरा हाथ नहीं रुका। एक... पाँच... दस... पंद्रह... बीस पन्ने।
लेकिन सोलहवें पन्ने पर... एक चमक में... मैंने तीसरा चेहरा देखा।
न वो राक्षस था... न मुस्कुराती हुई मालती। वो एक रोती हुई औरत का चेहरा था। गाल पर आँसू। होंठ काँपते हुए। और उन होंठों से... बिना आवाज़ के... बस तीन शब्द निकले...
जो पूछे... मत बोलना।
अगली चमक में वो चेहरा ग़ायब था।
बीसवें पन्ने के बाद... उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।
और अब जो आवाज़ आई... वो मालती की नहीं थी। वो वही भारी... बूढ़ी आवाज़ थी।
रुको वत्स। इक्कीसवें से पहले... एक प्रश्न।
पूरे कमरे के दिये एक साथ काँपे।
बताओ... वो कौन सा धन है... जो बाँटने से बढ़ता है... और छिपाने से सड़ जाता है?
मेरे गले में जैसे किसी ने रेत भर दी हो। भग्गो काका की आवाज़ कानों में गूँजी... सही जवाब दिया तो जाने देगा।
और उसी पल... उस रोती हुई औरत के तीन शब्द भी याद आए... जो पूछे... मत बोलना।
दो आवाज़ें। दोनों एक-दूसरे से उलट। और मैं डरा हुआ था भाई। बहुत डरा हुआ। मैंने वो आवाज़ चुनी... जो मुझे इस कमरे से बाहर निकलने का रास्ता दिखा रही थी।
मैंने काँपते हुए कहा...
विद्या।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
बहुत देर तक वो कुछ नहीं बोला। बस उसकी साँसें सुनाई देती रहीं। लंबी... भारी... जैसे कोई दो सौ साल से रुकी हुई साँस... आज छोड़ रहा हो। फिर उसकी आवाज़ आई। धीमी। लगभग प्यार से।
सही उत्तर वत्स। दो सौ साल में पहली बार... किसी ने अपने मुँह से कहा। अब ये तेरा वचन है। मैंने छिपाया था... तू बाँटेगा। जा... अब इस कमरे को मेरी ज़रूरत नहीं।
और अगले ही पल... मालती का शरीर... कटे पेड़ की तरह... फ़र्श पर गिर पड़ा।
मैंने एक सेकंड नहीं सोचा। काँच के नीचे से काली पोथी खींची। एक जलता हुआ दिया उठाया। और भागा। गलियारा... आँगन... पिछला दरवाज़ा... और सीधे... उस सूखे बेल के पेड़ के नीचे।
पोथी ज़मीन पर फेंकी। दिये का तेल उस पर उड़ेला। और आग लगा दी।
अनुराग भाई... वो पोथी जली नहीं... चीख़ी। सच में चीख़ी। पहले एक औरत की आवाज़ में। फिर एक बूढ़े आदमी की। और फिर... जैसे सैकड़ों आवाज़ें एक साथ... संस्कृत में... कुछ बोल रही हों।
पूरी रात मैं वहीं बैठा रहा। तब तक... जब तक आख़िरी पन्ना राख नहीं हो गया।
सुबह जब सूरज निकला... तो मैंने एक चीज़ देखी।
वो सूखा बेल का पेड़... जिस पर बरसों से एक पत्ता नहीं आया था... उसकी सबसे नीचे वाली डाल पर... एक छोटी सी... हरी कोंपल फूट आई थी।
मैं वापस हवेली के अंदर गया। मालती पोथी घर के फ़र्श पर पड़ी थी। मैंने उसे हिलाया। उसने आँखें खोलीं।
और भाई... वो आँखें... अलग थीं। डरी हुई। मासूम। किसी बच्ची जैसी।
उसने मुझे देखा और पूछा... आप कौन हैं? और... रघुनाथ जी कहाँ हैं? वो अभी तो... बाज़ार गए थे।
उसे पाँच साल का कुछ याद नहीं था। कुछ भी नहीं।
लेकिन मुझे याद था। वो भोर... मशीन बंद कर दो बाबू। और वो सोलहवाँ पन्ना... जो पूछे... मत बोलना।
वो वही थी। असली मालती। जो पाँच साल से उस शरीर के अंदर क़ैद होकर भी... मुझे बचाने की कोशिश कर रही थी। दो बार।
और मैंने... दोनों बार... उसकी एक नहीं सुनी।
मैंने गाँव के प्रधान को फ़ोन करके बुलाया। मालती को उसके मायके वालों के पास भिजवाया गया। और मैं उसी दोपहर... अपना सामान लेकर... झाँसी लौट आया।
दो हफ़्ते तक मैं सोता रहा। बस सोता रहा। धीरे-धीरे वज़न वापस आया। चेहरा ठीक हुआ। सिर के पीछे बाल भी आ गए। मैंने ख़ुद को समझा लिया... ख़त्म हो गया। काली पोथी जल गई। वो पेड़ हरा हो गया। आचार्य शिवदत्त मुक्त हो गए... या ख़त्म हो गए।
मैं ग़लत था।
एक दिन मैं बैठे-बैठे... उस रात के बारे में सोच रहा था। उसका सवाल। वो कौन सा धन है... जो बाँटने से बढ़ता है... और छिपाने से सड़ जाता है।
और अचानक मेरे पूरे बदन में ठंड दौड़ गई।
अनुराग भाई... वो सवाल था ही नहीं। वो एक मंत्र था। एक इजाज़त। जिस आदमी ने दो सौ साल पहले अपना ज्ञान छिपाया था... और उसी से सड़कर राक्षस बना था... उसे मुक्ति तब मिलती... जब कोई उसे बाँटने की इजाज़त दे। जब कोई ख़ुद अपने मुँह से कहे... कि विद्या बाँटने से बढ़ती है।
मैंने कहा था। अपने मुँह से।
और तब मुझे समझ आया... कि ख़तरा कभी ग़लत जवाब में था ही नहीं।
ब्रह्मराक्षस का प्रश्न पहेली नहीं होता भाई... सौदा होता है। ग़लत उत्तर दो... तो वो उसी रात तुम्हें खा जाता है। और सही उत्तर दो... तो वो तुम्हें जाने ज़रूर देता है... लेकिन तुम्हारे मुँह से निकला वो उत्तर... तुम्हारा वचन बन जाता है।
पुरानी रीत है... जो गुरु के प्रश्न का सही उत्तर दे... वो उसका शिष्य हो जाता है। और शिष्य का धर्म है... गुरु की विद्या को आगे बाँटना।
भग्गो काका ने आधी बात बताई थी... सही जवाब दोगे तो जाने देगा। ये नहीं बताया... कि किस क़ीमत पर। और वो जान भी नहीं सकते थे। ये बात मुझे झाँसी लौटकर पता चली। पोथी घर के दरवाज़े पर जो ताँबे की पट्टी जड़ी थी... पहले दिन आदतन मैंने उसकी भी एक फ़ोटो खींच ली थी। उस वक़्त मुझे संस्कृत नहीं आती थी। अब आती थी।
उस पट्टी पर पाठक परिवार ने अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए लिखा था... प्रश्न का उत्तर मत देना। मौन रहना।
और उसके नीचे एक और पंक्ति... ये रहस्य सिर्फ़ कुल के सबसे बड़े पुरुष को बताया जाए। किसी नौकर को नहीं। किसी बाहर वाले को नहीं।
क्यों? क्योंकि उन्हें डर था... कि जिसे इस सौदे का पता होगा... वो किसी दिन लालच में... जानबूझकर सही उत्तर दे देगा। विद्या के बदले... उसका शिष्य बनना क़बूल कर लेगा।
इसलिए नौकरों को बस इतनी कहानी सुनाई जाती थी... सही जवाब दोगे तो जाने देगा। भग्गो काका ने पचास साल उस घर की सेवा की... और उनके हिस्से भी बस यही आधा सच आया। पूरा सच जानने वाला आख़िरी आदमी था... रघुनाथ। जो पाँच साल पहले... उस राज़ को अपने साथ ले गया।
लेकिन मालती जानती थी। पाँच साल उसके अंदर क़ैद रहकर... वो उसकी हर चाल पहचान गई थी। इसीलिए उसने ये नहीं कहा कि सही जवाब देना। उसने कहा था... मत बोलना। न सही... न ग़लत। उस कमरे से बचकर निकलने का एक ही रास्ता था... चुप रहना।
और मैंने... डर के मारे... सही जवाब दे दिया। मुझे लगा मैंने अपनी जान बचाई है। असल में... मैंने उसका शिष्य बनना क़बूल किया था।
और उसने क्या कहा था? अब ये तेरा वचन है। मैंने छिपाया था... तू बाँटेगा। जा... अब इस कमरे को मेरी ज़रूरत नहीं।
मुझे लगा था... वो हार मानकर जा रहा है। वो हार नहीं रहा था भाई। वो घर बदल रहा था। और उसका नया घर... पहले ही तैयार हो चुका था।
मैंने काँपते हाथों से लैपटॉप खोला। उस आख़िरी रात के स्कैन चेक किए।
उस रात मैं काली पोथी लेकर भागा था... और लैपटॉप वहीं पोथी घर में छूट गया था। स्कैनर से जुड़ा हुआ। डोंगल लगा हुआ। अपलोड का बटन मैंने कभी नहीं दबाया था। लेकिन कंपनी के सॉफ़्टवेयर में ऑटो-सिंक हमेशा चालू रहता है... जैसे ही नेटवर्क मिले... नई फ़ाइलें अपने आप ऊपर चली जाती हैं। और उस गाँव में नेटवर्क... रात भर आता-जाता रहता था। लॉग में लिखा था... रात तीन बजकर तैंतीस मिनट। बीस फ़ाइलें। अपलोड सफल।
तीन बजकर तैंतीस मिनट। ठीक वही वक़्त... जब मैं बेल के पेड़ के नीचे बैठा... पोथी को जलते देख रहा था।
फिर मैंने लैपटॉप का स्कैन वाला फ़ोल्डर खोला। स्कैनर हर पन्ने को अपने आप एक नंबर देता है। एक से बीस तक... सब फ़ाइलें थीं।
और उनके नीचे... एक और फ़ाइल। नंबर इक्कीस।
मैंने उसकी जानकारी खोली। जहाँ लिखा होता है कि फ़ाइल किस मशीन से बनी... वो जगह ख़ाली थी। स्कैनर का कोई रिकॉर्ड नहीं। और हो भी कैसे सकता था... उस सुबह जब मैं लैपटॉप लेने पोथी घर गया था... तो स्कैनर की तार मैंने ख़ुद फ़र्श पर निकली पड़ी देखी थी।
मैंने सरकारी पोर्टल खोला। पाठक परिवार का पूरा संग्रह वहाँ था... पब्लिक में। कोई भी देख सकता था।
मैंने काली पोथी वाला फ़ोल्डर खोला।
उसमें बीस नहीं... इक्कीस फ़ाइलें थीं।
इक्कीसवाँ पन्ना... जो मैंने कभी स्कैन ही नहीं किया था... जो मेरी आँखों के सामने राख हुआ था... वो वहाँ था। साफ़। पूरा। और उसकी फ़ाइल बनने का वक़्त था... सुबह पाँच बजकर बारह मिनट। ठीक वही वक़्त... जब आख़िरी पन्ना आग में गया था।
आग ने कागज़ को जलाया था भाई। उसे नहीं। भग्गो काका का पहला नियम... उसकी हर नकल... उसी का शरीर है। उसकी बीस नकलें... पहले ही ऊपर पहुँच चुकी थीं। आख़िरी पन्ने के लिए उसे किसी स्कैनर की ज़रूरत नहीं थी। उसने ख़ुद को... अंदर से... लिख लिया।
उस पन्ने पर... ऊपर से नीचे तक... बारीक देवनागरी में कुछ लिखा था। और सबसे नीचे... कोने में... वही छोटी सी तस्वीर थी। मुंडा सिर। लंबी चोटी। बड़ी-बड़ी आँखें।
लेकिन इस बार... वो ऊपर नहीं देख रहा था।
वो सीधा... स्क्रीन के बाहर देख रहा था। मेरी तरफ़।
और उस तस्वीर के नीचे... किसी ने हाथ से लिखा था... दो शब्द।
पढ़ा गया।
भाई... वो लिखावट... मेरी अपनी थी।
उस पन्ने के नीचे एक काउंटर था। पोर्टल उसे पाठक कहता है। और ये गिनती... फ़ोन की नहीं... लॉगिन की नहीं... इंसानों की है। एक इंसान... कितने भी फ़ोन से... कितनी भी बार खोले... एक ही गिना जाता है। ठीक भग्गो काका के तीसरे नियम की तरह। जब मैंने पहली बार देखा... तो लिखा था... तीन सौ बारह।
मैंने ख़ुद आज़माया था। अपने फ़ोन से खोला। फिर लैपटॉप से। फिर ऑफ़िस वाले दूसरे अकाउंट से। गिनती सिर्फ़ एक बढ़ी। सिर्फ़ एक।
फिर एक रात... मेरी पत्नी ने मेरा लैपटॉप खुला देखा। उसी लॉगिन से... उसी स्क्रीन पर... उसने बस वो पन्ना पढ़ लिया। और गिनती... एक और बढ़ गई।
वो काउंटर मशीनें नहीं गिन रहा था भाई। वो लोग गिन रहा था।
आज... जब मैं आपको ये चिट्ठी लिख रहा हूँ... एक साल बाद... वो नंबर है... नौ सौ सत्तानवे।
हज़ार में... तीन कम।
इस साल मार्च में मेरी शादी हुई। मेरी पत्नी बहुत अच्छी है अनुराग भाई। लेकिन पिछले कुछ हफ़्तों से... रात ठीक बारह बजे... वो नींद में उठकर बैठ जाती है। उसका बदन बर्फ़ जैसा ठंडा होता है। और वो मेरे कान के पास आकर... संस्कृत में कुछ बोलती है।
मुझे उसका मतलब समझ आता है।
वो कहती है... बस तीन और।
और अब मुझे उसकी वो बात भी समझ आती है... तू बाँटेगा।
आज मैं ये कहानी आपको भेज रहा हूँ भाई। और सच कहूँ... मुझे नहीं पता... ये मैं ख़ुद भेज रहा हूँ... या उसका वचन पूरा कर रहा हूँ।
और अनुराग भाई... मैं जानता हूँ आपके चैनल पर हज़ारों लोग कहानियाँ सुनते हैं।
इसलिए एक गुज़ारिश है। ये कहानी सुनाते वक़्त... उस पोर्टल का नाम मत बताइएगा। उस गाँव का नाम मत बताइएगा।
क्योंकि यहाँ दो बातें हैं भाई... और मुझे नहीं पता... इनमें से कौन सी सच है।
पहली बात... कि पोर्टल का वो काउंटर सिर्फ़ उन्हीं को गिनता है... जो उस पन्ने को अपनी आँखों से पढ़ते हैं। अगर ऐसा है... तो आपके सुनने वाले सुरक्षित हैं। बस तब तक... जब तक उनमें से कोई उस पन्ने को ढूँढने न निकल पड़े।
दूसरी बात... भग्गो काका का दूसरा नियम। जो उसके शब्द अपने मन में उतार ले... चाहे पढ़कर... चाहे किसी के मुँह से सुनकर... वो उसका पाठक है। और आज ये कहानी... उसका नाम... उसका प्रश्न... उसका वचन... सब कुछ... आपके सुनने वालों के कानों तक जा रहा है।
अगर पहली बात सच है... तो गिनती अब भी नौ सौ सत्तानवे पर रुकी है।
और अगर दूसरी बात सच है... तो एक गिनती और भी चल रही है। जो किसी पोर्टल पर नहीं दिखती।
और मुझे नहीं पता... वो अभी कितने पर है।

Writer
Pretika
Story
ब्रह्मराक्षस
Chapter
Single story
Category
Tantrik & Black Magic
Reading time
31 min
Words
6020
Language
Hindi (हिंदी)
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