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Part 7: सपना
Piyashi Atma · Ghost Stories · 16 मिनट
"...एक सौ नौ।"
विक्रांत ने वह हिस्सा ग्यारह बार सुना। फिर बारहवीं बार headphones उतारे, और कमरे की खामोशी उसके कानों में किसी भारी, गीले कपड़े की तरह आकर बैठ गई।
खिड़की के बाहर अभी पूरा अंधेरा था। लालटेन की लौ स्थिर थी। सीधी, शांत, किसी तरफ़ नहीं झुकी हुई। पलंग के नीचे वाला recorder अब भी चल रहा था, उसकी लाल बत्ती फ़र्श पर एक छोटा-सा, खून जैसा धब्बा बना रही थी।
उसने वह किया जो उसे पिछली बार करना चाहिए था, इरा वाली आवाज़ के बाद: साँस ढूँढी।
उसने गिनती के एक हिस्से को zoom किया। "...नब्बे... इक्यानबे..." Spectrogram पर, शब्दों के बीच की धुँधली खाली जगहों में, उसने अपनी नज़रें गड़ा दीं।
साँस थी।
छोटी, हल्की, धुँधली लकीरें। हर दो-तीन संख्याओं के बाद। हवा का अंदर जाना, बहुत धीमे, जैसे कोई नींद में साँस ले रहा हो। होंठों की एक बारीक-सी चट, "इक्यानबे" के "क" से ठीक पहले।
इरा वाली आवाज़ में ये नहीं था। इसमें था।
विक्रांत ने अपने हाथों को देखा। उसके सामने दो ही रास्ते थे, और उसका दिमाग़ उन दोनों के बीच किसी फँसे हुए जानवर की तरह भाग रहा था।
या तो यह आवाज़ किसी ऐसी चीज़ की थी जो अब साँस लेना भी सीख गई थी।
या यह आवाज़ उसकी थी। सच में उसकी। किसी जिस्म से निकली, किसी फेफड़े से, किसी गले से। उसके गले से। रात दो बजकर चौदह मिनट पर, एक ऐसी कोठरी में जिसका ताला बंद था, जिसकी चाबी उसकी जेब में थी।
उसने अपनी jacket की जेब टटोली। पीतल की चाबी वहीं थी, ठंडी।
उसने अपने पैर देखे। सूखे। साफ़।
उसने पलंग के नीचे वाले recorder को उठाया और उसकी file खोली। अपने कमरे की रात भर की recording। अगर वह रात को उठा होता, दरवाज़ा खोला होता, सीढ़ियाँ उतरा होता, तो यहाँ होता। कुंडी की आवाज़, उसके कदम।
उसने दो बजे के आसपास का हिस्सा खोला।
वहाँ कुछ नहीं था। उसकी अपनी साँसें, नींद की धीमी, गहरी लय। पलंग की लकड़ी की एक हल्की चरमराहट, करवट। फिर साँसें। सत्रह मिनट तक, बिना रुके, बिना बदले।
वह सोया हुआ था। अपने पलंग पर। उसी वक़्त जब उसकी आवाज़, साँसों के साथ, नीचे एक बंद कोठरी में सीढ़ियाँ गिन रही थी।
विक्रांत ने laptop बंद कर दिया।
"आप ये किसी और को सुनाएँगे?" इरा ने पूछा।
वे पीछे के बरामदे पर बैठे थे, आँगन वाले हिस्से से दूर, सामने वाली मेहराबों के नीचे, जहाँ दिन की रोशनी थोड़ी ज़्यादा आती थी। इरा ने दोनों के लिए चाय बनाई थी, और विक्रांत का कुल्हड़ उसके हाथों में ठंडा हो चुका था।
"किसे? Police को? कहूँ कि मेरी आवाज़ मेरी मर्ज़ी के बिना एक ताला-बंद कमरे में गिनती कर रही थी?"
"किसी doctor को।"
विक्रांत ने उसकी तरफ़ देखा। इरा की नज़र में कोई तंज़ नहीं था। बस एक सीधा, शांत सवाल।
"आपको लगता है मैं पागल हो रहा हूँ।"
"मुझे लगता है आप छह रात से ठीक से सोए नहीं हैं, आपके पिता को गुज़रे दो हफ़्ते भी नहीं हुए, और आप उस जगह बैठे हैं जहाँ आपका भाई..." वह रुकी। "आप forensic expert हैं, विक्रांत। आप अदालत में एक ऐसे गवाह के बारे में क्या कहेंगे जिसकी हालत ये हो?"
"कि उसकी गवाही पर पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता।"
"हाँ।"
"पर recordings गवाह नहीं हैं। Recordings झूठ नहीं बोलतीं, थकती नहीं, दुखी नहीं होतीं।"
इरा ने अपना कुल्हड़ नीचे रखा। "Recordings को कौन सुनता है?"
विक्रांत चुप रहा। उसके पास इसका जवाब था, पर वह जवाब उसे अच्छा नहीं लगा।
इरा ने आँगन की तरफ़ देखा, जहाँ कोहरा पत्थर की पटियों पर लिपटा पड़ा था, जैसे कोई जानवर सो रहा हो।
"उस रात क्या हुआ था?" उसने पूछा। बहुत धीमे। "1999 में।"
"मुझे याद नहीं।"
"आपको कुछ तो याद है। हर बार जब अंशु का नाम आता है, आपका चेहरा बदल जाता है। आपके कंधे ऊपर हो जाते हैं, जैसे कोई चोट से बचने के लिए करता है।" उसने उसकी तरफ़ देखा। "मैं archivist हूँ। मेरा काम है वो पढ़ना जो लिखा नहीं गया।"
विक्रांत ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।
फिर, उसे खुद पता नहीं क्यों, शायद थकान की वजह से, शायद इसलिए कि यह कोठी उसके अंदर की हर दीवार पर धीरे-धीरे पानी की तरह रिस रही थी, उसने वह कहा जो उसने तेईस साल में किसी से नहीं कहा था।
"मैंने उसे भेजा था।"
इरा हिली नहीं।
"हम रात को चुपके से निकले थे। बड़ों को नहीं पता था। मेरे हाथ में लालटेन थी। मैंने उससे कहा कि वो डरपोक है। कि वो नीचे नहीं जा सकता। सातवीं सीढ़ी तक जाकर दिखाए।" उसका गला सूख गया। "वो गया। छह साल का बच्चा। मेरी बात रखने के लिए। और नीचे से कुछ आया, कोई आवाज़, और मैं..." उसकी आवाज़ टूटी। "मैं भाग गया। उसे वहीं छोड़कर। लालटेन तक छोड़ दी। फिर मुझे कुछ याद नहीं। अगली याद Delhi की है, हफ़्तों बाद। और सब कहते थे अंशु तालाब में डूबा।"
"किसने कहा? तालाब?"
"माँ ने।"
"माँ ने कब कहा? आपको याद है?"
विक्रांत ने सोचा। "नहीं। बस... हमेशा से पता था।"
"और आपने कभी किसी को ये नहीं बताया? कि आप उसके साथ थे?"
"कैसे बताता? कि मैंने उसे मरने भेजा?" वह हँसा, एक सूखी, टूटी आवाज़। "मुझे लगता था कि अगर मैं चुप रहूँ, तो शायद... शायद ये सच नहीं होगा।"
इरा ने उसे देखा। उसकी आँखों में दया थी, पर कुछ और भी। एक तरह की तीखी, सावधान ध्यान, जैसे वह किसी पुरानी पांडुलिपि की एक पंक्ति को बार-बार पढ़ रही हो क्योंकि उसमें कोई शब्द ठीक नहीं बैठ रहा।
"आपने कहा, लालटेन आपके हाथ में थी," उसने धीरे से कहा। "और आप ऊपर खड़े थे।"
"हाँ।"
"और वो नीचे गया।"
"हाँ।"
इरा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना कुल्हड़ उठाया, उसमें बची ठंडी चाय को देखा, और फिर उसे वापस रख दिया।
विक्रांत को एक पल के लिए लगा कि वह कुछ पूछने वाली है। कोई ऐसा सवाल जो उसके होंठों पर था। फिर उसने मुँह बंद कर लिया, और उठ गई।
दोपहर को एक काली SUV फाटक तक आई।
पुलिया पर नहीं रुकी। सीधी आई, बजरी उछालती, और फाटक के सामने इतनी ज़ोर से रुकी कि उसके टायरों ने ज़मीन पर दो लंबी लकीरें खींच दीं। दरवाज़ा खुला और एक आदमी उतरा। पैंतालीस के आसपास, अच्छे कट का overcoat, महँगे जूते जो इस कीचड़ के लिए नहीं बने थे, आँखों पर धूप का चश्मा, जबकि धूप कहीं नहीं थी।
"Mr. Sahgal?" उसने विक्रांत को देखकर पूछा, और हाथ बढ़ाया। "आशीष अरोड़ा। Terai Retreats।"
उसकी आवाज़ ऊँची थी। साफ़, आत्मविश्वासी, बड़े शहर की board meetings वाली आवाज़। और विक्रांत ने देखा कि आँगन के उस पार, रसोई के दरवाज़े पर खड़े रघु काका ने उस आवाज़ के आँगन की दीवारों से टकराने पर अपना सिर हल्का-सा झुका लिया, जैसे बारिश में कोई सिर झुकाता है।
कबीर अंदर से लगभग भागता हुआ आया।
"आशीष जी! आपने बताया नहीं, मैं Bahraich आ जाता..."
"आपने बताया नहीं, कबीर, कि आपके cousin ने sign करने से मना कर दिया है।" अरोड़ा ने धूप का चश्मा उतारा। उसकी आँखें छोटी और सख़्त थीं। "मुझे ये मेरे lawyer से पता चला। आपसे नहीं।"
"वो... एक misunderstanding है। विक्रांत अभी आया है, उसके पिता..."
"मुझे अफ़सोस है," अरोड़ा ने विक्रांत की तरफ़ मुड़कर कहा, आवाज़ में बिल्कुल अफ़सोस नहीं। "पर business business है। आपके cousin ने चालीस लाख का advance लिया है। सितंबर में। एक ऐसी property के लिए जिसका पूरा title उनके पास नहीं था। Agreement में साफ़ लिखा है कि इकतीस दिसंबर तक दोनों मालिकों के signature होंगे।" उसने अपनी घड़ी देखी, जैसे तारीख़ वहाँ लिखी हो। "बीस दिन बचे हैं।"
विक्रांत ने कबीर को देखा।
कबीर का चेहरा राख जैसा हो गया था। वह कुछ कहना चाह रहा था, उसके होंठ हिल रहे थे, पर कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी।
"चालीस लाख," विक्रांत ने धीरे से कहा।
"और वो पैसा कहाँ गया," अरोड़ा ने कहा, "ये आप अपने cousin से पूछिए। मेरी दिलचस्पी बस इसमें है कि या तो इकतीस तक signature, या एक जनवरी को ब्याज समेत refund। नहीं तो मेरे lawyers बात करेंगे।"
वह पलटा, फिर रुका, और पहली बार कोठी को ठीक से देखा। उसकी मेहराबें, उसके झरोखे, कोहरे में डूबी उसकी दीवारें।
"Beautiful property," उसने कहा। "Shame होगी अगर ये court case में बीस साल सड़ती रहे।"
SUV चली गई।
कबीर वहीं खड़ा रहा, फाटक को देखता हुआ, उसकी बाँहें शरीर के साथ लटकी हुई, जैसे किसी ने उसके अंदर की सारी तारें काट दी हों।
"चालीस लाख, कबीर?"
"मैं डूब रहा हूँ, यार।" कबीर ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। उसकी आवाज़ में अब कोई चमक नहीं थी, कोई client वाली मुस्कान नहीं। बस एक थकी, खोखली सच्चाई। "दो साल से। एक project फँसा, फिर दूसरा। लोगों से उधार लिया, फिर उनका चुकाने के लिए और लोगों से। ये advance उसी में गया। सब।" उसने हँसने की कोशिश की। "मुझे लगा था, चाचाजी को तो इस कोठी से कोई मतलब ही नहीं, वो sign कर देंगे। फिर वो..."
"मर गए।"
"हाँ।" कबीर ने आख़िरकार उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं। "और मरते-मरते तुझसे कह गए कि बेचना मत। वाह।"
विक्रांत ने कुछ नहीं कहा।
कबीर ने अपनी jacket की जेब से cigarette निकाली, और इस बार जलाई। उसके हाथ इतने काँप रहे थे कि lighter तीन बार में जला।
"तुझे पता है मैं यहाँ रातें कैसे काटता हूँ?" उसने धुआँ छोड़ते हुए कहा। बहुत धीमे। "नींद की गोली। दो। कभी तीन। क्योंकि अगर नहीं लूँ तो..." वह रुका।
"तो?"
कबीर ने आँगन के पीछे की तरफ़ देखा। उस गलियारे की तरफ़ जो बावड़ी तक जाता था।
"तो कोई मुझे बुलाता है," उसने कहा। "रात को। तीन बजे के आसपास। दरवाज़े के बाहर से।"
विक्रांत की गर्दन के पीछे कुछ ठंडा रेंगा। "कौन?"
कबीर ने cigarette का एक लंबा कश लिया। जब बोला, तो उसकी आवाज़ किसी बहुत छोटे बच्चे जैसी हो गई थी।
"मम्मी।" उसने कहा। "वो कहती हैं, 'कबीर, बेटा, एक गिलास पानी दे दे।' जैसे वो मेरे पंद्रहवें साल में कहती थीं, जब वो बीमार थीं। आख़िरी हफ़्तों में। हर रात।"
"और तू..."
"मैं जवाब नहीं देता।" कबीर ने सिर हिलाया, जल्दी-जल्दी। "कभी नहीं। मैं तकिया मुँह पर दबा लेता हूँ और गोली खा लेता हूँ। तीन महीने से।"
तीन महीने। सितंबर से।
विक्रांत ने उसे देखा, और पहली बार कबीर के झूठ के पीछे का चेहरा देखा। लालच नहीं। डर। एक ऐसा डर जो हर रात उसके दरवाज़े पर पानी माँगने आता था।
"सितंबर में," विक्रांत ने धीरे से कहा, "survey वाली रात। क्या हुआ था, कबीर?"
कबीर ने cigarette फेंकी और उसे जूते से मसल दिया।
"बीस दिन," उसने कहा, और अंदर चला गया।
शाम को विक्रांत रघु काका के क्वार्टर में गया।
यह कोठी के बाहर था, पूर्वी दीवार के साथ, एक छोटी-सी कोठरी, कच्ची, खपरैल की छत वाली। रघु काका ने उसे यहाँ बुलाया नहीं था। विक्रांत बस आया था, यह पूछने कि गाँव में कोई doctor है या नहीं। उसके सिर का दर्द अब एक लगातार, गहरी धमक बन चुका था।
दरवाज़ा खुला था। रघु काका अंदर नहीं था।
विक्रांत ने झाँका। एक चारपाई, उस पर एक पतली रज़ाई। एक कोने में मिट्टी का चूल्हा। दीवारों पर, बाकी गाँव की तरह, टाट और पुराने कंबल टँगे थे, कीलों से। एक कोने में लकड़ी का एक छोटा-सा संदूक।
और संदूक के ऊपर, एक लालटेन।
विक्रांत की नज़र उस पर रुकी, और फिर हटी नहीं।
पुरानी लालटेन, पीतल की, जिसका रंग अब हरा-भूरा पड़ चुका था। उसकी काँच की चिमनी में एक दरार थी, ऊपर से नीचे तक, एक टेढ़ी-मेढ़ी लकीर। और उसके हैंडल पर एक धागा बँधा था। लाल ऊन का। फीका, गाँठों भरा, बरसों पुराना।
उसके अंदर कुछ हिला। एक छोटी, तेज़ मछली, अंधेरे पानी की सतह के ठीक नीचे।
उसने यह लालटेन देखी थी।
नहीं, देखी नहीं थी। उसे याद थी। उस दरार की टेढ़ी लकीर। उस लाल धागे की गाँठ, जो किसी ने इसलिए बाँधी थी ताकि अंधेरे में लालटेन पहचानी जा सके। किसी छोटे हाथ ने। अपनी टोपी से एक धागा खींचकर।
उसे पता था कि यह धागा कहाँ से आया था। उसे पता था, और उसे नहीं पता था कि उसे कैसे पता था।
"छूना मत।"
रघु काका उसके पीछे खड़ा था, दरवाज़े पर, लकड़ियों का एक गट्ठर कंधे पर।
"ये कहाँ से आई, काका?"
बूढ़े ने गट्ठर नीचे रखा। बहुत धीरे। उसने लालटेन की तरफ़ देखा, फिर विक्रांत की तरफ़।
"उस सुबह," उसने कहा। "जिस सुबह आप लोग गए। बावड़ी की पहली सीढ़ी पर पड़ी थी। बुझी हुई।" वह रुका। "मैंने उठा ली। फेंकी नहीं।"
"क्यों?"
रघु काका ने जवाब नहीं दिया। उसने संदूक के पास जाकर लालटेन को देखा, छुए बिना, जैसे कोई किसी पुरानी क़ब्र को देखता है।
"धागा किसने बाँधा था?" विक्रांत ने पूछा। उसकी आवाज़ उसे खुद दूर से आती लगी।
"छोटे वाले ने।" रघु काका ने कहा। "अपनी टोपी से खींचकर। उस शाम। मैंने देखा था। आँगन में बैठा था, दाँत से गाँठ बाँध रहा था।"
अंशु। लाल ऊनी टोपी।
विक्रांत ने लालटेन को देखा। उसे वह याद आई, अपनी उस एक याद में। उसके हाथ में। ऊपर की सीढ़ी पर।
पर अगर धागा अंशु ने बाँधा था, तो यह अंशु की लालटेन थी।
अंशु की लालटेन। मेरे हाथ में।
उसके अंदर फिर कुछ हिला, और इस बार वह मछली थोड़ा और ऊपर आई, थोड़ा और देर तक रुकी। फिर डूब गई।
"मुझे doctor चाहिए था," उसने कहा। "सिर दर्द के लिए।"
रघु काका ने उसे बहुत देर तक देखा।
"यहाँ doctor नहीं है," उसने कहा। "Bahraich में है।" फिर, थोड़ा रुककर: "आप आज रात अपना दरवाज़ा अंदर से बंद रखिए। और चाबी तकिए के नीचे।"
उसने चाबी तकिए के नीचे रखी। दरवाज़ा अंदर से बंद किया। कुंडी और ताला दोनों। लालटेन जलाकर पलंग के पास रखी।
और सो गया।
सपना धीरे-धीरे आया, जैसे कोई कमरा धीरे-धीरे अंधेरे से रोशनी में आता है।
ठंड। जनवरी की ठंड, जो उसने पहले भी महसूस की थी, पर इस बार पूरे शरीर में, नंगे पैरों में, जो पत्थर पर थे। एक सीढ़ी। गीली, फिसलन भरी, किनारों पर काई। उसके पैर उस पर टिके थे, छोटे पैर, बहुत छोटे।
वह नीचे देख रहा था। अंधेरा। सीढ़ियाँ नीचे उतरती हुई, एक के बाद एक, और कहीं बहुत नीचे, पानी की एक काली, चमकती सतह, जिसमें कुछ नहीं दिखता था।
ऊपर से रोशनी आ रही थी।
उसने गर्दन उठाई। ऊपर, सीढ़ियों के सिरे पर, आँगन के किनारे पर, एक लालटेन जल रही थी। उसकी काँच में एक टेढ़ी दरार थी। उसके हैंडल पर एक लाल धागा झूल रहा था। और उसे पकड़े हुए एक आकृति थी। बड़ी, उससे बहुत बड़ी, लालटेन की रोशनी के पीछे एक काली परछाई, जिसका चेहरा नहीं दिख रहा था।
"डरपोक," परछाई ने कहा।
एक बच्चे की आवाज़। बड़े बच्चे की। हँसती हुई, क्रूर, मज़ेदार।
"डरपोक है तू। नीचे जा के दिखा। सातवीं सीढ़ी तक।"
और उसके छोटे पैर नीचे की तरफ़ बढ़े। एक सीढ़ी। उसका दिल ज़ोर से धड़क रहा था, छोटा, तेज़, किसी चिड़िया जैसा। दूसरी सीढ़ी। पानी की गंध, काई की, ठंडे पत्थर की। तीसरी।
उसने गिनना शुरू किया। मन में। ताकि डर कम लगे।
चार। पाँच। छह।
ऊपर की रोशनी छोटी होती जा रही थी।
सात।
उसने रुककर ऊपर देखा। लालटेन अब बहुत दूर थी, एक पीला बिंदु। परछाई अब भी वहीं थी।
और फिर नीचे से किसी ने पुकारा।
एक नाम। उसका नाम। पानी की सतह से, अंधेरे से, बहुत पास से, बहुत प्यार से, जैसे कोई माँ बुलाती है।
सपने में उसने वह नाम सुना। साफ़। पर जागने की कोशिश करते हुए, सतह की तरफ़ उठते हुए, वह नाम उसके हाथों से फिसल गया, जैसे पानी से निकाली गई मछली।
उसके मुँह ने जवाब देने के लिए खुलना शुरू किया।
विक्रांत की आँख खुली, और कुछ पल वह नहीं जानता था कि वह कहाँ है।
ठंड। अब भी ठंड। पैरों में।
उसने छत देखी। पंखा, लोहे के डंडे पर। खिड़की से सलेटी, फीकी सुबह। उसका कमरा। उसका पलंग।
उसने साँस ली, एक लंबी, काँपती हुई साँस, और खुद को याद दिलाया: सपना था। बस सपना। Guilt का सपना। तुम उस रात के बारे में बात कर रहे थे, इरा के साथ, और तुम्हारे दिमाग़ ने उसे दोबारा चलाया। अंशु की नज़र से। क्योंकि तुम हमेशा सोचते हो कि उसने क्या देखा होगा। नीचे से। ऊपर की तरफ़। अपने बड़े भाई को।
यह तर्क था। Psychology। उसने इसके बारे में पढ़ा था। Survivor's guilt में लोग अक्सर मरने वाले की जगह से सपने देखते हैं।
उसने इस तर्क को कसकर पकड़ा और उठ बैठा।
और तब उसने गंध महसूस की।
गीला पत्थर। काई। वह गंध जो अब उसकी नाक में नहीं, उसके पूरे कमरे में थी, भारी, नम, जैसे किसी ने कमरे के बीच में एक कुएँ का मुँह खोल दिया हो।
उसने नीचे देखा।
पलंग के पास, फ़र्श पर, लालटेन बुझ चुकी थी। उसकी काँच पर नमी की बूँदें थीं।
और लालटेन के बगल में, लकड़ी के तख़्तों पर, कीचड़ के निशान थे।
गीले, गहरे भूरे-काले, उनमें हरे रेशे फँसे हुए। पैरों के निशान। दरवाज़े से पलंग तक आते हुए। एक लकीर में।
इस बार वे छोटे नहीं थे।
विक्रांत ने उन्हें देखा, और फिर उसकी नज़र अपने आप उसके दरवाज़े पर गई। कुंडी लगी थी। ताला लगा था। उसने तकिया उठाया। चाबी वहीं थी, जहाँ उसने रखी थी।
निशान दरवाज़े से शुरू होते थे, उसकी दहलीज़ के ठीक अंदर से। जैसे कोई बंद दरवाज़े के ठीक अंदर खड़ा हुआ हो, और फिर पलंग तक चलकर आया हो। बस आया। जाने का कोई निशान नहीं।
उसने अपने पैरों को रज़ाई के नीचे से बाहर निकाला।
वे काले थे।
तलवों से एड़ी तक, कीचड़ से सने, अब भी गीले। उँगलियों के बीच, नाख़ूनों के नीचे, हरे, रेशेदार, फिसलन भरे धागे। काई। उसने एक पैर उठाकर नाक के पास लाया, और वही गंध, ठंडे, सड़ते पत्थर की, एक सौ साल से धूप से दूर पड़े पानी की, उसके चेहरे पर आई।
उसके पैर बर्फ़ जैसे ठंडे थे। इतने ठंडे कि उन्हें छूने पर उसकी हथेली में दर्द हुआ। जैसे वे घंटों तक किसी ठंडे पानी में डूबे रहे हों।
उसने अपने बाएँ पैर को पलटा, तलवे की तरफ़। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
तलवे की कीचड़ में, एड़ी के पास, कुछ चिपका हुआ था। कुछ जो काई नहीं था। कुछ जो उस भूरे-काले-हरे रंग में बिल्कुल अलग दिख रहा था।
उसने उसे नाख़ून से निकाला। उसे अपनी उँगलियों के बीच रखा। खिड़की की फीकी रोशनी में उठाया।
ऊन का एक रेशा। मुड़ा हुआ, गीला, एक छोटी-सी गाँठ में बँधा।
लाल।
[Part 7 समाप्त]
- Writer
- Piyashi Atma
- Story
- जवाब मत देना
- Chapter
- 7 of 30
- Category
- Ghost Stories
- Reading time
- 16 min
- Words
- 3025
- Language
- Hindi (हिंदी)
- Price
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